यह लोकतंत्र की अपूर्व विजय है

यह लोकतंत्र की अपूर्व विजय है
डॉ. वेदप्रताप वैदिक


यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की अपूर्व विजय है। टीवी चैनलों के कुछ एंकरों ने पूछा कि 2014 की विजय, 1971 और 1984 की विजय से भी बड़ी कैसे है? 1971 में इंदिरा गांधी को 352 सीटें मिली थीं और 1984 में राजीव गांधी को 410 सीटें मिली थीं। भाजपा और मोदी को तो अभी 350 सीटें भी नहीं मिलीं हैं और आप इस जीत को अपूर्व कह रहे हैं? इसका कारण क्या है?

ज़रा याद करें कि 1971 में क्या हुआ था? इंदिराजी पाँच साल तक भारत की प्रधानमंत्री रह चुकी थीं। नेहरु की बेटी थीं। कांग्रेस अध्यक्ष होने का भी उनका अनुभव था। इसके अलावा उन्होंने कांग्रेस के सारे खुर्राट नेताओं को पटकनी मारकर इंदिरा कांग्रेस खड़ी कर दी थी। बैंकों के राष्ट्रीयकरण और उसके बाद गरीबी हटाओ के नारे ने देश का ध्यान खींचा था। 1971 के चुनाव में क्या हुआ? वे कम सत्ता से ज्यादा सत्ता में आ गईं लेकिन मोदी मात्र मुख्यमंत्री थे। वे किसी प्रधानमंत्री के बेटे भी नहीं थे। वे पार्टी अध्यक्ष भी नहीं रहे। उनका अखिल भारतीय अनुभव भी अत्यंत सीमित था। वे एक ऐसी पार्टी का नेतृत्व कर रहे थे, जो दस साल से सत्ता से बाहर थी और जिसका नेतृत्व भी एकजुट नहीं था। लेकिन 2014 के चुनाव में क्या हुआ? पहली बार एक प्रांतीय नेता ने देश का दौरा किया। कोई प्रांत नहीं छोड़ा। करोड़ों लोगों को साक्षात् संबोधित किया। लाखों कि.मी. यात्राएं कीं। दस साल प्रधानमंत्री रहने पर भी जितना देश को मनमोहनसिंह ने देखा, उससे भी ज्यादा देश को साल भर में जाना और पहचाना मोदी ने। मोदी की वजह से मतदान का जो प्रतिशत बढ़ा, वह अपूर्व था। मोदी की सभाओं में जैसा उत्साह का ज्वार उमड़ता था, वैसे मैंने 1952 से अब तक के किसी चुनाव में नहीं देखा। इसीलिए पिछले दो माह से मैं कहता रहा कि भाजपा-गठबंधन को 300 से ज्यादा सीटें मिलेंगी। सारे लोकमत और लगभग सभी मतदानों के अंदाजी घोड़े गलत साबित हुए। विपक्ष पहले भी हारा है लेकिन कांग्रेस जैसी महान पार्टी का आकार हाथी से सिकुड़कर बकरी का रह जाए, क्या यह अपूर्व नहीं है?

जहाँ तक 1984 की विजय का प्रश्न है, वह राजीव की नहीं, शहीद इंदिरा गांधी की विजय थी। शहीद इंदिराजी को विरोधी दलों के समर्थकों ने भी वोट दिए थे। वह चुनाव नहीं था। वह एक महान शहीद को राष्ट्र की श्रद्धांजलि थी। 2014 के वोट ने फिरोज गांधी-परिवार को राजनीतिक श्रद्धांजलि दे दी है। इंदिराजी चुनाव के पहले शहीद हुई थीं और फिरोज गांधी-परिवार चुनाव के बाद शहीद हो गया है। 2014 के चुनाव में लोगों को 1984 की तरह गुस्सा नहीं था। निराशा थी। देश को लगा कि वह ठगा गया है। उसने अपना देश अ-नेताओं को थमा दिया है। प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे सज्जन में प्रधानमंत्री की कोई भी कुव्वत नहीं है। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का श्रेय सबसे ज्यादा मैं किसी को देता हूँ तो वह सोनियाजी और मनमोहनसिंहजी को देता हूँ। राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो ज्ञानी जैलसिंह की कृपा से बने लेकिन नरेंद्र मोदी बन रहे हैं तो वे अपने पुरुषार्थ से बन रहे हैं। कांग्रेस को अपने किए और अनकिए का फल भुगतना ही था। उसे तो हारना ही था। नरेंद्र मोदी की खूबी यह है कि उन्होंने इस हार को अपूर्व और एतिहासिक बना दिया। कहा भी है कि ‘आशिक का जनाजा है, जरा धूम से निकले’।

इस चुनाव की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें 1971 की तरह कोई नाटकीयता नहीं थी और इसमें 1984 की तरह खौलता हुआ गुस्सा नहीं था। एक ठंडी समझ थी। इस गंभीर समझ के कारण भारत के लोगों ने भारतीय राजनीति के जातिवादी और सांप्रदायिक चरित्र को बदल दिया। प्रांतों के जातिवादी दिग्गजों ने जैसी पटकनी इस चुनाव में खाई, क्या इससे पहले किसी चुनाव में खाई? लालू, नीतिश, मुलायम, मायावती, देवेगौड़ा आदि कहाँ हैं? क्या हुआ, उनके जातीय वोट-बैंकों का? भारत के नागरिकों को मवेशियों की तरह थोकबंद वोट डालने से इस बार मुक्ति मिली हैं जहाँ तक वोटों के सांप्रदायिक बँटवारे का सवाल है, वह अपरिहार्य था। उसे टाला नहीं जा सकता था। लेकिन उसे ठीक से समझा जाना चाहिए। अल्पसंख्यकों ने मोदी को जिस वजह से वोट नहीं दिए, वह समझ में आती है लेकिन देश के अन्य सभी लोगों ने मोदी को जो वोट दिए, उसकी वजह अल्पसंख्यक नहीं थे। याने वास्तव में वह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को वोट नहीं है। वह विकास का वोट था। आशा का वोट था। वह ठगी के विरुद्ध वोट था। उसके पीछे किसी प्रकार की सांप्रदायिक संकीर्णता या घृणा नहीं थी। सच पूछा जाए तो 2014 के चुनाव में सांप्रदायिकता कोई मुद्दा ही नहीं था। जाहिर है कि प्रधानमंत्री मोदी ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की राह पर निष्ठापूर्वक चलेंगे तो जो वोट उन्हें 2014 में नहीं मिले हैं, वे भी 2019 में उन्हें मिलेंगे।

इस चुनाव में भारतीय राजनीति की शक्ल को एक और ढंग से बदला है। इसने भाजपा को अखिल भारतीय दल और कॉंग्रेस को प्रांतीय दल बना दिया है। एकाध राज्य को छोड़कर सभी राज्यों में भाजपा का खाता खुल गया है जबकि कई राज्यों में कांग्रेस का सूंपड़ा ही साफ है। जहाँ वह बची है, वहाँ भी एकदम लहूलुहान होकर! महान से लहूलुहान, ऐसी दुर्गति पहली बार हुई है।

पहली बार ऐसा व्यक्ति भारत का प्रधानमंत्री बना है, जिसकी माँ घरेलू सेविका का काम करके अपने बच्चों का पोषण और शिक्षण करती रही है। वह स्वयं स्टेशन पर चाय बेचकर अपना गुजारा करता था। यह देश के 100 करोड़ गरीब और मजलूमों से तदाकार होना नहीं है तो क्या है? ला.ब. शास्त्रीजी के अलावा नरेंद्र मोदी ऐसे एकमात्र प्रधानमंत्री बने हैं, जिनकी अपनी माँ के चरणस्पर्श करके आशीर्वाद प्राप्त किया है। ऐसे प्रधानमंत्री को तो वर्ग-चेतना के हामी कम्युनिस्टों को भी क्या सलाम नहीं करना चाहिए?



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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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