कण्डोम प्रमोशन कार्यक्रम : सांस्कृतिक धूर्तता का वैज्ञानिक मुखौटा (३) - प्रभु जोशी

कण्डोम प्रमोशन कार्यक्रम : सांस्कृतिक धूर्तता का वैज्ञानिक मुखौटा

- प्रभु जोशी




गतांक ( भाग एवं भाग ) से आगे -


दरअसल, सामाजिक वर्जनाओं के रहते समाज का जो ढांचा बनता है, उसमें बाज़ार की घुसपैठ, एक सीमारेखा तक ही हो पाती है जबकि वर्जनाएँ , लक्ष्मण-रेखाएं खींचती है। यौन वर्जनाओं ने ही परम्परागत भारतीय समाज का एक सुगठित प्रारूप बनाया है (इस पर मैं कभी अलग से लिखूँगा) इसलिए, लक्ष्मण-रेखाएँ सीमाओं का वैध और सर्वमान्य प्रतिमान बनती रही हैं । लेकिन, अब भूमण्डलीकृत बाज़ार कहता है-रेखाओं को खींचने के लिए मिस्टर लक्ष्मण अधिकृत ही नहीं है । सीमाएँ क्या हों ? कहाँ तक हों ? और कौन सी हों ? यह सब अब केवल सीता का आऊटलुक है । और आज की सीता अपनी ज़रूरतों से ऊपर उठकर, आकांक्षा के नीचे रह जाना नहीं चाहती । उसे वह सब चाहिए, जो सोने की चमचमाती राजधानियों के उच्च-मध्य वर्ग की जीवनशैली जीने के लिए ज़रूरी है । यह स्त्री-विमर्श की भूमण्डलीकृत-संहिता है, जो राजपाट से हाथ धो कर जंगल में भटकने वाले राम के वनवासीपन के बजाय, सत्ता की सुनिश्चिता को चुनने के लिए कृत-संकल्प है । बाज़ार दृष्टि उसे बार-बार बता रही है कि उसके लिए अब रावण धोखा नहीं एक सुंदर संभावना है । एक स्वर्णिम विकल्प है । इसलिए, उसे लक्ष्मण रेखाओं को एक सिरे से लाँघ जाना चाहिए ।


बहरहाल, यह आधुनिक नहीं, उत्तर आधुनिक तर्क है, जबकि यथार्थ में न तो यह उत्तर आधुनिक-स्थिति है और ना ही आधुनिक - बल्कि मात्र ‘विपरम्पराकरण’ है। पश्चिम में आधुनिकता पूंजी के अपार आधिक्य से पैदा हुई थी तो ज़रा आप ही सोचिए कि हमारे यहाँ आधुनिकता पूंजी के अपार अभाव में कैसे पैदा की जा सकेगी ? इसलिए हम आधुनिक नहीं, सिर्फ परम्पराच्युत हुए हैं । मात्र डि-ट्रेडिशनलाइज्ड। अर्थात् अपनी जड़ों से उखड़ चुके हैं । हम उखड़ते हुए बरगद हैं ।


वास्तव में हमारे, विराट मध्यमवर्ग में बदलते इस समाज और समय को सम्पट ही नहीं बैठ रही है कि वह क्या करे ? वह माथे पर मालवी पगड़ी बाँध कर गुड़ी-पड़वाँ मनाता हुआ कण्डोम बेचने निकल आया है । वह रक्षाबंधन के दिन हाथ में राखी बाँधकर, उसी हाथ से वह कण्डोम वितरण का काम भी निबटा रहा है। वह जनेऊ चढ़ाकर ‘यूरिन कल्चर’ का सेम्पल दे रहा है । अतः इसी सम्पट न बैठ पाने के अभाव में समूचा भारतीय समाज एक खास किस्म के ‘सांस्कृतिक अवसाद’ में डूबा हुआ है । मीडिया और माफिया के रक्त संबंध ने उसे सांस्कृतिक-अनाथ बनाकर छोड़ दिया - और नया तथा धड़धड़ाता हुआ आने वाला यह बाज़ार बख़ूबी जानता है कि समाज को विखण्डित करने के लिए हमेशा से ही यही ‘अवसादकाल’ एक वाजिब वक्त रहा है। बिचारी एकता कपूर तो कभी की लगी हुई है कि परिवार टूटे ।


इसी सर्वथा उपयुक्त समय में परम्परागत-भारतीय-समाज को तोड़कर टुकड़े-टुकड़े किया जा सकता है । यही विखण्डन की अकाट्य सैद्धान्तिकी है और ‘यौनिकता’ विखण्डन का सबसे बड़ा और कारगर हथियार है । बहरहाल, यौनिकता की आक्रामकता के लिए मार्ग को प्रशस्तीकरण का काम करता है, - एड्स के बहाने सर्वव्यापी बनने वाला सर्व-सुलभ कण्डोम । इसलिए ‘एड्स’ जैसे विश्वव्यापी महामिथक के उपचार पर पूँजी खर्च करने के बजाय, कण्डोम-प्रमोशन को एकमात्र अभीष्ट बना दिया जाए । संतति निरोध के सामान्य उपकरण की तरह प्रकट हुए कण्डोम की बाज़ार दृष्टि ने इसलिए पूरे भारत की एक अरब आबादी को, अब दो स्पष्ट भागों में बाँट दिया है । पहले वे जो एड्स-ग्रसित हैं तथा दूसरे वे जो संभावित-ग्रसित हैं - अर्थात् पूरा भारत ही एड्स के घेरे में आ गया है । भारत का यह नया नक्शा है, जो अब एक अरब लोगों से भरा-पूरा जनसमाज नहीं बल्कि रिस्क ग्रुप है । अहा कितना व्यापार । महारोग ग्रस्त एक महाद्वीप ।


आपने देखा होगा कि ‘एड्स’ के उपचार के सवाल और समस्या को तो बहुत शीघ्र हाशिए पर कर दिया गया, उसका टीका अभी तक नहीं बन पाया है और अब सबसे बड़ा टीका कण्डोम है । इसी छल के तहत कण्डोम की प्रतिष्ठा केन्द्रीय बना दी गई है। इस कर्मकाण्ड में सरकारी और गैर सरकारी संगठन दोनों ही प्राणपण से लगे हुए हैं । कारण कि नैकों से लेकर पैकाड, मैक-आर्थर, और फोर्ड फाऊण्डेशन जैसी पूंजी का अबाध प्रवाह पैदा करने वाली संस्थाएं थैलियाँ लेकर कतार में डटी हुई हैं । उनसे पूंजी-हथियाकर तमाम गैर-सरकारी संगठन, एड्स के विराट भय की व्याख्या करते हुए यौनशिक्षा (सेक्स एजुकेशन) की अनिवार्यता के लिए भूमि-समतल करने का काम करते हैं । क्योंकि, सेक्स-एजुकेशन का पाठ्यक्रम किशोर-किशोरियों को ज्ञानग्रस्त करने वाला है कि हस्तमैथुन, समलैंगिकता, मुख तथा गुदा-मैथुन अप्राकृतिक नहीं है । केवल भारतीय पीनलकोड ने उपर्युक्त सभी सेक्स-क्रियाओं को अप्राकृतिक बताकर पूरे भारतीय समाज और देश को सैक्स के कारोबार में पिछड़ा बना रखा है । वात्स्यायन के देश में जन्म लेकर भी हमें यौन वर्जनाओं के कारण घोर बदनामी झेलनी पड़ रही है । देखिए, हमारे यहाँ तो सूर्यपुत्री यमी ने अपने भाई यम को अपना ‘सेक्समेट’ बनाने के लिए प्रस्ताव किया था, देखिए, ऐसी मिथकीय परम्परा वाला समाज हमारी विश्व में कैसी थू-थू करवा रहा है । हालांकि आगे के प्रसंग को इरादतन उल्लेख से बाहर रख दिया जाता है, जिसमें यम रक्त सम्बन्धी से शारीरिक संसर्ग (इनसेस्ट) को नीति विरूद्ध बताता है।


>>>>क्रमश:
(आगामी अंक में समाप्य)

2 comments:

  1. आज का खुला बाज़ार हर चीज़ की खुली छूट देता है - सेक्स की भी। आप को एतिहात चाहिए, तो वो भी बाज़ार में मौजूद है कण्डोम की शक्ल में। नहीं मिलती, तो नैतिकता जो आज अमूल्य बनती जा रही है - शायद भारतीय संस्कृति कि तरह , जिसे अब कोई नहीं पूछता - हां, अमूल्य- अब कोई मूल्य जो नहीं रह गया है!!

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  2. भाषा बहुत ही उचें दज़्रे की है,आम आदमी को कोइ लाभ नहीं होने वाला

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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