इस्लाम और योग : ओम् और अल्लाह

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7 comments:

  1. वेदप्रकाश वैदिक बहुत ही विश्लेषणात्मक तरीके से लिखते हैं. शालेय जीवन के दौरान मैं ने पहली बार इनका भाषण सुना था.

    सस्नेह -- शास्त्री

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  2. बहुत लाजवाब लेख है. वैदिक भाई साहब को नमन.

    रामराम.

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  3. आप सादर आमंत्रित हैं, आनन्द बक्षी की गीत जीवनी का दूसरा भाग पढ़ें और अपनी राय दें!
    दूसरा भाग | पहला भाग

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  4. योगाभ्यास को धर्म से जोडना बेमानी है पर जब मज़हब की बात आती है तो मानी-बेमानी तर्क सब कुछ बेमानी हो जाता है और धर्मभीरूता जीत जाती है। हमें इंडोनेशिया के लोगों से हमदर्दी है कि वे इस तकनीक का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं।

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  5. क्या कहे कल को आसमान को भी बाँट देगे लोग मजहब में

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  6. सामयिक और सद्भावनापूर्ण लेख के लिए लेखक प्रशंसा के पात्र हैं.

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  7. सुन्दर चिंतन करता हुआ सार्थक लेख.
    शानदार प्रस्तुति के लिए आभार.

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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