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सम्मान लौटाने के षड्यन्त्र के बदले चलाएँ 'पुस्तक जलाओ' अभियान

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सम्मान लौटाने के राष्ट्रविरोधी षड्यन्त्र के बदले चलाएँ 'पुस्तक जलाओ' अभियान 

- कविता वाचक्नवी


सम्मान लौटाने की यह तथाकथित मुहिम दारू और बोटी देने वाली कॉंग्रेस द्वारा अपने पालतू लोगों पर दबाव बना कर जारी करवाई गई है, इसमें कोई संदेह नहीं। जिन्हें उसने बोटी और दारू दे -दे कर पाला, NGOs के माध्यम से काले कारोबारों से / का  लाभ पहुँचाया, विदेश यात्राएँ करवाईं और कई तरह के अपराध में साथ रखने के लिए इनके स्वार्थ और टुच्चे लाभ पूरे करने के बड़े से बड़ा फायदा इन्हें पहुँचाया। 

अब जबकि  
- कॉंग्रेस सत्ता से बाहर है, 
- इन तथाकथित बुद्धिजीवियों को बोटियाँ देने की स्थिति में अब वह नहीं 
- एक शराब की बोतल तक पर बिक जाने को तैयार रहने वाले पत्रकारों और मीडिया वालों के भी दुर्दिन हैं, उन्हें विदेश यात्राएँ मोदी जी सरकारी खर्चे पर एकदम बंद कर चुके हैं अतः वे बदला लेने को उतारू हैं
- NGOs पर काफी लगाम है तो स्वार्थ सिद्धि का बड़ा दूसरा द्वार भी बंद है 
- कॉंग्रेस के काले कारनामे उजागर होने के दिन आ रहे हैं 
- अतः राजनैतिक और राष्ट्रीय अपराधों में बुद्धिजीवियों का सहयोग भी जनता के सामने आएगा 
- नेता जी सुभाषचन्द्र बोसस की फ़ाईलें उजागर होने के दिन दिनों-दिन निकट आ रहे हैं तो बड़ी साजिश खुलने से छटपटा रही है कॉंग्रेस 

 भारत की छवि और शक्ति और सामर्थ्य दिनों दिन बढ़ रहा है, जो देश के भीतरी और बाहरी शत्रुओं के लिए भीषण चिन्ता का कारण है। और उनके लिए तो विशेष चिन्ता का जो भीतर बैठ कर बाहरी शत्रुओं के साथी और सहयोगी हैं : विशेषतः चीन और पाकिस्तान समर्थक या उनसे पोषण पाने वाले उनके समर्थक। 

इसलिए इन सब कारणों के चलते कॉंग्रेस ने अपने पालतू बुद्धिजीवियों पर और उन बाहरी शत्रुओं के पैसे पर पलने वाले उनके समर्थकों / साथियों / संस्थाओं पर सोची-समझी नीति के तहत दबाव या धमकी या दोनों डाले गए हैं कि वे उनके अहसानों के बदले अब विश्व में ऐसा माहौल बनाएँ ताकि मोदी सरकार पर दबाव हो, छवि बिगड़े और चुनावों में क्षति पहुँचे। 

राष्ट्रविरोधी तीन मुख्य लक्ष्य जो इस सारी नौटंकी से साधने की साजिश रची गई है - 


1) पहला लक्ष्य था, कि पाकिस्तान  ओबामा से भेंट के समय अधिकाधिक हथियार उगाह सके और कश्मीर मुद्दे पर ओबामा का साथ मिल सके। इसीलिए नवाज़ की भेंट के बाद यह थोड़ा ठण्डा पड़ गया था।  पर दोनों बातें नहीं हुईं । 

2) दूसरा इसका आपराधिक लक्ष्य अब है कि 'संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद' में भारत को स्थायी सदस्यता न मिल सके, क्योंकि ऐसा होना पाकिस्तान और चीन के हित में नहीं है।  

3) तीसरा लक्ष्य है जनवरी से पहले सरकार गिराने की साजिश; क्योंकि जनवरी में सुभाषचन्द्र बोस की फ़ाईलें सार्वजनिक करने की घोषणा हो चुकी है और नेहरू वंश के कलंक खुलने का डर सोनिया और कॉंग्रेस की नींद हराम किए है

इनके साथ ही  काले धन और कॉंग्रेस के काले काण्डों की कलई  भी खुलने जा रही है, गत दिनों ही 200 कंपनियों के एक ही मालिक ( कंपनियाँ विधिवत् काले धन को सफ़ेद बनाने का धंधा करती थी) वाले प्रकरण में सोनिया-राहुल का भी कम्पनी का मालिक होना प्रमाणित हो चुका है तो फन्दा गर्दन पर कस रहा है। इसलिए कोई सन्देह नहीं कि यह सारी नौटंकी कॉंग्रेस और देश के शत्रुओं के पक्ष में की जा रही है। निस्संदेह कॉंग्रेस की ओर से योजनापूर्वक इसके लिए इन पर दबाव भी बनाया गया होगा कि यदि ऐसा न किया तो तुम सब की करतूतें भी उजागर कर दी जाएँगी। इतिहास के साथ छेड़छाड़ में इतिहासकारों ने साथ दिया ही और देश के शीर्ष वैज्ञानिकों की एक-एक कर हुई हत्याओं के पीछे की साजिश में इन कॉंग्रेस के पिट्ठू वैज्ञानिकों की कुछ-न-कुछ सहयोगी भूमिका है ही। तो ऐसे अनेकानेक काले कारनामों में साथ होने का सत्य उजागर होने का डर स्पष्ट है। 

आशीष कुमार अंशु ने इन नौटंकीबाज अपराध-सहयोगी लेखकों की इस नौटंकी के बदले इनकी पुस्तकें वापिस करने का जो अभियान प्रारम्भ किया है,  वह उचित ही है, किन्तु इसमें हिन्दी के पाठक से अधिक सहयोग न मिलेगा क्योंकि अधिकांश पुस्तकें सरकारी खरीद और विश्वविद्यालयों, संस्थाओं आदि के पुस्तकालयों में उनके पैसे से खरीदी जाती हैं। पुस्तक लौटाने के लिए बेचारे आम पाठक को डाक खर्च का और भार आ जाएगा। इसलिए लौटाने की बजाय 'पुस्तक जलाओ' अभियान होना चाहिए। लोग बाग चुन-चुन कर इनकी और इनके समर्थकों की पुस्तकें जलाएँ और जलाए जाने के चित्र खींच कर सोशल मीडिया पर अपलोड करें। पुस्तकें जलाने वाली अपनी प्रत्येक पोस्ट के साथ सबसे पहले  #BookBurning और #CampaignAgainstAwardReturning का हैशटैग अवश्य लगाएँ  अर्थात् इसी प्रकार कॉपी-पेस्ट कर अवश्य लिखेँ ताकि यह एक अभियान बन सके।#KavitaVachaknavee

जर्मन क्यों?

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इस समय केन्द्रीय विद्यालयों में जर्मन थोपने पर घमासान मचा हुआ है,  इसकी पृष्ठभूमि की भीतरी जानकारी रखने वाले जर्मन साहित्य के मर्मज्ञ प्रो. अमृत मेहता ने अपना यह आलेख हमें उपलब्ध कराया है - 




जर्मन क्यों?
- डॉ. अमृत मेहता 


इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले मैं यह स्पष्ट करना चाहूँगा कि मैं जर्मन भाषा तथा साहित्य का अदम्य समर्थक हूँ, और अब तक मुझ द्वारा अनूदित 72 साहित्यिक कृतियों में से 66 का अनुवाद जर्मन से किया गया है।  हिंदी मेरी मातृभाषा है, इसका प्रमाण इसी में है कि 72 में से 70 कृतियों मे लक्ष्य भाषा हिंदी रही है, और दो में पंजाबी। अब तक मैं 208 जर्मनभाषी लेखकों की कृतियों का जर्मन से हिंदी में अनुवाद कर चुका हूँ, और कुल मिला कर 222 जर्मनभाषी लेखकों के पाठ प्रकाशित कर चुका हूँ।  काफ़ी हद तक अपना धन लगा कर भी।  अपनी पत्रिका “सार संसार” के माध्यम से मैंने 72 ऐसे नए अनुवादकों को जन्म दिया है, जो विदेशी भाषाओँ से सीधे हिंदी में अनुवाद करते हैं, जिनमें से 16 जर्मन-हिंदी अनुवादक हैं।  पूरे विश्व में इन आंकड़ों के बराबर कोई नहीं पहुँचा, और यह वक्तव्य मैं पूरी ज़िम्मेदारी से दे रहा हूँ। 


भारत के केंद्रीय विद्यालयों में तीसरी भाषा के स्थान पर केवल जर्मन को सुशोभित करना एक दुर्भाग्यपूर्ण प्रकरण है, और जिस तरह से इस भाषा को भारतीय बच्चों पर लादा गया है, वह न केवल असंवैधानिक है, बल्कि इस से यह भी उजागर होता है कि भारत को स्वयं में इतना ढीला-ढाला देश माना जाता है कि यहाँ पर कोई भी विदेशी शक्ति जो चाहे करवा सकती है, चाहे घूस के बल पर अथवा बहला-फुसला कर।  इस प्रकरण में कौन सा तरीका अपनाया गया है, यह तथ्यों की गहराई में जाने से मालूम पड़ सकता है। 


यह मामला 2014 में मानव संसाधन मंत्री सुश्री स्मृति ईरानी की सतर्कता से उजागर हुआ है, परन्तु तीन वर्ष में कुछ लोग इस सन्दर्भ में जो करने में सफल हुए हैं, वह हमारी शासन प्रणाली पर एक गंभीर प्रश्न-चिन्ह है।  मैं 2009 से जानता हूँ कि कोई संदिग्ध खिचड़ी पक रही थी, परन्तु मेरी जानकारी में केवल इतना ही था कि हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओँ के अस्तित्व पर कुठाराघात करके कुछ जर्मनभाषी सांस्कृतिक दूत अंग्रेज़ी को भारत की मुख्य भाषा सिद्ध करने पर तुले हुए थे।  मैंने इसका जम कर विरोध किया है, बहुत कुछ लिखा है इस बारे में, और मुझे इसकी काफ़ी क़ीमत भी चुकानी पड़ी है। जर्मन का वर्चस्व जिस तरह से सरकारी स्कूलों में स्थापित किया जा रहा था, वह जुड़ा इसी सन्दर्भ से था, परन्तु मुझे यही भ्रम रहा कि यह भारत सरकार की इच्छा से हो रहा है, एक नीतिगत निर्णय है, अतः इसका विरोध करना निरर्थक होगा। 


2009 में मैं बर्लिन के साहित्य-सम्मेलन की ग्रीष्म-अकादमी में हिस्सा ले रहा था, जहाँ जर्मनी के अनेकों प्रकाशक तथा गोएथे-संस्थान के लोग भी उपस्थित थे।  सब मुझ से पूछ रहे थे कि क्या मैं नवीन किशोर को जानता हूँ।  किशोर कोलकाता के सीगल्ल-बुक्स-प्रकाशन के मालिक हैं, और तब तक अपना व्यापार लन्दन से चला रहे थे, क्योंकि वह पुस्तकें अंग्रेज़ी की प्रकाशित करते हैं।  सब मुझे बता रहे थे कि वे किशोर से मिलने कोलकाता जा रहे थे।  कारण पूछने पर मुझे बताया गया कि आगे से वे बहुत-सी जर्मन पुस्तकों के अंग्रेज़ी अनुवाद भारत से ही करवा कर वहीँ प्रकाशित करवाया करेंगे। यह एक बहुत ही चौंका देने वाली सूचना थी।  मेरे यह कहने पर कि कोई भी भारतीय जर्मन साहित्य का अनुवाद अंग्रेज़ी में कर पाने में समर्थ नहीं होगा, और वैसे भी अज्ञात जर्मन लेखकों की पुस्तकें पढ़ने में भारतीय दिलचस्पी नहीं लेंगे तो मुझ पर यह कह कर हँसा गया कि हर भारतीय अंग्रेज़ी जानता है, और मैं उन्हें भ्रमित कर रहा हूँ।  उनके इस विश्वास की पृष्ठभूमि में भारत में कुछ वर्षों से कतिपय सांस्कृतिक दूतों द्वारा चलाया रहा एक अंग्रेज़ी-समर्थक अभियान था।  इस बारे में मैं वेबज़ीन “सृजनगाथा” में मई 2010 में प्रकाशित अपने एक बहुचर्चित आलेख में विस्तार से लिख चुका हूँ।  यह भी कि मैंने जर्मनी के एक प्रमुख प्रकाशन “ज़ूअरकांप फर्लाग”  की प्रमुख पेट्रा हार्ट को एक मेल लिख कर अपना कड़ा विरोध जताया था तो उन्होंने मुझे जवाब में लिखा था कि ये पुस्तकें केवल अंग्रेज़ीभाषी देशों, जैसे अमरीका तथा इंगलैंड के लिए हैं, इन्हें छपवाया भारत में जायेगा, बेचा विदेश में जायेगा, और इनका अनुवाद भी अँगरेज़ करेंगे।  पेट्रा एक सीधी-सच्ची महिला हैं और उनके कथन में सत्य था.. जर्मन से अंग्रेज़ी में अनूदित, भारत में प्रकाशित पुस्तकें भारत में उपलब्ध नहीं हैं, अंग्रेज़ीभाषी देशों में ही बेचीं जा रही हैं।  इसका सीधा सा मतलब है: भारत में पुस्तकें सस्ती छपती हैं, तो इस से प्रकाशकों का मुनाफ़ा कई गुणा बढ़ जाता है।  परन्तु इसका चिंताजनक पहलू यह रहा कि इसके साथ ही भारत में, विशेषकर गोएथे संस्थान द्वारा, एक हिंदी-विरोधी अभियान भी शुरू हो गया, जिसके अंतर्गत, एक जर्मनभाषी सांस्कृतिक दूत के शब्दों में:  “दिल्ली से बाहर कदम रख कर देखो तो कोई भी हिंदी नहीं बोलता.” इस अज्ञान को क्षमा करने का कोई कारण नहीं है, लेकिन इसके मंतव्य को समझते हुए यह निस्सहाय रोष को जन्म देने वाला एक वक्तव्य है।  बहरहाल यह समझ में आने वाली बात है कि वैश्वीकरण के इस युग में कोई कम लागत में किसी दूसरे देश के सस्ते कामगारों का लाभ उठा रहा है, जबकि इस सांस्कृतिक दूत का कथन था कि वे यहाँ पर लोगों को रोज़गार उपलब्ध करवा रहे हैं.


लेकिन अभी तक जो एकदम अबोधगम्य रहा है, वह है भारत के संविधान की अवहेलना करते हुए जर्मन को भारत में बढ़ावा देना।  इससे क्या मिलने वाला है जर्मनी को, या किसी अन्य जर्मनभाषी देश, अर्थात आस्ट्रिया अथवा स्विट्ज़रलैंड को? उनके लिए भारतीय बच्चों को जर्मन सिखाना क्या इतना अधिक महत्व रखता है कि उन्होंने चुपचाप मानव संसाधन मंत्रालय को नज़रंदाज़ करते हुए गुप-चुप केन्द्रीय विद्यालय संगठन से इकरारनामा कर डाला और उसके बाद प्रति वर्ष लाखों यूरो जर्मन के प्रचार-प्रसार पर खर्च करते रहे।  यह तर्क किसी के गले नहीं उतरने वाला कि जर्मन सरकार चाहती है कि भारत के प्रतिभाशाली छात्र इससे जर्मन विश्वविद्यालयों में शिक्षा पाने को आतुर हो जायेंगे।  स्कूल में पढ़ी जर्मन बड़े होने के बाद कहाँ बची रह जाती है? मेरे छोटे बेटे ने स्कूल में तीसरी भाषा के तौर पर फ्रेंच ली थी, और अब वह ‘कोमा ताले वू?’ (कैसे हो?) के अलावा और कोई वाक्य नहीं जानता। मेरे ज्येष्ठ पुत्र ने कॉलेज में पढ़ते हुए गोएथे-संस्थान से दो सत्र में जर्मन सीखी थी, अपनी कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था उसने, लेकिन अब वह “शुभ प्रातः” या “शुभ संध्या” तक ही सिमट कर रह गया है।  एक तर्क और है कि अभी तक जर्मन की शिक्षा केवल निजी स्कूलों के बच्चों तक, अर्थात अमीर बच्चों तक ही सीमित रही है, और केंद्रीय विद्यालयों में इसे लगा कर गरीब बच्चों के लिए जर्मन भाषा की शिक्षा उपलब्ध करवाई जा रही है, जो स्वयं में एक बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है, 20/11/14 को समाचारपत्रों में निकली एक खबर के अनुसार हमारे सांसद इन विद्यालयों में प्रति वर्ष 15 सीटों का कोटा अपने बच्चों के लिए आरक्षित करवाना चाहते हैं, इसी से मालूम पड़ जाता है कि इन विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे कितने गरीब हैं।  न जाने ऐसा कितना अज्ञान इनके आसपास घूमने वाले अंग्रेजीदाँ हिंदुस्तानियों ने इनके भेजे में भर दिया है कि ये लोग अपनी नाक के आगे ज़्यादा दूर तक नहीं देख पाते। 


कुल मिला कर यह एक अचरज में डालने वाला विषय है कि क्या जर्मन का भारतीय स्कूलों में पढ़ाया जाना गोएथे संस्थान या जर्मन दूतावास के या जर्मन सरकार के लिए इतना गंभीर विषय है कि उसके लिए संदिग्ध प्रणाली से एक समझौता करना, पानी की तरह पैसा बहाना तथा जर्मन चांसलर मैडम मेर्केल का भारतीय प्रधानमंत्री से एक महत्वपूर्ण शिखर सम्मेलन के दौरान बात करना अनिवार्य हो गया? किसी भी जर्मन या भारतीय नागरिक के लिए यह गोरखधंधा अबोधगम्य ही रहेगा।  सुप्रसिद्ध साहित्यकार ई.एम.फोस्टर ने एक बार कहीं लिखा था: If I had to choose between betraying my country and betraying my friend, I hope I should have the guts to betray my country, अर्थात यदि मेरे सामने अगर दुविधा हो कि मैं देश से गद्दारी करूँ या दोस्त से, तो उम्मीद रखता हूँ कि मुझमें देश से गद्दारी करने का साहस होगा.


जर्मनों तथा जर्मनभाषियों से मेरा संपर्क तथा मेरे सम्बन्ध गत 41 वर्षों से हैं, और मैं भली-भांति जानता हूँ कि जर्मेनिक नस्ल दोस्ती निभाने के मामले में मिसालें क़ायम कर सकती है, पर देश से गद्दारी? ...मैं सोच भी नहीं सकता था, परन्तु इस प्रकरण में कहीं जा कर यह उक्ति इन के सन्दर्भ में सार्थक प्रतीत होती है। यह तो मैं गत 15 वर्षों से जानता हूँ कि ये लोग भारतीय दोस्तों द्वारा बरगलाये जाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। 


गोएथे-संस्थान दशकों से भारत में निरंकुशता से जर्मन-भारतीय भाषा अनुवाद क्षेत्र में निरीह हिंदी पाठकों पर जर्मन साहित्य के घटिया अनुवाद थोप रहा है। विष्णु खरे इसके आधिकारिक अनुवादक रहे हैं, जो खुद मानते हैं कि उनका जर्मन-ज्ञान अल्प है।  संस्थान हिंदी में उत्तम अनुवाद नहीं होने देता, अगर कोई करता है तो उसे प्रताड़ित करता है, उससे उसके प्रकाशक छीन लेता है, अपने दोस्तों को प्रकाशकों पर थोप देता है, कि इनसे अनुवाद करवाओ।  जब उनके अनुवाद ऐसे होते हैं कि हिंदी पाठक उन्हें पढ़ते हुए अपना माथा पीट ले, तो भी प्रकाशक के साथ ज़बरदस्ती की जाती है कि उसे वही अनुवाद छापने होंगे।  यह उनके अपने साहित्य का अपमान नहीं है तो क्या है? इस विषय पर जर्मनी तथा आस्ट्रिया की दो शोध-पत्रिकाओं में मैं जर्मन भाषा में 14-15 पृष्ठों का एक विस्तृत लेख प्रकाशित कर चुका हूँ।  खेद का विषय है कि मुझे इस प्रवृत्ति को कड़े शब्दों में लताड़ना पड़ा है; किसी प्रश्न का कोई उत्तर तो इनके पास नहीं है, लेकिन लोगों से निजी वार्तालापों में इसके अधिकारी मेरे प्रति अपनी आक्रोश जताते रहते हैं।  इनकी निरंकुशता अब इस हद तक बढ़ चुकी है कि ये अनधिकृत रूप से देश से संस्कृत तथा अन्य भारतीय भाषाएँ मिटा कर जर्मन को स्थापित करने कि लिए दशकों से बने मधुर भारत-जर्मन संबंधों में दरार लाने पर भी उतारू हो गए हैं। 


बात जर्मनों के जिगरी दोस्त होने की हो रही थी।  50 वर्ष से अधिक समय से गोएथे-संस्थान का एक जिगरी दोस्त प्रमोद तलगेरी नाम का एक जर्मन पढ़ाने वाला प्रोफ़ेसर रहा है।  जर्मन भाषा और साहित्य के मामले में यह हमेशा उनका प्रमुख परामर्शदाता रहा है।  गत कुछ वर्ष ऐबरहार्ट वेल्लर संस्थान की दक्षिण एशिया-शाखा के भाषा-विभाग के प्रमुख रहे थे। उनके कार्यकाल के दौरान भारतीय विश्वविद्यालयों में जर्मन के वही शिक्षक फले-फूले, जो वेल्लर तथा तलगेरी की युगल-जोड़ी को दंडवत प्रणाम करते रहे। ...  और ये उन्हें बार-बार जर्मनी की सैर करवाते रहे.. लेकिन वेल्लर के ज़माने में भारत में जर्मन भाषा ख़ूब फली-फूली, भले ही इसकी उन्नति के तौर-तरीके संदिग्ध थे।  इन्हीं के ज़माने में हिंदी के प्रति संस्थान की शत्रुता खुल कर प्रकट हुई।  इन्होने देश के कई कोनों में जर्मन सेंटर खुलवाए, अपने पिच्छ्लग्गुओं को वहाँ नियुक्त कर दिया।  एक उदाहरण ही इनकी कार्यविधि को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त होगा।  इन्होंने चंडीगढ़ के सेक्टर 34 में एक गोएथे-सेंटर खुलवाया, जिसे पूरे उत्तर भारत में जर्मन भाषा सीखने के लिए एकमात्र सेंटर का दर्ज़ा प्रदान किया गिया, और जिसके बारे में घोषणा की गई कि दिल्ली की इंदिरा गाँधी ओपन यूनिवर्सिटी की भागीदारी इसके साथ होगी।  यहाँ उल्लेखनीय है कि इस निजी-सेंटर के कर्ता-धर्ता निदेशक सिर्फ़ एम.ए. हैं, तथा किसी कॉलेज या यूनिवेर्सिटी में शिक्षक की नौकरी नहीं पा सके, क्योंकि यू.जी.सी. की नेट परीक्षा पास नहीं कर सके, परन्तु, यदि हम वेल्लर के शब्दों पर विश्वास करें तो इन्हें – वेल्लर तथा तलगेरी की कृपा से - एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर का दर्ज़ा इन्हें संभवतः मिल चुका है।  यह अनिवार्य है कि जाँच की जाये: क्या इंदिरा गाँधी ओपन यूनिवर्सिटी से भी गोएथे-संस्थान ने ऐसा कोई अवैध समझौता किया है? यह स्वतःस्पष्ट है कि भारत में जर्मन का प्रचार-प्रसार बढ़ाने से वेल्लर की प्रतिष्ठा गोएथे-संस्थान के म्यूनिख मुख्यालय में बढ़ी और तलगेरी की जर्मन दूतावास इत्यादि में ; और इस प्रतिष्ठा की दरकार तलगेरी को बहुत बुरी तरह से थी। 


गोएथे-संस्थान, जर्मन दूतावास तथा अन्य जर्मनभाषी देशों के दूतावासों के घनिष्ठ मित्र प्रमोद तलगेरी भारत सरकार के अपराधी हैं, अतः इन्हें भारतीय यूनिवर्सिटी सिस्टम से बहिष्कृत किया जा चुका है और मानव संसाधन मंत्रालय ने केन्द्रीय सतर्कता आयोग के आदेश पर एक यूनिवर्सिटी में इनके भ्रष्टाचार के मामलों को दृष्टिगत रखते हुए भारत सरकार की कड़ी नाराज़गी इनके प्रति प्रकट की है। यह कभी हैदराबाद में एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय के उपकुलपति होते थे, और अब अपने आप को इंडिया इंटरनेशनल मल्टीवेर्सिटी, पुणे, का उपकुलपति बताते हैं। वास्तव में यह “वेर्सिटी” न तो “यूनिवर्सिटी” है, न ही “इंटरनेशनल” है, और न ही यह इसके उपकुलपति हैं।  जर्मनों के यह घनिष्ट मित्र दशकों से मक्कारियों और घोटालों के लिए जाने जाते रहे हैं, और स्वयं पर हाल में हुए कुठाराघात से निज़ात पाने के लिए इनके लिए अपने मित्रों के लिए कुछ नया करना अनिवार्य था।  यह फ़रवरी 2014 में “अपनी यूनिवर्सिटी” में जर्मन, स्विस तथा आस्ट्रियाई दूतावास के सहयोग से “भारत में जर्मन के शिक्षण” के सौ वर्ष की जयंती” बड़ी धूमधाम से मनाने वाले थे।  मुझे जब यह सूचना स्विस दूतावास की सांस्कृतिक सचिव, ज़ारा बेरनास्कोनी, से मिली कि तीनों दूतावास इंडिया इन्टरनेशनल मल्टीवेर्सिटी में जा कर यह समारोह आयोजित करने जा रहे हैं तो मैंने उन्हें सच्चाई से परिचित करवाया. वह आश्चर्यचकित हुईं और उन्होंने मेरे कथन पर विश्वास नहीं किया।  मैनें उन्हें कोरिएर से प्रमाण भेजे तो उन्हें यकीन आया।  ये सब प्रमाण इन्टरनेट पर उपलब्ध हैं।  तथ्य ये हैं -  :  

वेर्सिटी का पता कहीं पर कुछ है, कहीं कुछ और है, कुछ पता नहीं कि यह कब स्थापित हुई थी, 2000 से 2012 तक कई तारीखें हैं इसमें, वेर्सिटी में छात्रों की संख्या: 0, शिक्षकों की संख्या: 0, कमरों की संख्या: 0, कम्प्यूटरों की संख्या: 0, कुछ भी नहीं वहाँ पर, कुल मिला कर वेर्सिटी के पास 6,36,122 रूपये का बजट है, जो उन्हें किसी ने दान में दिये हैं, जिस में से 5,40,000रूपये कर्मचारियों में बाँटे गए हैं।  वेर्सिटी को न तो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और न ही तकनीकी शिक्षा परिषद से मान्यता प्राप्त है, जो हर सही यूनिवर्सिटी के लिए अनिवार्य होती है।  कहीं पर इसे कॉलेज बताया गया है, कहीं एक वाणिज्यिक संस्था, कहीं कल्याणकारी संस्था और कहीं गैर-सरकारी संगठन के रूप में इसका परिचय दिया गया है; विकिपीडिया में इसे एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बताया गया है, जिसे तलगेरी चला रहे हैं।  और कि इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी एक ग्रामीण यूनिवर्सिटी है, प्रमोद तलगेरी जिसके “Appily Adhikari” और “Principal” हैं।  स्विस राजदूत लीनुस फॉन कास्टेलमूर को भी मैंने आगाह किया कि ऐसे व्यक्तियों से बच कर रहें।  यथासंभव जर्मन से जुड़े हर व्यक्ति को देश-विदेश में आगाह किया।  समारोह अंततः पुणे यूनिवर्सिटी में संपन्न हुआ, वहाँ जर्मन राजदूत मिषाएल श्टाइनर ही उपस्थित थे, परन्तु उन्होंने तलगेरी को उनके सहयोग के लिए धन्यवाद अवश्य दिया.... और सबसे अधिक हैरत की बात यह है कि इसी वर्ष अप्रैल में गोएथे-संस्थान ने तलगेरी को भारत तथा जर्मनी के मध्य सांस्कृतिक तथा साहित्यिक संबंधों को असाधारण प्रोत्साहन देने के लिए मेर्क-टैगोर पुरस्कार से सम्मानित किया है।  स्पष्ट है कि किस लिए दिया गया है यह सम्मान!


प्रमोद तलगेरी और गोएथे-संस्थान अर्थात माक्स-म्युलर भवन में, जैसा कि मैं बता चुका हूँ, हमेशा प्रगाढ़ सम्बन्ध रहे हैं, और कांग्रेस सरकार में भी तलगेरी की गहरी पहुँच थी, जिस कारण यह गुप-चुप क़रार सम्भव हुआ है। आधिकारिक तौर पर तलगेरी इंडाफ (भारतीय-जर्मन शिक्षक संघ) के अध्यक्ष हैं, इन्होने ही अवश्य दोनों पक्षों में इस अवैध समझौते को सम्भव बनाया है।  गोएथे-संस्थान की दिसंबर 2011 की यह विज्ञप्ति प्रमाण है तलगेरी कि गतिविधियों का :

“Destination Deutsch” was the slogan of the first Asian conference for German teachers. It took place in New Delhi from 3-5 December 2011, organized by the Indian German Teachers Association (InDaF) and the International German Teachers Association (IDV). Marianne Hepp, IDV president, was delighted to address more than 350 participants. This translates into the biggest regional conference in IDV history. The German ambassador noticed that there were not enough seats for everybody in the multi-purpose hall. The host and president InDaF Professor Pramod Talgeri, announced proudly: “This is a big moment for us.”


कई बार तो पता नहीं चलता कि इनकी निष्ठा भारत के प्रति है या जर्मनी के प्रति।  जर्मन दूतावास की 17/11/2009 की एक प्रेस विज्ञप्ति में तलगेरी को जर्मनी के प्रान्त बाडेन व्युर्त्तेमबेर्ग के मुख्यमंत्री ग्युंटर एच. अयोत्तिन्गेर के साथ आये प्रतिनिधिमंडल का सदस्य बताया गया है।  यदि जर्मन हमारे देश में अपनी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए दम लगते हैं तो यह एक स्वाभाविक बात है, यह उनका काम है, परन्तु यदि एक भारतीय के षड्यंत्र के कारण वैश्विक स्तर पर एक कूटनीतिक संकट की स्थिति आन खड़ी हो, जिसमें दो देशों मे सम्बन्ध बिगड़ जाने का खतरा हो, तो ऐसे अपराधी को देशद्रोह का दंड मिलना चाहिए। 


इससे पहले भी तलगेरी अनगिनत घोटाले कर चुके हैं, जिनका विवरण मैं यहाँ स्थानाभाव के कारण नहीं दूँगा, परन्तु इनके बारे में मैं बहुत कुछ पहले भी लिख चुका हूँ, इन घोटालों में भारत सरकार तथा अन्य कई संस्थाओं को ठगा गया था।  परन्तु यू.पी.ऐ. सरकार के समय में इन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। 


संक्षेप में,  वेल्लर का काम था भारत में जर्मन सीखने वाले छात्रों में वृद्धि करना, वह उसने किया, तलगेरी का काम था अपने कलंक को छुपाना, वह उसने किया, और म्यूनिख और भारत के गोएथे-संस्थान ने अपनी दोस्ती निभाई, अपनी भाषा तथा साहित्य की क़ीमत पर।  मुझे और कोई कारण नज़र नहीं आता इस गौण समस्या को इतना तूल देने का कि जर्मन प्रधानमंत्री को इस में हस्तक्षेप करना पड़े। 


वैसे वेल्लर तथा तलगेरी ने मिल कर यदि भारत में जर्मन भाषा सीखने वालों की संख्या में भारी वृद्धि की तो उसमें पैसे का बड़ा हाथ था।  शिक्षिका ने अभी पढाना शुरू ही किया और बच्चों ने सीखना तो उन्हें फटाफट जर्मनी की सैर करा दी।  स्कूली बच्चों पर इस तरह गैर-क़ानूनी रूप से तीसरी भाषा के रूप में जर्मन थोपना हास्यास्पद तथा अनर्गल है, क्या कोई कल्पना कर सकता है कि भारतीय इस तरह जर्मनी या किसी अन्य यूरोपीय देश में जा कर हिंदी या तमिल वहाँ के स्कूलों पर थोप सकते हैं?


देखा जाये तो केंद्रीय विद्यालय संगठन ने गोएथे-संस्थान से उक्त समझौता कर के अपने देश, अपनी भाषा के प्रति निष्ठा नहीं दिखाई।  त्रिभाषी सूत्र का मुख्य उद्देश्य था देश के सभी भाषाई क्षेत्रों को भावनात्मक स्तर पर एक दूसरे से जोड़ना, और यदि छात्र उत्तर में संस्कृत को वरीयता देते हैं तो भी यह उद्देश्य पूरा होता है. आखिरकार जर्मनी और दूसरे यूरोपीय देशों में भी तो बच्चे लातिन सीखते हैं।  यह एक कसौटी पर कसा तथ्य है कि लातिन सीखने वाले बच्चे यूरोप की किसी अन्य भारोपीय भाषा में आसानी से महारत प्राप्त कर सकते हैं। वही बात संस्कृत में है, जो न भारत की हर इन्डो-यूरोपीय भाषा से, बल्कि कन्नड़ और तेलुगु जैसी द्रविड़ भाषाओँ से भी छात्रों को जोड़ती है।  संस्कृत प्राचीन ग्रीक की माँ है, जो लातिन की माँ है, और जो भारत-जेर्मैनिक, भारत-आर्य, भारत-रोमांस तथा भारत-स्लाव भाषाओँ की माँ है।  इस में विरोध काहे का! हर भारोपीय भाषा में संस्कृत के शब्दों की भरमार है, अतः बेहतर होगा कि दोनों सम्बन्धी देश अपने-अपने देश में अपनी-अपनी भाषा के लिए काम करें तथा भाषा के नाम पर एक दूसरे की भावनाओं से खिलवाड़ न करे। 


शौकिया तौर पर जर्मन सिखाए जाने देने का भारत सरकार का निर्णय उचित है।  जर्मनी को भी चाहिए कि वह वहाँ संध्याकालीन-क्लासों में हिंदी पढाये जाने का इंतजाम करें। 


इस सन्दर्भ में मुझे अंग्रेज़ी मीडिया की भूमिका हर तरह से संदिग्ध लगती है।  बिना मामले की गहराई में गए जर्मन के पक्ष में सम्पादकीय तक लिख मारने में उनकी नीयत पर शक होना स्वाभाविक है।  



सम्मानित हुए साहित्यकार

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मुखपृष्ठ, दैनिक जागरण 1/11/2014 

पृष्ठ 4, दैनिक जागरण 1/11/2014 

महर्षि दयानन्द, आर्य समाज और हिन्दी

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हिन्दी दिवस पर विशेष 

‘महर्षि दयानन्द और आर्य समाज का हिन्दी के प्रचार-प्रसार में योगदान’

- मनमोहन कुमार आर्य



भारतवर्ष के इतिहास में महर्षि दयानन्द पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने अहिन्दी भाषी गुजराती होते हुए पराधीन भारत में सबसे पहले राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के लिए हिन्दी को सर्वाधिक महत्वपूर्ण जानकर मन, वचन व कर्म से इसका प्रचार-प्रसार किया। उनके प्रयासों का ही परिणाम था कि हिन्दी, जिसे स्वामी दयानन्द जी ने आर्यभाषा का नाम दिया, शीघ्र लोकप्रिय हो गई। स्वतन्त्र भारत में संविधान सभा द्वारा 14 सितम्बर 1947 को सर्वसम्मति से हिन्दी को राजभाषा स्वीकार किया जाना भी स्वामी दयानन्द के इससे 77 वर्ष पूर्व आरम्भ किए गये कार्यों का ही सुपरिणाम था।


प्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार विष्णु प्रभाकर हमारे राष्ट्रीय जीवन के अनेक पहलुओं पर स्वामी दयानन्द का अक्षुण्ण प्रभाव स्वीकार करते हैं और हिन्दी पर साम्राज्यवादी होने के आरोपों को अस्वीकार करते हुए कहते हैं कि यदि साम्राज्यवाद शब्द का हिन्दी वालों पर कुछ प्रभाव है भी, तो उसका सारा दोष अहिन्दी भाषियों का है। इन अहिन्दीभाषियों का अग्रणीय वह स्वामी दयानन्द को मानते हैं और लिखते हैं कि इसके लिए उन्हें प्रेरित भी किसी हिन्दी भाषी ने नहीं अपितुं एक बंगाली सज्जन श्री केशव चन्द्र सेन ने किया था।



स्वामी दयानन्द का जन्म 14 फरवरी, 1825 को गुजरात राज्य के राजकोट जनपद में होने के कारण गुजराती उनकी स्वाभाविक रूप से मातृभाषा थी। उनका अध्ययन-अध्यापन संस्कृत में हुआ। इसी कारण वह संस्कृत में ही वार्तालाप, व्याख्यान, लेखन, शास्त्रार्थ, शंका-समाधान आदि किया करते थे। 16 दिसम्बर, 1872 को स्वामीजी वैदिक मान्यताओं के प्रचारार्थ भारत की तत्कालीन राजधानी कलकत्ता पहुंचे थे और वहां उन्होंनें अनेक सभाओं में व्याख्यान दिये। ऐसी ही एक सभा में स्वामी दयानन्द के संस्कृत भाषण का बंगला में अनुवाद गवर्नमेन्ट संस्कृत कालेज, कलकत्ता के उपाचार्य पं. महेशचन्द्र न्यायरत्न कर रहे थे। दुभाषिये वा अनुवादक का धर्म वक्ता के आशय को स्पष्ट करना होता है परन्तु श्री न्यायरत्न महाशय ने स्वामी जी के वक्तव्य को अनेक स्थानों पर व्याख्यान को अनुदित न कर अपनी उनसे विपरीत मान्यताओं को सम्मिलित कर वक्ता के आशय के विपरीत प्रकट किया जिससे व्याख्यान में उपस्थित संस्कृत कालेज के छात्रों ने उनका विरोघ किया। विरोध के कारण श्री न्यायरत्न बीच में ही सभा छोड़कर चले गये थे। प्रसिद्ध ब्रह्मसमाजी नेता श्री केशवचन्द्र सेन भी इस सभा में उपस्थित थे। बाद में इस घटना का विवेचन कर उन्होंने स्वामी जी को सुझाव दिया कि वह संस्कृत के स्थान पर लोकभाषा हिन्दी को अपनायें। गुण ग्राहक स्वाभाव वाले स्वामी दयानन्द जी ने तत्काल यह सुझाव स्वीकार कर लिया। यह दिन हिन्दी के इतिहास की एक प्रमुख घटना थी कि जब एक 48 वर्षीय गुजराती मातृभाषा के संस्कृत के अद्वितीय विद्वान ने हिन्दी को अपना लिया। ऐसा दूसरा उदाहरण इतिहास में अनुपलब्ध है। इसके पश्चात महर्षि दयानन्द जी ने जो प्रवचन किए उनमें वह हिन्दी का ही प्रयोग करने लगे।



सत्यार्थ प्रकाश स्वामीजी की प्रसिद्ध रचना है जो देश-विदेश में विगत 139 वर्षों से उत्सुकता एवं श्रद्धा से पढ़ी जाती है। फरवरी, 1872 में हिन्दी को स्वीकार करने के लगभग 2 वर्ष पश्चात ही स्वामीजी ने 2 जून 1874 को उदयपुर में इसका प्रणयन आरम्भ किया और लगभग 3 महीनों में पूरा कर डाला। श्री विष्णु प्रभाकर इतने अल्प समय में स्वामीजी द्वारा हिन्दी में सत्यार्थ प्रकाश जैसा उच्च कोटि का ग्रन्थ लिखने पर इसे आश्चर्यजनक घटना मानते हैं। सत्यार्थ प्रकाश के पश्चात वेदों एवं वैदिक सिद्धान्तों के प्रचारार्थ स्वामीजी ने अनेक ग्रन्थ लिखे जो सभी हिन्दी में हैं। उनके ग्रन्थ उनके जीवनकाल में ही देश की सीमा पार कर विदेशों में भी लोकप्रिय हुए। विश्वविख्यात विद्वान प्रो. मैक्समूलर ने स्वामी दयानन्द की पुस्तक ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने हुए लिखा कि वैदिक साहित्य का आरभ ऋग्वेद से एवं अन्त स्वामी दयानन्द जी की ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका पर होता है। स्वामी दयानन्द के सत्यार्थ प्रकाश एवं अन्य ग्रन्थों को इस बात का गौरव प्राप्त है कि धर्म, दर्शन एवं संस्कृति जैसे क्लिष्ट विषय को सर्वप्रथम उनके द्वारा हिन्दी में प्रस्तुत कर उसे सर्वजनसुलभ किया जबकि इससे पूर्व इस पर संस्कृत निष्णात ब्राह्मण वर्ग का ही अधिकार था जिसने इन्हें संकीर्ण एवं संकुचित कर दिया था। यह उल्लेखनीय है कि 'ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका' संस्कृत व हिन्दी दोनों भाषाओं में है। दोनों भाषाओं के देवनागरी लिपि में होने के कारण प्रो. मैक्समूलर व इस ग्रन्थ के अन्य पाठकों व विद्वानों का हिन्दी से परिचय हो गया था। हिन्दीतर संस्कृत विद्वानों को हिन्दी से परिचित कराने हेतु स्वामी दयानन्द जी की यह अनोखी सूझ महत्वपूर्ण एवं अनुकरणीय है। इसी पद्धति को उन्होंने अपने वेद भाष्य में भी अपनाया है।



थियोसोफिकल सोसासयटी की नेत्री मैडम बैलेवेटेस्की ने स्वामी दयानन्द से उनके ग्रन्थों के अंग्रेजी अनुवाद की अनुमति मांगी तो स्वामी दयानन्द जी ने 31 जुलाई 1879 को विस्तृत पत्र लिख कर उन्हें अनुवाद से हिन्दी के प्रचार-प्रसार एवं प्रगति में आने वाली बाधाओं से परिचित कराया। स्वामी जी ने लिखा कि अंग्रेजी अनुवाद सुलभ होने पर देश-विदेश में जो लोग उनके ग्रन्थों को समझने के लिए संस्कृत व हिन्दी का अध्ययन कर रहे हैं, वह समाप्त हो जायेगा। हिन्दी के इतिहास में शायद कोई विरला ही व्यक्ति होगा जिसने अपनी हिन्दी पुस्तकों का अनुवाद इसलिए नहीं होने दिया जिससे अनुदित पुस्तक के पाठक हिन्दी सीखने से विरत होकर हिन्दी प्रसार में बाधक हो सकते थे।



हरिद्वार में एक बार व्याख्यान देते समय पंजाब के एक श्रद्धालु भक्त द्वारा स्वामीजी से उनकी पुस्तकों का उर्दू में अनुवाद कराने की प्रार्थना करने पर उन्होंने आवेश पूर्ण शब्दों में कहा था कि अनुवाद तो विदेशियों के लिए हुआ करता है। देवनागरी के अक्षर सरल होने से थोड़े ही दिनों में सीखे जा सकते हैं। हिन्दी भाषा भी सरल होने से आसानी से कुछ ही समय में सीखी जा सकती है। हिन्दी न जानने वाले एवं इसे सीखने का प्रयत्न न करने वालों से उन्होंने पूछा कि जो व्यक्ति इस देश में उत्पन्न होकर यहां की भाषा हिन्दी को सीखने में परिश्रम नहीं करता उससे और क्या आशा की जा सकती है? श्रोताओं को सम्बोधित कर उन्होंने आगे कहा, ‘‘आप तो मुझे अनुवाद की सम्मति देते हैं परन्तु दयानन्द के नेत्र वह दिन देखना चाहते हैं जब कश्मीर से कन्याकुमारी और अटक से कटक तक देवनागरी अक्षरों का प्रचार होगा।’’ इस स्वर्णिम स्वप्न के द्रष्टा स्वामी दयानन्द ने अपने ग्रन्थों में एक स्थान पर लिखा कि आर्यावत्र्त (भारत का प्राचीन नाम) भर में भाषा के एक्य सम्पादन करने के लिए ही उन्होंने अपने सभी ग्रन्थों को आर्य भाषा (हिन्दी) में लिखा एवं प्रकाशित किया है। अनुवाद के संबंध में अपने हृदय में हिन्दी के प्रति सम्पूर्ण प्रेम को प्रकट करते हुए वह लिखते हैं, ‘‘जिन्हें सचमुच मेरे भावों को जानने की इच्छा होगी, वह इस आर्यभाषा को सीखना अपना कर्तव्य समझेगें।’’ यही नहीं आर्य समाज के प्रत्येक सदस्य के लिए उन्होंने हिन्दी सीखना अनिवार्य किया था। भारतवर्ष की तत्कालीन अन्य संस्थाओं में हम ऐसी कोई संस्था नहीं पाते जहां एकमात्र हिन्दी के प्रयोग की बाध्यता रही हो।



सन् 1882 में ब्रिटिश सरकार ने डा. हण्टर की अध्यक्षता में एक कमीशन की स्थापना कर इससे राजकार्य के लिए उपयुक्त भाषा की सिफारिश करने को कहा। यह आयोग हण्टर कमीशन के नाम से जाना गया। यद्यपि उन दिनों सरकारी कामकाज में उर्दू-फारसी एवं अंग्रेजी का प्रयोग होता था परन्तु स्वामी दयानन्द के सन् 1872 से 1882 तक व्याख्यानों, पुस्तकों वा ग्रन्थों, शास्त्रार्थों तथा आर्य समाजों द्वारा मौखिक प्रचार एवं उसके अनुयायियों की हिन्दी निष्ठा से हिन्दी भी सर्वत्र लोकप्रिय हो गई थी। इस हण्टर कमीशन के माध्यम से हिन्दी को राजभाषा का स्थान दिलाने के लिए स्वामी जी ने देश की सभी आर्य समाजों को पत्र लिखकर बड़ी संख्या में हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन भेजने की प्ररेणा की और जहां से ज्ञापन नहीं भेजे गये उन्हें स्मरण पत्र भेज कर सावधान किया। आर्य समाज फर्रूखाबाद के स्तम्भ बाबू दुर्गादास को भेजे पत्र में स्वामी जी ने लिखा, ‘‘यह काम एक के करने का नहीं है और चूक (भूल-चूक) होने पर वह अवसर पुनः आना दुर्लभ है। जो यह कार्य सिद्ध हुआ (अर्थात् हिन्दी राजभाषा बना दी गई) तो आशा है कि मुख्य सुधार की नींव पड़ जायेगी।’’ स्वामीजी की प्रेरणा के परिणामस्वरूप आर्य समाजों द्वारा देश के कोने-कोने से आयोग को बड़ी संख्या में लोगों के हस्ताक्षर कराकर ज्ञापन भेजे गए। कानपुर से हण्टर कमीशन को दो सौ मैमोरियल भेजे गए जिन पर दो लाख लोगों ने हिन्दी को राजभाषा बनाने के पक्ष में हस्ताक्षर किए थे। हिन्दी को गौरव प्रदान करने के लिए स्वामी दयानन्द द्वारा किया गया यह कार्य भी इतिहास में अन्यतम घटना है। हमें इस सन्दर्भ में दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि हिन्दी के विद्वानों ने स्वामी दयानन्द के इस योगदान की जाने अनजाने घोर उपेक्षा की है। हमें इसमें उनके पक्षपातपूर्ण व्यवहार की गन्ध आती है। स्वामी दयानन्द की प्ररेणा से अनेक लोगों ने हिन्दी सीखी। इन प्रमुख लोगों में जहां अनेक रियासतों के राजपरिवारों के सदस्य हैं वहीं कर्नल एच.एस. आल्काट आदि विदेशी महानुभाव भी हैं जो इंग्लैण्ड में स्वामी जी की प्रशंसा सुनकर उनसे मिलने भारत आयै थे। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि शाहपुरा, उदयपुर, जोधपुर आदि अनेक स्वतन्त्र रियासतों के महाराजा स्वामी दयानन्द के अनुयायी थे और स्वामी जी की प्रेरणा पर उन्होंने अपनी रियासतों में हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया था।

स्वामी दयानन्द संस्कृत व हिन्दी के अतिरिक्त अन्य भाषाओं का भी आदर करते थे। उन्होंने सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है कि जब पुत्र-पुत्रियों की आयु पांच वर्ष हो जाये तो उन्हें देवनागरी अक्षरों का अभ्यास करायें, अन्यदेशीय भाषाओं के अक्षरों का भी। स्वामीजी अन्य प्रादेशिक भाषाओं को हिन्दी व संस्कृत की भांति देवनागरी लिपि में लिखे जाने के समर्थक थे जो राष्ट्रीय एकता की पूरक है। अपने जीवनकाल में हिन्दी पत्रकारिता को भी आपने नई दिशा दी। आर्य दर्पण (शाहजहांपुर: 1878), आर्य समाचार (मेरठ: 1878), भारत सुदशा प्रवर्तक (फर्रूखाबाद: 1879), देश हितैषी (अजमेर: 1882) आदि अनेक हिन्दी पत्र आपकी प्ररेणा से प्रकाशित हुए एवं पत्रों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि होती गई।



स्वामी दयानन्द ने हिन्दी में जो पत्रव्यवहार किया वह भी संख्या की दृष्टि से किसी एक व्यक्ति द्वारा किए गए पत्रव्यवहार में सर्वाधिक है। स्वामीजी के पत्रव्यवहार की खोज, उनकी उपलब्धि एवं सम्पादन कार्य में स्वामी श्रद्धानन्द, प्रसिद्ध वैदिक रिसर्च स्कालर पं. भवतद्दत्त, पं. युधिष्ठिर मीमांसक एवं श्री मामचन्द जी का विशेष योगदान रहा है। सम्प्रति स्वामीजी का समस्त पत्रव्यवहार चार खण्डों में पं. यधिष्ठिर मीमांसक के सम्पादन में प्रकाशित है जो रामलाल कपूर ट्रस्ट, रेवली, सोनीपत-हरयाणा से उपलब्ध है। इस पत्र व्यवहार का सम्प्रति दूसरा संस्करण ट्रस्ट से उपलब्ध हैं। स्वामी दयानन्द इतिहास में पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने अहिन्दी भाषी होते हुए सर्वप्रथम अपनी आत्म-कथा हिन्दीं मे लिखी। सृष्टि के आरम्भ में सृष्टि के उत्पत्तिकर्ता ईश्वर से वेदों की उत्पत्ति हुई थी। स्वामी दयानन्द के समय तक वेदों का भाष्य- व्याख्यायें-प्रवचन-लेखन व शास्त्रार्थ आदि संस्कृत में ही होता आया था। स्वामीजी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने वेदों का भाष्य संस्कृत के साथ-साथ जन-सामान्य की भाषा हिन्दी में भी करके सृष्टि के आरम्भ से जारी पद्धति को बदल दिया। न केवल वेदों का भाष्य अपितु अपने सभी सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका, संस्कार विधि, आर्याभिविनय, व्यवहार भानु आदि ग्रन्थ हिन्दी में लिखे जो धार्मिक जगत के इतिहास की अन्यतम घटना है। हमें लगता कि देश के सभी राजनैतिक दलों एवं विद्वानों ने स्वामी दयानन्द के प्रति घोर पक्षपात का रवैया अपनाया है जिससे उनका पक्षपातरहित न्यायपूर्ण मूल्यांकन आज तक नहीं हो सका। प्राचीनतम धार्मिक साहित्य से सम्बन्धित यह घटना जहां वैदिक धर्म व संस्कृति की रक्षा से जुड़ी है वहीं भारत की एकता व अखण्डता से भी जुड़ी है। न केवल वेदों का ही अभूतपूर्व, सर्वोत्तम, सत्य व व्यवहारिक भाष्य उन्होंने हिन्दी में किया है अपितु मनुस्मृति एवं अन्य शास्त्रीय ग्रन्थों का अपनी पुस्तकों में उल्लेख करते समय उनके उद्धरणों के हिन्दी में अर्थ भी किए हैं। स्वामी दयानन्द के साथ ही उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज एवं उनके अनुयायियों द्वारा स्थापित गुरूकुलों, डी.ए.वी. कालोजों, आश्रमों आदि द्वारा भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार में उल्लेखनीय कार्य किया गया है। गुरूकुल कांगड़ी, हरिद्वार में देश में सर्वप्रथम विज्ञान, गणित सहित सभी विषयों की पुस्तकें हिन्दी में तैयार करायीं एवं उनका सफल अध्यापन हिन्दी माध्यम से किया। इस्लाम मजहब की पुस्तक कुरआन को प्रमाणिकता के साथ हिन्दी में सबसे पहले अनुदित कराने का श्रेय भी स्वामी दयानन्द जी को है। इसका प्रकाशन भी किया जा सकता था परन्तु किन्हीं कारणों से यह कार्य नहीं हो सका। यह अनुदित ग्रन्थ उनकी उत्तराधिकारिणी परोपकारिणी सभा के पुस्तकालय में आज भी सुरक्षित है।



ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका ग्रन्थ में स्वामी दयानन्द जी ने लिखा है कि जो व्यक्ति जिस देशभाषा को पढ़ता है उसको उसी का संस्कार होता है। अंग्रेजी या अन्यदेशीय भाषा पढ़ा व्यक्ति सत्य, ज्ञान व विज्ञान पर आधारित विश्व वरणीय वैदिक संस्कृति से सर्वथा दूर देखा जाता है। इसके अतिरिक्त वह पाश्चात्य एवं अन्य वाममार्गी आदि जीवन शैलियों की ओर उन्मुख देखा जाता है जबकि इनमें मानवीय संवेदनाओं व मर्यादाओं का अभाव देखा जाता है। इसका उदाहरण इनमें पशुओं के प्रति दया भाव के स्थान पर उन्हें मारकर उनके मांस को भोजन में सम्मिलित किया गया है जो कि भारतीय वैदिक धर्म व संस्कृति के विरूद्ध है। अतः स्वामी जी का यह निष्कर्ष भी उचित है कि हिन्दी व संस्कृत के स्थान पर अन्य देशीय भाषाओं को पढ़ने से मनुष्य वैदिक संस्कारों के स्थान पर उन-उन देशों के संस्कारों से प्रभावित होता है।



एक षडयन्त्र के अन्तर्गत विष देकर दीपावली सन् 1883 के दिन स्वामी दयानन्द की जीवनलीला समाप्त कर दी गई। यदि स्वामीजी कुछ वर्ष और जीवित रहे होते तो हिन्दी को और अधिक समृद्ध करते और इसका व्यापक प्रचार करते। इससे हिन्दी भाषा का वर्तमान स्वरूप व विस्तार आज से कहीं अधिक उन्नत, सरल व सुबोध होता। लेख को निम्न पंक्तियों से विराम देते हैंः


‘‘कलम आज तू स्वामी दयानन्द की जय बोल,
  हिन्दी प्रेमी रत्न वह कैसे थे अनमोल।’’


लन्दन में 'जो चढ़ गए पुण्यवेदी पर' ....

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लन्दन में 'जो चढ़ गए पुण्यवेदी पर' .... 
- कविता वाचक्नवी

प्रथम चित्र को बहुत ध्यान से देखिए। 
यह अमर शहीद ऊधम सिंह (26 दिसंबर 1899 - 31 जुलाई 1940) का चित्र है, जिनका आज बलिदान-दिवस है। 

यह चित्र लन्दन में लिया गया था। जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड का बदला लेने के लिए 13 मार्च 1940 को उन्होंने 10 कैक्स्टन हाल में सभा के मध्य मंच पर स्थित पंजाब के तत्कालीन (जलियाँवाला बाग काण्ड के समय) गवर्नर Michael O'Dwyer को सिर में दो गोलियाँ मार कर उसकी हत्या कर दी थी व पुलिस उन्हें गिरफ़्तार कर ले गई थी। अपनी गिरफ्तारी (और सुनिश्चित मृत्युदण्ड) के अवसर पर भी उनके चेहरे पर हँसी इस चित्र में साफ देखी जा सकती है;  जबकि तीन अंग्रेज़ अधिकारियों के मुख पर बहुत तनाव दीख रहा है। 


यहाँ पाठकों की जानकारी के लिए जोड़ना चाहूँगी कि गोलियाँ चलाने का आदेश देने वाला जनरल डायर (General Reginald Dyer)  था और जब यह हत्याकाण्ड हुआ था उस समय पंजाब के गवर्नर Michael O'Dwyer, ये दोनों अलग-अलग व्यक्ति थे। हिन्दी में दोनों के नाम का उच्चारण 'डायर' कर देते हैं, तो अब तक यह भ्रांति चली आई है कि उधम सिंह जी ने जनरल डायर को मारा था। जबकि उधम सिंह जी ने जलियाँवाला काण्ड के समय पंजाब के गवर्नर के रूप में आदेश देने वाले Michael O'Dwyer की हत्या की थी।

लन्दन के न्यायालय में अपने वक्तव्य में न्यायाधीश द्वारा पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि "मैंने उन्हें इसलिए मारा क्योंकि वे इसी योग्य थे और उनके साथ यही होना चाहिए था"। अतः 31 जुलाई 1940 को आज ही के दिन उन्हें लन्दन की Pentonville Prison में फाँसी दे दी गई। उसी जेल परिसर में उनका शव गाड़ दिया गया क्योंकि तब यहाँ भारतीय विधि से अन्तिम संस्कार की अनुमति नहीं थी। लम्बे अरसे बाद वर्ष 1974 में उनकी अस्थियाँ भारत लाई गईं ।

मेरे साथ यह सौभाग्य जुड़ा है कि वर्ष 1974 में जब उनकी अस्थियाँ भारत पहुँचीं थी, तब हमारे पिताजी मुझे व मेरे भाई को उनके दर्शन करवाने स्वयं ले गए थे। दूसरा सौभाग्य यह लन्दन में भारतीय क्रांतिकारियों व नायकों से जुड़े स्थलों के हमने स्वयं जाकर दर्शन किए हैं। अपनी उस चित्रावली से '10 कैक्स्टन हाल' (जहाँ उन्होने गोली चलाई थी) तथा 'Pentonville जेल' (जहाँ उन्हें फाँसी दी गई और जहाँ 1940 से 1974 तक उनका शव रखा था) पर जा निजी कैमरा से स्वयं लिए गए वे चित्र भी यहाँ दे रही हूँ -






10 कैक्स्टन हॉल, लन्दन ©KV

10 कैक्स्टन हॉल, लन्दन ©KV


10 कैक्स्टन हॉल, लन्दन ©KV


10 कैक्स्टन हॉल, लन्दन ©KV


10 कैक्स्टन हॉल, लन्दन ©KV


Pentonville जेल, लन्दन ©KV


Pentonville जेल, लन्दन ©KV

Pentonville जेल, लन्दन ©KV























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