भारत का यौवन रहस्य

रसांतर


भारत का यौवन रहस्य







दुनिया भर के मंचों पर भार को युवाओं का देश बताया जा रहा है, क्योंकि आँकडे ऐसा ही कहते हैं। सभी समृद्ध देशों में वृद्धजनों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। आधुनिक चिकित्सा पद्धति ने उन्हें जीवन भर स्वस्थ रहना भले ही न सिखाया हो, पर लंबी से लंबी आयु में भी और तरह-तरह की बीमारियों से ग्रस्त रहते हुए भी मरने का विकल्प बंद कर रखा है। ऐसा भी नहीं है कि इन वृद्ध लोगों से समाज कुछ सार्थक काम ले रहा हो। आधुनिक जीवन व्यवस्था में इसकी कोई गुंजाइश ही नहीं है। यहाँ बच्चों और बूढ़ों से काम लेना मना है। भारत में भी यही संस्कृति रोपने का दौर शुरू हो चुका है। ऐसे में कार्यशाली आबादी युवाओं की ही रह जाएगी। यहाँ भारत की स्थिति बहुत शानदार है। अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, इटली, जापान आदि की तुलना में हमारे यहाँ प्रति लाख आबादी में युवाओं की संख्या बहुत ज्यादा है। हमारे कई मंत्री और उद्योगपति इस तथ्य पर खुशी और गर्व का इजहार कर चुके हैं। उनका कहना है कि भारत अगर अपनी इस विशाल युवा शक्ति का ठीक से इस्तेमाल करे. तो हमारी विकास दर तेजी से बढ़ सकती है। विश्व की अन्य सभ्यताएँ बुढ़ा रही हैं, भारत युवा हो रहा है।



यह भारत की शक्ति है या उसकी कमजोरी है? इससे हमारे विकास का पता चलता है या अविकास का? भारत की इस युवा तस्वीर का सत्य बहुत खतरनाक है। पहली बात यह है कि भारत की शिशु मृत्यु दर समृद्ध देशों की तुलना में काफी ज्यादा है। यहाँ तक कि यह श्रीलंका और पाकिस्तान की तुलना में भी अधिक है। पूरी आबादी में बच्चों का प्रतिशत कम हो, तो युवा लोगों का प्रतिशत अपने आप बढ़ जाता है। दूसरी ओर, हमारे देश में बूढ़े लोगों की संख्या भी समृद्ध लोगों की तुलना में कम है। उनके बूढ़े बहुत देर से मरते हैं, हमारे यहाँ बूढ़ा होने का मौका सभी को नहीं मिलता। संपन्न शहरी आबादी में बूढ़े और अति बूढ़े ज्यादा संख्या में हैं, क्योंकि जीवन की डोर को बढ़ानेवाली पद्धतियाँ उनकी पहुँच के भीतर हैं। लेकिन गाँवों और कस्बों में साठ-सत्तर के बाद जीवित बचे रहने की कोई गारंटी नहीं है। न डॉक्टर हैं, न अस्पताल। कोई ऐसा सपोर्ट सिस्टम नहीं है जो बूढ़े लोगों की देखभाल कर सके। इसलिए हमारे यहाँ वृद्ध मृत्यु दर भी काफी ज्यादा है। यह तथ्य भी भारत में युवा आबादी के अनुपात को बढ़ाने में मदद करता है। इसलिए इस बात पर कोई खास उत्साह नहीं होता कि हम दुनिया के युवतर देशों में एक हैं। बल्कि दुख होता है -- अरे, बच्चे और वृद्ध कहाँ चले गए?



भारत की युवा आबादी को तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है। एक वर्ग उन युवाओं का है जो अपनी आनुवंशिक स्थितियों के परिणामस्वरूप अच्छी आधुनिक शिक्षा पा जाते हैं और इसके बल पर आधुनिक क्षेत्र के रोजगार भी। ये ही आईएएस-पीसीएस--आईएफएस बनते हैं, सूचना उद्योग में स्थान पाते हैं डॉक्टर-इंजीनियर बनते हैं, पुलिस विभाग में ऊँचे पद संभालते हैं या विदेश चले जाते हैं। इनमें गरीब परिवारों से आए हुए कुछ युवा भी होते हैं जो अपनी मेधा और परिश्रम के बल पर इस अल्पसंख्यक समूह में शामिल होने में सफलता हासिल कर लेते हैं। इसी वर्ग के कुछ लड़के-लड़कियों की तस्वीरे छाप कर अंग्रेजी के स्मार्ट माने जानेवाले साप्ताहिक समय-समय पर बताते रहते हैं कि आर्थिक सफलता के मामले में रिक्शावालों या खेतिहर मजदूरों के बच्चे अब किसी से पीछे नहीं हैं यानी भारत में ज़ात-पाँत और वर्ग की दीवारें टूट रही हैं। सच यह है कि ये दीवारें टूट नहीं, मजबूत हो रही हैं। कहीं-कहीं उनमें दरकन जरूर दिखाई देती है, लेकिन ऐसा कब नहीं था? कभी मुरा नाम की दासी का पुत्र चंद्रगुप्त मौर्य भी भारत का सम्राट बन गया था। इन असाधारण तथ्यों से इस साधारण तथ्य पर परदा नहीं डाला जा सकता कि भारत के अधिकांश पिछड़े परिवार ऐसे ही युवक पैदा करते हैं जो अपने आर्थिक पिछड़ेपन को थोड़ा कम कर सकते हैं, खत्म नहीं कर सकते।


भारत में ऐसे युवाओं की संख्या सर्वाधिक है जिन्हें भविष्यहीन, या सोच कर देखिए तो वर्तमानहीन, कहा जा सकता है। ये खेतों में काम या मजदूरी करते हैं, लघु इकाइयों में खून-पसीना एक करते हैं, साइकिल की मरम्मत करते हैं, टायर के पंक्चर ठीक करते हैं, बस, ट्रक, टेम्पो, ऑटोरिक्शा, साइकिल रिक्शा आदि चलाते हैं, मध्य और उच्च वर्ग के लोगों की गाड़ी ड्राइव करते हैं, सिनेमाहॉलों की गेटकीपरी करते हैं, रेल यात्रियों का भारी-भारी सामान ढोते हैं, नालियाँ साफ करते हैं, मकानों और बिÏल्डगों के निर्माण में पैदल सैनिकों की विशाल फौज में शामिल हो जाते हैं, र्इंट ढोते हैं, पलस्तर करते हैं, धोबी, नाई और बिजली मिस्त्री का काम करते हैं, फर्श साफ करते हैं, दुकानें चलाते हैं, सामान यहाँ से वहाँ ले जाते हैं, मेन होल में घुस कर उसकी सफाई का खतरनाक काम करते हैं, दरबानी करते हैं, चायखानों और ढाबों में बेयरा बनते हैं, पानी भरते हैं, रेलगाड़ियों, रेलवे स्टेशनों और हवाई अड्डों की सफाई करते हैं, गली-गली जा कर कूरियर की चिट्ठियाँ और पैकेट बाँटते हैं, यानी वे सारे जरूरी काम करते हैं जो न किए जाएँ तो देश ठप हो जाए। जब हम देश की युवा शक्ति के बारे में सोचते हैं, तो यह विशाल युवा आबादी ही हमारी चिंता के केंद्र में रहनी चाहिए। नहीं तो कहना पड़ेगा कि इस देश का मीडिया अपने देश को बिलकुल नहीं जानता।


उन युवाओं की चर्चा करना बहुत जरूरी है जो युवा संस्कृति की तीसरी धारा की रचना करते हैं। इनमें भाँति-भाँति के लोग हैं। नक्सलवादी युवकों को इसी धारा में रखा जा सकता है। अनेक युवा नर्मदा बचाओ आंदोलन की तरह की गतिविधियों में लगे हुए हैं। कुछ गाँधीवादी कार्रवाइयों में मशगूल हैं, तो कुछ आदिवासियों तथा अन्य वंचित वर्गों की सेवा में लगे हुए हैं। ये वे आधुनिक युवक हैं जिनका आधुनिकता से मोहभंग हो चुका है। बहुत-से युवक जेपी, आंबेडकर, मार्क्स आदि की शिक्षाओं से प्रभावित हैं और छोटे-छोटे संगठनों के माध्यमों से महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। धर्मनिरपेक्षता के संघर्ष में भी युवाओं की उल्लेखनीय भूमिका है। पोस्टर लगाना, परचे बाँटना, नारेबाजी करना, धरना देना, जुलूस निकालना - ये वे गतिविधियाँ हैं जिनसे भारतीय समाज में आंदोलन का भाव बचा हुआ है। कुछ ने राजनीतिक कार्य और कॅरियर का अद्भुत संगम बनाने में प्रशंसनीय सफलता प्राप्त की है। युवाओं का एक वर्ग एनजीओगीरी को समर्पित है और समाज सेवा के माध्यम से उद्यमी बनने का ख्वाब देखता है। जैसा कि हर समाज में होता है, युवाओं का एक बहुत छोटा-सा हिस्सा साहित्य, नाटक, चित्रकला, संगीत, नृत्य, फिल्म निर्माण आदि के माध्यम से अपनी रचनात्मकता को विकसित और अभिव्यक्त कर रहा है। इन पेशों में शुरू में साधना है और बाद में पैसा और शोहरत, दोनों। खेलकूद युवा वर्ग का राष्ट्रीय मनोरंजन तथा मुट्ठी भर खुलाड़ियों के लिए बेहतरीन धंधा है। बहुत-से युवा कम उम्र में ही सिनिकल हो चुके हैं और कुछ भी करने को व्यर्थ मानते हैं, लेकिन इसका ध्यान रखते हैं कि वे उचित स्थानों पर देखे जाएँ कुछ ऐसे भी हैं, जो रंगीन या संगीन नशों की संकुचित दुनिया में मस्त और आगे-पीछे के बारे में सोचने के अभिशाप से मुक्त हैं। ऐसे में समझ में नहीं आता कि भारत के यौवन पर गर्व करें या नहीं और गर्व करें तो कितना।

- राजकिशोर
(लेखक इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में वरिष्ठ फेलो हैं।)

7 comments:

  1. विचारणीय आलेख. आभार प्रस्तुत करने का.

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  2. अत्यन्त गहरी दृष्टि के साथ लिखा गया आलेख। विचारोत्तेजक...।

    एक युवा वर्ग ऐसा भी है जो फास्ट मनी के लिए अपराध की दुनिया में हाथ आजमाता है। राहगीरों की छिनैती, घरों में जबरिया घुसकर लूट, रेलगाड़ियों में जहरखुरानी से होते हुए सुपारी लेकर हत्या करने तक का धन्धा अपना लेते हैं। बेरोजगारी तो एक बहाना है ही, लेकिन इसे दूर करने की ऐसी छटपटाहट और विक्षिप्त सोच के पीछे बढ़ता उपभोक्तावाद और सामाजिक उच्श्रृंखलता को मिलने वाला राजनैतिक संरक्षण है।

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  3. हर दृष्टि से सोंचकर लिखा गया पोस्‍ट.....आभार इतने सुंदर पोस्‍ट के लिए।

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  4. आज का समाजिक संतुलन बिगड़ रहा है। लडकियों के पैदा होने पर रोक लग रही है तो परिवार नियोजन से बच्चों की संख्या घट रही है। बूढे बेसहारा होते जा रहे हैं क्योंकि बच्चे अपनी मस्ती में मस्त हैं। इस लेख से उस गम्भीर परिस्थिति से भी अवगत कराया गया है जब हमारी युवा पीढी का एक वर्ग ऐयाशी में डुबा है और दूसरा समाज को चलाए जा रहा है निरंतर, अपनी गरीबी के बावजूद। इस असंतुलन को कौन और कब रोकेगा ईश्वर ही जाने!!

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  5. बहुत लाजवाब, विचारोतेजक और उपयोगी लेख. धन्यवाद.

    रामराम.

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  6. लेखक सम्यक् दृष्टि के धनी हैं। सार्थक और विचारोत्तेजक लेख !

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  7. भारत के यौवन रहस्य का अच्छा तर्क दिया है, न बच्चे जियेंगे न बूढे, तो युवा ही तो बचेंगे।
    युवा शक्ति पर गर्व करने से पहले युवाओं को उपयुक्त उच्च शिक्षा व रोजगार के साधन मुहैया करवाए जाने चाहिए अन्यथा युवा वर्ग ग़लत राह पर चल दिया तो देश भी उधर ही हो लेगा।

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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