वेद और विटामिन डी

जीवन और जीवन विज्ञान 




आधुनिक विज्ञान और धारोष्ण गोदुग्ध 
(भारतवर्ष के संदर्भ में ) 
सुबोध कुमार 
(महर्षि दयानन्द गो संवर्धन केन्द्ग, दिल्ली -96) 


कृत्रिम रूप से विटामिन डी बनाने की विधि भी हमारे शाकाहारी समाज के लिए जानने लायक है । बूचड खानों से उपलब्ध गौ की खाल से एक तैलीय पदार्थ प्राप्त किया जाता है, इसे कृत्रिम सूर्य किरणों ( अल्ट्रा वायलेट) से उपचारित करने से विटामिन डी प्राप्त होता है। जितना भी विटामिन डी प्रयोग मे लाया जाता है केवल इसी प्रकार बनाया जाता है। यह एक पेटन्टीड विधि है जिस का उत्पादन विश्व मे केवल दो कम्पनियों द्वारा किया जाता है |









एलोपेथिक डाक्टरों की मानें तो गोदुग्ध का किसी को भी सेवन नहीं करना चाहिये । इस के वसा तत्व के कारण, कोलेस्ट्रोल बढ़ जाने से हृदय और ब्लड प्रेशर का रोग होता है । दूध मे लेक्टोज़ होता है जिसे अधिकांश लोग पचा नहीं सकते, इस से गैस, कब्ज, कोलायटिस, मोटापा रोग होते हैं। इस के कारण माइग्रेन,एस्थमा भी होता है। दाँत मुँह  साफ रखने पर भी श्वास मे दुर्गन्ध रहती है। इन से बचाव के लिये गोदुग्ध का सेवन नहीं करना चाहिए। यदि लेना ही है तो कृत्रिम सोयाबीन के दूध जैसे घोल लीजिए।


आज समाज मे पिछले लगभग एक सौ वर्ष के आधुनिकतम्‌ चिकित्सा विज्ञान के चलते, हृदय रोग, ब्लड प्रेशर, आर्थराइटिस, केंसर, डाइबिटीजक्ष्, मोटापा रोग क्यों लगातार बढ़ रहे हैं यह बात कोई नही पूछता। लगभग सभी माताओं को केल्शियम की कमी रहती है। किसी भी रोग का उपचार सम्भव नहीं बताया जाता। केवल आयु बढ़ाने के लक्ष्य से सब रोगों को संभाल कर ही रखा जाना पड़ता है। शारीरिक कष्ट कम करने के साधन मे आजीवन- एन्ज़ाइम, विटामिन, ब्लड प्रेशर , केल्शियम, थायराइड, ब्रुफेन की गोली खाना ही एक विकल्प बताया जाता है। किसी भी रोग का आमूल उपचार सम्भव नही है। केवल शल्य चिकित्सा से शरीर के विकार ग्रस्त भाग अलग करे जा सकने से उपचार सम्भव होता है। परन्तु कुछ नए रोग भी अब सामने आ रहे हैं जैसे, छोटे बच्चों मे ओटिज़्म, डाइबिटीज़, अस्थमा, मुटापा जो पहले नही थे। वयस्कों मे सोरियासिस त्वचा रोग तथा आर्थरायटिस वे रोग हैं जिन के बारे मे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान किंकर्तव्यविमूढ़ है। यहाँ यह ध्यान देने की बात है कि यह सब रोग स्वशरीरजन्य रोग हैं। यह रोग किसी रोगाणु, कृमि, इत्यादि के आक्रमण से उत्पन्न नहीं होते। यह रोग तो हमारे शरीर के सुचारु संचालन के न होने से होते हैं। इन का विकल्प केवल नियमित जीवन, योग प्राणायाम और आहार शुद्धि है।



परन्तु पिछले दस वर्षों मे आधुनिक विज्ञान की एक और चोंका देने वाली खोज भी सामने आ रही है। जो पूर्ण रूप से प्राचीन भारतीय वेदिक मान्यताओं के अनुकूल मिलती है। केवल हरे चारे पर वनों मे स्वपोषित गौ दुग्ध मे ही एक नया तत्व पाया गया है। इन्हें कहते हें, सी एल ए (कोन्ज्यूगेटिड लिनोलीइक एसिड) तथा ओमेगा3 (अल्फा लिनोलिनिक एसिड) इन तत्वों के रहते धारोष्ण गोदुग्ध को आधुनिक विज्ञान भी एक अमृत बताता है।सीएलए. ओमेग3 युक्त आहार लेने वालों मे उपर्लिखित शरीर के स्वजन्य रोग उत्पन्न ही नहीं होते । इस गोदुग्ध सेवन से इन सभी रोगों का उपचार भी संम्भव बताया जा रहा है। यह भी पाया गया है कि गोचर मे स्वपोषित गौ के दूध मे ओमेगा थ्री भी प्रचुर मात्रा मे होता है । यह वसा तत्व शरीर मे रक्त की नाडियों को स्वच्छ रखता है । जिस से ब्लड प्रेशर नही बढ़ता। वसा तत्व रक्त वहनियों के अन्दर की परत को साफ करता हॅ, यह ऋग्वेद ४/५८/।८  मन्त्र इतनी स्पष्टता से बताता है कि वेदों मे यह आधुनिक शरीर विज्ञान है, मानना ही पडता है।


“सिन्धोरिव प्राघ्वने शुघनासो वातप्रमियः पतयन्ति यह्वाः । घृतस्य धारा अरुषो न वाजी काष्ठी भिन्दन्नूर्मिभिः पिन्वमानः ॥   ऋ ४ /५८ / ८  

यह भी पाया गया है कि सूर्य की किरणों से गौ के शरीर मे एक तत्व उत्पन्न होता है जिसे आज के वैज्ञानिक 125 डाइहाड्रोक्सी डी थ्री- के नाम से, विटामीन डी भी कहते हैं। यह तत्व हमारी त्वचा पर सूर्य (विशेष रूप से प्रातः काल के सूर्य) के सेवन से ही हमें मिलता है। विटामिन डी मानव शरीर मे सैल ग्रोथ रेग्युलेटर का कार्य करता है। शरीर मे उत्पन्न होने वाली सब सैल- कोशिकाओं का उत्पादन इसी सूर्य जन्य पदार्थ से नियन्त्रित होता है।सूर्य का महत्व इन्स्युलीन डायबिटीज में  , केल्शियम अस्थि दुर्बलता, आर्थरायटिस में, सोरियासिस त्वचा में उल्लेखनीय हैं। शरीर के थोडे से भाग, हाथ पैर मुख  इत्यादि के मात्र दस पन्द्गह मिनट के सूर्य दर्शन से शरीर को पर्याप्त मात्रा में यह विटामिन डी मिल जाता है  यहाँ सूर्य नमस्कार के महत्व को देखा जा सकता है। इस सूर्य जन्य तत्व को भी ऋग्वेद के इसी सूक्त का पहला मन्त्र स्पष्ट करता है -


“ समुद्गादूर्मिर्मधुमा उदारदुपांशुना सममृतत्वमानट । घृतस्य नाम गुह्यं यदस्ति जिह्वा देवानाममृतस्य नाभिः ॥ ऋ / ४ / ५८ / १ 


इस वेद मंत्र में सूर्य की उदारता से मानव शरीर में वसा में घुलन शील तत्व को देवताओं द्वारा मानव को अमृत रूपी पदार्थ के बारे में बताया है !

कृत्रिम रूप से विटामिन डी बनाने की विधि भी हमारे शाकाहारी समाज के लिए जानने लायक है । बूचड खानों से उपलब्ध गौ की खाल से एक तैलीय पदार्थ प्राप्त किया जाता है, इसे कृत्रिम सूर्य किरणों ( अल्ट्रा वायलेट) से उपचारित करने से विटामिन डी प्राप्त होता है। जितना भी विटामिन डी प्रयोग मे लाया जाता है केवल इसी प्रकार बनाया जाता है। यह एक पेटन्टीड विधि है जिस का उत्पादन विश्व मे केवल दो कम्पनियों द्वारा किया जाता है। यह भी एक प्रश्न है क्रित्रिम रूप से बना विटामिन डी कितना लाभकारी सिद्ध होता है ।

यह एक सत्य है कि सम्पूर्ण विश्व मे डेरी उद्योग से पहले केवल धारोष्ण दूध ही लिया जाता था।

यही आधुनिक विज्ञान अनुमोदित वैदिक परम्परा के अनुकूल स्वच्छ धारोष्ण गौदुग्ध का महत्व हमारे स्वस्थ शरीर द्वारा देश के लिए हितकर सिद्ध हो सकता है। जहाँ  भी स्वच्छ धारोष्ण गो दुग्ध सम्भव है उस के सम्वर्धन और सेवन में हम सब को अपना योगदान अवश्य करना चाहिए।



श्रद्धेय प्रभाष जोशी : भस्‍म और अस्थिरूप में : हरिद्वार





भस्‍म की रस्‍म और पुनर्जन्‍म की आस
कमलकांत बुधकर




आज आख़िरी रस्‍म हो गई,
सबके मन में टीस बो गई ।
आज आख़िरी रस्‍म हो गई ।


भस्‍मरूप में शेष बची जो देह,
वह भी गंगाजल में बहकर
शेष हो गई।

आज आख़िरी रस्‍म हो गई।

किन्‍तु मुझे विश्‍वास,
लौट वे फिर आएँगे।
पुनर्जन्‍म के बाद
पखेरू उस आत्‍मा के
धरा गगन के बीच उड़ेंगे
नवजीवन ले,
फिर नाचेंगे, फिर गाएँगे,
हम सबके प्रिय
श्रीप्रभाष जी फिर आएँगे
नवल रूप में ।।




श्रद्धेय प्रभाष जोशी आज भस्‍म और अस्थिरूप में हरिद्वार के पावन हरकी पौड़ी गंगाघाट पर लाए गए। उनके दो अस्थिकलश प्रभाष जी के छोटे भाई सुभाष जोशी और पुत्र सन्‍दीप जोशी के हाथों में थे।


साथ में थे उदास और निढाल परिजन जिनमें आदरणीया भाभीश्री उषा प्रभाष और प्रभाष जी के छोटे पुत्र सोपान, पौत्र माधव, पौ्त्री मूमल और छोटे भाई गोपाल जोशी सहित अनेक परिजन तथा वरिष्‍ठ पत्रकार श्री रामबहादुर राय भी थे।


हरिद्वार के गंगाघाट पर प्रभाष जी के सैकड़ों प्रशंसक भी उपस्थित थे।















कमलकांत बुधकर 

हरिद्वार से 






















समस्या का समाधान, बच्चों का दृष्टिकोण



समस्या का समाधान, बच्चों का दृष्टिकोण
सुधा सावंत

 
 
 
बात 1996 की है। मैं एक विद्यालय में प्राथमिक कक्षा के विद्यार्थियों को पढ़ाती थी। सीनियर सैकेण्डरी के विद्यार्थियों को पढ़ाने के बाद इन नन्हे मुन्नों को पढ़ाने में बड़ा आनन्द आ रहा था। उन के विचार और तर्कों को सुन कर कभी कभी मैं चमत्कृत रह जाती थी और मन ही मन इन मेधावी बच्चों की प्रगति के लिये ईश्वर से प्रार्थना करती थी ।  


एक दिन मैं कक्षा पाँच में विद्यार्थियों को महाभारत की कहानी सुना रही थी। वह पुस्तक में एक पाठ के रूप में लिखित थी। एक स्थान पर लेखक ने लिखा था कि गांधारी बहुत पतिव्रता स्त्री थी| उनके पति अंधे थे अत: गांधारी सोचती थी कि यदि उनके पति महाराजा धृतराष्ट्र अंधे है यदि वे सृष्टि की सुन्दरता नहीं देख सकते तो वे भी इस सुन्दरता को नहीं देखेंगी। पाठ में आगे वर्णन था कि कौरव और पांडव गुरु द्रोणाचार्य से शस्त्र-संचालन की शिक्षा लेते थे। पांडव आरंभ से ही बड़ी विनम्रता पूर्वक अध्ययन करते थे, शस्त्र संचालन का अभ्यास करते थे। उनका व्यवहार भी सब के साथ बहुत स्नेहपूर्ण था। परन्तु कौरवों में दुर्योधन दुश्शासन आदि सभी से बुरा व्यवहार करते थे। भीम को एक बार उन्होंने विषाक्त खीर खिला दी थी।  


पाठ पूर्ण हुआ। प्रश्नोत्तर का समय आया ।एक विद्यार्थी ने पूछा – अध्यापिका जी, पतिव्रता का क्या अर्थ होता है। मैंने सामान्य सा उत्तर दिया – पति के अनुकूल काम करने वाली, या पति के व्रतों को पूरा करने वाली स्त्री। विद्यार्थी अपने प्रश्न का उत्तर खोज रहा था। उसने अपनी शंका स्पष्ट की- पूछा अध्यापिका जी अगर गांधारी अपनी आंखों पर पट्टी नहीं बांधतीं  और अपने बच्चों को ठीक से पढ़ातीं, होमवर्क करातीं तो उनके बच्चे दुर्योधन, दुश्शासन आदि इतने उद्दण्ड और क्रूर न होते।  


मैं दंग रह गई। आज बच्चे पौराणिक कहानियों को अपने संदर्भ में देखना - परखना चाहते हैं। पाँचवीं कक्षा के विद्यार्थी के लिये माता की भूमिका यही है कि वह बच्चों का सही मार्ग दर्शन करे। केवल पतिव्रता बन कर वह माता का दायित्व नहीं निभा सकतीं। वह छोटा सा पाँचवीं कक्षा का छात्र जीवनदर्शन का एक महत्वपूर्ण पाठ मुझे समझा रहा था। मैं आश्चर्य-चकित थी। आज के समाज में व्याप्त अव्यवस्था को सुधारने का यही एक उपाय है कि माता पिता के रूप में वे पहले अपना दायित्व ठीक से निभायें। बच्चों की जरूरतों को पूरा करें व सही शिक्षा दें।  


बहुत वर्षों बाद 2009 में एक दिन मैं कक्षा छह के विद्यार्थियों के साथ दैनिक हवन कर रही थी। मैनें हवन करने का महत्व, छात्रों को समझाया। इदन्न मम – का अर्थ समझाया और बताया कि मिल कर खाने खिलाने का आनंद ही निराला है। दीपावली का त्यौहार समीप था। इसलिए श्री राम के जीवन चरित पर भी थोड़ी सी चर्चा की। मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम ने किस प्रकार अहंकारी, दुराचारी रावण का नाश किया इस बात पर भी चर्चा की। विद्यार्थी भी बता रहे थे कि श्री राम ने तो शांतिपूर्वक युद्ध टालने का प्रयत्न किया था। बालि पुत्र अंगद को शांति प्रस्ताव के साथ रावण के पास भेजा भी था यह कहते हुए कि रावण सीता जी को सम्मान सहित श्री राम के पास लौटा दे और क्षमा माँगले तो युद्ध टाला जा सकता है। किंतु रावण ने श्री राम के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। इसके बाद भीषण युद्ध हुआ और रावण वध के बाद श्री राम सीता जी को लेकर वापस अयोध्या आ गए। लेकिन फिर सीता जी को वनवास भी हुआ।


हवन संपन्न हुआ। पूर्णाहुति व शांति पाठ के बाद सभी विद्यार्थी अपनी कक्षा की ओर जाने लगे परंतु एक छात्र रुका रहा। मैंने उसकी ओर देखा तो वह बोला – अध्यापिका जी, मेरे मन में एक शंका है। मैंने उसकी तरफ प्रश्न भरी दृष्टि से देखा। वह बोला- अध्यापिका जी, श्री राम ने धोबी के कहने पर ही माता सीता को क्यों महल से निकाल दिया और वनवास दिया। मुझे भी यह बात कहीं न कहीं खटकती थी। फिर भी मैंने उत्तर दिया कि श्री राम उस स्थिति में राजा का कर्तव्य निभा रहे थे। वे चाहते थे कि प्रजा संतुष्ट रहे। वह गलत आचरण न करें – प्रजा में व्यवस्था बनाए रखने के लिए उन्होंने सीता जी का त्याग किया था। विद्यार्थी इस उत्तर से संतुष्ट नही हुआ। उसका तर्क था -अध्यापिका जी, जिस व्यक्ति के सोचने का ढंग गलत है या जो गलत काम कर रहा है राजा को उसे समझाना चाहिए या दंड देना चाहिए। श्री राम ने निर्दोष सीता को दंड क्यों दिया जबकि सीता जी तो अग्निपरीक्षा भी दे चुकीं थी।


मैं इस तर्क के सामने निरुत्तर सी हो रही थी। फिर भी कुछ दार्शनिक बातें समझाने की कोशिश की। राजा संपूर्ण प्रजा की भलाई के लिए सोचता है। उसे अपना स्वार्थ त्यागना पड़ता है। परंतु मन में यही बात आ रही थी कि शायद श्री राम जी का चरित्र भी यही सत्य स्पष्ट करता है कि मनुष्य जीवन धारण करने पर मनुष्य की शक्तियां और बुद्धि सीमित हो जाती है और गलतियां हो ही जाती हैं। मनुष्य का जीवन निरंतर सुधार करते रहने की प्रक्रिया है।



उपवन, 609, सेक्टर 29
अरूण विहार, नोएडा – 201303. भारत

प्रेम न हाट बिकाय










आज की चर्चा करने के लिए जी भर कोशिश करनी पड़ीं है| यात्रा पर निकलने से पूर्व चर्चा की मनःस्थिति बना पाना बड़ा ही दुष्कर होता है| पर आप तो जानते हैं कि कुछ चीजें दायित्वबोध के चलते भी निभाई जाती हैं, निभाई जानी चाहिएँ भी, जब जितना बन पड़े| सो, हम आप से गिने चुने कुछ लेखों की ही चर्चा करेंगे; वह इसलिए नहीं कि संकलक खंगालना समय माँगता है अपितु इसलिए भी कि कुछ मुद्दे गंभीर विमर्श की अपेक्षा करते हैं|




सब से पहले मैं चिट्ठाचर्चा परिवार और हिन्दी नेट समुदाय की ओर से स्वर्गीय कल्याण मल लोढ़ा जी को श्रद्धांजलि  अर्पित करती हूँ | हिन्दी के इन सुप्रतिष्ठित विद्वान का अतुल अमूल्य योगदान आने वाली पीढ़ियों की धरोहर है|







Prof.Kalyanmal Lodha
हिंदी के सुविख्यात विद्वान तथा उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल आचार्य विष्णुकांत शास्त्री कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर लोढ़ा के शिष्य रहे. सन १९७९ से ८० तक आप राजस्थान के जोधपुर विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त किये गए. एक वर्ष के पश्चात आप पुनः कलकत्ता आ गए फिर सन १९८६ में आपने कलकत्ता विश्वविद्याला से अवकाश ग्रहण किया. प्रोफ़ेसर लोढ़ा ने ५० से अधिक शोध निबंध लिखे. आपने दर्जनों पुस्तकों की रचना की, जिनमे प्रमुख हैं- वाग्मिता, वाग्पथ, इतस्ततः, प्रसाद- सृष्टी व दृष्टी , वागविभा, वाग्द्वार, वाक्सिद्धि, वाकतत्व आदि. इनमे वाक्द्वार वह पुस्तक है, जिसमे हिंदी के स्वनामधन्य आठ साहित्यकारों - तुलसी, सूरदास, कबीर, निराला, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, माखनलाल चतुर्वेदी के साहित्यिक अवदानों का सुचिंतित तरीके से मूल्याङ्कन किया गया है. प्रोफ़ेसर लोढ़ा ने प्रज्ञा चक्षु सूरदास , बालमुकुन्द गुप्त-पुनर्मूल्यांकन, भक्ति तत्त्व, मैथिलीशरण गुप्त अभिनन्दन ग्रन्थ का संपादन भी किया. प्रोफ़ेसर लोढ़ा को उनके साहित्यिक अवदानों के लिए मूर्ति देवी पुरस्कार, केंद्रीय हिंदी संसथान-आगरा से राष्ट्रपति द्वारा सुब्रमण्यम सम्मान, अमेरिकन बायोग्राफिकल सोसाइटी अदि ने सम्मानित किया. आप अपनी ओजपूर्ण वाक्शैली के लिए देश भर जाने जाते थे. विविध सम्मेलनों में आपने अपना ओजश्वी वक्तव्य देकर हिंदी का मान बढाया. आप के के बिरला फाउन्डेसन, भारतीय विद्या भवन, भारतीय भाषा परिषद्, भारतीय संस्कृति संसद सरीखी देश की सुप्रसिद्ध संस्थावों से जुड़े हुए थे. प्रोफ़ेसर लोढ़ा के निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर है. उनका अंतिम संस्कार रविवार २२ नवम्बर को जयपुर में किया जा रहा है.












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साहित्य अकादमी पुरस्कारों के सम्बन्ध में एक नई व अनोखी सूचना मिलने पर  हिन्दी-भारत याहू समूह  में जो परिचर्चा छिड़ी, उसे बाँचना स्वयं में दो विचारपक्षों में से किसी एक विचार की पक्षधरता मात्र नहीं है अपितु साहित्य से जुड़े ऐसे अति महत्व के प्रश्नों पर भविष्य में देश में क्या होने जा रहा है, क्या होना चाहिए और क्यों होना चाहिए की पक्षधरता भी है| दोनों ही मत-विमत अपनी अपनी जगह सही और सटीक हैं| परिचर्चा इतनी महत्वपूर्ण, रोचक, सामयिक व विचार- उर्वर है कि आप में से प्रत्येक भाषा और साहित्य से सम्बद्ध पाठक को एक बार अवश्य देखना पढ़ना और उस पर अपनी राय देनी चाहिए थी, किन्तु  हाय री आदान-प्रदान की श्रृंखला!! 



· यदि हम सैमसंग की सहायता से पुरुस्कार की राशि बढा सकें तो क्या यह लेखकों के लिये अच्छा नहीं होगा ? नोबल पुरुस्कार की महत्ता का एक कारण यह भी है कि उस के साथ एक बड़ी पुरुस्कार राशि जुड़ी होती है । · यदि एक ’अल्फ़्रेड नोबल’ अपने निजी धन से एक ऐसा पुरुस्कार स्थापित कर सकता है जिसे पूरी दुनिया सम्मान से देखे और वह पुरुस्कार आने वाले वर्षों में कभी किसी पर निर्भर न रहे तो ऐसा पुरुस्कार हमारे अम्बानी , बिरला या मित्तल क्यों नहीं स्थापित कर सकते ? हमें किसी विदेशी कम्पनी सैमसंग पर निर्भर नहीं रहना होगा । · इस दुनिया में कुछ भी मुफ़्त नहीं मिलता । हम मुफ़्त ’टेलीविज़न’ भी तभी देख पाते हैं जब प्रायोजक उस के लिये पैसा देते हैं । किसी भी पुरुस्कार को बनाये रखने के लिये धन की ज़रूरत होती है और वह कहीं न कहीं से आना ज़रूरी है । धन का स्त्रोत जो भी होगा कुछ सीमाएं और बंधन तो ले कर आयेगा ही । हमें देखना यह है कि किस में हम अपनी स्वतंत्रता को कम से कम खोते हैं ।


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गत सप्ताह  और मेरे हृदय की धक्-धक् पूछती है– वह कौन  पर एक टिप्पणी का यह अंश देखें -
ऋषभ  ने कहा…
महाराष्ट्र विधानसभा के चपत-समारोह को भावुकता के बजाय इस तरह भी देखने की ज़रुरत है कि इस बहाने एक उद्दंड नेता ने हिन्दी को जानबूझकर अपमानित कराया है..... उकसावा भी आपराधिक कृत्य है.


यह टिप्पणी बताती है कि हिन्दी के सम्मान के नाम पर  जिस प्रकार के दाँव पेंच खेले गए हैं, उनसे हिन्दी का  अपमान ही हुआ है| इसमें हिन्दी को दुत्कारने वाला जितना दोषी है, उस से बड़ा दोषी उसका सम्मान करने के नाम चाँटा खाने की सहानुभूति और महिमा मंडन पाने वाला है| उसके ऐसे कृत्य पर उसकी भर्त्सना के स्थान पर हिन्दी वालों ने यकायक पहली नज़र में उसे भले हिन्दी के लिए सार्वजनिक अपमान तक झेल जाने वाला नायक बना कर प्रस्तुत किया हो, मान  लिया हो; किन्तु उद्वेग उतरते ही उस आपराधिकता की पोल खुलते दीखने लगी है|



राजनीति की बजबजाती गंदगी को हिंदी की पैकिंग लगाकर उस बजबजाती राजनीति को सहेजने के लिए अपने-अपने पक्ष की सेना तैयार करने की कोशिश थी
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समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अबू आजमी के रिश्ते देश के दुश्मन दाऊद इब्राहिम से होने की खबरों के ठंडे हुए अभी बहुत ज्यादा समय नहीं हुआ और न ही इसे ज्यादा समय बीता होगा जब मराठी संस्कृति के नाम पर भारतीय संस्कृति तक को चुनौती देने वाले राज ठाकरे गर्व से पॉप स्टार माइकल जैकसन की गंधाती देह के दर्शन के लिए आतुर थे।



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बन्दूकधारियों और हताहतों के अपने शब्दों के माध्यम द्वारा  मुम्बई आतंक की अकथ कथा के छिपे रहस्यों की जो वास्तविकता उजागर हुई है, उस कथा को उसके पूरे रूप में पहली बार पुरस्कृत  फिल्मकार  Dan Reed  ने कई अनजाने पक्षों के साथ खरा-खरा प्रस्तुत किया है,  ... एक ऐसी  कथा जिसे सुन देख कर आप सिहर उठेंगे .... अवाक हो जाएँगे ...





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गत दिनों मुझे एक अजीबोगारीब लेख देखने पढ़ने का अवसर मिला| लेख क्या था, मानो अपनी कुंठाओं की अभिव्यक्ति थी|  कृष्ण बिहारी जी के इस 5 नेट पन्नों में फैले लेख को आप भी स्वयं पढ़ें और विचारें|

लेखक लिखते हैं


प्रेम नहीं सेक्सप्रेम. यह शब्द जितना सम्मोहक है उतना ही भ्रामक भी. एक विचित्र-सी मनोदशा का नाम प्रेम है. यह कब होगा, किससे होगा और जीवन में कितनी बार होगा, इसका कोई अता-पता किसी को नहीं होता. जब-जब मुझसे किसी ने इसके बारे में सवाल किया है या मैंने खुद से पूछा है कि आख़िर यह मामला है क्या, तो मुझे केवल एक उत्तर ही देते बना है कि प्रेम वासना से उपजी मनोस्थिति है.
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असल में इस झूठ को वह इस तरह जीती है कि उसे यह सच लगता है कि किसी के साथ हमबिस्तर हो चुकने के बाद भी वह पाकीजा है. मैं नब्बे-पंचानबे प्रतिशत स्त्रियों की बात कर रहा हूं न कि उन पांच दस प्रतिशत की जिन्होंने समाज को ठेंगा दिखा दिया है. ये ठेंगा दिखाने वाली महिलाएं आर्थिक रूप से या तो स्वतंत्र हैं या फिर वेश्याएं हैं. वेश्या सबसे अधिक स्वतंत्र होती है.
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कहने का मतलब है कि रोज की दाल-रोटी है सेक्स, प्रेम का कहीं अता पता नहीं यह सच एक बड़ा सच है. मैं यदि देहधारी नहीं होता तो क्या कोई स्त्री मुझे प्रेम करती, यदि कोई अपने वज़ूद के साथ मुझे न बांधता तो क्या मैं उसके बारे में सोचकर अपना समय नष्ट करता. अशरीरी प्रेम को बहुत महत्व देने वालो, ऐसा कौन सा अशरीरी रिश्ता है जो तुम्हारे साथ ज़िंदा है
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इसका सीधा अर्थ है कि जिस्म है और पहुंच में है तो जहान है नहीं तो कुछ भी नहीं है.
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प्रेम एक ऐसा मर्ज़ है जो सबको जुकाम की तरह पकड़ता और छोड़ता है. कुछ लोगों को यह बार-बार पकड़ता और छोड़ता है. अगर यह उनकी आदत न बनी हो तो उन्हें हर बार पहले से ज्यादा दुखी करता है. प्रेम पहला हो या उसके बाद के किसी भी क्रम पर आए, होने पर पाने की छटपटाहट पहले से ज्यादा होती है और टूटने पर पहले से भी तगड़ा झटका लगता है. यह टूटना इनसान को बिखरा और छितरा देता है.जिनकी आदत ओछेपन की होती है और जो अवसर पाते ही अपना मतलब पूरा करने में लग जाते हैं उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. उनको ही क्रमश: लम्पट और छिनाल कहा जाता है. इस प्रवृत्ति के लोग प्रेम नहीं करते.ये एक किस्म की अलग लाइफ स्टाइल जीते हैं.
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प्रेम ईर्ष्यालु, शंकालु और हिंसक होता है. प्रेम ही एक मात्र ऐसा मानवीय व्यवहार है जिसमें सबसे अधिक अमानवीयता है. प्रेम बनाता नहीं, बरबाद करता है. यह अलग बात है कि बरबाद करने वाले की कोशिश कभी कभी नाकाम हो जाती है. मैं कभी नहीं मान सकता कि रत्नावली या विद्योत्तमा ने तुलसीदास या कालिदास को अमर कर दिया
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मैं जब इस लेख को लिखते हुए अपने परिवेश में इसकी चर्चा कर रहा हूं तो इस सभ्य समाज के लोग इसे मेरा व्यक्तिगत मत कहते हुए मुझे ख़ारिज करने में लगे हैं कि प्रेम कतई दैहिक नहीं है. प्रेम आत्मा की बात है. वासना का इससे कोई लेना-देना नहीं. प्रेम ही है कि दुनिया बची हुई है. मेरा मन इसे स्वीकार नहीं कर रहा. मैं समझता हूं कि करूणा है जिससे दुनिया बची हुई है. प्रेम और करूणा में अन्तर है .करूणा का जहां असीम विस्तार है, वहीं प्रेम एक संकरी गली है. प्रेम राजपथ नहीं है कि उस पर एक साथ और सबके साथ दुनिया चले. प्रेम में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है.




यदि प्रेम केवल देह से देह का सम्बन्ध ही होता और देह पाने तक,  पा चुकने तक की यात्रा तक ही प्रेम की यात्रा होती तो किसी से भी प्रेम करने के बाद उसे ही पाने की लालसा क्यों रहती| देह तो लुके छिपे किसी की भी पा लेने वाले लोग सदा इस समाज में रहे हैं ना !!


अर्थात्  a को यदि यदि b से प्रेम है और वह उस के लिए तड़प रहा / रही है तो उसे तड़पने की क्या आवश्यकता है? वह  b से इतर किसी अन्य के देह को माध्यम क्यों नहीं बना लेता ? उसी की देह की अनिवार्यता क्यों रहती है ( यदि देह ही मूल कारक है तो)| और  गृहस्थ के बुढापे में आपसी प्रेम को आप ऐसे ही ख़ारिज करते चले जाएँगे ?

आप खारिज कीजिए, क्योंकि आप के खारिज करने के अपने कारण हैं |


कहना शोभा तो नहीं देता किन्तु पूरे लेख से एक देह लोभी पुरुष की देह लोभी होने के कारण हुई दुर्गत से उपजी मानसिकता का दिग्दर्शन होता है| वैसे बूढ़े तोतों को पढ़ाने का लाभ  हम नहीं देखते, इसलिए लेख पर तर्क वितर्क करने तक से ऊब हुई| 



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इधर  हिन्दी  ब्लॉग  जगत्  में बच्चों के ब्लॉग बनाने का उत्साह भी दिखाई देता है, जो स्वागत योग्य है| ये ब्लॉग उन ब्लॉग से हट कर हैं जो बच्चों के विषयों पर अथवा उन्हें केंद्र में रख कर लिखे जा रहे हैं क्योंकि मैं उन ब्लॉग की बात कर रही हूँ जो बच्चों के नाम से उनके मातापिता अथवा परिवारीजनों द्वारा चलाए जा रहे हैं| अभी एक दो दिन पूर्व प्रवीण जाखड जी के ब्लॉग के माध्यम से हिन्दी में सबसे छोटी आयु की बच्ची का भी एक ब्लॉग देखा था|


 खैर, बच्चों के या किसी बच्चे विशेष के ब्लॉग का लिंक या उल्लेख करना यहाँ मेरा उद्देश्य नहीं है| मेरा उद्देश्य इस बात को यहाँ उठाने का दूसरा है| वह यह कि जब भी कोई रचना किसी पात्र - विशेष  के माध्यम से व्यक्त होती है तो वह उस पात्र की भाषा और उसी की भंगिमा लेकर आती है, आनी चाहिए| साहित्य इसका प्रमाण है| प्रेमचंद के हर पात्र की भाषा और भंगिमा उसके समाज, वय, लिंग, शिक्षा, अनुभव, स्तर, भाषिक पृष्ठभूमि आदि आदि आदि कई स्तरों का निर्वाह करती है| प्रेमचंद ही क्यों, सारा हिन्दी साहित्य, संस्कृत साहित्य, अन्य भाषाओं का साहित्य, पंचतंत्र..... जाने क्या क्या गिनाऊँ ! और तो और, बोलचाल में भी लोग जब बच्चे की भूमिका में कभी  संवाद करते हैं तो तुतला कर बोलना, ... आदि शैली को अपना लेते हैं| अभिप्राय यह कि  वाणी और शब्दों का चयन वक्ता अथवा पात्र के अनुसार होना भाषा की अनिवार्य शर्त है|


आज मुझे दुःख हुआ यह देख कर कि हम अपने बच्चों के मुँह में  कैसी भाषा आरोपित कर रहे हैं| स्वप्निल नाम की इस बच्ची का ब्लॉग यों तो सराहनीय है, प्यारा है किन्तु आज के संवाद में एक शब्द "चुड़ैल" के प्रयोग में ऐसी असावधानी हुई है कि लगा जैसे हम अपने बच्चों को अपनी  वान्छओं से आरोपित कर रहे हैं| उन पर  उनकी उम्र से बड़ी चतुराई और उस चतुराई की भाषा बोलना लाद रहे हैं| 


मुझे पक्का विश्वास है कि यह भाषा स्वप्निल कदापि नहीं बोलती होगी| बोलनी चाहिए भी नहीं| ऐसे में जो भी स्वप्निल बन कर इस ब्लॉग को लिख रहे हैं,  उन्हें चाहिए कि शब्द चयन में सावधानी बरतें| बच्चे की भाषा और भावना से सामंजस्य न रखने वाले एक शब्द के गलत चयन व प्रयोग से बच्चे की पूरी छवि धूमिल हो जाती है| बच्चों के पास उनका बचपन अधिकतम सुरक्षित रहने दें| मेरी इस बात को तर्क वितर्क का मुद्दा बना कर  मुझे खेद में न डालें| मैं किसी दुर्भावना वश ऐसा नहीं लिख रही हूँ| फिर भी यदि मेरी सलाह पर किसी को आपत्ति हो तो वह/ वे अपने बच्चों के लिए निर्णय लेने में स्वतन्त्र तो हैं ही |



स्वप्निल
My Photoअचानक पापा के कम्प्यूटर में मैंने एक फोटो देखी। फोटो में पापा एक लड़की के साथ शूट में खड़े हैं। मैंने सोचा मेरे पापा कब से फिल्मों में काम करने लग गए और ये चुडैल कौन है? जो मेरी मम्मी के स्थान पर पापा के साथ खड़ी है। पापा से पूछा तो पापा ने बताया कि बेटा ये तेरे पापा नहीं है, ये तो राजीव तनेजा अंकल के ब्लाग में किया गया कमाल है। यह जानकर मुझे अच्छा लगा कि चलो पापा न तो किसी फिल्म में काम कर रहे हैं और न ही मेरे मम्मी के स्थान पर कोई और है।  आप एक चित्र के साथ हुई चुहल में हमें पहचाने की कोशिश कीजिए तब तक हम आप से अगली बार मिलने के लिए विदा ले लेते हैं|




वैसे यह तो सच है कि राजीव तनेजा जी की तकनीकी चित्रकारी ने ब्लॉग जगत् के लोगों को क्या से क्या बना दिया है|

अब यही देखिए -

 हम आपसे  अगली बार मिलने से पूर्व आपके मंगलमय भविष्य की कामना करते हैं.


fvwegwe

अब से साहित्य अकादमी पुरस्कार के प्रायोजक हैं ......





अभी कुछ ही दिन पूर्व मुझे आलोक तोमर जी का एक अत्यंत सामयिक आलेख मिला जिसे मैंने अपने समूह हिन्दीभारत के साथियों को भी भेजा | लेख तो महत्वपूर्ण व विचारणीय था ही, आलेख पर जो प्रतिक्रियाएँ आईं वे भी बहुत सधी हुई व विमर्श की अपेक्षा करती हैं| इसलिए आज पहले उस आलेख को पढ़ें व नीचे क्रम से एक एक कर उस पर आए प्रतिलेखों को भी पढ़ें| विषय इतना जटिल व महत्वपूर्ण है कि अधिकाधिक कलमकारों की सहभागिता व विचारों की अपेक्षा करता है | अतः अपनी राय हमें देना ना भूलें कि आप क्या सोचते हैं इस विषय में | तो चलिए सर्वप्रथम सीधे पढ़ते हैं वह आलेख व फिर एक एक कर आए मान्य विचारकों की राय |
कविता वाचक्नवी




सैमसंग- साहित्य अकादमी पुरस्कार!
आलोक तोमर



साहित्य अकादमी पुरस्कार देश के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से एक है। इस साल से इस पुरस्कार का नाम होगा सैमसंग साहित्य अकादमी पुरस्कार। अभी तक बड़ी और मल्टीनेशनल कंपनियां टीवी और सिनेमा के पुरस्कारों तक ही सीमित थी और क्रिकेट के मैच प्रायोजित करती थी, मगर अब कोरिया की इस कंपनी ने भारतीय साहित्य पर भी कब्जा कर लिया है। शुरूआत रवींद्र नाथ ठाकुर के नाम पर दिए जाने वाले पुरस्कार से हो रही है।


भारतीय शिक्षा और साहित्य जगत का लगभग सब कुछ बर्बाद कर देने वाले केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने कोरिया की सैमसंग कंपनी के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है और सैमसंग के दक्षिण पश्चिमी एशिया के सीईओ जे जी छीन और एकेडमी सेक्रेटरी अग्रहरा कृष्णमूर्ति ने पिछले सप्ताह इस समझौते पर दस्तखत किए। अब सफाई में यह कहा जा रहा है कि पुरस्कार में सैमसंग का नाम नहीं जोड़ा जाएगा मगर पुरस्कार समारोह में साहित्य से ज्यादा सैमसंग के बैनर नजर आएंगे। टैगोर साहित्य सम्मान हर साल दिसंबर में घोषित किया जाता है और अभी साहित्य अकादमी के दूसरे पुरस्कार सैमसंग के घेरे से बचे हुए हैं। टैगोर पुरस्कार बांग्ला, हिंदी, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, पंजाबी, तेलगु और वोडो भाषाओं में साहित्य के सम्मान के लिए दिए जाने है।


सैमसंग का कोई विद्वान निर्णायक मंडल में होगा या नहीं यह पता नहीं मगर सैमसंग के तरफ से कहा गया है कि कोरिया में साहित्य का बड़ा आदर होता है। सही बात तो यह है कि इस बात के भी कोई प्रमाण नहीं हैं कि कोरिया में कोई ठीक से हिंदी जानता है भी या नही। सैमसंग वालों के लिए, जैसे दूसरी कंपनियों के लिए भारत एक बड़ा बाजार है और इस बाजार में साहित्य में पूंजी निवेश उसके लिए बहुत बड़ा सौदा है। हम इस सौदे में शामिल हैं। सवाल है कि क्या हम इतने गरीब हो चुके हैं कि अपने साहित्यकारों को सम्मान और पुरस्कार देने के लिए हमें किसी विदेशी कंपनी की जरूरत पड़ती है? क्या भारतीय साहित्य में भी गरीबी की कोई सीमा रेखा है? अगर है तो साहित्य पर भी नरेगा कानून लागू क्यों नहीं किया जाता? भारत में साहित्य के नाम पर प्रकाशकों के गोरख धंधे से ले कर साहित्यिक शोध के नाम पर जो भयानक चोरी चकारी चलती है वह अपने आप में भयानक शर्मिंदगी का विषय है। लेकिन सैमसंग- साहित्य अकादमी संगम ने तो सबसे ज्यादा शर्मिंदा किया है। सैमसंग को अगर भारतीय साहित्य में इतनी ही रूचि थी तो अपना सैमसंग साहित्य पुरस्कार घोषित कर दिया होता। सैमसंग तो खैर धंधा कर रहा है मगर भारतीय साहित्य इतना बिकाऊ कैसे बन गया?


इस पर अनिल जनविजय जी ने लिखा 
                                                                        

हम भारतीय लेखकों को इस तरह के कुकृत्य का कड़ा विरोध करना चाहिए। साहित्य अकादमी जैसी संस्थाएँ भी अब बेची और ख़रीदी जाने लगी हैं। मैं आलोक भाई से पूरी तरह सहमत हूँ कि साहित्य अकादमी को बाज़ार से न जोड़ा जाए। अगर ख़ुद लेखक विरोध करेंगे और यह पुरस्कार लेने से मना करेंगे तभी इस तरह की कार्रवाईयों पर रोक लगेगी। लेकिन विडम्बना तो यह है कि भारत में ज़्यादातर लेखक भी तो बिकाऊ हैं और गले में अपना मूल्य लटकाए बिकने के लिए तैयार बैठे हैं।



चन्द्रमौलेश्वर जी ने कहा
                                                                                            



अब तो हर क्षेत्र बाज़ारवादी हो गया है तो पुरस्कारों का क्षेत्र पीछे क्यों रहे। तो.... अब पुरस्कार भी मल्टीनेशनल हो गए



वरिष्ठ भाषाविद प्रो.सुरेश कुमार जी ने कहा

सीमित टिप्पणी : दक्षिण कोरिया से हिन्दी पढने के लिए केन्द्रीय हिन्दी संस्थान आगरा में छात्र आते हैं. सोल (Seoul) स्थित वि.वि. में हिन्दी पढाने भारत से अध्यापक गये हैं और मैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानता हूं. परन्तु केवल इतने से सैमसंग का साहित्य अकादमी से इतनी गहराई से जुड जाने का औचित्य बन जाता है ? मैं भी कहूंगा नहीं. यह तो हमारे शेयर बाज़ार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश जैसी बात हो गई. लेखक समुदाय चुप क्यॊं है ?


प्रो. ऋषभदेव शर्मा जी ने कहा

यह तो जी देखिए कोरी दुकानदारी लग रही है. अनुचित भी ,और अपमानजनक भी!
बेहतर शायद यह हो सकता था कि यदि संयुक्त या प्रायोजित पुरस्कार देने ही थे तो नया पुरस्कार खड़ा कर लिया होता.




अनूप भार्गव जी ने लिखा

इस विषय पर कई उन व्यक्तियों की टिप्पणियां पढने को मिली जिन का मैं बहुत आदर करता हूँ लेकिन फ़िर भी अपनी बात कहने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ जो शायद उन के विचारों से अलग हो । अग्रिम माफ़ी के साथ कुछ बिन्दु रखना चाहता हूँ :



· बात इस बात की नहीं होनी चाहिये कि सैमसंग का नाम पुरुस्कार के साथ हो या न हो , बात इस बात की होनी चाहिये कि हम पुरुस्कार की निष्पक्षता को बनाये रख सकते हैं या नहीं ?

· अभी तक इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि सैमसंग पुरुस्कार के निर्णय में कोई हाथ चाहता है ।

· सैमसंग का निहित स्वार्थ स्पष्ट है । वह भारतीय बाज़ार चाहता है । वह सिर्फ़ इस बात से खुश हो सकता है कि उस का नाम एक प्रतिष्टित कार्यक्रम/पुरुस्कार के साथ जुड़े और वह इस के लिये पैसा खर्च करने को तैयार है ।

· जहां तक मेरी समझ है , सैमसंग को कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि पुरुस्कार ’क’ को मिले या ’ख’ को । बल्कि यह सैमसंग के हित में ही होगा कि पुरुस्कार की निष्पक्षता बनी रहे क्यों कि पुरुस्कार की गरिमा और सम्मान के साथ ही उस के व्यापरिक हित भी जुड़े हैं ।

· यह ज़रूरी नहीं कि प्रायोजकों के रहते हुए पुरुस्कार निष्पक्ष नहीं बनाये जा सकते । अमेरिका के औस्कर (अकेडमी) पुरुस्कार के साथ दर्जनों प्रायोजक जुड़े होते हैं लेकिन फ़िर भी उन की निष्पक्षता पर शायद ही किसी नें कभी संदेह किया हो । उन की तुलना भारतीय फ़िल्म फ़ेयर या अन्य पुरुस्कारों से कर के देखें जहां विजेताओं के नाम पहले से तय होते हैं ।

· सरकारी तंत्र में रह कर साहित्यिक पुरुस्कारों की निष्पक्षता हम जानते हैं ।

· सिर्फ़ पुरुस्कार की चाह रखने से लेखक ’बिकाऊ’ नहीं हो जाता । हम सभी जानते हैं कि पुरुस्कारों के साथ किताब की खरीद जुड़ी होती है और अपनी किताब को बिकता कौन लेखक नहीं चाहता ? क्यों सिर्फ़ लेखकों से ही यह अपेक्षा की जाती है कि वह सिर्फ़ ’जन हित’ का सोच कर लिखें और कुछ नहीं । यह शायद हम लोगों के लिये कहना सरल होगा जिन का पूर्ण व्यवसाय लेखन नहीं है लेकिन जो अपने व्यवसाय के लिये लेखन से जुड़े हैं , उनका क्या ?

· जहां लेखको के बिकाऊ होने की बात की जाती है , उस से जुड़ी प्रकाशकों द्वारा लेखको के शोषण की भी चर्चा ज़रूरी है । दोनो विषय एक दूसरे से जुड़े हैं ।

· यदि हम सैमसंग की सहायता से पुरुस्कार की राशि बढा सकें तो क्या यह लेखकों के लिये अच्छा नहीं होगा ? नोबल पुरुस्कार की महत्ता का एक कारण यह भी है कि उस के साथ एक बड़ी पुरुस्कार राशि जुड़ी होती है ।

· यदि एक ’अल्फ़्रेड नोबल’ अपने निजी धन से एक ऐसा पुरुस्कार स्थापित कर सकता है जिसे पूरी दुनिया सम्मान से देखे और वह पुरुस्कार आने वाले वर्षों में कभी किसी पर निर्भर न रहे तो ऐसा पुरुस्कार हमारे अम्बानी , बिरला या मित्तल क्यों नहीं स्थापित कर सकते ? हमें किसी विदेशी कम्पनी सैमसंग पर निर्भर नहीं रहना होगा ।

· इस दुनिया में कुछ भी मुफ़्त नहीं मिलता । हम मुफ़्त ’टेलीविज़न’ भी तभी देख पाते हैं जब प्रायोजक उस के लिये पैसा देते हैं । किसी भी पुरुस्कार को बनाये रखने के लिये धन की ज़रूरत होती है और वह कहीं न कहीं से आना ज़रूरी है । धन का स्त्रोत जो भी होगा कुछ सीमाएं और बंधन तो ले कर आयेगा ही । हमें देखना यह है कि किस में हम अपनी स्वतंत्रता को कम से कम खोते हैं ।

· बाज़ारीकरण हर समस्या का समाधान नहीं है लेकिन बाज़ारीकरण से लड़ाई उन के ही हथियारों से लड़ी जा सकती है और तभी लड़ी जा सकती है जब हम एक बेहतर, व्यवहारिक विकल्प सुझा सकें ।

अभी बस इतना ही ...
सादर स्नेह के साथ



समीक्षक दुर्गाप्रसाद अग्रवाल जी ने लिखा                                                                                 


मित्रों,
मुझे लगता है कि श्री भार्गव जी की बात पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए. केवल एक विदेशी प्रायोजक के नाम को पढ कर भड़क उठना कोई समझदारी की बात नहीं है. असल् बात तो साहित्य और धन के रिश्ते की है. जब सरकार साहित्य के लिए धन देती है तो वह भी जाने-अनजाने में अपनी शर्तें जोड़ती है. भारत में केन्द्रीय और प्रदेशों की साहित्य अकादमियों की पक्षधरता किसी से छिपी नहीं है. क्या वह हमें स्वीकार्य है? अगर नहीं, तो हमने उसे भी बदलने के लिए क्या कर लिया?

किस लेखक को सम्मान, पुरस्कार और अपने साहित्य के प्रचार प्रसार की तमन्ना नहीं होती? जब मुझे पुरस्कार मिलता है तो मैं उसे निष्पक्ष मानता हूं लेकिन जब किसी और को मिलता है तो मुझे तमाम छल छद्म नज़र आने लगते हैं. असल में यो सोच की यही विसंगति सारी दिक्कतें पैदा करती है.
अब समय आ गया है कि खुल कर इस पर बात हो कि लेखक चाहता क्या है? क्या सिर्फ लिख कर और उसे समय के भरोसे छोड़ कर निशिंत हो जाना चाहता है? क्या वह केवल स्वांत: सुखाय लिखना चाहता है? या वह्चाहता है कि जो उसने रचा है वह अधिक से अधिक लोगों  तक पहुंचे? उसका व्यापक प्रचार प्रसार हो, और साथ ही एक रचनाकार के रूप में समाज में उसकी भी विशिष्ट जगह और हैसियत बने?

अगर उसका चयन यह दूसरा विकल्प है, तो मुझे लगता है कि बाज़ार से बच पाना असंभव प्राय: है. आप जो लिखते हैं, उसे कोई प्रकाशन (चाहे वह अखबार हो, पत्रिका हो या पुस्तक प्रकाशक हो) छापता है, या कोई अन्य संचार माध्यम जैसे रेडियो या टेलीविज़न या सिनेमा प्रसारित करता है. क्या इनसे बचा जा सकता है? अगर  आप सरकारों की भी बात करें तो उनकी राजनीतिक पक्षधरता के साथ ही  व्यावसायिक घरानों से उनकी  निकटता को भी नज़र अन्दाज़ नहीं किया जाना चाहिए. सरकारों के पास जो पैसा होता है वह बाज़ार का भी होता है, और यह सोचना कि बाज़ार सरकारों को नियंत्रित नहीं करते, मासूमियत की पराकाष्ठा ही होगा.

भार्गव जी ने सही कहा है कि आपत्ति तब होनी चाहिए जब कोई प्रायोजक कृति के चयन में हस्तक्षेप करे.

अन्यथा तो इस बात का स्वागत ही होना चाहिए कि बड़े औद्योगिक संस्थानों और घरानों की नज़र भी साहित्य की तरफ जाने लगी है. अन्यता अब तक तो वे खेल या मनोरंजन तक ही देख पाते थे.


इस पर सुरेश कुमार जी ने पुनः लिखा                                                              





श्री अनूप भार्गव ने बडी स्पष्टता से अपने विचार रखे हैं जिससे  स्थिति का दूसरा पक्ष सामने आया है. इसके लिए वे हमारे धन्यवाद के पात्र हैं. तथापि आलोक जी के लेख से जो बात सामने आई है उसमें केवल नामकरण का मुद्दा है, पुरस्कार निर्णय में निष्पक्षता आदि का नहीं. हम भारत में इस बात को लेकर संवेदनशील हैं कि केवल धन के बूते कोई विदेशी व्यापारी संगठन ’साहित्य’ जैसे सम्माननीय क्षेत्र में न घुसे. साहित्य के पुरस्कारों में धनराशि का आकार गौण है, सम्मान की बात मुख्य है. इसके नाम के साथ विदेशी नाम का जुडना हमॆं अपनी अस्मिता पर आघात-सा लगता है.



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मित्रो! यह खुला मंच अब आप के हवाले! 


आप क्या सोचते हैं, हिन्दी साहित्य के एक सम्मानित पुरस्कार के प्रायोजित स्वरूप में बदले जाने वाले  प्रकरण पर ?
आप की राय की प्रतीक्षा है !!





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