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भाषा का संसार : वाणी प्रकाशन

पुस्तक चर्चा / ऋषभदेव शर्मा



‘‘भाषा का संसार’’: कहि न जाय का कहिए!



प्रो. दिलीप सिंह (1951) ने समाजभाषाविज्ञान को अपने अध्ययन और अनुसंधान का केंद्र बनाया है। वे साहित्य और भाषा पर विचार करते समय सामाजिक संदर्भ को सदा ध्यान रखते हैं। साहित्य का संसार और भाषा का संसार उनके निकट अलग-अलग नहीं है। स्मरणीय है कि कुछ वर्ष पूर्व उन्होंने एक कविता प्रधान मासिक पत्रिका में ‘कविता पाठ विमर्ष’ पर धारावाहिक लेखन किया था और साथ ही दैनिक पत्र स्वतंत्र वार्ता में अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान पर भी धारावाहिक लेख लिखे थे जिनमें भाषा और समाज के परस्पर संबंध से लेकर भाषाविज्ञान की अधुनातन प्रणालियों तक की व्याख्या की गई थी। भाषा विषयक उनके इस चिंतन को सुगम रूप में उनकी नई कृति ‘भाषा का संसार’ (2008) में देखा जा सकता है। इस कृति के शीर्षक की व्याख्या करते हुए कोष्ठक में लिखा गया है - आधुनिक भाषाविज्ञान की सुगम भूमिका। सचमुच यह कृति आधुनिक भाषाविज्ञान को समझने के लिए सहज और सुगम मार्ग का निर्माण करने में समर्थ है।


लेखक के लिए भाषा मानो संपूर्ण संसार है। अगर ‘भाषा का संसार’ को ‘भाषा ही संसार’ भी कह दिया जाए तो अत्युक्ति नहीं होगी - वैसे भी भारतीय चिंतन मूलतः वाक् केंद्रित ही तो है! प्रो. दिलीप सिंह मानते हैं कि भाषा एक साथ बहुत कुछ है अर्थात् यदि भाषा एक ओर संप्रेषण की बहुमुखी व्यवस्था है तो दूसरी ओर सोचने-विचारने का माध्यम हैं, तीसरी ओर भाषा ही साहित्यिक सृष्टि का कलात्मक साधन है।चौथी ओर वे भाषा को एक सामाजिक संस्था मानते है तो यह भी मानते है कि भारत जैसे देश में भाषा राजनैतिक विवाद का सर्वकालिक मुद्दा है। वे ध्यान दिलाते है कि भाषा किसी देश को एकता के सूत्र में जोड़नेवाला सबसे महत्वपूर्ण तत्व है जो उसके विकास का माध्यम बनता है। लेकिन उन्हें यह बात नहीं सुहाती कि हम भाषा को मिली-मिलाई चीज़ मान लेते हैं। उनका मानना है कि भाषा के प्रति उदासीनता हमारी अपनी भाषाओं के विकास और व्यवहार को अवरुद्ध करती है। अपनी भाषा के प्रति हमारी सजगता और दृष्टि से हमारे पूरे भाषा समाज के विकास पर प्रभाव पड़ता है। इसीलिए वे दृढ़ शब्दों मे कहते है कि अपनी भाषा के प्रति सकारात्मक और व्यापक दृष्टिकोण अपनाए बिना न तो हमारा सामाजिक विकास संभव है न ही मानसिक।


इस पुस्तक में भाषा, संप्रेषण और व्याकरण के जटिल रिश्तों की गाँठें भी खोली गई है। भाषा एक व्यवस्था है -इस सत्य को स्वीकारते हुए भी लेखक ने इस स्थापना पर अधिक बल दिया है कि भाषा कोई जड़ या रूढ़ व्यवस्था नहीं है। उसके साथ व्याकरण ही नहीं बोध और संप्रेषण का भी गहरा जुड़ाव है। संप्रेषण की क्षमता के लिए भाषा प्रयोग की उपयुक्तता की आवश्यकता होती है। इसे लेखक ने भाषा के समाज स्वीकृत विकल्पों के प्रयोग की क्षमता के रूप में व्याख्यायित किया है और इस पुस्तक द्वारा भाषा के बदलते परिप्रेक्ष्य को रूपायित करने का प्रयास किया है। इसके लिए उन्होंने भाषा क्या है, भाषा क्या करती है तथा भाषा के लिए भाषाविज्ञान किस तरह विक्सित हुआ है जैसे प्रश्नों पर अपने पाठक को सामने रखकर खुला चिंतन किया है।



पुस्तक का पहला खंड जहाँ भाषा के संबंध में हमारी धारणा, सिद्धांत, व्यवहार, व्यक्ति और संप्रेषण से उसके संबंध और भाषा की सर्जनात्मकता पर केंद्रित है, वहीं दूसरे खंड में सस्यूर, चौम्स्की, लेबाव, हैलिडे और डेल हाइम्स जैसे आधुनिक पाश्चात्य भाषावैज्ञानिकों की मान्यताओं का सुबोध शैली में विवेचन किया गया है। उदाहरण के लिए, भाषा और संप्रेषण के संबंध की चर्चा करते हुए एक स्थान पर वे लिखते हैं कि ‘‘संप्रेषण एक खेल है (हैलिडे)। जब दो टीमें कोई खेल खेलती हैं तो उन्हें उस खेल के नियमों पर परस्पर सहमत होना होता है, तभी खेल अपनी परिणति तक पहुँच पाता है। इसमें संदेह नहीं कि हम किसी से तभी बातचीत कर पाते हैं जब हमारे और उसके बीच भाषा-व्यवहार का ‘एग्रीड’ (साझा) समुच्चय (सेट) का साधन है, खुद में संप्रेषण है (पटनायक)। भाषा की सामाजिक उपादेयता यही है कि वह संप्रेषण है।’’


जब हम भाषा पर विचार करते हैं तो सहज ही उसकी सर्जनात्मकता का प्रश्न भी सामने आता है। यदि सर्जनात्मक संभावनाएँ न हो तो भाषा रूढ़िबद्ध होकर मरने के लिए अभिशप्त होगी। इसके विपरीत सर्जनात्मकता उसे नवनवोन्मेषशालिनी जीवन्तता से भरा पूरा बनाए रखती हैं। इस सर्जनात्मकता को भी भाषा प्रयोक्ता निरंतर नई धार देता चलता है। लेखक ने इसके साधक तत्वों की ओर भी बखूबी संकेत किया है - ‘‘कहने की जरूरत नहीं कि हमें अपनी भाषाओं में अलंकारों, प्रतीकों, बिंबों, मुहावरों, कहावतों, कथनों, अभिव्यक्तियों का जो समृद्ध जखीरा प्राप्त है वह भाषा की सर्जनात्मक शक्ति की संभावनाओं के सतत उत्खनन से ही निर्मित हुआ है। भाषा में सर्जनात्मकता जितने गहरे पैबस्त है, मनुष्य का सर्जक मन उतना ही उसे नए रंग, नई छटा और नए स्वर देने को बेचैन रहता है और इस तरह भाषा की सर्जनात्मकता निरंतर निखरती रहती है। उसका प्रयोक्ता उसे खराद पर चढ़ाता रहता है। इसीलिए भाषा-व्यवहार सदैव नवप्रवर्तनकारी (इनोवेटिव) और सर्जनात्मक (क्रिएटिव) हुआ करता है।’’


इसमें संदेह नहीं कि भाषा वैविध्य के कारण भाषा अध्ययन की दृष्टियों में समय-समय पर अनेक बदलाव आए हैं और उसके संदर्भ भी बदले हैं । यही कारण है कि किसी के लिए भाषा एक व्यवस्था है तो किसी के लिए व्यवस्थाओं की व्यवस्था, एक के लिए वह मानव मन की सर्जनात्मक शक्ति है तो दूसरे के लिए मानव व्यवहार की सामाजिक शक्ति। कहना न होगा कि प्रो. दिलीप सिंह ने इस कृति में परिवर्तनशील भाषादृष्टि और भाषासंदर्भ का सुंदर विवेचन किया है।


कृति का तीसरा खंड भारतीय भाषाचिंतकों को समर्पित है। यहाँ डॉ. धीरेंद्र वर्मा, डॉ. रामविलास शर्मा, डॉ.देवेंद्र नाथ शर्मा, पंडित विद्यानिवास मिश्र, प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव, प्रो. सुरेष कुमार, प्रो. षिवेंद्र किषोर वर्मा, प्रो. राजाराम मेहरोत्रा, डॉ.भोलानाथ तिवारी, डॉ.कैलाष चंद्र भाटिया और डॉ.हरदेव बाहरी के भाषाचिंतन का विवेचन किया गया है जिससे आधुनिक भारतीय भाषाविज्ञान एक मुकम्मल तस्वीर उभरकर सामने आती है। निश्चय ही लेखक की भाषादृष्टि और इतिहास दृष्टि का समुचित परिपाक इस खंड में हुआ है।


चौथे खंड में अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की कतिपय शाखाओं और धारणाओं को उदाहरणों सहित खोलकर समझाया गया है। इनमें भाषा शिक्षण, समाजभाषाविज्ञान, शैलीविज्ञान, अनुवाद विज्ञान और कोश विज्ञान के साथ-साथ प्राकृतिक भाषा संसाधन तथा कंप्यूटर प्रणाली को सम्मिलित किया गया है। कंप्यूटर भाषा की चर्चा करते हुए इस तथ्य पर बल दिया गया है कि भाषा क्या है से आगे बढ़कर भाषा कैसे काम करती है का प्रश्न इस प्रयोग क्षेत्र के लिए अधिक महत्वपूर्ण है।


पांचवें खंड में प्रो. दिलीप सिंह ने भाषा अध्ययन की आधुनिक संकल्पनाओं की व्याख्या की है। इन संकल्पनाओं में भाषा समुदाय, द्विभाषिकता, बहुभाषिकता, कोड मिश्रण, कोड परिवर्तन, पिजिन, क्रियोल, भाषाद्वैत, अधिशासी भाषा, अधिशासित भाषा, मानकीकरण, आधुनिकीकरण और भाषा नियोजन शामिल हैं । आजकल मीडिया की मिश्रित हिंदी को लेकर अनेक प्रकार की चिंताएँ व्यक्त की जाती हैं और यह निष्कर्ष दे दिया जाता है कि बाज़ार के दबाव के कारण मीडिया हिंदी की हत्या कर रहा है। इस संबंध में प्रो. दिलीप सिंह तटस्थतापूर्वक विचार करते हुए कहते है, ‘‘भाषा की शुद्धता का समर्थक वर्ग इसे हिंदी भाषा का अपमान और अवनति मानकर देख रहा है। यदि हम इसे भाषा संपर्क और भाषा विकास के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। अवमिश्रण से भाषाएँ भ्रष्ट नहीं होती हैं, उनकी अभिव्यंजना शक्ति बढ़ती है।’’ यहाँ प्रश्न उठता है कि इस भाषाई मिश्रण और परिवर्तन की क्या कोई सीमारेखा नहीं है। लेखक ने इसका भी उत्तर दिया है। वे बताते हैं कि भाषा मिश्रण में भी प्रतिबंध होते है जैसे -


1. एक भाषा के वाक्य में दूसरी भाषा का उपवाक्य मान्य नहीं है: वह लड़का, हूम यू मेट यस्टरडे, फेल हो गया।

2. एक भाषा के दो वाक्यों के बीच दूसरी भाषा का संयोजक मान्य नहीं है: मैं पढ़ना चाहता था बट नहीं पढ़ सका।

3. एक भाषा के उपवाक्य के बाद दूसरी भाषा के उपवाक्य में समुच्चय बोधक दूसरी भाषा का ही होना चाहिए: कल तुम समय से नहीं आए देन आई विल टर्न यू आउट (मान्य), कल तुम समय से नहीं आए तो आई विलटर्न यू आउट (अमान्य)।

4. हिंदी के वाक्यों में अंग्रेज़ी के निर्धारक, क्रमसूचक, संख्यासूचक का प्रयोग अमान्य है: दैट आदमी मूर्ख है, फस्र्ट लड़का अच्छा है, फाइव छात्र अनुपस्थित हैं।






अन्यत्र लेखक ने आधुनिक भाषा के रूप में संचार माध्यमों की हिंदी की विषेषताएँ इस प्रकार गिनाई हैं -

1. सहजता और संप्रेषणीयता

2. तकनीकीपन

3. प्रभावशीलता (जैसे शीर्ष पंक्ति का पैनापन)

4. भाषा प्रवाह (मिश्रित शैली का प्रयोग जो जनभाषा के निकट है)

5. संक्षिप्तियों का व्यापक प्रयोग (जैसे इंका, दक्षेस, भाजपा)

6. कर्मवाच्य का प्रयोग (पाया गया है, टीम बनाई गई, भेजा गया)

7. समाचार प्रारंभ करने वाली खास अभिव्यक्तियाँ (सूचना मिली है, ज्ञात हुआ है, बताया जाता है, - का कहना है)



इस प्रकार स्पष्ट है कि भाषा की सैद्धांतिकी से लेकर उसके आधुनिकतम व्यावहारिक रूप तक का विवचेन इस पुस्तक को सही अर्थों में ‘भाषा का संसार’ सिद्ध करता है। पुस्तक के समाहार शीर्षक अंतिम खंड में लेखक ने यह स्थापना की है कि ‘जड़ नहीं अब भाषाविज्ञान’ और यह प्रतिपादित किया है कि मानव जीवन में भाषा का स्थान इतना केंद्रीय है कि भाषाविज्ञान की परिधि में मिथकों, वर्जित भाषा प्रयोगों, नाते-रिश्तों की भूमिकाओं, वैवाहिक संबंधों से उत्पन्न आचरणों और रंग शब्दों के अध्ययन को भी समेटा जा सकता है तथा इनके प्रारूप बनाए जा सकते हैं। भाषा विमर्श के अद्यतन सरोकारों को समेटने वाली इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य भाषा और भाषाविज्ञान की ऐसी पीठिका तैयार करना है जो हर खासोआम को भाषा रूपी उस सशक्त माध्यम का परिचय दे सके जिसका वह रात-दिन प्रयोग करता है। दुहराने की आवश्यकता नहीं है कि पुस्तक अपने इस उद्देश्य में पूर्ण सफल है।




`भाषा का संसार ' /
प्रो. दिलीप सिंह/
वाणी प्रकाशन, 21 ए, दरियागंज, नई दिल्ली-110 002/
प्रथम संस्करण: 2008/ 250 रु./
180 पृष्ठ (सजिल्द)।




भाषा का संसार : वाणी प्रकाशन भाषा का संसार : वाणी प्रकाशन Reviewed by Kavita Vachaknavee on Friday, November 21, 2008 Rating: 5

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