एक पत्र पढने का सुयोग


एक पत्र पढने का सुयोग




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क.वा.





मित्रो



“नरसी भगत” नाम की फिल्म में हेमंत कुमार आदि का गाया “दरशन दो घनश्याम नाथ” भजन बहुत लोकप्रिय हुआ है। रचनाकार जाने माने कवि गोपाल सिंह नेपाली हैं। इस भजन के बोल पत्र के अन्त में दे रहा हूं।


नेपाली जी द्वारा गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचना “उर्वशी” का बंगला से हिन्दी में सुन्दर अनुवाद/भाष्यांतर १९६० में साप्ताहिक हिन्दुस्तान में देखा तो मुझे इतना अच्छा लगा कि पूरी लम्बी कविता को कण्ठस्थ कर लिया। तब मुझे बंगला नहीं आती थी। नेपाली जी ने कई हिन्दी फिल्मों के लिये गाने लिखे हैं और उनका नाम बम्बई के साहित्यकारों में अनजाना नहीं होना चाहिये।


इधर लगभग ६-८ सप्ताह से एक फिल्म “स्लमडौग मिलियनेयर” की बहुत चर्चा सुन रहा था। लोग कहते थे कि इसे सर्वश्रेष्ठ चलचित्र की श्रेणी में ऑस्कर के लिये मनोनीत किये जाने की संभावना है। सो, चार दिन पहले अपने राम बहुत दिनों के बाद एक सिनेमा हॉल में घुस गये इसे देखने के लिये।


संभव है कि यह औसत हिन्दी फिल्मों की अपेक्षा अच्छी फिल्म कहलाये। कुछ कैमरा तकनीक के आधार पर, कुछ निर्देशन के कारण। लेकिन कुछ बातें ऐसी खलीं कि सिनेमा हॉल से निकलते समय मन थोड़ा खिन्न था कि ऐसा अनुभव नहीं हुआ जिसकी भीतर जाते समय कल्पना की थी।


बाकी बातें अलग, ई-कविता में यह सब लिखने का उद्देश्य यह है कि फिल्म में एक प्रश्न उठाया गया कि “दरशन दो घनश्याम नाथ” यह भजन लिखने वाले कवि कौन थे। चार विकल्प दिये गये: सूरदास, तुलसीदास, मीराबाई, और कबीर। फिर बताया गया कि सही उत्तर है: सूरदास। ऐसा लगता है कि फिल्म के साहित्यिक सलाहकार (ऐसा कोई व्यक्ति होता होगा, नहीं तो होना चाहिये) महाशय ने सूरदास की रचना “अँखियां हरि दर्शन की प्यासी” कभी देखी होगी और वो उससे भ्रमित हो गये। कारण चाहे जो हो, एक गंभीर व महत्त्वाकांक्षी चलचित्र के निर्माता से ऐसी भूल अपेक्षित नहीं है। एक ओर तो नेपाली जी को उनकी रचना के लिये उपयुक्त श्रेय नहीं मिल, दूसरी ओर अब इस फिल्म के माध्यम से और तत्पश्चात अन्तर्जाल पर लोगों को तथ्य से दूर रखा जा रहा है।

पाठकों से निवेदन है कि वे विचार करें कि क्या इसका प्रतिवाद करना उचित व आवश्यक है और, यदि हां, तो किस प्रकार?

- घनश्याम




दरशन दो घनश्याम नाथ मोरी, अँखियाँ प्यासी रे

मन मंदिर की ज्योति जगा दो, घट घट बासी रे

मंदिर मंदिर मूरत तेरी

फिर भी ना दीखे सूरत तेरी

युग बीते ना आई मिलन की

पूरणमासी रे ...

द्वार दया का जब तू खोले

पंचम सुर में गूंगा बोले

अंधा देखे लंगड़ा चल कर

पहुँचे कासी रे ...

पानी पी कर प्यास बुझाऊँ

नैनों को कैसे समझाऊँ

आँख मिचौली छोड़ो अब

मन के बासी रे ...

निबर्ल के बल धन निधर्न के

तुम रखवाले भक्त जनों के

तेरे भजन में सब सुख पाऊँ

मिटे उदासी रे ...

नाम जपे पर तुझे ना जाने

उनको भी तू अपना माने

तेरी दया का अंत नहीं है

हे दुख नाशी रे ...

आज फैसला तेरे द्वार पर

मेरी जीत है तेरी हार पर

हार जीत है तेरी मैं तो

चरण उपासी रे ...

द्वार खड़ा कब से मतवाला

मांगे तुम से हार तुम्हारी

नरसी की ये बिनती सुनलो

भक्त विलासी रे ...

लाज ना लुट जाये प्रभु तेरी

नाथ करो ना दया में देरी

तीन लोक छोड़ कर आओ

गंगा निवासी रे ...



2 comments:

  1. ये तो बहुत ही गल्त बात है. हर दृष्टि से. इस का क्षमायाचना सहित भूल सुधार होना चाहिये. इधर ध्यान दिलाने का बहुत २ शुक्रिया.

    रामराम.

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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