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मणिपुरी कविता : मेरी दृष्टि में - डॉ. देवराज (१३)


मणिपुरी कविता : मेरी दृष्टि में - डॉ. देवराज
नवजागरणकालीन मणिपुरी कविता - [१३]



अंग्रेज़ों ने जिस प्रकार समस्त देश में संस्कृति पर आक्रमण करके जनता के मानसिकता को कुंठित किया, उसी हथियार का प्रयोग उन्होंने मणिपुर में भी किया। इसका ब्योरा डॉ। देवराजजी इस प्रकार देते हैं :-

"अंग्रेज़ों ने मणिपुरी समाज पर सांस्कृतिक आक्रमण किया। इसका एक उदाहरण है मणिपुर में अंग्रेज़ी शिक्षा के लिए पहले स्कूल का खोला जाना। इसी से मनोनुकूल कर्मचारी उपलब्ध हो सकते थे, ईसाई धर्म का प्रचार हो सकता था और परम्परागत विचारों पर अंग्रेज़ी विचारधारा का प्रभुत्व स्थापित किया जा सकता था। पोलिटिकल एजेंट जांस्टन के प्रयास से सन १८३५ में मणिपुर में एक मिडिल स्कूल स्थापित हो गया। अपनी सैन्य शक्ति के बल पर अंग्रेज़ मणिपुरी शासकों के भाग्यविधाता बनने और उन्हें मणिपुरी जनता के विरुद्ध अपने पक्ष में खडा़ करने में पहले ही सफ़ल हो गये थे, अब अपने सांस्कृतिक आक्रमण के बल पर वे यह सिद्ध करने में भी सफ़ल हो गए कि मणिपुरी समाज के पास न तो समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है, न गरिमापूर्ण साहित्य और न वैज्ञानिक चिन्तन-दृष्टि।"


"भारतेंदु को भी इसी प्रश्न ने समग्र भारतीय समाज के संदर्भ में झिंझोडा था और उन्होंने निर्णय किया था कि सामाजिक, आर्थिक, वैचारिक तथा भाषायी दासता को समाप्त किए बिना अंग्रेज़ों द्वारा थोपी गई राजनीतिक दासता से मुक्ति पाना असम्भव है। इतिहासकारों के अनुसार टीकेन्द्रजीत और थाङ्गाल की फ़ांसी ने बंगाल के क्रांतिकारियों में हलचल मचा दी। जिस प्रकार इन इतिहास-पुरुषों ने मातृभूमि की रक्षा में अपने प्राणों की बलि चढा़ई, उससे भारतीय क्रांतिकारियों ने बहुत प्रेरणा प्राप्त की।"


"यहाँ एक तथ्य पर ध्यान देना होगा। परिस्थितियों के प्रभाव से मणिपुरी समाज में जो परिवर्तन आया, उसने आत्म-निरीक्षण की आवश्यकता प्रतिपादित की तथा उसके परिणामस्वरूप यहां परम्परागत सामाजिक मूल्य बदलने शुरू हुए। थोकचोम मधु सिंह जैसे समाज सेवी घर-घर जा कर लोगों को इस बात के लिए राजी़ करने लगे थे कि वे अपनी लड़कियों को स्कूल भेजना प्रारम्भ करें। व्यक्तिगत स्तर पर हिंदी प्रचार आंदोलन भी उन्हीं दिनों अस्तित्व में आ गया था। हिंदी का सर्वप्रथम विद्यालय थोकचोम मधुसिंह के घर पर ही खुला था। विभिन्न दिशाओं में ये परिवर्तन बडी़ तीव्र गति से घटे।"



.....क्रमश:
(प्रस्तुति: चंद्र मौलेश्वर प्रसाद)
मणिपुरी कविता : मेरी दृष्टि में - डॉ. देवराज (१३) मणिपुरी कविता : मेरी दृष्टि में   - डॉ. देवराज (१३) Reviewed by Kavita Vachaknavee on Monday, July 28, 2008 Rating: 5

5 comments:

  1. खोजपरक, ज्ञानवर्द्धक, उपयोगी विश्लेषण... आभार एक अनजान दुनिया से परिचित कराने के लिए...

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  2. main bhee siddharth ji se sahmat hoon.

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  3. सिद्धार्थ जी व ऋषभ जी,
    आप के पधारने व आलेख को सराहने के प्रति कृतज्ञ हूँ.

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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