इस्तीफा काफी नहीं, सजा जरूरी !

इस्तीफा काफी नहीं, सजा जरूरी !
डॉ. वेदप्रताप वैदिक


गृहमंत्री पी. चिदंबरम बुरी तरह घिर गए हैं। पहले ए. राजा के मामले में, फिर एस.पी. गुप्ता के मामले में और अब बाबा रामदेव के मामले में! इन तीनों मामलों में चिदंबरम का जो चेहरा उभर रहा है, वह किसी लोकतांत्रिक देश के गृहमंत्री का नहीं है। ये तीनों काम चिदंबरम की सहमति से हुए हैं बल्कि उनके इशारे पर ही हुए हैं, इसके ठोस प्रमाण रोज़ सामने आते जा रहे हैं लेकिन उनके सिर पर जूं भी नहीं रेंग रही। ऐसा क्यों हो रहा है? ऐसा इसलिए हो रहा है कि हमारी यह सरकार बाबू-सरकार है। कोई बाबू किसी भी पद पर बैठ जाए, वह रहता है, बाबू का बाबू ही! उसमें इतनी हिम्मत कहाँ कि वह किसी नेता के कान पकड़ सके और उसे दरवाजा दिखा सके! जिन्हें हम नेता कह देते हैं, वे भी सचमुच अगर नेता होते तो इस्तीफा दे देते। चुपचाप नेपथ्य में चले जाते। लेकिन वे भी बाबू ही हैं। अपनी अवधि पूरी किए बिना वे कुर्सी कैसे छोड़ सकते हैं? सारा देश चाहे चीखता-चिल्लाता रहे, छोटे बाबुओं और बड़े बाबू की जुगलबंदी चलती चली जा रही है।



बाबुओं की इस जुगलबंदी को गड़बड़ाने का काम उच्चतम न्यायालय के न्यायमित्र (एमिकस क्यूरी) राजीव धवन ने कर दिया है। उन्होंने रामलीला मैदान में 4 जून को जो रावण-लीला हुई, उसका सांगोपांग अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला है कि बाबा रामदेव और उनके हजारों भक्तों पर हमला करने की जिम्मेदारी चिदंबरम की ही है। धवन का कहना है कि रामलीला मैदान में शांति से सोते हुए लोगों पर मध्य-रात्रि में जो हमला हुआ, उसका उचित प्रतिदान होना चाहिए। धवन ने पुलिस के इस झूठ के परखचे उड़ा दिए कि 4 जून की रात को सारी स्थिति बेकाबू हो गई थी।


सच्चाई तो यह है कि बाबू-सरकार जन-आंदोलन के डर के मारे पहले से पसीने में तर हो गई थी। इसने पहले अपने चार मंत्रियों को हवाई अड्डे पर भेजकर बाबा रामदेव को फुसलाने की कोशिश की। फिर इसने अपने मंत्रियों द्वारा बाबा को क्लेरिजेस होटल में ठगने की कोशिश की लेकिन 4 जून की शाम को जब सरकार की इस जालसाज़ी का भांडाफोड़ हो गया तो बाबू-लोग घबरा गए। चिदंबरम ने शांत और अनुशासित लोगों पर डंडे बरसा दिए।


इस रावण-लीला ने मनमोहनसिंह-सरकार की कब्र खोद दी है। उसने भारत और कांग्रेस के माथे पर कलंक का टीका लगा दिया। इंदिराजी के गृहमंत्री गुलजारीलाल नंदा की तरह चिदंबरम इस्तीफा दे देते तो लोग शायद इस सरकार को माफ कर देते लेकिन चिदंबरम की मूर्खता का मजा अब अगले चुनाव में कांग्रेस पार्टी और इस पूरी सरकार को भुगतना होगा। 4 जून की घटना ने अन्ना के आंदोलन में जान फूँक दी। अब रामदेव और अन्ना मिलकर ही इस सरकार का सोलहवाँ संस्कार करेंगे। लेकिन यह काफी नहीं है। चिदंबरम का इस्तीफा या इस सरकार का खत्म होना अपने आप में कोई बड़ी बात नहीं है। यह तो होना ही है। जरूरी यह है कि दोषियों को दंड मिले। सिर्फ अदालत ही नहीं, चिदंबरम जैसे अपराधियों को तो सरकार, संसद और जनता द्वारा भी दंडित किया जाना चाहिए ताकि भविष्य में कोई गृहमंत्री सत्ता के नशे में चूर होकर भारतीय लोकतंत्र की धज्जियाँ न उड़ा सके। 
17 दिसंबर 2011


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5 comments:

  1. किसी की क्या मजाल जो इनका कुछ बिगाड सके?

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  2. सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का :)

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  3. चिदम्बरम ने वाकई हद कर दी है। मुझे तो मनमोहन सिंह की लाचारी पर तरस आती है। किस तरह इनके हाथ बँधे हैं, यह आसानी से समझा जा सकता है।

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  4. सच्ची बात बताती........

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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