अ-मानव - एस. आर. हरनोट

-मानव
एस. आर. हरनोट



समय के विकराल जबड़ों में अपना अस्तित्व खोए वह एक उजाड़ गांव था। वहां न अब कोई घर था और न खेत खलिहान। किसी अजीब सी कंटीली झाड़ियों का साम्राज्य वहां फैला था। उसके आसपास और दूर-दूर तक जहां भी आंखें देखतीं वीरानगी के सिवा कुछ नजर न आता। घाटियां निपट नंगी दिखतीं। उन पर न घास, न हरी भरी झाड़ियां और न कहीं पेड़-पौधों का नामोनिशां। उनके पीछे के पर्वत डायनासोरों जैसे डरावने दिखते। उनके गर्भ से बाहर झांकती चट्टानें मगरमच्छों के जबड़ों की तरह दिखतीं। तराईयों में बहते नदी-नाले ऐसे सूखे थे मानों कोई भयंकर अजगर अपने शिकार की ताक में चुप पड़ा हो। यह पच्चीसवीं-छब्बीसवीं शताब्दी के बीच का कोई समय था।

कालांतर में वह गांव भारत के अन्य गावों की तरह सुन्दर और जीवन्त रहा होगा। उसके खेत और क्यार गेहूं, जौ, मक्की और धान की फसलों से लहलाते होंगे। खलिहान में बीनने के लिए रखी फसलों पर जब कोई चाचा, ताया या दादा बैलों को घुमाता होगा तो बैलों के गले की धण्टियों की मधुर आवाजों से वातावरण संगीतमय हो जाया करता होगा। आंगन और खलिहान की मुंडेर पर बैठा दादा हुक्का गुड़गुड़ाते जब खांसता होगा तो गांव की औरतों और बच्चों में एक उत्साह और सुरक्षा का भाव जाग जाता होगा। किम्मू और पीपल के पेड़ के नीचे दोपहर और ढलती शामों के वक्त जब चैपालें सजती होंगी तो गांव बड़े-बुजुर्गों के ठहाकों से आच्छादित हो जाया करता होगा। उसके साथ की कुफ्फर-पोखर के किनारे चरांदों से लौटते सुस्ताते, पानी पीते पशु और भेड़-बकरियांे के रेवड़ जब अपनी-अपनी गौ शालाओं को जाते होंगे तो पगडंडियांे में जीवन लौट जाता होगा। प्राइमरी स्कूल के बच्चे आधी छुट्टी में जब उस पोखर के किनारे तख्तियां धोते-सुखाते होंगे तो उनकी किलकारियां पंछियों की चहचाहटों के साथ मिलकर मधुर संगीत पैदा करती रहती होंगी। सुबह-शाम गांव की औरतों और लड़कियों के टोले जब घास काटने जाते होंगे तो उनकी बाहों में सजी कांच की चूड़ियां और पैरों में बंधी पायजेबों की खनखनाहट से घाटियां गूंज जाया करती होंगी। जब वे बांवड़ियों के पास पानी भरने जातीं होंगी तो सिर पर उठाए घड़े और तांबे की टोकणियों की खनखनाहटें भी मन को मोह लिया करती होंगी। किसी के घर जब कन्या जन्म लेती होंगी तो उसे लक्ष्मी या देवी मान कर उत्सव मनते रहते होंगे। गांव में वर्ष भर मेले और त्यौहार मनते होंगे। देवताओं की जातरे होती रहती होंगी। हर सक्रांत को देवता के मंदिर के पास देव पंचायतें लगती होंगी जहां गावों के लोग अपने दुख-दर्द की फरियादें देवता के पास सुनाते होंगे। फसल काटने के बाद जब दूसरी फसल बीजने का मौसम आता होगा तो किसान अपने बैलों को लेकर जब खेत जोतने जाते होंगे तो हलों की फाटों के बीच उनके शरीर से बहती पसीने की बूंदो से धरती नम हो जाया करतीं होंगी।

लेकिन अब ये सभी अतीत हो गया था और टाइम मशीन के जरिये कुछ लोग उस काल में जाने की तैयारियां कर रहे थे। लेकिन उससे पहले इस काल में एक चुनौती उनके सामने मुंह बाएं खड़ी हो गई थी।

अति आधुनिक व विकसित वैज्ञानिकों ने एक दिन उपग्रह से भेजी तस्वीरों से उस उजाड़ जगह को जब चिन्हित किया तो झंखाड़ों के बीच एक जगह उन्हें उसी तरह की मानव आकृति दिखी जैसे मंगल ग्रह पर कभी दिखी थी। मशीनों की मदद से यह पता लगा लिया गया कि वह इक्कीसवीं सदी का कोई मानव है जो अभी तक ज़िन्दा है। उन्होंने कुछ बची-खुची प्राचीन इतिहास की पुस्तकों से इक्कीसवीं सदी के भारत के बारे में जो कुछ जाना-समझा था उसकी हल्की फुल्की तस्वीरें उनके जहन में थीं। इस पांच-छः सौ साल की अवधि में देश की तस्वीर बिल्कुल बदल गई थी। पहले जहां भ्रष्ट और स्वार्थी राजनीति और धर्मान्धता ने सबकुछ नष्ट कर दिया था, वहां एक ऐसी नई पीढ़ी बिल्कुल नए दिमाग के साथ पैदा हो रही थी जो उम्र से पहले ही जवान और स्याने हो जाते थे। उनकी उम्र तीस से पैंतालीस साल मुश्किल से होतीं, लेकिन वे इतने जी लेते मानो कई सदियों के मानव हों। सब कुछ मशीनी। इक्कीसवीं सदी जैसा कुछ नहीं। न दिन और न रात। न कोई मौसम। न नींद न भूख। न धर्म न संस्कृति। न लेखक न कोई साहित्य। न दलित विमर्श न स्त्री विमर्श। न बाजारवाद न भूमंडलीकरण। मां और पिता भी नहीं। न दादी-नानी, न कोई चाची ताई। भाई-बहन भी नहीं। न किसान न उनके गांव। न कोई फसलें। न चैपालें न पोखरें। गरीब और बूढ़े भी नहीं। न पक्षियों के कलरव और न पशु-जानवरों की हुंकारे और दहाड़ें।

रहने-जीने के अति आधुनिक तरीके। हर व्यक्ति के पास भूख-प्यास बुझाने के लिए नए-नए साधन। बच्चे पैदा करने के लिए इंजैक्शन। उठने, बैठने और चलने के लिए इंजैक्शन। उस युग में औरतों की कोई जरूरत नहीं रह गई थी। वैसे भी पहले लड़कियों को पेट में मार दिया जाता था। इसलिए इस युग तक महिलाएं जैसे नदारद हो गईं थीं। किसी भी मर्द में जरूरत के मुताबिक इंजैक्शन ठूंसों और बच्चा पैदा कर लो। उनके कदकाठी भी बहुत छोटे होते। कुल मिलाकर वे रोबोट या एलियन की ही तरह लगते। सब के पास छोटी-छोटी जहाजनुमा उड़न तश़्तरियां थीं जो लेजर तकनीक से सम्पन्न होतीं। जहां चाहें जाएं। चांद-सितारे और दूसरे ग्रहों पर तो लोग ऐसे जाते मानो ससुराल जा रहे हों। इसके बावजूद भी सबकुछ नया-नया करने की होड़।

उस मानव की खोज में एक दल निकल पड़ा था। ....और एक दिन वे उस चिन्हित खंडहर में उतर गए। आवाज सुन कर एक बूढ़ा झाड़ियों के बीच से बाहर निकल आया। उसने देखा कि एक कटोरेनुमा कोई चीज उसके कुछ दूर उतरी है जिसने स्वतः ही वहां की झाड़ियों को जला कर एक साफ सुथरी जगह बना ली है। वह बिल्कुल भी विचलित नहीं हुआ। एक गहरी सांस ली। आंखों में खून तैर आया। सिर सहित पूरे बदन पर झाड़ों की तरह उगे बाल खड़े हो गए। तभी धीरे-धीरे उस कटोरे से पांच छोटे-छोटे लोग उतरे। उनके हाथों में सूक्ष्म लेजर बंदूकें थीं। वह बूढ़ा नहीं समझ पाया कि ये क्या चीजें हैं। सभी उसकी ओर बढ़ने लगे। जैसे वह कोई खतरनाक आतंकी हो। अपनी गनों को सावधान करते हुए। हांालाकि उन्हें किसी खतरे की आशंका नहीं थी फिर भी इस पांच सौ बरस से ज्यादा उम्र के उस आदमी से वे भीतर ही भीतर घबराए हुए थे। उसके पास कुछ नहीं था। न कोई हथियार और न कुछ और। वह तकरीबन सात फुट का आदमी था जिसके सिर और दाढ़ी के बाल घुटनों तक थे। उसके शरीर को उन्हीं बालों ने ढक रखा था। उसने कभी जो कपड़े पहने थे वे मोसमों के साथ गल-सड़ गए थे। पर अजीब बात थी कि उसके शरीर को कुछ नहीं हुआ था। आंखों की नजर ठीक थीं। सांस ठीक थीं। पर उसने पिछले पांच सौ सालों में न कुछ खाया था न बोला ही था। वह भूल गया था कि शब्द भी कोई चीज होते हैं। लेकिन उड़न तश्तरी के उतरते ही उसके कानों में इतने दिनों बाद कोई आवाज गूंजी थी।

वे लोग उसके पास पहुंचे और सभी ने अपनी-अपनी गनें उस निहत्थे पर तान दीं। उसने झटपट उन्हें ऐसे पटक दिया मानों अपने शरीर पर पड़ा घास-फूस झाड़ दिया हो। वे सभी हैरान परेशान। एक ने हिम्मत जुटाई और विनती के स्वर में कहने लगा,

’देखो, हम से डरो नहीं। हम तुम्हारे दोस्त हैं। हम तुम्हें नुकसान पहुंचाने नहीं आए हैं। बस हम यह जानना चाहते हैं कि क्या तुम्हारे पास अभी भी अनाज है ? क्योंकि तुम जिन हालातों में रहते हो, जरूर कोई ऐसी चीज होगी जो तुम्हें इतने बरसों ज़िन्दा रखे हुए है। देखो, हम अति आधुनिक युग के आदमी हैं। हमने अनाज के बारे में सुना है। रोटी के बारे में सुना है। पर उसका स्वाद नहीं चखा है। किसानों के बारे में सुना है। पर उन्हें कभी देखा नहीं है। हमने यह भी सुना है कि इस देश में कभी अनाज के लिए बहुत बड़ा गृहयुद्ध हुआ था। हम गांव नहीं जानते। हम पशु जानवर नहीं जानते। ये सभी हमने एक किताब में पढ़ा है जो मुश्किल से बची थीं।’

वह बूढ़ा उनकी बातों को सुन कर पहले हल्का सा मुस्कुराया और फिर इतनी जोर से हंसा कि मानो उसकी हंसी उस पूरे युग में छा गई हो। हंसी के साथ उसके भयानक और डरावने चेहरे पर कई सदियों की जमीं परतें अजीबो गरीग ढंग से उघड़ने लगीं। उसने अपने को संयत किया। संभाला। वे हतप्रद से उसे देखते रहे।

वह कुछ बोलना चाहता था पर तत्काल बोल नहीं पाया। उसका मुंह फूलता रहा जैसे कोई बड़े गुब्बारे में जबरदस्ती हवा भरने की कोशिश कर रहा हो। अचानक एक भारी भरकम आवाज निकली,

’तुम्हे अनाज चाहिए। पर क्यांे ? इस युग में तुम्हें उसकी क्या आवश्यकता..? तुम्हारे पास तो अति आधुनिक तकनीके हैं। मशीनी मानव है। सुइयां हैं। दवाईयां हैं। जिन्हें लगा-खाकर न भूख लगती है न प्यास। फिर तुम्हें अनाज-रोटी की क्या जरूरत..?’

उन में से एक ने उसकी बातों का जवाब दिया,

’जरूरत नहीं है, पर हम देखना चाहते हैं कि वह होता कैसा है ? उसका स्वाद कैसा है ? उसमें शक्ति कैसी है।’

बूढ़ा दहाड़ा,

’उसकी शक्ति ? देख नहीं रहे हो।’

उसने कुछ इस तरह से बाहें फैलाई जैसे उनकी इस दुनिया को वह अपनी बाहों में समेट लेगा। ऐसा करते ही उसकी बाहों से कई मन मिट्टी, घास, पत्थर नीचे गिरते रहे। उसने हुंकारते हुए कहना शुरू किया,

’तुम सभी ने उसकी शक्ति मिटा दी। नया और अति नया करने के चक्कर में सब कुछ नष्ट कर दिया। अपने देश को नया युग बनाने के लिए तुमने गरीबी के बदले गरीब मिटा दिए। कामगरों को नई-नई मशीने विकसित करके समाप्त कर दिया। देवता और भगवान बनने के लिए मन्दिर, मस्जिद और गुरूद्वारे नष्ट कर दिए। जवान दिखने के लिए बूढ़े नहीं रहने दिए। रिश्ते खो दिए। संस्कृति मिटा दी। धर्म नहीं रहने दिया। यहां तक कि अ-मनुष्य पैदा कर दिए। माताओं की ममता नहीं रहने दी, जो किसी भी युग में सर्वोपरि होती थीं। जो संसार की रचना करती थी। तुमने उस मां को भी नहीं रहने दिया। तुमने जो कुछ पाया वह अप्राकृतिक था और आज भी है......तुम यहां से चले जाओ.........नहीं तो तुम बचोगे नहीं।’

वे उसकी बातें सुन कर चुपचाप खड़े रहे। उन्हें कुछ समझ नहं आ रहा था। थोड़ी देर बाद उन सभी ने अपने हाथ जोड़ दिए। यह तरीका भी उन्होंने उस पुरानी किताब में कहीं पढ़ा था.........।

इस विनम्रता से उस बूढ़े के हृदय में वह पुराना सोया प्यार जाग गया। वह प्यार जो पिता या मां के हृदय में अपने बच्चों के लिए छिपा रहता है।

उसने अजीब तरीके से आंखों की पुतलियां घुमाई। फिर जमीन पर हाथ मारा। कई मन मिट्टी निकल कर बाहर आई, जिनमें असंख्य काली चींटियां थीं। वे सभी उन चींटियों को देख कर हैरान रह गए कि इस धरती पर आज भी कोई इतना सूक्ष्म जीव रहता है। पहले वे पगलाई सी बाहर आई। फिर जमीन के भीतर कहीं लोप हो गई। थोड़ी देर बाद कतारों में निकलने लगीं। सभी के मुंह में अनाज के दाने थे। किसी के मुंह में गेहूं का दाना, किसे के चावल का तो कोई बथ्थू-बाजरा लेकर आ रही थीं। देखते ही देखते उन्होंने एक तरफ अनाज का ढेर लगा दिया।

’लो! उठा लो, जितना चाहिए। उठा लो। यही अनाज है। इसी से रोटी बनती है। किसान इसे ही पैदा करता था। लेकिन तुमने सबकुछ खत्म कर दिया। बस, चींटियों ने अपने घरों में इसे बचाए रखा। याद रखो कोई भी युग, कोई भी समय, कोई भी मौसम बिना मेहनतकशों और किसानों के ज़िन्दा नहीं रह सकता। तुम अति आधुनिक विकसित देश के लोग तो हों पर बुतों से बढ़कर कुछ नहीं हो। अभागे हो तुम। जाओ अब, चले जाओ यहां से और ले जाओ इस अनाज को। हो सके तो भारत के उस किसान को ज़िन्दा करो जोे इस दुनिया के आधार हैं। जिसे तुमने बर्वाद कर दिया है।

यह कहते हुए उस बूढ़े नें अपनी आंखें बन्द कर दीं।

वे सभी बुत बने वहीं जैसे जड़ हो गए। उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। वे यह देख कर हैरान थे कि अनाज के इतने छोटे दाने होते हैं और जिन्हें अभी तक इन छोटे-छोटे काले कीड़ों ने कहीं धरती के नीचे जमा कर रखा है। उनके मन में एकाएक खुराफात सूझी। वे उन कीड़ों को अपने साथ ले जाना चाहते थे। लेकिन इससे पहले कि वे कुछ योजना बनाते, चींटियां सारे का सारा अनाज लेकर गायब हो गई थी। वे कभी जमीन पर तो कभी उस बूढ़े की तरफ देखते। उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि ये सब क्या है। बूढ़े ने उनकी तरफ पीठ फेर ली थी। उन्हें लग रहा था जैसे उनके सामने कोई पहाड़ आकर खड़ा हो गया हो।

वे जैसे ही पीछे मुड़े तो यह देख कर हतप्रद रह गए कि असंख्य चींटियां उनकी उड़न तश़्तरी को धरती के नीचे घसीट रही थीं।



-ओम भवन, मोरले बैंक इस्टेट, निगम बिहार, शिमला-१७१००२


1 comment:

  1. पिछले 20 साल से भी ज़्यादा समय से हरनोट जी को पढ़ रहा हूं। उनकी भाषा और विचारों का कायल हूं। उनकी तारीफ करना सूरज को दीपक दिखाने के समान है।
    अजय शर्मा, नई दिल्ली

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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