सत्य के प्रयोग, सेक्स,ब्रह्मचर्य और गाँधी
- कविता वाचक्नवी

बहुधा मैं उन विषयों पर लिखती नहीं जो विषय त्वर-प्रसरण का शिकार हो कर खूब चर्चा का अंग बनते हैं। बहस के केन्द्र में न रहने की प्रवृत्ति या इसे मेरी भीरुता भी कहा जाए तो कोई आपत्ति नहीं। विषयों, अनुभवों या रस के परिपाक होने का ऐसा रंग चढ़ा भी कहा जा सकता है, या कुछ भी कह लें| हर बात को कहने, और वह भी अपनी तरफ़ से अपने शब्दों में, से अधिक उचित यही मुझे लगता है मुझ से श्रेष्ठ विचारक, विद्वान या रचनाकार जो कह गए हैं, उसे स्थान दिया जाए, दोहराया जाए, सहेजा, बताया जाए| फिर भी कभी कभी कुछ अवसर स्वयं को व्यक्त करने से बचने नहीं देते व एक प्रकार की विचारतीव्रता से ग्रस लेते हैं, जहाँ चुप रहते बनता नहीं व मत व्यक्त हो ही जाता है।
गाँधी पर कभी सिलसिलेवार अधिक कुछ लिखा नहीं। परन्तु सम्भवत: यह डॊ. अनुराग आर्य की अभिव्यक्ति की शक्ति थी कि उनके लिखे (व उस पर आई अनेक प्रकार की टिप्पणियों से हुए विचलन) के बाद स्वयं को लिखने से रोक नहीं पाई।
गाँधी तर्क की कसौटी पर तो कभी आदर्श या राष्ट्रीय नायक नहीं प्रमाणित होते, उनका अपनी कमजोरियों को दूसरे पर थोपने का आग्रह ( बल्कि हठ या जिद) ही तो थी कि अलग मुस्लिम देश की स्थापना का दंश झेलकर व बांटने पर भी देश उनकी उदारता का दंश झेलने को बाधित हुआ। उनकी जिद ही तो थी कि भगत, राजगुरु और सुखदेव को संभव व सुगम होते हुए भी वे फाँसी-मुक्त करवाने के लिए दबाव की कोई प्रक्रिया नहीं अपनाते। वरना बात बात में अनशन, सत्याग्रह, पदयात्रा और जाने कितनी किस्मों के ऐसे मारक हथियार होते हुए भी वे कुछ नहीं करते। बस, एक ही तो कारण का आधार लेकर - कि वे (गर्म दल वाले) हिंसा के अनुयायी हैं और मैं अहिंसावादी। अहिंसा का यह अर्थ भी उनकी निजी उपज था, जिसके प्रति वे अत्यन्त हठधर्मी रहे। राम के भक्त गाँधी यदि राम की अहिंसा की मर्यादा का लेश भी समझ जाते तो हिंसा और अहिंसा का सही अर्थ तो समझते ही, देश का इतिहास भी दूसरा होता।

उनके अतिवाद का ही परिणाम था कि उनका अपना बेटा धर्मान्तरण का शिकार हुआ, जिसे आर्यसमाज और आर्यसमाज के पं. रामचन्द्र देहलवी(शास्त्रार्थ महारथी) ने दल- बल के साथ जाकर मुस्लिमों से शास्त्रार्थ कर, उन्हें पराजित कर (बेटे को) बचाया था व वापिस गाँधी जी को लाकर सौंपा था।
ब्रह्मचर्य के प्रयोग भी गाँधी की उसी हठधर्मिता और अतिवाद का परिणाम थे। जहाँ वे अपने को अपनी नजर में विजयी घोषित देखने के लिए स्त्री का वस्तु की भाँति प्रयोग करते रहे। साफ़ साफ़ कहें तो युवतियों के साथ नग्न होकर सोने का परीक्षण करना ताकि अपनी ब्रह्मचर्य के लक्ष्य की पूर्णता जाँची -परखी जा सके।
इस विषय में विनोबा का स्त्री के प्रति दृष्टिकोण बेहद सम्मानजनक व मातृवत् था। गाँधी के संस्कारों में वह बात थी नहीं, जिसे आप तलाश रहे हैं - स्त्री को मातृस्थान मानना। वे स्वयं कभी बा को लंबे वर्षों तक पीटते भी रहे थे।
अभी वाणी प्रकाशन से दयाशुक्ल सागर की एक पुस्तक आई है - ‘महात्मा गाँधी : ब्रह्मचर्य का प्रयोग’(२५०/-रु.), जो बहुत भयंकर रूप में गाँधी को इस विषय में कटघरे में खड़ा करती है। इस से पूर्व भी अन्य भाषाओं में इस बात को लेकर मौखिक लिखित आक्षेप गाँधी पर होते आए हैं। यह कोई नई बात नहीं है।
मेरी दृष्टि में गाँधी का वैशिष्ट्य उनका वह होने में नहीं है, जो वे न थे या होना चाहते थे या होने के लिए करते थे और हो नहीं पाये या पाए। गाँधी के इन या ऐसे अनेक अन्य विषयक प्रयोगों के प्रति मेरी कोई सहानुभूति, श्रद्धा या स्वीकृति भी नहीं और निजी तौर पर मैं गाँधी की विरोधी ही के रूप में स्वयं को पाती हूँ, इन अर्थों में भी और सुभाष, भगत, राजगुरु, चन्द्रशेखर,सुखदेव आदि वाले गर्म दल के प्रति अपनी निजी आस्था व श्रद्धावनतता के कारण भी।
फिर भी, गाँधी को एकदम सिरे से नकार देने की पक्षधर भी मैं नहीं हूँ, जैसा कि दयाशंकर या और भी कई लोग करते/सकते हैं।
कमजोरियाँ होना एक बात है, उनकी आत्मस्वीकृतियाँ और सार्वजनिकीकरण उनसे भी बड़ी। गाँधी अपनी कमजोरियों और गलतियों के जितने भागी या उत्तरदायी और बल्कि दोषी हैं, उसी के समानान्तर वे इन अर्थों में विशिष्ट भी हैं। विशेषतः ब्रह्मचर्य के प्रयोग वाली कसौटी पर तो| हम जिस सेक्सपूर्ण और पोर्नोग्राफी वाले खुले समय में जी रहे हैं और जिसका एक भाग ही हैं वस्तुत: , उस जमाने में इनकी प्रवृत्ति के विरोध को स्वर दिए बिना, पाप या अपराध के विरोध को स्वर दिए बिना, किसी की भूल या आत्मस्वीकृति के विरोध को स्वर देना, नैतिक उत्थान के मार्ग के सत्य को अनुभूत करने के विरोध को स्वर देना मुझे निजी रूप में स्वीकार उचित नहीं लगता, बल्कि कटघरे में खडा करता है - नैतिकता के कटघरे में। आत्मा इसकी गवाही नहीं देती|



कविता जी
ReplyDeleteकथनीय सभी कुछ आपने लिख दिया है। मैं आपकी अक्षरश: समर्थक हूँ।
अजित
गांधी जी को भी सफाई देने का मौका मिला होता तो कितना अच्छा होता !
ReplyDeleteआपके इस saargarbhit sarthak aalekh hetu आपको naman.
ReplyDeleteआपके आलेख से शब्दशः सहमत हूँ. लगता है मेरे ही vicharon को abhivyakti मिल गई है,इस आलेख में.
गांधीजी तथा उनके mahatva को nakartee नही मैं, परन्तु जीवन तथा राजनीती में किए उनके कई प्रयोगों(जिन सबका आपने उल्लेख किया है),के कारण उनके प्रति बहुत अधिक samman का भाव नही रख पाती मन में..
गाधी जी की कुछेक बाते तो सही हो सकती है, जिन की मै भी इज्जत करता हौ, बाकी मेरा सलाम हमेशा भगत सिंह को ओर सुभाष चन्द, मोलाना आजाद को जाता है. कई जगह गांधी जी ने दो गला पन भी किया है, नेहरु को हमेशा आगे लाये ???
ReplyDeleteधन्यवाद
शुक्रिया आपने इस दृष्टिकोण को सामने रखा ...इसी किताब को पढ़कर खासा व्यथित हुआ था...इससे पहले भी सहारा समय जो ४८ पेजों का रविवारीय संस्करण निकलता था ..उसमे लंबे लंबे विमर्श .बड़े बड़े बुधिजिवियो के शब्दों के तर्क जाल पढता .पर फ़िर भी मन किसी भी तर्क को स्वीकार नही पाया .सार्वजनिक रूप से गांधी अपने देह सम्बन्ध का कस्तूरबा से न होने की जब घोषणा करते है....जाने क्यों ये निजता का हनन लगता है..ऐसा प्रतीत होता है वे निर्णय लेने में कोई भागीदारी कस्तूरबा जी को नही देते या ...कही न कही निजता का उलंघन कर रहे है....प्रोढ़ उम्र में वे अपने ब्रहमचर्य के वर्त में कमी पाते है ओर इसके लिए कम उम्र लड़कियों को गिनी पिग की तरह चुनते है....यहाँ भी निर्णय उनका है....वे इस आत्म शुद्धि के कथित प्रयोग के अपने तर्क देते है ..पर देह का कोई तर्क नही होता....उसकी अपनी भाषा होती है..मुझे ये नैतिकता की थोपी गई हिंसा प्रतीत होती है....जो इस प्रयोग में भागीदार है..उनके स्वास्थ्य पर इसका प्रतिकूल असर स्वाभाविक है....यहाँ वे किसी आश्रम के बाबा से प्रतीत होते है....उनकी पारदर्शिता उनके इस व्यवहार को न्यायोचित ठहराने के लिए काफ़ी नही है ...... ... स्वंत्रता के लिए दिए गए उनके योगदान को कोई नही नकार सकता न उसकी महत्ता ख़त्म कर सकता....पर केवल यही कारण उन्हें दूसरे कार्य करने की छूट नही देता....जैसे हम पंजाब के गिल को माफ़ नही करते रूपल देवल बजाज के लिए....
ReplyDeleteएक बात ओर इस पोस्ट को लिखने के बाद मुझ पर कई मित्रो ने मेल किए की मुझे इस विवादस्पद विषय पर नही लिखना चाहिए था.....मै हैरान हुआ ओर उससे भी ज्यादा इस बात पर की इस सत्य से बहुत से भारतीय अनजान है..इतिहास में बड़ी चतुराई से इस विषय पर परदा डाल रखा है जैसे इस बात पर की नेहरू को सिफलिस था......
I agree with kavita that Gandhiji is important and respectable, because who he was.
ReplyDeleteAnd I believe that Meera Ben and Sarlaa ben, both had taken a conscious decision to participate in Gandhi's experiments to test his desire. They were not forced into that. and as long as there is a mutual consent, nothing is wrong with it.
And in this matter I will not go to simplification to the extent that Gandhiji was a 'womanizer" or comparable to the "todays baabaas or anybody else for that matter.
I totally disagree with Dr. Anurag's or similar stands on Ganghiji by others.
And that is why only Hindus are forced to accept " Tathakathit Chhadma" secularism /Gandhian thought and under this shadow others are considered as minority and hence they are rising and we The Hindus gradually going down and down.
Deletephir to bap beti karishta bhi koi mayanae nahi rakhta koi kisi ke sath apni marji se kuchh bhi kar sakta hai.sex bhi. wah re swapndarshi.
Deleteअनुराग जी...
ReplyDeleteवाकई नेहरू जी के बारे में नहीं पता था....
ऒह......
जब किसी प्रसिद्ध व्यक्ति का चरित्रहनन होता है तो उस व्यक्ति के व्यक्तित्व में तो कोई अंतर नहीं आता पर चरित्रहनन करने वाले को मुफ्त की ख्याति मिल जाती है और इसीलिए कुछ लेखक गढे मुर्दे उखाड कर अपना नाम आगे बढाने की जुगत करते हैं। कुछ वर्ष पूर्व सुधीश कक्कड ने भी मीरा और बापू को लेकर एक पुस्तक लिखी थी। अब यह पुस्त्क आई है जिसका लाभ निश्चय ही लेखक को मिलेगा। रही बात गांधी की तो उनके महात्म्य को कोई हानि नहीं होगी क्योंकि उनकी जीवनी एक खुली किताब रही है।
ReplyDeleteडो. अनुरागजी, यह ख्याल गलत है कि इन बातों के बारे में अब तक किसी को मालूम नहीं था। इन बातों की चर्चा उनके जीवन काल से ही सुनी जा रही थी। हां, यह ज़रूर है कि नई पीढी इससे अनभिज्ञ हो क्यों कि उन्हें उन बूढों के इतिहास को पढने की आवश्यकता नहीं महसूस हुई।
यह भी एक गलत धारणा है कि गांधीजी के कारण देश का विभाजन हुआ। वे तो यह कहते रहे कि देश का विभाजन उनकी लाश पर से होगा। इतिहास को देखने के अपने अपने नज़रिये हैं। शायद हर कोई अपनी जगह यह समझता है कि वह सही है। तो फिर यही कहा जा सकता है - LET US AGREE TO DIFFER!!
vaise to main in kahaniyon me khas dilchaspi nahi rakhta par aapne gandhi ji per itna kichad uchhala hai to mujhe bhi apni bat kahne ki ichchhaho rahi hai(sorry for using harsh words in the given description)
Deletebahut sahi kaha apne balki main to in lekhika mahoday se yahi kahunga ki doosre per kichad uchhalne wale ke muh par sabse pahle kkichad lagta hai
aur rahi bat gandhi ji ki to main aap ko bata doon ki gandhi ji ka jiwan aur unke principles ki hamare liye inspiration ka kam karte hain.gandhi ji ke diye hue aadarshon ke prati hamare vishwas ki to wo in corrupted aur itni ghatiya soch rakhne wale logo ki ek do gadhi hui kahaniyon se tootne wala nahi.
aur agar aap is kahani ko man bhi le(kyon ki jab gandhi ji jivit the tab mera janm bhi nahi hua tha aur shayad is kahanikar ka bhi nahi jo in thathyon ko is tarike se pesh kar raha hai ki jaise ki ye gandhi ji ke samay swayam maujood raha ho)ki jo aap kah rahi ho wo satya bhi ho par ek achcchhe insaan ka hamesha ye farz hota hai ki doosre ki doshon per parda dale aur uski achchhaiyon ko dikhaye par aap to wo bhi nahi kar saki.
hamari soch ka adhar gandhi vyakti vishesh nahi balki unke diye hue adarsh hai.
as a conclusion mujhe aapke dwara likhe gaye lekh se gandhi ji ke bare me bhale hi na pata chala ho par aap ke bare me kaphi kuchh pata chal gaya hai
अच्छा किया जो आपने इस बात पर लिखा। संतुलित लेख!
ReplyDeleteगांधी राष्ट्रीय नायक थे ये लोग जानते थे तभी उनके एक आहवान पर करोड़ों भारतीय उनके पीछे चलने को तैयार हो जाते थे और सबसे बड़ी बात की आजादी के बाद उन्होंने किसी भी पद की लालसा नहीं रखी। उन्हें राष्ट्रीय नहीं अंतरराष्ट्रीय नायक कहना प्रासंगिक होगा। नेल्सन मंडेला उनके पदचिन्हों पर चलकर अपने देश में इतिहास बन गये। आज इस हिंसा के युग में उनके अहिंसा के सिद्वान्त आवश्यक हैं। ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ की गांधीगिरी कितनी प्रसिद्ध हुई यह जग जाहिर है।
ReplyDeleteAgar aapke vichar satya hain to kya aap vi Gandi Ji ke vicharo se sahmat hai jo unhone Shahid Bhagat Singh aur unke sathiyo ke liye the. Kya Gandhi ne unhe phansi se bachane ko kuchh kiya????? Jab ke sara desh jaanta hai ke agar Gandhi chahe to Sardar Bhagat Singh, Raj Guru aur Sukhdev ki phansi tali ja sakti thi......,, to fir Gandhi kyoo chup rah gaye ?????????? Dusri baat ke Namaj ke haq aur Jan bachane ki jaddo jahad me jab chunaw karna hua to Gandhi ji ne Namaj ke Haq ko tarjih di aur Delhi ke Masjido se Hajaro Hinduo ko jinho ne waha sharan le rakkhi thi unhe hatane ke liye Bhukh Hadtal kar di....... Kya ye hi hai Gandhi aur chhadm Secularwad jo hame bachpan se kitabo me padhayi jaati hai????????? agar hai to ye bas ek dikhawa hai jise lekhak ne apne shabdon me bakhubi prastut kiya hai take aane wali pidhiya sikke ke dono pahluo pe najar dal sake......
Deleteऐसी ही एक विचार सरणि में में मेरा एक विचार कभी अकस्मात निसृत हो जा मिला था -गांधी को समझने के लिए थोड़ा ही सही गान्धीपन होना जरूरी है .गांधी को अप्रासंगिक करार करने के पीछे बहुधा उन्हें उपेक्षित दिखा स्वयं गरिमा मंडित होने या गांधी को ग़लत साबित कर उनसे भी बड़ी बौद्धिक समझ रखने का दावा /आग्रह ,जो सहज ही है ,होता है ! मैं फिर फिर कहूँगा कि गांधी को तब तक अप्रीसियेट नही किया जा सकता जब तक ख़ुद भी कुछ सीमा तक ही सही कोई गांधीत्व /का अंश न समेटे हुए हो !
ReplyDeleteडॉ अनुराग से सहमत, महापुरुषों (?) के बारे में कई बातें इतिहास में बड़ी चतुराई से छिपाई गई हैं, लेकिन गाँधी-नेहरू परिवार की बातें खासतौर पर, जैसा कि अनुराग जी ने कहा नेहरु को सिफ़लिस था, उसी प्रकार यह भी सच है कि नेहरू एक "चेन स्मोकर" थे, लेकिन उनकी सिगरेट पीते हुए तस्वीरें जनता को कभी-कभार शायद ही देखने को मिलें… प्रमुख राजनैतिक परिवारों के बारे में उनके "अंतरंग सम्बन्धों" के बारे में तो हजारों सच्ची बातें हैं (जिसके तथ्यात्मक सबूत भी मिलते हैं) जनता से आमतौर पर छिपा लिये जाते हैं… शायद नेताओं में जनता और सच का सामना करने का नैतिक साहस होता ही नहीं…
ReplyDeleteअनुराग जी की बात सही है.. मुझे नही पता था की गाँधी जी ने इस तरह का कोई काम भी किया था.. उन्हे धन्यवाद उनके ब्लॉग के कारण मुझे ये सच्चाई भी पता चली..
ReplyDeleteजो लोग गाँधी जी के इस कर्म को सही कहते है.. क्या वो लोग अपने घर की बेटियो को गाँधी जी के साथ प्रयोग करने देते?
यदि हा तो ऐसा ही प्रयोग मैं भी करना चाहता हू..
डॉ.कविता ने अत्यंत सटीक और बेबाक तौर पर अपनी बात पेश की। वह यकीनन बधाई की पात्र हैं। गाँधी एक महान शख्सियत थे और उन्होने इतिहास पर जबरदस्त असर छोडा, किंतु वह आलोचना से परे कदाचित नहीं और नाहि वह कोई पूजनीय मूरत हैं। गाँधी ने भयंकर भूले अंजाम दी जिनका खामियाजा देश आजतक भुगत रहा है।
ReplyDeleteवैचारिक स्तर पर गाँधी को समझने के लिए गौतम बुद्ध और लार्ड जीसस के विचारों से गुज़रना होगा। करूणा की जो धारा बुद्ध ने बहाई वह जीसस होते हुए गाँधी तक पहुंची। गाँधी के करूणा पर अपने प्रयोग एवं निष्कर्ष हैं।
ReplyDeleteआपकी निम्नलिखित पंक्तियाँ गाँधी जी की अहिंसा की असलियत दिखाती हैं।
ReplyDelete"राम के भक्त गाँधी यदि राम की अहिंसा की मर्यादा का लेश भी समझ जाते तो हिंसा और अहिंसा का सही अर्थ तो समझते ही, देश का इतिहास भी दूसरा होता।"
ऊपर कुश जी की टिप्पणी से सहमत हूँ। गाँधी जी अपने अहं की तुष्टि का वह घटिया प्रयोग कोई और करता तो लोग उसे पता नहीं क्या-क्या कह डालते। और फिर वह प्रयोग सफल रहा यह बात भी हमें गाँधी के कहे से ही माननी पड़ती है।
हकीकत यह है कि गाँधी कोई भगवान नहीं थे आम इन्सान ही थे। पर पता नहीं क्यों उनकी गलतियों की बात करना ही भारत में गुनाह माना जाता है। जैसे कि गाँधी न हुये छुईमुई हो गये। भगवान की निन्दा कर सकते हैं पर गाँधी की गलतियों के बारे में बात नहीं कर सकते।
कुछ लोगों ने टिप्पणियों में ऐसा प्रयोग स्वयं को करने देने की अनुमति की बात कही है।
ReplyDeleteउनके ध्यानार्थ एक उदाहरण द्वारा बात को समझ लेना अनिवार्य है कि जैसे दो ऊँची ऊँची बिल्डिंगों के बीच छत से मोटरसाईकल पर एक से दूसरी पर हवा में जंप करना, खाई में कूदना, दो पहाड़ों के बीच रस्सी बांध कर उस पर चलना या ऐसे ही और करतब, बिना किसी प्रशिक्षण, अभ्यास व उन कला, क्रिया आदि के एकदम सही परफेक्ट अभ्यास/नियंत्रण के बिना किसी को नहीं करने दिया जाते, न ऐसी छूट कोई देगा;
उसी प्रकार यह ब्रह्मचर्य का प्रयोग भी हर किसी (युवा/वृद्ध ) पुरुष/स्त्री को करने की बात करना बिना अभ्यास व प्रशिक्षण के अनाड़ी को मस्ती के लिए जोखिम भरे एडवंचर की छूट देने जैसा है।
अनाड़ी, अनभ्यासी व अकुशल यदि इसे करेगा तो अपनी व दूसरों की जान तो जोखिम में डालेगा ही साथ ही और भी कई चीजों को नष्ट कर सकता है। ऐसा करने की छूट लेना बिना सोची समझी मस्ती, गैरजिम्मेदारी, बचपना व मूर्खता बताते हैं सब लोग।
इसलिए जब व जिसे ब्रह्मचर्य के मामले में पूरा संयम और सफलता प्राप्त हो जाए, व जिसने मन तक की वासना पर पूरा नियंत्रण कर "चित्तवृत्तियों का निरोध" [ योगश्चित्त्वृत्तिनिरोध: ] कर लिया हो केवल वही हकदार हो सकता है, हर कोई नहीं।
- कविता वाचक्नवी
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प्रिय दीदी, आपने गाँधी के बारे में जो लिखा उस को मै पूरा समर्थन देता हू.लेकिन अंत में जो कमेन्ट आपने लिखा वो तो पुनः गाँधी प्रवर्ति का समर्थन करने जैसा ही है.जो चीज गलत है हम क्यों उसका अभ्यास करे.जहा तक कुश जी का कमेन्ट है तो मै समझता हू कि उनका कोई इरादा ऐसा करने का नहीं है,बल्कि इस तरह वो लिख कर आपना विरोध जता रहे है.मै कुश जी कि बात का भी समर्थन करता हू कि यदि उनका यह प्रयोग असफल हो जाता तो उन बहनों के भविष्य का क्या होता ?अपनी इच्छा या प्रयोग को किसी दूसरे पर थोपना कहा तक जायज है.
ReplyDelete@ B.K.John जी,
ReplyDeleteव्यक्ति का विरोध या उसके आचरण का विरोध एक बात है और सिद्धान्त का विरोध दूसरी । मैंने अपने लेख में गांधी जी के उस व्यवहार और आचरण का विरोध किया है, ब्रह्मचर्य के सिद्धान्त का नहीं । गांधी जी के अथवा किन्हीं अन्य के किसी प्रयोग के कारण यदि सिद्धान्त का मखौल उड़ने लगे तो क्या वह सही है ?
उस अ-सही को ही मैंने अपनी पिछली टिप्पणी द्वारा सही किया है।
इस लेख का उद्देश्य समझेंगे तो स्पष्ट हो जाएगा।
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well done but i think these all things are old we can use these things as a reference to define what is applicable are not applicable for our society currently we are facing agreat problems like nuxlite why these people are became nuxlite whate is the reasion behind these i think this is the point for discussion
ReplyDeletekavita ji apke vicharo se main sahmat hoon , hamare desh me ek samasya ye hai ki ham apne nayko ko avtaar manne lagte hai . aur unse manviy bhool ki sambhavna ko nakr dete hai . galtiyan har insaan se hoti hai . hamre desh me bhi nayko ke sabhi paksho par charcha honi chahiye . chahe wo hamare rashtrpita ke hath ho , nehru ji ke gupt kisse ho , netaji ka jarman mahila se prem ho
ReplyDeleteगांधी जी के विषय में मैं बस यही कह सकती हूँ कि उनके विषय में मैंने आज तक जो कुछ जाना वह पढ़कर ही जाना या यूं कहें की उनकी बातें किसी न किसी के द्वारा लिखी गयी बातों को ही मैंने पढ़ा अब पता नहीं जो सबने लिखा वह कितना सच था कितना झूठ क्यूंकि कोई भी व्यक्ति कितना भी महान क्यूँ न हो है तो एक इंसान ही, और भूल इंसान से ही नहीं होती भगवान से भी होती है इतिहास गवाह है। तो उन्होने अपने निजी जीवन में क्या किया, क्यूँ किया, इस सबसे हमें क्या मतलब हमारे लिए तो इतना काफी है कि देश को आज़ाद करने में उनका एक बहुत बड़ा योगदान रहा। बस इसलिए हमारी ओर से उनको नमन हालांकी दुनिया जानती है आज़ादी लाना या पाना किसी एक व्यक्ति के बस की बात नहीं या एक दल के वश की भी बात नहीं थी बहुत से लोगों ने उसके लिए कई बलिदान दिये तब जाकर हम आज़ाद हुए इसलिए अकेले गांधी जी को भी इस बात का पूरा श्रेय नहीं दिया जा सकता और ना ही ऐसा हो सकता है कि आज़ादी की बात हो और उसमें गांधी का नाम ना आए।
ReplyDeleteगान्धी मेरे लिये कभी आदर्श नहीं रहे। देश के लिये उनका योगदान सम्माननीय है पर उनका व्यक्तित्व अतिवादी की तरह था। अतिवाद अपने आप में एक हिंसा है। वे अहिंसा की बात करते रहे पर जब सिखों के एक दल ने उनसे लाहौर में सिख लड़कियों और स्त्रियों की इज़्ज़त की सुरक्षा का उपाय बताने को कहा तो गान्धी का उत्तर था कि उन्हें अफ़ीम दे दो। गान्धी यदि देश के बटवारे के लिये उत्तरदायी नहीं थे तो जिन्ना को प्रथम प्रधानमंत्री स्वीकार करने के लिये क्यों पीछे हटते रहे? ...जाने दीजिये, बहुत से दर्द हैं। इन बातों को कुरेदने से कोई लाभ नहीं किंतु अनावश्यक महिमा मण्डन बाध्य करता है।
ReplyDeleteआज आप जहॉ खडे है वहीं से इतिहास को देखने और समझने की कोशिस कर रहे है ।जिसमे अब आपके कुछ पूर्वग्रह भी शामिल हो गए है । अक्सर हम वही देखते है जो देखना चाहते है । इतिहास के कुछ अंशों के अनुसार गांधी पक्षपातपूर्ण लगते अवश्य है लेकिन उन्हे समग्रतामें समझने के लिए आपको उस काल में जीने का अनुभव करना होगा । हम और आप यदि अपने जीवन में ही पिछली कुछ घटनाओ को देखे तो शायद वे आज के तर्कों की कसौटी परखे न उतरे । कोई व्यक्ति यू ही इतना महान नही हो जाता । और सबसे बड़ी बात तो ये है कि महान से महानतम व्यक्ति भी आखिर हमारे आपकी तरह इन्सान ही होता है।
ReplyDeleteBetter go through this new book – “Gandhi ke brahmacharya prayog” (Delhi: Rajpal and Sons, 2012), it is really very interesting and revealing. Everything the author has said is through Gandhi’s own narrations and comments!
ReplyDeleteThere is no other book like it so far on this subject.
Price: Rs 250.00
ISBN: 9789350640814
Author: शंकर शरण
Publisher: Rajpal and Sons
Language: Hindi
Pages: 152
Better go through this new book – “Gandhi ke brahmacharya prayog” (Delhi: Rajpal and Sons, 2012), it is really very interesting and revealing. Everything the author has said is through Gandhi’s own narrations and comments!
ReplyDeleteThere is no other book like it so far on this subject.
Price: Rs 250.00
ISBN: 9789350640814
Author: शंकर शरण
Publisher: Rajpal and Sons
Language: Hindi
Pages: 152