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‘उदारीकरण का उन्माद और आधी-शताब्दी का सबसे बड़ा दोगलापन : सरलता के सहारे हत्या की हिकमत


आधी-शताब्दी का सबसे बड़ा दोगलापन


सरलता के सहारे हत्या 




पिछले दिनों राजभाषा के नीति-निर्देशों को लेकर गृह मंत्रालय का एक जो नया ‘ परिपत्र ' प्रकाश में आया है (क्लिक - "हिन्दी पर सरकारी हमले का आखिरी हथौड़ा" ) , उसने भाषा के संबंध में निश्चय ही एक नये ‘विमर्श‘ को जन्म दे दिया है। क्योंकि, भाषा केवल ‘सम्प्रेषणीयता‘ का माध्यम भर नहीं है, बल्कि वह मनुष्य का सामाजिक-सांस्कृतिक आविष्कार भी है। फिर क्या किसी भी राष्ट्र की भाषा की संरचना में मनमाने ढंग से छेड़छाड़ की जा सकती है ? क्या वह मात्र एक सचिव और समिति के सहारे हाँकी जा सकती है ? निश्चय ही इस प्रश्न पर समाजशास्त्री, शिक्षा-शास्त्री, संस्कृतिकर्मी और राजनीतिक विद्वानों को बहस के लिए आगे आना चाहिए। यहाँ प्रस्तुत है , इस प्रसंग में एक बौध्दिक-जिरह को जन्म देने वाली कथाकार प्रभु जोशी की टिप्पणी


सरलता के सहारे हत्या की हिकमत
प्रभु जोशी 



भारत-सरकार के गृह-मंत्रालय की सेवा-निवृत्त होने जा रही एक सचिव सुश्री वीणा उपाध्याय ने जाते-जाते राजभाषा संबंध नीति-निर्देशों के बारे में एक ताजा-परिपत्र जारी किया कि बस अंग्रेजी अखबारों की तो पौ-बारह हो गयी। उनसे उनकी खुशी संभाले नहीं संभल पा रही है। क्योंकि, वे बखूबी जानते हैं कि बाद ऐसे फरमानों के लागू होते ही हिन्दी, अंग्रेजी के पेट में समा जायेगी। दूसरी तरफ हिन्दी के वे समाचार-पत्र, जिन्होंने स्वयं को ‘अंग्रेजी-अखबारों के भावी पाठकों की नर्सरी‘ बनाने का संकल्प ले रखा है, उनकी भी बांछें खिल गयीं और उन्होंने धड़ाधड़ परिपत्र का स्वागत करने वाले सम्पादकीय लिख डाले। वे खुद उदारीकरण के बाद से आमतौर पर और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हासिल करने के बाद से खासतौर पर अंग्रेजी की भूख बढ़ाने का ही काम करते चले आ रहे हैं।





ऐसे में ‘अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष‘ के अघोषित एजेण्डे को लागू करने वाले दलालों के लिए तो इस परिपत्र से ‘जश्न-ए-कामयाबी‘ का ठीक ऐसा ही समां बंध गया होगा, जब अमेरिका का भारत से परमाणु-संधि का सौदा सुलट गया था। दरअस्ल, देखने में बहुत सदाशयी-से जान पड़ने वाले इस संक्षिप्त से परिपत्र के निहितार्थ नितान्त दूसरे हैं, जिसके परिणाम लगे-हाथ सरकारी दफ्तरों में दिखने लगेंगे। बहरहाल यह किसी सरकारी कारिन्दे का रोजमर्रा निकलने वाला ‘कागद‘ नहीं, भाषा सम्बन्धी एक बड़े ‘गुप्त-एजेण्डे‘ को पूरा करने का प्रतिज्ञा-पत्र है।



दरअस्ल, चीन की भाषा ‘मंदारिन‘ के बाद दुनिया की ‘सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा-हिन्दी‘ से डरी हुई, अपना ‘अखण्ड उपनिवेश बनाने वाली अंग्रेजी‘ ने, ‘जोशुआ फिशमेन‘ की बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए, ‘उदारीकरण‘ के शुरू किये जाने के बस कुछ ही समय पहले एक ‘सिद्धान्तिकी‘ तैयार की थी, जो ढाई-दशक से ‘गुप्त‘ थी, लेकिन ‘इण्टरनेटी-युग‘ में वह सामने आ गयी। इसका नाम था, ‘रि-लिंग्विफिकेशन‘।



अंग्रेज शुरू से भारतीय भाषाओं को भाषाएँ न मान कर उनके लिए ‘वर्नाकुलर‘ शब्द कहा करते थे। वे अपने बारे में कहा करते थे, ‘वी आर अ नेशन विथ लैंग्विज, व्हेयरएज दे आर ट्राइब्स विद डॉयलेक्ट्स।‘ फिर हिन्दी को तो तब खड़ी ‘बोली‘ ही कहा जा रहा था। लेकिन, दुर्भाग्यवश एक गुजराती-भाषी मोहनदास करमचंद गांधी ने इसे अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ाई में ‘प्रतिरोध‘ की भाषा बना दिया और नतीजतन, गुलाम भारत के भीतर एक ‘जन-इच्छा‘ पैदा हो गयी कि इसे हम ‘राष्ट्रभाषा‘ बनाएँ और कह सकें ‘वी आर अ नेशन विद लैंग्विज‘। लेकिन, ‘राष्ट्रभाषा‘ के बजाय वह केवल ‘राजभाषा‘ बनकर रह गयी। यह भी एक काँटा बन गया।



बहरहाल, चौंसठ वर्षों से सालते रहने वाले काँटे को कहीं अब जाकर निकालने का साहस बटोरा जा सका है। यह एक बहुत ही दिलचस्प बात है कि अभी तक, पिछले पचास बरस से हिन्दी में जो शब्द चिर-परिचित बने चले आ रहे थे, पिछले कुछ वर्षों में उभरे ‘उदारीकरण‘ के चलते अचानक ‘कठिन’ ‘अबोधगम्य‘ और टंग-ट्व्स्टिर हो गये। परिपत्र में पता नहीं हिन्दी की किस पत्रिका के उदाहरण से समझाया गया है, कि ‘भोजन‘ के बजाय ‘लंच‘, ‘क्षेत्र‘ के बजाय ‘एरिया‘, ‘छात्र’ के बजाय ‘स्टूडेण्ट‘, ‘परिसर‘ के बजाय ‘कैम्पस‘, ‘नियमित’ की जगह ‘रेगुलर‘, ‘आवेदन‘ के बजाय ‘अप्लाई‘, ‘महाविद्यालय‘ के बजाय ‘कॉलेज‘, ‘क्षेत्र‘ की जगह ‘एरिया‘ आदि-आदि हैं, जो ‘बोधगम्य‘ है ?



हिन्दी के ‘सरकारी हितैषियों का मुखौटा’ लगाने वाले लोग निश्चय ही पढ़े-लिखे लोग हैं और अच्छी तरह जानते हैं कि भाषाएँ कैसे मरती हैं और उन्हें कैसे मारा जाता हैं। बीसवीं शताब्दी में अफ्रीकी महाद्वीप की तमाम भाषाओं का खात्मा करके उसकी जगह अंग्रेजी को स्थापित करने की रणनीति उन्हें भी बेहतर ढंग से पता होगी। उसको कहते हैं, ‘थिअरी ऑव ग्रेजुअल एण्ड स्मूथ-लैंग्विज शिफ्ट‘। इसके तहत सबसे पहले ‘चरण’ में शुरू किया जाता है- ‘डिस्लोकेशन ऑव वक्युब्लरि‘। अर्थात ‘स्थानीय-भाषा’ के शब्दों को ‘वर्चस्ववादी-भाषा’ के शब्दों से विस्थापित करना । बहरहाल, परिपत्र में सरलता के बहाने सुझाया गया रास्ता उसी ‘स्मूथडिस्लोकेशन ऑफ वक्युब्लरि ऑफ नेटिव लैंग्विजेज‘ वाली सिध्दान्तिकी का अनुपालन है। क्योंकि, ‘विश्व व्यापार संघ के द्वारा बार-बार भारत सरकार को कहा जाता रहा है कि ‘रोल ऑफ गव्हर्मेण्ट आर्गेनाइजेशन्स शुड बी इन्क्रीज्ड इन प्रमोशन ऑव इंग्लिश‘। इसी के अप्रकट निर्देश के चलते हमारे ‘ज्ञान-आयोग‘ ने गहरे चिन्तन-मनन का नाटक कर के कहा कि ‘देश के केवल एक प्रतिशत लोग ही अंग्रेजी जानते हैं, अतः शेष को अंग्रेजी सिखाने के लिए पहली कक्षा से अंग्रेजी विषय की तरह शुरू कर दी जाये।’ यह ‘एजुकेशन फॉर ऑल‘ के नाम पर विश्व-बैंक द्वारा डॉलर में दिये गये ऋण का दबाव है, जो अपने निहितार्थ में ‘इंग्लिश फॉर ऑल‘ का ही एजेण्डा है। अतः ‘सर्वशिक्षा-अभियान’ एक चमकीला राजनैतिक झूठ है। यह नया पैंतरा है, और जो ‘भाषा की राजनीति‘ जानते हैं, वह बतायेंगे कि यह वही ‘लिंग्विसिज्म‘ है, जिसके तहत भाषा को वर्चस्वी बनाया जाता है। दूसरा झूठ होता है, स्थानीय भाषा को ‘फ्रेश-लिविंस्टिक लाइफ’ देने के नाम पर उसे भीतर से बदल देना। पूरी बीसवीं शताब्दी में उन्होंने अफ्रीकी महाद्वीप की तमाम भाषाओं को इसी तरह खत्म किया।


एक और दिलचस्प बात यह कि हम ‘राजभाषा के अधिकारियों की भर्त्सना’ में बहुत आनन्द लेते हैं, जबकि हकीकतन वह सरकारी केन्द्रीय कार्यालयों का सर्वाधिक लतियाया जाता रहने वाला नौकर होता है। कार्यालय प्रमुख की कुर्सी पर बैठा अधिकारी उसे सिर्फ हिन्दी पखवाड़े के समय पूछता है और जब ‘संसदीय राजभाषा समिति’ (जो दशकों से खानापूर्ति के लिए) आती-जाती है, के सामने बलि का बकरा बना दिया जाता है। यह परिपत्र भी उन्हीं के सिर पर ठीकरा फोड़ते हुए बता रहा है कि हिन्दी के शब्द कठिन, दुरूह और असंप्रेष्य हैं। जबकि, इतने वर्षों में कभी पारिभषिक-शब्दावलि का मानकीकरण’ सरकार से खुद ही नहीं किया गया।



कहने की जरूरत नहीं कि यह इस तथाकथित ‘भारत-सरकार’ (जबकि, इनके अनुसार तो ‘गव्हर्मेण्ट ऑफ इण्डिया‘ ही सरल शब्द है) का इस आधी-शताब्दी का सबसे बड़ा दोगलापन है, जो देश के एक अरब बीस करोड़ लोगों को वह अंग्रेजी सिखाने का संकल्प लेती है, लेकिन ‘साठ साल में मुश्किल से हिन्दी के हजार-डेढ़ हजार शब्द‘ नहीं सिखा पायी ? यह सरल-सरल का खेल खेलती हुई किसे मूर्ख बनाने की कोशिश कर रही है ?



यह बहुत नग्न-सचाई है कि देश की मौजूदा सरकार ने ‘उदारीकरण के उन्माद’ में अपने ‘कल्याणकारी राज्य‘ की गरदन कभी की मरोड़ चुकी है और ‘कार्पोरेटी-संस्कृति’ के सोच‘ को अपना अभीष्ट मानने वाले सत्ता के कर्णधारों को केवल ‘घटती बढ़ती दर‘ के अलावा कुछ नहीं दिखता। ‘भाषा‘ और ‘भूगोल‘ दोनों ही उनकी चिंता के दायरे से बाहर हैं। निश्चय ही इस अभियान में हमारा समूचा मीडिया भी शामिल है, जिसने देश के सामने ‘यूथ-कल्चर‘ का राष्ट्रव्यापी मिथ खड़ा किया और ‘अंग्रेजी और पश्चिम के सांस्कृतिक उद्योग‘ में ही उन्हें अपना भविष्य बताने में जुट गया। यह मीडिया द्वारा अपनाई गई दृष्टि उसी ‘रायल-चार्टर‘ की नीति का कार्यान्वयन है, जो कहता है, ‘दे शुड नॉट रिजेक्ट अवर लैंग्विज एण्ड कल्चर इन फेवर आफ ‘देअर’ ट्रेडिशनल वेल्यूज। देअर स्ट्रांग एडहरेन्स टू मदर टंग हैज टू बी रप्चर्ड।‘



कहना न होगा कि ‘लैंग्विजेज शुड बी किल्ड विथ काइण्डनेस‘ की धूर्त रणनीति का प्रतिफल है, यह परिपत्र। बेशक इसे बकौल राहुल देव के ‘हिन्दी के ताबूत में आखिरी कील’ समझा जाना चाहिए। बहरहाल, हिन्दी को सरल और बोधगम्य बनाये जाने की सद्-इच्छा का मुखौटा धारण करने वाले इस चालाक नीति-निर्देश की चौतरफा आलोचना की जाना चाहिए और कहा जाना चाहिए कि इसे वे अविलम्ब वापस लें। निश्चय ही आप-हम-सब इस लांछन के साथ इस संसार से बिदा नहीं होना चाहेंगे कि ‘प्रतिरोध’ की सर्वाधिक चिंतनशील भाषा का, एक सांस्कृतिक रूप से अपढ़ सत्ता का कोई कारिन्दा हमारे सामने  गला घोंटे और हम चुप बने रहे। यह घोषित रूप से जघन्य सांस्कृतिक अपराध है और हिन्दी के हत्यारों की फेहरिस्त में हमारा भी नाम रहेगा।



यह सरकार का हिन्दी को ‘आमजन‘ की भाषा बनाने का पवित्र इरादा नहीं है, बल्कि खास लोगों की भाषा के जबड़े में उसकी गरदन फंसा देने  की सुचिंतित युक्ति है। यह शल्यक्रिया के बहाने हत्या की हिकमत है। यह बिना लाठी टूटे साँप  की तरह समझी जाने वाली भाषा को मारने की तरकीब है, क्योंकि यह अंग्रेजी के वर्चस्ववाद को डंसती है।



क्या कभी कोई कहता है कि अङ्ग्रेज़ी का फलाँ शब्द कठिन है ? ‘परिचय-पत्र‘ के बजाय ‘आइडियेण्टिटी कार्ड‘ कठिन शब्द है ? ऐसा कहते हुए वह डरता है। इस सोच से तो ‘राष्ट्र‘ शब्द कठिन है और अंततः तो उनके लिये पूरी हिन्दी ही कठिन हैं । बस अन्त में यही कहना है कि अङ्ग्रेज़ी की दाढ़ में भारतीय-भाषाओं का खून लग चुका है। उसके मुँहह से खून की बू आ रही है और इस ‘भाषाखोर’ के सामने हमारी भाषाओं के गले में इसी तरह फंदा डाल कर धक्का दिया जा रहा है। यही वह समय है कि हम संभलें और हिंसा की इस कार्रवाई का पुरजोर विरोध करें।
***
303, गुलमोहर निकेतन, वसंत-विहार
(शांति निकेतन के पास)
इन्दौर-10


‘उदारीकरण का उन्माद और आधी-शताब्दी का सबसे बड़ा दोगलापन : सरलता के सहारे हत्या की हिकमत ‘उदारीकरण का उन्माद  और  आधी-शताब्दी का सबसे बड़ा दोगलापन :  सरलता के सहारे हत्या की हिकमत Reviewed by Kavita Vachaknavee on Wednesday, October 19, 2011 Rating: 5

9 comments:

  1. Bhasha HAMARE JATEEY ASMITA KI PAHCHAN HAI ,HAM JIS BHASHA ME SOCHTE HAIN JEETE HAI USI ME HAM THHEEK SE ABHIBYKT HO SAKTE HAI /BHASHA HAMARE RASHTREEY GARIMA KI BRIDDHI KARTI HAI .HAME pAHCHAN DRTI HAI ,HAMARI BHASHA KE JATIY SHABDON KI ABHIBYNJANA SHAKTI USE ARTH DETI HAI ,MAMA KAKA NANA ,DIDI BHABHI JAISE SHABD HAME LAOUKIK PAHCHAN,HAMARE RISHTO KO JEEVANT KARTE HAI ,HAMARI LIPI VISHW KI SABSE BAGYANIK LIPI HAI, HAM JO BOLTE HAI WAHI LIKHTE HAI .......

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  2. बड़ी विकट स्थिति है जी हिंदी की भी। यहां व्यक्त की गयी चिंतायें जायज हैं।

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  3. Rupee symbol mix Roman R and Hindi RA..
    Press note Government of Indian dated 15 July 2010,

    "July 15, 2010 turned out to be a historic day, as the Indian Rupee got the much awaited symbol, just like other leading currencies of the world viz – Dollar, Euro, Pound Sterling and the Yen. The new symbol is an amalgamation of Devanagari –‘Ra’ and the Roman ‘R’ without the stem. Till now, the rupee was written in various abbreviated forms in different languages.


    The new symbol designed by IIT Bombay post-graduate Shri D.Udaya Kumar, was approved by the Union Cabinet on July 15. "It's a big statement on the Indian currency... The symbol would lend a distinctive character and identity to the currency and further highlight the strength and global face of the Indian economy," said Information and Broadcasting Minister Smt. Ambika Soni, while briefing the media on the Cabinet decision.''

    Visit... http://www.saveindianrupeesymbol.org/

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  4. डॉ. राजीव कुमार रावत ईमेल से लिखते हैं

    प्रभु जोशी जी जैसे अन्य ख्यातिलब्ध, संवेदनशील विद्वान जिनके निजी संपर्क में हों उनसे निवेदन करिए कि इस विषय में अपने आलेख, प्रतिक्रिया प्रकाशित कर सरकार के ऊपर एक नैतिक दबाव बनाने के अभियान की आवश्यकता है-इसकी रुपरेखा बना कर सभी को परिचालित करें । हम सरकारी कारिंदों के लिए भी यह स्थित असहज करने वाली है।

    डॉ वीणा उपाध्याय जी ने सचिव का पदभार संभालने के बाद काफी सकारात्मक उल्लेखनीय कार्य किए थे, राजभाषा विभाग की वेबसाइट को बहुत ही अच्छे स्वरुप में लाने , हिंदी दिवस कार्यक्रम
    का सीधा प्रसारण, राजभाषा सम्मेलनों में उल्लेखनीय प्रस्तुतियां आदि - उनके खाते में हैं। यह बड़े ही आश्चर्य की बात है कि सेवा निवृत्ति के चार दिन पहले उन्होंने किन परिस्थितियों में इस आदेश को जारी किया है ?

    हमारे बीच कुछ पत्रकार बंधु भी होंगे-निवेदन है कि डॉ उपाध्याय से संपर्क कर उनका एक साक्षात्कार लिया जाए और उनका पक्ष जाना जाए । राजभाषा अधिकारियों,अनुवादकों की भूमिका अथवा नकारापन
    आदि विषयों को इसके साथ न रखें-क्यों कि मेरे जिस साथी ने भी टिप्पणी की है शायद वह अनुवादक या राजभाषा अधिकारी नहीं हैं-इसलिए इस विषय पर फिर कभी चर्चा करेंगे । सरकार का एक अधिकारी होता है समाज कल्याण अधिकारी-क्या आप बता सकते हैं वह पदाधिकारी कितना समाज कल्याण कर पाता है? और क्या वह अपने पदनाम के कारण ही समाज की हर बुराई के लिए उत्तरदाई है अपराधी है ? तो मेरे भाई, हिंदी अधिकारी अथवा अनुवादक जैसे निरीह खरगोश को पीछे से लात मारना बहुत आसान है किसी ऐसे कर्मचारी के अथवा अधिकारी के मार के देखिए जो लात पकड़ कर तोड़ने की हैसियत रखता हो ( इन दो पंक्तियों पर कृपया चर्चा न करें नोट कर के रखले - फिर कभी बात करेंगे-मूल बिंदु से भटकाव न हो -इसलिए ऐसा निवेदन है)

    अपने स्तर पर विरोध को धारदार बनाने के लिए क्या करना है, वह बताइए। मीडिया की भूमिका हताश करने वाली है, उससे क्या आशा करें- क्योंकि आज सरकार ऐसा परिपत्र जारी कर सकी है तो
    इसका कारण कहीं न कहीं मीडिया है जिसमें ऐसी भाषा को सम्मान मिला है। कानपुर से निकलने वाले एक रुपये के अखबार ने हिंदी का जितना विद्रूप स्वरुप मान्य एवं स्वीकृत किया है- वह अक्षम्य है ,और अन्य शहरों से भी ऐसे पत्र निकलने लगे हैं-और उन्हे हिंदी भाषी ही पढ़ते हैं , तो सारा दोष सरकार का नहीं है हमारा ---- पन भी शामिल है । राजनेता के हैलीकॉप्टर उतारने के लिए किसके खेत की फसल साफ की जाती है- गरीब की, कि जमींदार की ?

    सादर,
    राजीव रावत

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  5. ईमेल से प्राप्त टिप्पणी

    सन्दर्भः

    सरकारी कामकाज में सरल और सहज हिंदी के प्रयोग के लिए नीति-निर्देश

    "हिन्दी का ताबूत"

    नामक लेख पर चर्चा में कुछ अवांछनीय भाषा का प्रयोग हुआ । ऐसा नहीं होना चाहिए था ।

    राजभाषा विभाग द्वारा प्रचालित परिपत्र (सर्कुलर) पर सरकारी कामों में हिन्दी के प्रयोग में जिस लचीलापन की बात की गई है उसकी प्रतिक्रिया के रूप में कई सदस्य गण ने यह आशंसा जताई है कि इस प्रकार से हिन्दी विकृत होगी । यह मूल लेख के शीर्षक "हिन्दी का ताबूत" से भी स्पष्ट है । ताबूत का अर्थ है – शवपेटी (coffin) ।

    अब थोड़ा हिन्दी के सरलीकरण के इतिहास पर भी दृष्टि डाल लें । हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिए जाने की चर्चा के दौरान हिन्दी के सरलीकरण के बारे में भी दो बार विशेष रूप से चर्चा हुई थी - पहली सन् 1932-33 में और दूसरी 6-7 अगस्त 1949 को ।

    पहली चर्चा हुई थी "हिन्दी व्याकरण में सुधार का प्रस्ताव" पर । इसके बारे में विस्तृत जानकारी हेतु देखें -
    डॉ॰ अनन्त चौधरी (1972) - "हिन्दी व्याकरण का इतिहास", बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना; पृ॰456-459.

    दूसरी चर्चा के बारे में विस्तृत जानकारी हेतु देखें - "राष्ट्रभाषा का प्रथम व्याकरण" की "भूमिका" । सन्दर्भ इस प्रकार है -
    आचार्य किशोरीदास वाजपेयी ग्रन्थावली, भाग-1, सम्पादक - विष्णुदत्त राकेश; वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली; पृ॰188-189.
    इसे ऑनलाइन भी देखा जा सकता है -




    --- नारायण प्रसाद
    ---------------

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  6. ऑनलाईन देखने के लिए लिंक (नारायण जी द्वारा उपलब्ध कराया गया)

    यहाँ

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  7. ईमेल द्वारा प्राप्त

    आज 21 अक्तूबर 2011 को सुबह 0830 बजे (`हम ऐसे क्यों है' के अंतर्गत) श्री राहूल देब, अशोक चक्रधर जी एव संचालक महोदय की इसी संदर्भ में डीडी-1 पर बहुत अच्छी वार्ता प्रसारित हुई है ।

    सादर
    डॉ. राजीव कुमार रावत
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  8. उपर्युक्त ईमेल संवाद में एक अन्य टिप्पणी

    कृपया उस चर्चा के मुख्य निष्कर्षों के बारे में बताएँ ।
    धन्यवाद ।

    ---नारायण प्रसाद
    -------------

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  9. ईमेल से प्राप्त प्रतिक्रिया -


    प्रभुजोशी का लेख और उस पर आयी प्रतिक्रियाएं पढ़ कर जख्म हरा हो गया।

    बहुत पुरानी बात है हिन्दी के एक बड़े लेखक से बहस हो रही थी और उनके जवाब से में सन्न हो कर रह गया था। उनका कहना था हिन्दी से क्या होगा, भूखे को रोटी मिल जाएगी ? हमारे अधिकांश हिन्दी व़ालों से बात करके लगता है कि व़े हिन्दीं से उक्ताये हुए हैं और एक मजबूरी की तरह ढो रहे हैं। आत्म विश्वास की जगह ग्लानि की हद तक की आत्म हीनता। जिस तरह कोई छोटे पेशे वाला अपनी संतान को उस पेशे में नहीं लाना चाहता है उसी तरहा हम अपने बच्चों को हिंदी नहीं पढ़ाना चाहते हैं। मैं अपनी बेटी को हिंदी माध्यम के स्कूल में पढ़ाने के कारण अपने घर-परिवार और हिंदी भाषी मित्रों में आज तक लतियाया जा रहा हूं।

    जोशी जी मुझे लगता है गलती यह है कि हम हिंदी की बात करते हैं दरअसल बात हिंदी की नहीं है भारतीय भाषाओं की भी नहीं है, बात है भारत की, हिंदुस्तान की है जिसका झंडा ही रह गया है जो चुटकले की भाषा में अंग्रेजों या अंग्रेजी के डंडे में फंसा है। हम अनेक भाषाओं वाला देश हैं और हर भाषा और बोली एक सम्पन्न सांस्कृतिक विरासत की वाहक है। परंतु हमें अपनी किसी भी बात के लिए कोई स्वागभिमान नहीं है। इतिहास गवाह है हमने कभी कुछ जीतना नहीं चाहा। लोग आते रहे हमें जीतते रहे, हम पर राज करते रहे। जीतना तो बड़ी बात है हमने कभी कुछ सहेजने की भी कोशिश नहीं की। यह तो हमें विरासत में इतना मिला है कि इतना लूटे जाने के बाद अब भी बहुत बाकी है। पर अब नहीं बचेगा इस बार हमला राजनीतिक नहीं सांस्कृतिक है और शिक्षा पर है। निशाने पर अगली पीढ़ियां हैं और हम मानसिक रूप से पराजित हो चुके हैं।

    चूंकि हमला शिक्षा पर है तो जवाब भी वहीं से देना होगा। प्रा‍थमिक शिक्षा तक से बेदखल हो चुकी हिंदी और भारतीय भाषाओं को कम से कम एक विषय के रूप में पढ़ना अनिवार्य होना चाहिए। आरटीई का भी दुरपयोग हो रहा है क्योंूकि शिक्षा के अधिकार पर बात हो रही है पर शिक्षा कैसी हो इस पर कोई बात नहीं है और ना ही शिक्षा में समानता की बात हो रही है। शिक्षा के नाम पर अंग्रेजी और सांमतबाद थोपा जा रहा है। कहीं कोई प्रतिरोध नहीं है। विदेशी शिक्षा बोर्डों की क्याा जरूरत है, जो हमारे पाठयक्रमों से खेल रहे हैं हमारी भाषाओं को पढ़ाने से बचने के लिए कानूनी लड़ाईयां तक लड़ रहे हैं।

    आप सोच रहे होंगे बात हिंदी की हो रही है और मैं स्कूलों और शिक्षा का रोना रो रहा हूं। मुझे लगता है गाय-भैंस होंगी तो दूध भी होगा, छाछ, मक्खन, घी के साथ-साथ पनीर,चीज, खोआ भी बनाया जा सकता है। इसी तरह जब हम हिंदी में काम करने लगेंगे तो इस तरह के आदेश फाईलों में भी नहीं टिक पाएंगे।

    तब तक राम ही जाने, अल्ला ही मालिक है।

    कुशल कुमार

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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