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त्रिलोचन पर श्रद्धांजलि पुस्तक `क्षण के घेरे में घिरा नहीं` का लोकार्पण

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`क्षण के घेरे में घिरा नहीं` का लोकार्पण




हैदराबाद, 8 मार्च 2008


दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के खैरताबाद परिसर में डॉ. देवराज और अमन द्वारा संपादित पुस्तक `क्षण के घेरे में घिरा नहीं` के लोकार्पण समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में उपस्थित `स्वतंत्र वार्ता` के संपादडॉ. राधेश्याम शुक्ल ने पुस्तक का लोकार्पण करते हुए कहा कि `कवि त्रिलोचन शब्दों के मर्मज्ञ थे। वे शब्दों पर अंतहीन चर्चा करते थे। शब्दों पर अपने अधिकार के कारण वे ऐसी कविताएँ रच सके, जो देखने में अत्यंत सहज प्रतीत होती हैं, परंतु उनमें लोक और वेद दोनों एक हो गए हैं। इसलिए त्रिलोचन की कविता का समग्र पाठ अभी खुलना शेष है।` उन्होंने कहा कि श्रद्धांजलि के रूप में होते हुए भी `क्षण के घेरे में घिरा नहीं` शीर्षक पुस्तक त्रिलोचन की कविता के समग्र पाठ की दिशा में एक सार्थक प्रयास है। उन्होंने कहा कि इस पुस्तक में देश के विविध क्षेत्रों के कविता प्रेमियों और विद्वानों ने अपने अनुभव, दृष्टिकोण और विचार प्रकट किए हैं। डॉ. शुक्ल ने आगे कहा कि अपने संक्षिप्त कलेवर के बावजूद यह कृति दो पंक्ति के अनुष्टुप की भांति प्रभाव उत्पन्न करने वाली है, क्योंकि इसमें संवेदना का प्राणतत्व विद्यमान है और संवेदना के स्तर पर हमें महाग्रंथों की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। कविता को एक भावक्षण बताते हुए उन्होंने कहा कि त्रिलोचन न तो क्षण के घेरे में कैद हो सकते हैं और न ही युग के घेरे में। उन्होंने त्रिलोचन को अननुकरणीय बताते हुए यह भी जानकारी दी कि वे अवधी के अपनी तरह के इकलौते गद्यकार हैं।

मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए कवि पत्रकार डॉ . रामजी सिंह `उदयन` ने कहा कि लोकार्पित पुस्तक त्रिलोचन को वादमुक्त दृष्टि से देखे जाने की एक नई शुरूआत करती है। इस पुस्तक के हवाले से उन्होंने साहित्यकारों, समीक्षकों व आलोचकों से त्रिलोचन की रचनाओं में मीन-मेख न निकालते हुए उन्हें अपनी अवधूत साहित्यिक परंपरा में जीवित रखने की बात कही।

विशिष्ट अतिथि के रूप में केंद्रीय विश्वविद्यालय के डॉ. आलोक पांडेय ने त्रिलोचन की इस मान्यता की ओर ध्यान दिलाया कि वे कविता की पूरी पंक्ति लिखने के पक्षधर थे और खोखला होता जा रहा आज का आदमी उनकी चिंता का मुख्य विषय था, क्योंकि वे यह समझ चुके थे कि यह युग कबंध युग है जिसमें सबका सिर पेट में धंसा हुआ है।

पुस्तक का परिचय देते हुए समीक्षक चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने बताया कि `क्षण के घेरे में घिरा नहीं` में 27 आलेख, एक साक्षात्कार, एक रिपोर्ट और त्रिलोचन की बारह कविताएँ तथा कुछ चित्र सिम्मलित हैं। उन्होंने कहा कि इस पुस्तक के माध्यम से त्रिलोचन के बारे में हिंदी ही नहीं, हिंदीतर भाषी कई साहित्यकारों के भी मार्मिक विचार सामने आ सके हैं।

लोकार्पित पुस्तक के प्रकाशन की योजना का परिचय देते हुए इसकी परामर्श समिति की संयोजक डॉ. कविता वाचक्नवी ने बताया कि उत्तर प्रदेश के स्थान नजीबाबाद से प्रकाशन का यह कार्य विविध प्रकार की तकनीकी असुविधाओं के कारण दुष्कर रहा, तथापि संपादक मंडल के उत्साह और त्रिलोचन के प्रति हार्दिकता के भाव के सहारे उन सबका निराकरण भी हो गया।

आरंभ में कुंकुम, अक्षत, उत्तरीय, पुस्तक तथा लेखनी समर्पित करके अतिथियों का स्वागत किया। डॉ.विनीता सिन्हा, डॉ. मृत्युंजय सिंह, सुनीता, शिवकुमार राजौरिया, शक्ति द्विवेदी, डॉ. घनश्याम , आर. संजीवनी, वंदना शर्मा, सुरेश इंगले, के. नागेश्वर राव, सी. नरसिंह मूर्ति, निर्मल सुमिरता, वी. एल. शारदा, शीला, डॉ. सुनीता सूद, अनुराधा जैन, आशा देवी सोमाणी तथा श्रीनिवास सोमाणी ने पुस्तक पर हुई चर्चा को जीवंत बनाया।

अध्यक्ष के रूप में संबोधित करते हुए वरिष्ठ कवि और कथाकार डॉ. किशोरी लाल व्यास ने कहा कि सॉनेट परंपरा का हिंदीकरण और भारतीयकरण करने वाले महान कवि त्रिलोचन की स्मृति को समर्पित `क्षण के घेरे में घिरा नहीं` केवल श्रद्धांजलि भर की पुस्तक नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की विराटता का ऐसा सूत्रलेख है जिससे आगामी शोधकर्ताओं को नई दिशा और दृष्टि मिल सकती है।

इस अवसर पर आयोजित कवि गोष्ठी में डॉ.किशोरी लाल व्यास, डॉ. ऋषभदेव शर्मा, डॉ. कविता वाचक्नवी, डॉ. रामजी सिंह `उदयन`, चंद्र मौलेश्वर प्रसाद, सुषमा बैद, बी.बालाजी, तेजराज जैन, गुरुदयाल अग्रवाल, डॉ. एस. दत्ता, मालती, वसंत जीत सिंह, सत्यादेवी हरचंद, कन्हैयालाल अग्रवाल, मनोज कुमार चकोर, वीरप्रकाश लाहोटी सावन, गोविंद मिश्र, भंवर लाल उपाध्याय, आशा मिश्रा, विजय मिश्रा, सूरज प्रसाद सोनी और सविता सोनी ने विविध विधाओं की कविताएँ प्रस्तुत कीं। कवि गोष्ठी का संचालन बी. बालाजी ने त्रिलोचन शास्त्री की काव्य पंक्तियों के सहारे किया। संयोजक डॉ. ऋषभदेव शर्मा के धन्यवाद प्रस्ताव के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ।

मणिपुरी कविता : मेरी दृष्टि में - डॉ.देवराज -[२]

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मणिपुरी कविता : मेरी दृष्टि में - डॉ.देवराज -[२]


डॉ. देवराज के लेखन की ओर बढ़ने से पहले लेखक की जीवनी पर एक नज़र डाल लें तो शायद कृति को समझने में भी सुविधा होगी।

डॉ. देवराज का जन्म १९५५ ई. में उत्तर प्रदेश के नजीबाबाद में हुआ। हिंदी में एम. ए. करने के बाद ‘नई कविता में रोमानी और यथार्थवादी अवधारणाओं की भूमिका’ को अपना विषय बनाकर पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। यहाँ से उनकी साहित्य यात्रा शुरू हुई।

सन् १९८५ से उन्होंने भारत के सीमान्त राज्य मणिपुर के साथ-साथ सम्पूर्ण पूर्वोत्तर भारत में हिंदी प्रचार आन्दोलन, हिंदी साहित्य और् हिन्दी पत्रकारिता के विकास में सक्रिय भाग लिया और मणिपुर हिन्दी परिषद्, इम्फाल के आजीवन सदस्य बने। इस परिषद् से निकलनेवाली त्रैमासिक ‘महिप पत्रिका’ का सम्पादन १९९१ से लेकर २००१ तक किया। हिन्दी के प्रचार-प्रसार हेतु हिन्दी लेखक मंच, मणिपुर की स्थापना की और उसके संस्थापक एवं प्रथम सचिव रहे। इसी क्रम में उन्होंने हिंदीतरभाषी हिन्दी कवि सम्मेलन की परम्परा का प्रारम्भ किया। डॉ. देवराज कई साहित्यिक संस्थाओं के आजीवन सदस्य भी हैं जिनमें मणिपुर संस्कृत परिषद् - इम्फ़ाल, नागरी लिपि परिषद्- नई दिल्ली, तथा राष्ट्रीय हिन्दी परिषद्- मेरठ उल्लेखनीय हैं

अपनी कृतियों के माध्यम से भी डॉ. देवराज का हिंदी साहित्य में बडा़ योगदान रहा। चिनार, तेवरी[कविता संग्रह], नई कविता, नई कविता की परख, संवेदना का साक्ष्य, तेवरी चर्चा, मणिपुरी लोककथा संसार, नोंदोननु[लोककथा संग्रह ], संकल्प और् साधना [जीवन साहित्य] जैसी कृतियों के वे रचयिता हैं। उन्होंने कई पुस्तकों का सम्पादन भी किया है; जैसे,मीतै चनु, मणिपुर: विविध संदर्भ , मणिपुर - भाषा और् संस्कृति, नवजागरण कालीन मणिपुरी कविताएँ, आधुनिक मणिपुरी कविताएँ, प्रतिनिधि मणिपुरी कहानियाँ, फ़ागुन की धूल, माँ की आराधना, जित देखूँ, तुझे नहीं खेया नाव, आन्द्रो की आग, शिखर-शिखर , कमल- संपूर्ण रचनाएँ, बीहड़ पथ के यात्री, पाञ्चजन्य आदि।

अस्सी के दशक में डॉ. देवराज ने डॉ. ऋषभदेव शर्मा के साथ मिलकर गज़ल को एक नया आयाम दिया जिसे उन्होंने ‘तेवरी’ का नाम दिया। गज़ल को प्राय: प्रणय से जोडा़ जाता है जबकि हिंदी में इसी विधा में आक्रोश की रचनाएँ रची जा रही थी। ऐसी गज़ल जिसमें प्रेम नहीं आक्रोश और आंदोलन झलकता हो, उसे ‘तेवरी’ कहा गया और आज के साहित्यकार उस रेखा का सम्मान भी करते हैं जो गज़ल और तेवरी के बीच खींची गई है।

आचार्य, हिंदी विभाग एवं अधिष्ठाता, मानविकी संकाय, मणिपुर विश्वविद्यालय, इम्फ़ाल के पद पर रहते हुए आज भी प्रो. देवराज स्थानीय भाषा मणिपुरी को राष्ट्रभाषा हिंदी से जोड़ने का कार्य अपनी कलम के माध्यम से चला रहे हैं। इसी संदर्भ में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद की उच्च शिक्षा एवं शोध संस्थान के अध्यक्ष व प्रोफ़ेसर ऋषभ देव शर्माजी [जो तेवरी काव्यान्दोलन के प्रवर्तकों में से एक हैं] बताते हैं :-
"...प्रो. देवराज पिछले दो द्शकों से मणिपुर में कार्यरत हैं और वहाँ हिन्दी प्रचार-प्रसार आन्दोलन तथा मणिपुरी साहित्य से निकट से जुडे़ हैं। उनके प्रयास से विपुल परिमाण में मणिपुरी साहित्य हिन्दी में आ चुका है और् हिंदी की अनेक कृतियाँ मणिपुरीभाषी पाठकों को उपलब्ध हो चुकी हैं। स्वाभाविक रूप से मणिपुरी साहित्य के विविध पक्षों के सम्बन्ध में उनकी दृष्टि अधिक पैनी और तटस्थ है।"
- चंद्रमौलेश्वर प्रसाद

मणिपुरी कविता मेरी दृष्टि में - डॉ. देवराज

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‘हिन्दी भारत’ का एक उद्देश्य यह भी है कि हिन्दी के माध्यम से सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य पर विचार-विमर्श को सम्भव बनाया जाए। इसी क्रम के अन्तर्गत मणिपुरी कविता के विकास व प्रवृत्तियों के अध्ययन पर केन्द्रित डॊ। देवराज (अधिष्ठाता-- मानविकी संकाय, मणिपुर विश्वविद्यालय,मणिपुर) के चर्चित ग्रन्थ " मणिपुरी कविता : मेरी दृष्टि में " के चयनित अंशों को ‘हिन्दी भारत’ के सदस्यों के लिए प्रस्तुत करने की योजना `हिन्दी भारत'( समूह) पर चल रही है

यह लेखमाला विविध भारतीय भाषाओं के साहित्य को मुख्य धारा में सम्मिलित करने व हिन्दीतर लेखन को हिन्दी के माध्यम से हिन्दी पाठकों के संज्ञान में लाने के उद्देश्य व इच्छा से आरम्भ की गई थी। मणिपुर की (बल्कि सप्तभगिनी क्षेत्र की)स्थिति इन अर्थो में बहुत दुरूह है कि एक ओर तो भौगोलिक दृष्टि से चीन उस पर छाया है, दूसरी ओर समाज-सांस्कृतिक दृष्टि से ईसाई मिशनरी अपना आधिपत्य जमाए हैं। एक और विडम्बना यह कि इन परिस्थितियों के साथ चेहरे-मोहरे आदि की भिन्नता के कारण वे देश में अलग थलग से छूटे रहे हैं। जबकि वहाँ के स्थानीय लोग भौगोलिक व सांस्कृतिक भारत से उतने ही सम्बद्ध हैं जितना कि कोई भी अन्य प्रदेश का वासी। ऐसे में उन लोगों को देश की मुख्यविरासत, धारा, संस्कृति,समाज व परिदृश्य में सम्मिलित करने की नितान्त आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए उपर्युक्त बाधाओं को भुलाकर उन्हें निकटता व आत्मीयता से अपनाने की पहल प्रत्येक भारतीय को करनी ही चाहिए। ताकि वे भी स्वयम् को इस देश का अविभाज्य अंग अनुभव कर सकें। ऐसी पहल भाषा,साहित्य व व्यवहार से जिन सज्जनों ने की ,उनमें प्रो। देवराज का नाम अग्रगण्य है। वे मणिपुरी भाषा व साहित्य के संरक्षण-सम्वर्धन का कार्य अनेक प्रकार के शोधों द्वारा व उसे हिन्दी भाषा में उपलब्ध करा कर बहुत अरसे से कर रहे हैं। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि वहाँ की परिस्थिति जान को सदा जोखिम में पड़े रखने से इतर नहीं है। विकट परिस्थितियों से जूझते हुए सम्पन कराए इस कार्य के लिए पूरे भारतीय समाज को प्रो. देवराज सरीखे लगन के धनी व्यक्तियों का आभारी होना चाहिए, विशेषत: भारत व भारतीयता से प्रेम करने वाले जन को।

नवजागरण कालीन मणिपुरी साहित्य पुस्तक रूप में उपलब्ध है, कुछ शोध भी इस दिशा में हिन्दी में मिल सकते हैं। आगामी समय में यत्न रहेगा कि तद्विषयक अधिक जानकारी उपलब्ध कराई जाए।

इस बार से प्रस्तुत है इस लेखमाला की पहली कड़ी

मणिपुरी कविता पर केन्द्रित प्रो . देवराज की पुस्तक के लेखमाला के रूप में अनवरत प्रकाशन के लिए चन्द्रमौलेश्वर जी का जो सहयोग मिल रहा है, तदर्थ वे धन्यवाद के पात्र हैं

~कविता वाचक्नवी

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पुस्तक का नाम : मणिपुरी कविता : मेरी दृष्टि में
लेखक : डॉ. देवराज
प्रथम संस्करण : २००६
प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन, ७/३१, अनसारी रोड़, दरियागंज,दिल्ली-११० ००२


मणिपुरी कविता - मेरी दृष्टिमें
डॉ. देवराज
(१)
एक दिन डॉ. ऋषभदेव शर्माजी बैठा था तो मेरी नज़र उपर्युक्त पुस्तक पर पडी़। मणिपुरी कविता की जानकारी मिली जो मैं आप सब से बाँटना चाहूँगा। ज़ाहिर है कि सारी पुस्तक एक सांस में पढना ��"र उस पर पर लिखना सम्भव नहीं है, अतः हम अंशों में इस पुस्तक का अध्ययन करेंगे। तो, आइए चलें, प्रारम्भ भूमिका ही से किया जाय। मणिपुर के प्रसिद हिंदीमर्मज्ञ इबोहल सिंह काग्ङ्जम ने इस पुस्तक की भूमिका लिखी है। यह माना जाता है कि मणिपुरी साहित्य का प्राचीन काल प्रथम शताब्दी से होता है। मणिपुरी साहित्य पर बंगला साहित्य का प्रभाव भी रहा। इस साहित्य में काव्यपरम्परा की विशेष भूमिका भी रही। इबोहलसिंह काङ्जम बताते हैं कि: "डॉ. देवराज पिछले बीस वर्षों से मणिपुर में रह रहे हैं। जब से वे यहा आए, तब से यहाँ के स्थानीय हिंदी प्रचारकों एवं मणिपुरीभाषा के साहित्यकारों के सम्पर्क में रहे। स्वयं कवि हैं��"र काव्य-अध्ययन में विशेष रुचि लेते हैं। बीस वर्षों के मणिपुर-प्रवास के दौरान मंणिपुर के बारे में उन्होंने बहुत कुछ हासिल किया, विशेष कर मणिपुरीकाव्य-परम्परा के बारे में। मणिपुरी कविता की प्रवृत्तियों के बारे में उनका ज्ञान काफ़ी गहरा है। यह उनके लेखों तथा साहित्यिकसभादquot;ं में व्यक्त्त विचारों से मालूम होता है। उनके द्वारा तैयार किये गए लेखों का मणिपुरी अनुवाद जब धारावाहिक रूप में स्थानीय दैनिकपत्र ‘पोक्नफम’में छपा, तब जो प्रतिक्रियाएँ पाठकों ��"र अन्य साहित्यकारों से आई, वे ही उनके मणिपुरी कविता के मर्म- ज्ञानकी सबूत थीं। अब मणिपुरी कविता का जो ज्ञान उन्होंने प्राप्त किया है, वे उसे हिन्दी पाठकों एवं विद्वानों तक पहुँचाने का कार्य कर रहे हैं। मणिपुरीभाषा-भाषी होने के नाते मैं हर्ष का अनुभव कर रहाहूँ ��"र डॉ. देवराज का ऋण भी मानता हूँ मणिपुरी भाषा��"र साहित्य के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य किया, जेसे हमें ही अपनी मातृभाषा ��"र साहित्य के लिए करना चाहिए था ��"र हम आज तक नहीं कर पाए। डॉ। देवराज धन्यवाद के पात्र हैं।"
( क्रमश: )
-चन्द्रमौलेश्वर

'क्षण के घेरे में घिरा नहीं‘ : त्रिलोचन का स्मरण

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'क्षण के घेरे में घिरा नहीं' : त्रिलोचन का स्मरण

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पुस्तक : क्षण के घेरे में घिरा नहीं
प्रधान संपादक : देवराज
संपादक : अमन
प्रकाशक : परिलेख प्रकाशन,
मातृ भवन, १७-सावित्री एन्क्लेव,
नजीबाबाद-२४६७६३ (उत्तर प्रदेश)
संस्करण : २००८
मूल्य : पचास रुपए
पृष्ठ संख्या : ६४
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कविवर त्रिलोचन शास्त्री ९ दिसंबर, २००७ को ९० वर्ष की आयु में दिवंगत हुए। हिंदी साहित्य जगत की विशिष्ट परंपरा रही है कि यहाँ साहित्यकारों को या तो पुरस्कार-सम्मान आदि मिलने पर याद किया जाता है या दिवंगत होने पर! त्रिलोचन जी के संबंध में भी कैसे चूक हो सकती थी! देश भर की हिंदी पत्रिकाओं ने उन पर श्रद्धांजलि और स्मृति परक आलेख छापे और अपना कर्तव्य पूरा कर लिया। लेकिन इस सब के बीच एक स्मृति सभा नजीबाबाद (उत्तर प्रदेश) में हुई जो रस्मी-रवायती न थी। दरअसल त्रिलोचन १९९० में नजीबाबाद में संपन्न माता कुसुमकुमारी हिंदीतर भाषी हिंदी साधक सम्मान समारोह में आए थे और जनपद के साहित्य प्रेमियों के कंठहार बन गए थे। इसीलिए जब उनके निधन का समाचार सुना तो १० दिसंबर को ये तमाम लेखक और साहित्य प्रेमी नजीबाबाद में मध्यकालीन साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान डॉ. प्रेमचंद्र जैन के घर पर इकट्ठे हुए और अपने प्रिय कवि त्रिलोचन को टुकड़ों-टुकड़ों में याद किया। इस अवसर पर देश के विविध अंचलों से अलग-अलग साहित्यकारों के संदेश मोबाइल फोन पर संपर्क करके प्राप्त किए गए। तभी यह भी तय किया गया कि इन संदेशों को पुस्तकाकार प्रकाशित किया जाएगा। काम शुरू हो गया और प्रस्तावित पुस्तक केवल संदेशों तक सीमित नहीं रह सकी बल्कि जिन्होंने मोबाइल-सभा में संदेश दिए थे, उन्होंने अच्छे खासे समीक्षात्मक आलेख उपलब्ध करा दिए इसलिए पुस्तक का स्वरूप भी बदल गया और इस तरह एक समीक्षा पुस्तक ही तैयार हो गई। शीर्षक है ‘क्षण के घेरे में घिरा नहीं‘।
‘क्षण के घेरे में घिरा नहीं‘ (२००८) के प्रधान संपादक हैं मणिपुर विश्वविद्यालय के मानविकी विभाग के अधिष्ठाता डॉ देवराज और संपादक हैं नजीबाबाद के युवा पत्रकार अमन। पुस्तक ‘विन्यास‘ की ओर से परिलेख प्रकाशन ने प्रकाशित की है जिसकी परामर्श समिति के संरक्षक डॉ. प्रेमचंद्र जैन है तथा संयोजक हैदराबाद स्थित संस्था ‘विश्वम्भरा‘ की महासचिव डॉ. कविता वाचक्नवी जो विशेष रूप से इस योजना की पूर्ति में सक्रिय रहीं।

पुस्तक में संपादक के ‘पूर्व कथन‘ के अतिरिक्त २६ छोटे-बड़े आलेख हैं, एक साक्षात्कार है, एक रिपोर्ट और ‘पथ पर चलते रहो निरंतर‘ शीर्षक से त्रिलोचन की बारह छोटी-छोटी कविताएँ। कुल मिलाकर त्रिलोचन को समझने-समझाने के लिए पर्याप्त सामग्री है। पुस्तक की समीक्षात्मक दृष्टि को डा. देवराज के शब्दों के माध्यम से सहज ही पकड़ा जा सकता है। वे बताते हैं “त्रिलोचन प्रगतिशील चिंतन की भारतीय परंपरा के प्रमुख लेखकों में से एक होते हुए भी अपने प्राप्य से अधिकतर वंचित रहे। हिंदी कविता में आलोचकों ने उन्हें कभी चर्चा के केंद्र में नहीं आने दिया। उन दिनों तो बिल्कुल नहीं, जब प्रगतिशील विचारधारा का आंदोलन ज्ञात-अज्ञात शक्तियों द्वारा हाशिए की ओर धकेला जा रहा था और उसे त्रिलोचन की ज़रूरत थी। यह कम आश्चर्य की बात नहीं कि हिंदी साहित्य का अध्येता त्रिलोचन की पहचान इस रूप में चिह्नित करता है कि वे हिंदी कविता में अंगरेज़ी छंद सॉनेट को स्थापित करने वाले हैं, कि उन्होंने इस विदेशी छंद को अपने कलात्मक-कौशल से साध कर हिंदी के अन्य जातीय छंदों के समान बना दिया, कि उनके सॉनेट अभिव्यक्ति की सादगी के उदाहरण हैं आदि। सॉनेट और उसकी सादगी के सामने कुछ तथ्यों की जानबूझ कर उपेक्षा की जाती है - जैसे, त्रिलोचन ने हिंदी में निराला की मुक्त छंद की परंपरा को सही रूप में सबके सामने रखा और कविता की मुक्ति तथा मनुष्य की मुक्ति के बीच विद्यमान वास्तविक संबंध को पुनर्प्रस्तुत किया, उन्होंने अपने लेखों में हिंदी आलोचना की कमज़ोरियों के विरुद्ध आवाज़ उठाई, उनकी कहानियों में अपने देशकाल की ईमानदार अभिव्यक्ति है, उनके पत्रों में संबंधों को जीने की असाधारण ललक है, वे लोक और शास्त्र का अद्भुत संगम थे आदि। इस तरह त्रिलोचन का सॉनेट साहित्य भाव और भाषा की असाधारण सादगी की भेंट चढ़ जाता है, जिसकी चकाचौंध में सॉनेट के भीतर व्यक्त जीवन संघर्ष अप्रकाशित ही रह जाता है और उनके रचना संसार के शेष पक्ष यों ही परे सरका दिए जाते हैं।”


अपने आलेख में वाचस्पति (वाराणसी) ने बड़ी तल्खी से सवाल उठाया है कि पतनशील उच्च और मध्य वर्ग की बाजारवादी मानसिकता को खाद-पानी देने वाले, भ्रष्ट हिंदी और फूहड़ अंग्रेजी के वर्णसंकर दैनिकों में अपना वर्तमान और भविष्य तलाशने वाले बुद्धिबली, निधन के बाद बड़ी शिद्दत से त्रिलोचन जैसे बोली-बानी के अद्भुत संगतराश को आखिर क्यों याद कर रहे हैं? उन्होंने त्रिलोचन की विरासत का विस्तार करने में जनपदीय युवतर कवियों की भागीदारी के प्रति विश्वास भी प्रकट किया है।

नंदकिशोर नवल (पटना) ने त्रिलोचन को क्लासिकी गंभीरता का कवि सिद्ध किया है तो विजेंद्र (जयपुर) ने उन्हें संघर्षशील जनता से जुड़ी कविता रचने वाले जातीय कवि के रूप में देखा है। ऋषभदेव शर्मा ने उनकी विराटता और विलक्षणता का आधार साधारणता को माना है तो कविता वाचक्नवी (हैदराबाद) ने विचारधारा के आधार पर साहित्य और साहित्यकारों को बाँटने वालों की अच्छी खबर ली है और इसे सर्वनाश का द्योतक माना है। त्रिलोचन के पात्रों का विश्लेषण करते हुए उन्होंने लोक संस्पृक्ति को उनकी कविता की ताकत माना है। ए।अरविंदाक्षन (कोच्चि) ने समन्वय करते हुए लिखा है कि यदि लोक त्रिलोचन का सहज यथार्थ है तो उनकी कविता का अन्वेषित यथार्थ क्लासिकी का है। इसीलिए उन्हें कालिदास से होते हुए त्रिलोचन तुलसी तक की कविता-यात्रा करते दिखाई देते हैं।

हरिपाल त्यागी (दिल्ली) ने त्रिलोचन को उदार भारतीय आत्मा और मानवीय प्रतिभा से संपन्न कवि बताया है जिनकी भाषा का जादू सिर चढ़कर बोलता था। इसी प्रकार बालशौरि रेड्डी (चेन्नई) ने उनकी कविता के प्रगतिशील तत्व को रेखांकित किया है। अर्जुन शतपथी (राउरकेला) के लिए त्रिलोचन क्रांति पुरुष थे तो एम.शेषन (चेन्नई) के लिए वे आधुनिक कविता को समसामयिक भावबोध से संयुक्त कर उसे ऊँचाई प्रदान करने वाले कलमकार थे। ई.विजयलक्ष्मी (इम्फाल) ने अपने आलेख में त्रिलोचन को अनुत्तरित चुनौती का कवि कहा है तो नित्यानंद मैठाणी (लखनऊ) ने उन्हें हिंदी का एक और कबीर माना है। विनोद कुमार मिश्र (ईटानगर) ने त्रिलोचन के व्यक्तित्व और कृतित्व में व्याप्त जिजीविषा की चर्चा की है तो महेश सांख्यधर (बिजनौर) ने अपने आलेख में कहा है कि यदि आप कवि हृदय नहीं हैं तथा आपकी आँख में पानी नहीं है तो आप न कवि त्रिलोचन को समझ सकते हैं न त्रिलोचन की कविता को।
इसी प्रकार गोपाल प्रधान (सिलचर), दिनकर कुमार (गुवाहाटी), शंकरलाल पुरोहित (भुवनेश्वर), नरेंद्र मारवाड़ी (बिजनौर), ऋचा जोशी (मेरठ), अरुणदेव, बलवीर सिह वीर, राजेंद्र त्यागी, पुनीत गोयल, चंचल और अमन (नजीबाबाद) ने भी अपने आलेखों में त्रिलोचन के साहित्य के अलग-अलग आयामों पर संक्षेप में प्रकाश डाला है।

‘जीवित व्यक्ति ही साहित्य देता है‘ शीर्षक से वाचस्पति द्वारा १९७० में लिया गया त्रिलोचन जी का साक्षात्कार इस समस्त चर्चा को परिपूर्णता प्रदान करता है। और अंत में हैं त्रिलोचन की कुछ कविताएँ। निस्संदेह समकालीन साहित्य के एक शलाका पुरुष को उसके चाहने वाले लेखकों और पाठकों की ओर से दी गई यह सारस्वत श्रद्धांजलि स्पृहणीय है।
प्रो.ऋषभदेव शर्मा

The Memory and Its Programming + SCIENCE AND RELIGION

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Dr Harish Chandra's article in SpiritMag Feb '08 - 14
SpiritMag February '08Volume II, No. 6



VIII. The Memory and Its Programming

Last month we had discussed the three constituent units of the mind domain ? mind, memory and intellect. The first unit of mind functions as the link between the subtle mind domain and the gross body. It picks up the incoming knowledge from the sense organs for sight, sound, smell, taste and touch. In the outward direction, it activates the organs for karma and brings the body in action. The memory unit stores the incoming knowledge for future reference before 'projecting' it to the intellect unit that 'displays' the incoming knowledge for the soul's perception. Now, the decision is taken by the soul with the help of the intellect and then relayed to the memory and mind units, and then to the body's motor organs for outgoing karma.


हिंदी के हिंडोले में जरा तो बैठ जाइए

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हिंदी के हिंडोले में जरा तो बैठ जाइए

हिंदी भाषा ने अपनी हजार साल से ज्यादा की यात्रा में अभी तक अनेक पड़ाव पार किए हैं, उतार-चढ़ाव देखे हैं। उसकी इस विकासयात्रा की एक बड़ी विशेषता है कि वह सदा जन-मन की ओर प्रवाहित होती रही है। यदि यह कहा जाए कि हिंदी की ताकत उसके निरंतर जनभाषा होने में है, राजभाषा होने में नहीं, तो शायद कोई अतिशयोक्ति न होगी। अपभ्रंश के अनेक क्षेत्रीय रूपों से जब दूसरी आधुनिक भारतीय आर्यभाषाएँ रूपाकार ग्रहण कर रही थीं, उसी समय हिंदी ने भी अपने प्रारंभिक रूप की आहट दी। यह आहट सुनाई पड़ी अलग-अलग बोलियों और उपभाषाओं के रूप में। एक ओर इसका यह राजस्थानी रूप था -
कहिरे भरहेसर कुण कहीइ।
मइ सिउँ रणि सुरि असुरि न रहीइ॥
चक्रधरइ चक्रवर्ती विचार।
तउ अह्म पुरि कुंभार अपार॥
- भरतेश्वर बाहुबली रास
(भरतेश्वर की क्या कहते हो, मेरे सामने तो युद्ध में सुर-असुर भी नहीं ठहरते। यदि उस चक्रवर्ती को चक्रधारण का ही अधिक विचार हो गया है तो हमारे यहाँ तो एक नहीं, कई चक्रधारी कुम्हार हैं।)

यह थी 1184 ई. की हिंदी। पृथ्वीराज चौहान के समकालीन चंदबरदायी की कविता में 1300-1400 ई. में इसका अलग पड़ाव दिखाई देता है -
मति घट्टी सामंत मरण हउ मोहि दिखावहु।
जम चीठी विणु कदन होइ जउ तुमउ बतावहु॥
- पृथ्वीराज रासो
(हे सामंत! क्या तुम्हारी मति घट गई है जो मुझे इस तरह मृत्यु का हौवा दिखा रहे
हो। क्या यम के परवाने के बिना कभी मौत आ सकती है - तुम्हीं बताओ।)

दूसरी ओर इन दोनों के बीच अमीर खुसरो की रचनाओं में आरंभिक खड़ीबोली और ब्रजभाषा के रूप देखे जा सकते हैं -
"गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारे केस।
चल खुसरो घर आपणे, रैन भई चहुँ देस॥"

इसी प्रकार हिंदी का एक आरंभिक रूप यदि सरहपाद जैसे सिद्ध और गुरु गोरखनाथ जैसे नाथपंथी कवियों की भाषा में प्रकट हो रहा था, जिसका पौरुषपूर्ण संस्करण आगे चलकर कबीरदास जैसे कवि की भाषा में मुखर होकर संध्याभाषा, सधुक्कड़ी और खिचड़ी कहलाया तो एक अन्य रूप विद्यापति की पदावली में व्यक्त हो रहा था -
"नंदक नंदन कदंबक तरुतर
धिरे-धिरे मुरली बजाव।"
(नंद का पुत्र कदंब के वृक्ष तले धीरे-धीरे मुरली बजा रहा है।)
यह मुरली मैथिली में बजी, तो ब्रजी में गूँज उठी। इस तथ्य से हम सब भलीभांति परिचित हैं। राजस्थान से लेकर मिथिला तक, या कहें कि गुजरात से लगती सीमा से लेकर बंगाल से लगती सीमा तक व्याप्त विविध बोलियों के रूप में हिंदी भाषा ने अपनी आरंभिक उपस्थिति दर्ज कराई। इसके बाद का अर्थात कबीरदास के समय से लेकर आज तक की हिंदी भाषा की यात्रा का पूरा इतिहास तो हमें मालूम है ही। लेकिन इस इतिहास को बार-बार दुहराने और समझने की आज के समय में सबसे ज्यादा जरूरत है।

आज जब हिंदी ने अपने आपको साहित्य और संपर्क के परंपरागत प्रयोजन क्षेत्रों के साथ-साथ राजकाज, प्रशासन, ज्ञान-विज्ञान, आधुनिक वाणिज्य-व्यवसाय तथा तकनीकी के लिए उपयुक्त भाषा के रूप में सब प्रकार सक्षम सिद्ध कर दिया है (भले ही अपनी राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी या गुलाम मानसिकता की हीनभावना के कारण हम इस सत्य को व्यावहारिक स्वरूप प्रदान करने में हिचकते हों) तथा बाजार में और कंप्यूटर पर व्यापक प्रयोग की अपनी संभावनाओं को प्रकट कर दिया है, दुनिया की सर्वाधिक प्रयोग की जाने वाली शीर्ष भाषाओं में शामिल होकर संयुक्त राष्ट्र द्वारा विश्व-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित होने की दावेदारी प्रस्तुत कर चुकी है। ऐस समय में हिंदी के इस बहुक्षेत्रीय और बहुबोलीय आधार की स्मृति बनाए रखना बेहद जरूरी है क्योंकि हिंदी केवल उतनी सी नहीं है, जितनी सी वह राजभाषा हिंदी या खड़ी बोली हिंदी या मानक हिंदी के रूप में दिखाई देती है।

इसी प्रकार जब हम कहते हैं कि हिंदी का प्रयोग देश भर में किया जाता है या जब इस बात पर गर्व करते हैं कि हिंदी बोलने/जानने वाले विश्वभर में हैं, तो इसका अर्थ है कि हिंदी का प्रयोग करने वाला भाषा-समाज अनेक भाषा-कोडों का प्रयोग करता है। ये भाषा-कोड एक ओर तो उसकी तमाम बोलियों से आए हैं, दूसरी ओर इनका विकास हिंदी की इन बोलियों के विविध भाषाओं के साथ संपर्क से हुआ है। हाँ, जहाँ यह संपर्क अत्यंत घनिष्ठ है, वहाँ हिंदी के विविध रूपों का संप्रेषण घनत्व भी अधिक है तथा जहाँ संपर्क में उतनी घनिष्ठता नहीं है, वहाँ संप्रेषण में भी उतना घनत्व नहीं है। इन स्थितियों में ही हिंदी के बंबइया, हैदराबादी, मद्रासी आदि संस्करण विकसित हुए हैं। इसी प्रकार भारतवंशियों द्वारा आबाद किए गए देशों में भी हिंदी का अपना-अपना रूप है। अंग्रेजी मिश्रण से विकसित संस्करण को भी नकारा नहीं जा सकता। हमें आज हिंदी के विकास की अनेक दिशाओं के रूप में इन सब संस्करणों को स्वीकृत और सम्मानित करना होगा। तभी जनभाषा को विश्वभाषा की प्रतिष्ठा प्राप्त होगी।

हमें इस प्रवृत्ति के बारे में गंभीरता से सोचना होगा कि हिंदी परिवार की बोलियाँ/भाषाएँ मूलत: परस्पर नाभिनालबद्ध हैं और किसी तात्कालिक लाभ के लिए उनकी यह परस्पर एकता खंडित नहीं की जानी चाहिए। साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ जैसी संस्थाओं से लेकर सरकारी योजनाओं तक के नियामकों को इस तथ्य को ध्यान में रखना होगा कि इन समस्त बोलियों/भाषाओं से संबलित हिंदी भाषा समाज का विस्तार भौगोलिक और सांख्यिकीय दृष्टि से अत्यंत व्यापक है। अत: जब अन्य भारतीय भाषाओं के साथ हिंदी को रखा जाए तो उसके इस विस्तार के अनुरूप विविध योजनाओं में उचित अनुपात में भागीदारी प्रदान की जाए। लोकतंत्र के इस साधारण से सिद्धांत की उपेक्षा का अर्थ है - हिंदी भाषा के व्यापक बोलीय आधार की उपेक्षा। इससे असंतोष पैदा होता है और अलग-अलग बोलियों के प्रयोक्ता समाज में तात्कालिक लाभों के लिए अलग से सूचीबद्ध किए जाने का मोह जागता है। यदि इस प्रवृत्ति पर रोक न लगी, तो सब बोलियाँ खिसक जाएँगी और हिंदी के समक्ष खुद अपनी पहचान का संकट खड़ा हो सकता है। हिंदी की सारी बोलियाँ मिलकर ही हिंदी भाषा रूपी रथ की संज्ञा प्राप्त करती हैं। यदि रथ के घोड़े, पहिए और आसन आदि को एक-एक कर अलग करते जाएँ तो रथ कहाँ बचेगा! अत: हिंदी की बोलियों की एकजुटता में ही हिंदी का अस्तित्व है, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हमें हिंदी के रथ को बिखरने से बचाना होगा।

यहाँ हम यह भी उल्लेख करना जरूरी समझते हैं कि हिंदी जिस प्रकार बोलीगत विभेदों से भरी-पूरी संपूर्ण भाषा है, उसी प्रकार वह शैलीगत भेदों से भी परिपूरित है। हजार साल से ज्यादा की अपनी विकास यात्रा में हिंदी ने विभिन्न भाषाओं के संपर्क और ऐतिहासिक सामाजिक दबावों के परिणामस्वरूप अपने इन शैलीगत भेदों को निर्मित किया है। ध्यान में रखना होगा कि जिस प्रकार बोलीगत भेद एक दूसरे के सहयोगी हैं, उसी प्रकार हिंदी के शैलीगत भेद भी एक दूसरे के पूरक हैं। यहाँ हम खासकर दक्खिनी हिंदी और उर्दू के प्रदेय की ओर ध्यान दिलाना चाहते हैं। इन दोनों शैलियों के बिना हिंदी का इतिहास अधूरा है। उसे भी हिंदी साहित्य के अंग के रूप में ग्रहण करना अपनी विरासत को पहचानने और उससे जुड़ने के लिए आवश्यक है।
हिंदी जैसी व्यापक और अक्षेत्रीय--सार्वदेशिक और अंतरराष्ट्रीय--भाषा के लिए यह सदा स्मरण रखना आवश्यक है कि भाषा 'बहता नीर' है। इस बहते नीर की घाट-घाट पर अलग-अलग रंगत है। इस पर तथाकथित शुद्धतावाद नहीं थोपा जाना चाहिए। कहने का अभिप्राय है कि हमें जीवन के समस्त विविध प्रयोजनों और भाषा प्रयोक्ता समाज के वैविध्यों के अनुरूप जहाँ एक ओर उच्च हिंदी पर गर्व है, वहीं उसके हिंदुस्तानी/गंगाजमुनी रूप पर भी नाज है तथा उर्दू रूप पर भी फ़ख्र है। इतना ही नहीं, अंग्रेजी के मिश्रण से बने गए भाषा रूप से भी हमें उतना ही प्रेम होना चाहिए जितना दूसरे भाषा रूपों से। हम किसी भाषा रूप को हिकारत की नज़र से देखेंगे तो यह उचित नहीं होगा। मीडिया के विविध प्रकार के प्रकाशनों और प्रसारणों के कारण जो इन विविध भाषा रूपों का विकास हो रहा है, वह भी प्रशंसनीय है।

14 सितंबर को जब-जब हम हिंदी दिवस मनाएँ तो भारत के संविधान के अनुच्छेद-343 से अनुच्छेद-351 तथा अनुसूची-8 के प्रावधानों का तो खयाल रखें ही, यह भी खयाल रखें कि राजभाषा की यह सारी व्यवस्था भारत की जातीय अस्मिता और सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्ण बनाए रखने तथा विकसित करने के उद्देश्य से की गई है। इसे केवल सरकारी कामकाज की भाषा तक सीमित रखना उचित नहीं होगा। बल्कि सच तो यह है कि अनुच्छेद-351 के निर्देश के अनुरूप हिंदी का सामासिक स्वरूप राजभाषा की अपेक्षा व्यापक जनसंपर्क, साहित्य, मीडिया, वाणिज्य-व्यवसाय, ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी की भाषा के रूप में हिंदी के व्यापक व्यवहार से ही संभव है। यदि हम - हमारी सरकारें - सचमुच हिंदी को विश्वभाषा के पद पर आसीन देखना चाहती हैं तो उसका जो संवैधानिक अधिकार लंबे अरसे से लंबिंत/स्थगित पड़ा है, उसे तुरंत बहाल किया जाए। सभी भारतीय भाषाओं को इससे बल मिलेगा तथा परस्पर अनुवाद द्वारा उनके माध्यम से हिंदी भी बल प्राप्त करेगी। अनुवाद ही वह माध्यम है जो हिंदी को समूचे भूमंडलीय ज्ञान की खिड़की बना सकता है, अत: इस दिशा में भी ईमानदारी से प्रयास करने की जरूरत है। मौलिक लेखन और अनुवाद दोनों मिलकर हिंदी के इस सामासिक और वैश्विक स्वरूप का पुनर्गठन करेंगे - इसी शुभकामना के साथ हम सर्वभाषाभाषी समाजों को हिंदी के हिंडोले में झूलने के लिए आमंत्रित करते हैं, जैसाकि किसी कवि का सहज आह्वान है :-
बिहरो 'बिहारी' की बिहार वाटिका में चाहे
'सूर' की कुटी में अड़ आसन जमाइए।
'केशव' के कुंज में किलोल केलि कीजिए या
'तुलसी' के मानस में डुबकी लगाइए॥
'देव' की दरी में दुरी दिव्यता निहारिए या
'भूषण' की सेना के सिपाही बन जाइए।
अन्यभाषाभाषियों मिलेगा मनमाना सुख
हिंदी के हिंडोले में ज़रा तो बैठ जाइए॥

- ऋषभदेव शर्मा

एक शोक सभा मोबाईल के जरिए

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विशेष
Wednesday, 26 December 2007

कवि त्रिलोचन शास्त्री

रेखांकन : मुजीब हुसैन




हिन्दी के खबरिया चैनल और अखबारों में बैठे लोगों को खबरों के नाम पर फिल्म और टीवी से जो भी जूठन या खबरें मिल जाती है उनको बेचारे दर्शकों के सामने परोस दिया जात है। फूहड़ नाच गानों और फिल्मी सितारों की बकवास को दिन भर परोसने के पीछे चैनल वालों का अजीब तर्क है कि उनके दर्शक पढ़े-लिखे नहीं है इसीलिए उनको अपने दर्शकों की रुचि का ध्यान रखते हुए ऐसी ही दो कौड़ी की खबरें दिखाना होती है। तो क्या यह मानलें कि चैनल में बैठे लोगों का भी पढा़ई-लिखाई से कोई वास्ता नहीं है। इस बात में कुछ दम इसलिए लगता है कि किसी चैनल पर कभी किसी हिन्दी साहित्यकार की किसी कृति से लेकर उसके जीने या गुजर जाने पर कोई चर्चा नहीं होती। देश के जाने माने हिन्दी कवि त्रिलोचन के निधन पर देश भर के साहित्यकारों ने मोबाईल के जरिए अपनी संवेदनाएं व्यक्त कर उनको याद किया। पेश है यह रिपोर्ट।







हिन्दी की प्रगतिशील चिंतन परंपरा के प्रमुख स्तंभ और आम आदमी के अपने कवि त्रिलोचन शास्त्री के निधन पर उत्तर-प्रदेश के ऐतिहासिक नगर, नजीबाबाद में 10 दिसंबर को एक शोक सभा का आयोजन किया गया, जिसमें स्थानीय साहित्यकारों के अतिरिक्त मोबाइल फोन के माध्यम से देश के विभिन्न राज्यों के प्रसिद्ध साहित्यकारों ने शोक संवेदना व्यक्त कर त्रिलोचन शास्त्री को श्रद्धांजलि अर्पित की। हिन्दी विद्वान डॊ। प्रेमचन्द जैन की अध्यक्षता में उन्हीं के आवास पर संपन्न इस सभा का संचालन मणिपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर देवराज ने किया।




शोक सभा में अरूणाचल से डॊ। विनोद मिश्र ने मोबाइल पर दिये अपने श्रद्धांजलि वक्तव्य में कहा कि त्रिलोचन की कविताओं में लाहौर में रिक्शा चलाने वाले लोगों की तस्वीर भी दिखायी देती है और किसानों की पीड़ा भी। जयपुर से प्रख्यात जनवादी साहित्यकार विजेन्द्र ने त्रिलोचन शास्त्री को लोकधर्मी परंपरा का बहुत बड़ा कवि, तपस्वी व मनीषी बताते हुए कहा कि उन्होंने हिन्दी साहित्य में अनुकरणीय कीर्तिमान रचा। दिल्ली से प्रख्यात वयोवृद्ध साहित्यकार विष्णु प्रभाकर ने कहा कि त्रिलोचन भी चले गये अब, मन नहीं लगता। मैं भी जाना चाहता हूँ!, बस पता नहीं कब जाना होगा। यह कहते हुए वह अत्यंत भावुक हो गये।



कोल्हापुर से डॊ। अर्जुन चह्वाण ने उन्हें सरलता एंव सादगी से भरा हुआ महान आदमी बताते हुए कहा कि त्रिलोचन की सादगी और सरलता दिखावे की नहीं थी। उन्होंने अपनी कविता में भी कोई छद्म नहीं पाला। बनारस में निवास कर रहे वाचस्पति जी हिन्दी के बहुत से मूर्धन्य साहित्यकारों के संपर्क में रहे हैं। नागार्जुन और त्रिलोचन शास्त्री से उनकी घनिष्ठता रही है। उन्होंने बनारस से ही मोबाइल पर कहा कि त्रिलोचन जी संध्याकाल में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में आ जाते थे। प्रेमचन्द जैन और गुरूवर शिवप्रसादजी के साथ आचार्य हजारी प्रसाद जी के यहाँ भी जाते थे।


महाप्राण निराला ने 1940 में अपनी एक रचना में अपना रचनात्मक अकेलापन देखा था- ``मैं अकेला/ देखता हूँ आ रही/ मेरे दिवस की सांध्य वेला।´´ वाचस्पति जी ने भावुक होकर कहा कि पिछले कुछ समय से धरती और दिगंत के कवि त्रिलोचन ने भी अपनी सांध्य वेला का अनुभव अपने जीवन में करना प्रारम्भ कर दिया था, लेकिन उनका स्वर `धरती´ जो उनका पहला संग्रह था उसी से मिलता हुआ था-आज मैं अकेला हू¡/ अकेला रहा नहीं जाता/ सुख-दु:ख एक भी/ सहा नहीं जाता। त्रिलोचन पिछले वर्षों में सचमुच अकेले हो गये थे। पेट का अलसर फट जाने के कारण वह अपने छोटे पुत्र के साथ ज्वालापुर भी रहे। वह जब तक जीवित रहे चलते रहे। `शब्द´ नाम के सॊनेट संग्रह को वह अपना उत्तम संग्रह मानते थे।


नजीबाबाद के साहित्यकार राजेंद्र त्यागी ने कहा उन्होंने जिस विधा को अपनाया है, वह दुर्लभ है। ऐसा साहित्य अन्यत्र कहीं नहीं मिलता। पटना से प्रगतिशील साहित्य चिन्तक डॊ। नन्दकिशोर नवल ने विगलित हृदय से त्रिलोचन जी का स्मरण किया। उन्होंने कहा कि उनसे मेरा संबन्ध 1967 से था। जब वे पटना आते थे, मेरे घर ही ठहरते थे। त्रिलोचन अपनी परंपरा के अंतिम कवि थे। वे आधुनिक कविता के सबसे बड़े कवि भी थे। शमशेर, केदार, नागार्जुन, मुक्तिबोध और त्रिलोचन प्रगतिवादी कवि थे। जिनमें चार पहले ही जा चुके थे। श्रद्धांजलि वक्तव्य के अंत तक आते-आते नवल जी मोबाइल पर ही फूट-फूट कर रोने लगे।



गुवाहाटी से प्रखर पत्रकार, पूर्वोदय के अधिशासी संपादक रवि शंकर `रवि´ ने कुछ वर्ष पहले त्रिलोचन के लिए एक कविता लिखी थी, जिसे वे उन्हें स्वयं सुनाना चाहते थे। अचानक त्रिलोचन जी के चले जाने से वह अवसर भी चला गया। हैदराबाद से प्रख्यात कवयित्री और विश्व भर में हिन्दी साहित्य, भाषा और देवनागरी लिपि के प्रचार-प्रसार में जुटी डॊ। कविता वाचक्नवी ने कहा कि ऐसा अनुभव हो रहा है, मानो मुझे व्यक्तिगत क्षति हुई है। उनका भाषा में जो सतत् प्रयोगधर्मिता का अंदाज रहा वह मुझे लुभाता रहा। भाषा पर उनका संपूर्ण नियंत्रण था। वे भाषा के आचार्य कवि थे। नन्द किशोर नवल की भाँति ही डॊ. कविता वाचक्नवी भी त्रिलोचन जी को मिली घातक उपेक्षा से भीतर तक आहत थीं। उन्होंने कहा कि इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि जब भारतीय साहित्य का यह शिखर पुरूष पूरी तरह अशक्त स्थिति में पहुँच गया तो हिन्दी के छुटभैये ठेकेदारों ने इनके संबन्ध में तरह-तरह के स्पष्टीकरणनुमा वक्तव्य जारी किए। सचमुच हिन्दी वालों ने ही उन्हें मार डाला।



नजीबाबाद निवासी साहित्यकार बलवीर सिंह वीर ने इस दु:खद अवसर पर त्रिलोचन जी के प्रति अपनी भावनाएँ प्रकट करते हुए कहा कि आज प्रगतिवादी चेतना का अंतिम स्तंभ ढह गया है। उनके चले जाने से हिन्दी को जो क्षति हुई है, उसकी भरपाई नहीं हो सकती। राउरकेला से ओड़िया और हिन्दी के प्रसिद्ध विद्वान अर्जुन शतपथी ने अपने श्रद्धांजलि वक्तव्य में कहा कि उनके उठ जाने से निश्चय ही हिन्दी जगत की बहुत बड़ी हानि हुई है। त्रिलोचन जी जैसे पितामह कल्प प्रगतिवादी कवि का स्थान सदा के लिए रिक्त रह जायेगा। उन्होंने कवि त्रिलोचन के साथ बिताए समय को भी स्मरण किया।



त्रिलोचन जी के निधन के समाचार के समय हिन्दी के युवा समीक्षकों में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा त्रिचुरापल्ली में थे। उन्होंने वहीं से मोबाइल पर कहा कि त्रिलोचन जी के जाने से ऐसा लगा, जैसे अपने परिवार का कोई शिखर खिसका हो। त्रिलोचन जी के न रहने से जनपक्षीय काव्य के क्षेत्र में एक शून्य उत्पन्न हो गया है। वे बहुभाषाविद् थे और शब्दों से कौतुक करने वाले थे। वे भारतीय साहित्य के मूल सरोकारों की पहचान रखने वाले ऐसे कवि थे, जिन्हें हम कालिदास के साथ जोड़कर देख सकते है। भारत की अन्य भाषाओं को भी उन्होंने आत्मसात किया हुआ था। उन्होंने नजीबाबाद के माता कुसुमकुमारी हिन्दीतरभाषी हिन्दी साधक सम्मान समारोह में सन् 1990 में मुख्य अतिथि के रूप में भारत- भर के लेखकों को संबोधित करते हुए हिन्दी भाषा के मानकीकरण का सवाल उठाया था। वह बात आज भी हमारे सामने ज्यों की त्यों है। वे हिन्दी का सार्वदेशिक रूप में मानकीकरण चाहते थे।प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा ने इस बात पर बल दिया कि यदि हम हिन्दी के सार्वदेशिक मानक रूप का विकास करेंगे तो यह हमारी उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। गुवाहाटी से सैंटीनल हिन्दी दैनिक के सम्पादक दिनकर कुमार ने कहा कि महान चिंतक और जुझारू जीवन जीने वाले त्रिलोचन शास्त्री के निधन से हिन्दी कविता में कभी न भरा जा सकने वाला एक और शून्य दर्ज हो गया है।



आधुनिक हिन्दी समालोचना में रामविलास शर्मा, नामवर सिंह और प्रकाशचन्द्र गुप्त की परंपरा को नया अर्थ देने वाले, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा के निदेशक प्रोफेसर शंभुनाथ ने कहा कि त्रिलोचन शास्त्री जी ने अनेकता व प्रगतिशीलता की ओर बढ़ते हुए भी अपना संबन्ध लोक संस्कृति और काम करने वालें हाथों से हमेशा बनाये रखा। उन्होंने बहुत अच्छे सॉनेट लिखे हैं। उनकी मृत्यु से प्रगतिशील कवियों का अंतिम स्तंभ भी टूट गया है। साहू जैन महाविद्यालय, नजीबाबाद के हिन्दी विभाग में कार्यरत डॊ। अरूण देव जायसवाल ने अपने श्रद्धांजलि वक्तव्य में कहा कि त्रिलोचन जी आज हमारे बीच से उठकर चले गये, परन्तु इसकी भूमिका बहुत पहले तैयार हो गयी थी। एक रचनाकार का अपने रचनाकर्म से धीरे-धीरे च्युत हो जाना ही अंतत: उसे उसकी मृत्यु की ओर ठेलता जाता है। डॊ. जायसवाल ने पाश्चात्य छन्द सॉनेट को ठेठ हिन्दी छन्द की प्रकृति के अनुरूप ढालने में त्रिलोचन जी की ऐतिहासिक भूमिका का स्मरण भी किया।



नजीबाबाद के चित्रकार एंव कवि इंद्रदेव भारती ने कहा कि त्रिलोचन शास्त्री आम आदमी के अपने कवि थे। वे उसकी पीड़ा को अच्छी तरह समझते थे। भारती जी ने यह भी कहा कि त्रिलोचन जी की कविताएँ सदैव जीवित रहेंगी। ओड़िया-हिन्दी के वरिष्ठ अनुवादक, शंकरलाल पुरोहित ने भुवनेश्वर से त्रिलोचन शास्त्री को भावुक होकर स्मरण करते हुए कहा कि वे त्रिलोचन जी से पहली बार 35 साल पहले बनारस में मिले थे। वे एकदम किसी ग्रामीण गरीब किसान की तरह लग रहे थे। चेन्नई से मोबाइल पर जाने माने हिन्दी और तेलुगु लेखक डॊ। बालशौरि रेड्डी ने त्रिलोचन जी को याद किया। वे उनसे अनेक बार मिले थे। रेड्डी जी ने कहा कि प्रगतिशील धारा के शक्तिमान कवि त्रिलोचन के अभाव में हिन्दी साहित्य के सामने एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है। संकट यह है कि उन्होंने काव्य और काव्यभाषा के लिए जीवनभर जिस संघर्ष चेतना की अगुवाई की, वह कार्य अब कौन करेगा।


हिन्दी और मणिपुरी की समीक्षक और अनुवादक डॊ. विजयलक्ष्मी ने इम्फाल से अपने श्रद्धांजलि वक्तव्य में त्रिलोचन जी को उनकी कविताओं के जरिए समझने और समझाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि उन्हें यह सौभाग्य प्राप्त नहीं हो सका कि वे त्रिलोचन जी से मिल पातीं, लेकिन यह भी तो सही है कि कवि किसी न किसी अंश में अपनी हर कविता में होता है। कोचीन, केरल से प्रख्यात अनुवादक और समालोचक डॊ. अरविंदाक्षन ने त्रिलोचन जी के कवि व्यक्तित्व के साथ ही उनके शोधकर्ता ओर शब्दकोश संपादक रूप को भी याद किया।



अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में हिन्दी साहित्य और जैन दर्शन के मर्मज्ञ डॉ। प्रेमचन्द जैन ने त्रिलोचन शास्त्री के जीवन और व्यक्तित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बनारस के उस कालखण्ड का जीवंत चित्रण किया जब त्रिलोचन जी बनारस में प्रसिद्ध कथाकार शिवप्रसाद सिंह के साथ सांध्यकालीन भ्रमण पर निकलते थे और साहित्य चर्चा करते थे। डॊ. जैन ने हिन्दी के इस महान कवि की एक और विशेषता का उल्लेख भी किया, वह थी अपनी कविता के साथ ही अन्य कवियों की कविताओं का स्मरण और प्रभावशाली पाठ। त्रिलोचन जी निराला की, राम की शक्ति पूजा की अद्भुत आवृत्ति किया करते थे।



इस तरह श्रद्धांजलि अर्पित की राष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों के साहित्यकारों ने अपने प्रिय युगजीवी लेखक को जिनकी भौतिक उपस्थिति वहाँ नहीं थी (कुछ लोगों को छोड़ कर) लेकिन क्या सचमुच भारत के इस महान कवि की शोक-सभा में साहित्य सेवी अनुपस्थित थे? मोबाइल के सहारे लगातार लगभग चार घण्टे चलने वाली ऐसी सभा भारतभर में और कहाँ-कहाँ हुई!



प्रस्तुति:

अमन

कुमार ए-7, आदर्श नगर,

नजीबाबाद-२४६७६३

0 9897742814 / ९४५६६७७१७७

पुनीत गोयल

01341220345

विश्वम्भरा'

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`विश्वम्भरा' की
विशेष कविगोष्ठी व लोकार्पण






"मूल्य संक्रमण के वर्तमान दौर में पत्रकारिता के दायित्व को नए सिरे से पारिभाषित करने की आवश्यकता है। आज के समय में व्यवसायिकता और उपभोक्तावाद का इतना अधिक दबाव है कि समाज और संस्कृति की चिंता करने वाली मिशनरी पत्रकारिता दुर्लभ होती जा रही है। रंगीन विज्ञापनी पत्रिकाओं ने पाठक के मन-मस्तिष्क के ऊपर हमला बोल रखा है और मूल्यकेंद्रित पत्रकारिता हाशिये में चली गई है।" ये विचार यहाँ 'विश्वम्भरा' की विशेष गोष्टी में अध्यक्ष के रूप में बोलते हुए उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के आचार्य डॉ. ऋषभ देव शर्मा ने प्रकट किए। वे देहरादून से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका 'सरस्वती सुमन' के नववर्षांक का लोकार्पण करने के बाद कवियों और पत्रकारों को संबोधित कर रहे थे। डॉ. ऋषभ देव शर्मा ने आगे कहा कि आंदोलनकारी और समर्पित पत्रकारिता के अभाव के युग में 'सरस्वती सुमन' एक सामाजिक और सांस्कृतिक जागरण के लक्ष्य के साथ जुड़ी हुई ऐसी पत्रिका है जो स्थापित लेखकों के साथ-साथ नवोदित रचनाकारों को भी पूरे सम्मान और उत्साह के साथ प्रकाशित करती है।
इस अवसर पर 'सरस्वती सुमन' के सम्पादक डॊ आनंद सुमन मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। संस्था की और से उनका अभिनन्दन भी किया गया। डॉ. सुमन ने अपने सम्बोधन में बताया कि यह पत्रिका उनकी दिवंगत सहधर्मिणी श्रीमती सरस्वती सिंह की स्मृति में प्रारभ की गई है और इसका चरम उद्देश्य एक ओर तो भारतीय संस्कृति के मूल्यों की पुनः स्थापना करना है तथा दूसरी ओर यह नए रचनाकारों को एक मंच प्रदान करने का भी अभियान है।
आरंभ में 'विश्वम्भरा' की महासचिव डॉ. कविता वाचक्नवी ने संस्था और मुख्य अतिथि का परिचय दिया और कहा कि सोद्देश्य पत्रकारिता के क्षेत्र में 'सरस्वती सुमन' का विशिष्ट स्थान बन चुका है। कार्यक्रम में विशेष अतिथि के रूप में पधारे डॉ. किशोरीलाल व्यास, डॉ. रणजीत तथा डॉ. रामजी सिंह उदयन ने भी पत्रिका के सम्बन्ध में अपने उद्-गार प्रकट किए।
'सरस्वती सुमन' के नववर्षांक के लोकार्पण के अवसर पर आयोजित कवि-गोष्टी में सर्वश्री नरेन्द्र राय, बलबीर सिंह, भँवरलाल उपाध्याय, कन्हैया लाल अग्रवाल, गोविन्द मिश्र, बी।एल।अग्रवाल स्नेही, सविता सोनी, उमा सोनी, ज्योति नारायण, अंबादास, प्रकाश कुमार सोनी आदि ने विभिन्न विधाओं की सामाजिक यथार्थ से युक्त कविताओं का पाठ किया। चर्चा-परिचर्चा में सर्वश्री प्रो। टी। मोहन सिंह, डॉ. राजकुमारी सिंह,डॉ. अहिल्या मिश्रा, सम्पत मुरारका, अशोक जालान, नर सिंह, राजेश मुरारका,राजेश निर्मल, शंकर मुरारका, कृष्ण कुमार सोनी, शिवकुमार राजौरिया,आशा देवी सोमाणी, श्रीनिवास सोमाणी आदि ने भी सक्रिय भूमिका निभाई।
कार्यक्रम का संचालन 'विश्वंभरा' के संरक्षक युवा कवि द्वारकाप्रसाद मायछ ने किया। बी बालाजी के धन्यवाद प्रस्ताव के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

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