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हिन्दी पर सरकारी हमले का आखिरी हथौड़ा


हिन्दी पर सरकारी हमले का आखिरी हथौड़ा 



गृह मंत्रालय के एक नए आदेश के अनुसार अब से सरकारी कार्यालयों में कामकाज में कामकाज राजभाषा हिन्दी की अपेक्षा हिंगलिश में किया जा सकेगा।  चिदम्बरम के विश्वबैंक के एजेंडा का सच। सरकार ने हिन्दी पर आखिरी हथौड़ा चला दिया है, हमला बोल दिया है। 


यदि आप हिन्दी से प्रेम करते हैं तो देश-भर में अपने अपने तरीके से इस आदेश के विरुद्ध आंदोलन चलाएँ और  इस आदेश की होली जलाएँ, विरोध की हिम्मत दिखाएँ। 


नीचे, प्रभु जोशी जी के सौजन्य से प्राप्त, आदेश की मूल प्रति --


Policy Sep 11
हिन्दी पर सरकारी हमले का आखिरी हथौड़ा हिन्दी पर सरकारी हमले का आखिरी हथौड़ा Reviewed by Kavita Vachaknavee on Saturday, October 15, 2011 Rating: 5

45 comments:

  1. अब चिन्दम्बरम और सिब्बल से और क्या उम्मीद की जा सकती है।

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  2. ऊपर के शासनादेश में बिन्दु-६ के अंतर्गत जो आधुनिक हिंदी के उदाहरण तथाकथित हिंदी पत्रिकाओं से दिये गये हैं वे स्तब्ध करने वाले हैं। यह मूर्खों और अज्ञानियों की अधकचरी जानकारी को महिमामंडित करने का कुत्सित प्रयास है।

    चिदंबरम सरीखे दक्खिनी मानसिकता वाले हिंदी के प्रति कैसा नजरिया रखते हैं यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है।

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  3. ऐसा लग रहा है कि हिन्दी भाषा के आखिरी दिन आ गये हैं और ये दखिनी लोग अंग्रेजियत थोप कर ही रहेंगे। खुद अपनी भाषा का सम्मान करते हैं और हिन्दी भाषा के साथ खिलवाड़ ।

    हम इसकी विरोध करते हैं।

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  4. इस आदेश में 'प्रधानमंत्री' के विचारों का क्या महत्व है? कब से वे हिन्दी के शुभचिंतक और भाषाशास्त्री हो गए? वे अर्थशाशास्त्र की कुछ पढाई किये हैं किन्तु भारत की महंगाई पर जब कुछ पूछा जाता है तो वे कहते हैं कि 'मैं कोई ज्योतिषी नहीं हूँ'. भैया, जब देश की भीषण महंगाई पर आपका 'ज्ञान' काम नहीं आ रहा है तो हिन्दी के लिए वह कैसे उपयोगी होगा? आप तो सदा अंग्रेजी में ही 'रोते हुए' दिखते हैं!

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  5. Jitendra Kumar wrote -


    प्रजातन्त्र में संसदीय शासन पद्धति की यह विशेषता ही है कि इसमें व्यक्तियों की कुछ संख्या ही महत्त्वपूर्ण होती है । यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि संसद के लगभग सभी सदस्य स्वभाव से गैर जिम्मेदार होते हैं या फ़िर जिम्मेदारी नाम की कोई वस्तु वहां होती ही नहीं । कोई भी सच को स्वीकार करने का साहस नहीं रखता । संभवतः इसमें प्रमुख कारण सच स्वीकार करने वाले व्यक्ति को हमेशा मूर्ख माना जाता है , वह हास्य का पात्र बनता है और फ़िर उसे रजनीति को खराब करने की अनुमति नहीं दी जाती । मानव स्वभाव के जानकार व्यक्ति यह भी जानते हैं कि कोई भी व्यक्ति अपने को मूर्ख कहलाना पसन्द नहीं करता , जब कि अनेक क्षेत्रों में ईमानदारी को मूर्खता का पर्याय ही माना जाता है । राजनीति का खेल ही इतना अजीब है कि यदि इसमें स्वभाव से ईमानदार व्यक्ति आ जाये और संसद के लिये चुना लिया जाये , तो वह हालात से मजबूर होकर व्यवहार के उस निम्न स्तर तक पहुंच जाता है ,जहां पर केवल लोगों के विश्वास को धोखा दिया जाता है

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  6. Smt. ajit gupta wrote (E-mail)-

    दुखद प्रकरण है।


    smt. ajit gupta
    7 charak marg udaipur

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  7. विनोद शर्मा ( टेक्नीकल हिन्दी समूह पर )-

    बड़े आश्चर्य की बात है कि इस आदेश का इस मंच पर गर्मजोशी से स्वागत किया गया है, किंतु कविताजी इसे आखिरी हथौड़ा बता रही हैं।
    जब इस आदेश का स्वागत किया जा रहा था तो कुछ अल्पसंख्यक मूक दर्शक बन कर बैठे थे। अब कविताजी इसे हथौड़ा और हमला बताने
    पर विद्वद्जनों की क्या राय है, यह काबिले गौर होगा।

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  8. एम सी गुप्ता ख़लिश का ईमेल ( हिंदीभारत समूह पर )-



    आज १५-१०-२०११ को इसे एक हथौड़ा एवं निंदनीय प्रकरण बतानेव वाले क्या कृपया निम्नलिखित प्रश्नों का "सिलसिलेवार" (अर्थात हर प्रश्न का पृथक उत्तर) देने की ज़हमत उठाएंगे?


    १--इसी संदर्भ में १३-१०-२०११ को मेरे द्वारा अनिल जनविजय जी के अनुरोध पर भेजे गए उत्तर पर आज लिखने वालों ने प्रतिक्रिया देना क्यों ज़रूरी न समझा?

    अब भी दे सकते हैं. अनिल जी का मूल पत्र और मेरा उत्तर नीचे दिए गए हैं--


    प्रश्न--इस ख़बर के बारे में क्या कहना है आपको ?

    *******

    उत्तर--

    मुझे यह कहना है कि:

    सचाई छिप नहीं सकती बनावट के असूलों से
    खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज़ के फूलों से.


    सचाई यह है कि सब हिंदी प्रेमी हिंदी से प्रेम तो करते हैं किंतु प्राय: अन्य सभी भाषाओं से द्वेष सा रखते हैं और उन्हें प्रतिस्पर्धी के रूप में देखते हैं, सहयोगी के रूप में नहीं. हिंदू संस्कृति की सहिष्णुता--टोलेरेंस--की दुहाई देते नहीं थकते मगर चाहते हैं सवा अरब लोग हिंदी बोलें और लिखें और वह भी शुद्ध. भला क्यों? यदि सर्व-धर्म-सम-भाव में इतने गुण दिखते हैं तो सर्व-भाषा-सम-भाव में क्यों नहीं?

    संदर्भित लिंक का अर्थ मूलत: क्या है? यही न कि सब बाबू देवनागरी में लिखने का प्रयत्न करें किंतु कुछ शब्दों का हिंदी पर्याय न मालूम हो तो देवनागरी में अंग्रेज़ी-उर्दू आदि का प्रचलित रूप ही लिख दें!

    यह एक सचाई को स्वीकारने वाला कदम है जो बहुत देर से आया है मगर इसका स्वागत है.

    --ख़लिश

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  9. 2011/10/15 भाई भोपाली wrote -


    इस मंच पर तो यह खबर पहली बार आई है। अलबत्ता शब्द चर्चा मंच पर ज़रूर कुछ लोगों ने इसका स्वागत किया था।

    मुझे इसमें काबिले-एतराज अर्थात इसमें भर्त्सना जैसी कोई बात नज़र नहीं आती। मेरे विचार वही हैं जो शब्दचर्चा मंच पर थे।
    तथाकथित कठिन और नकली हिन्दी को ही जब साठ सालों में लागू नहीं किया जा सका तो राजभाषा का स्वरूप बदले जाने पर हाय तौबा कैसी? राजभाषा का मौजूदा स्वरूप तो
    उसे आम आदमी से पूरी तरह जोड़ने में नाकामयाब रहा है। राजभाषा के नाम पर काम करने वालों ने

    अलबत्ता हिन्दी के किन्ही प्रकाशनों के उदाहरणों को जिस तरह से अपनी बात के समर्थन में पेश किया गया है, वह गैरज़रूरी है। वैसी हिन्दी नासमझी में कतिपय प्रकाशनों ने कुछ अर्सा पहले युवाओं को आकर्षित करने के लिए चलाई थी। वह कृत्रिम प्रयास था। वे प्रकाशन भी अब उस रास्ते से दूर होते जा रहे हैं। युवाओं ने खुद उसका मखौल उड़ाया। यह व्यावहारिक भी नहीं है। शायद सरकारी तौर पर यह बताने की कोशिश की गई है कि ऐसी हिन्दी भी लिखी जा रही है।

    हाँ, यंत्र के लिए मशीन और दूरभाष की जगह टेलीफोन, कुंजीपटल के लिए कीबोर्ड जैसे बर्ताव तो अरसे से प्रचलित हैं।

    यह व्यावहारिक कदम है। बाकी यह किसी की धारणा या राय से विरोध का मामला नहीं है।

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  10. Anuradha R. लिखती हैं -

    भाषा में 'फ्लेक्सिबिलिटी' न हो तो वह धीरे-धीरे कमजोर हो जाती है। उसे समय और माहौल के साथ बदलना ही होगा। और जो उदाहरण उक्स आदेश में दिए गए हैं, वे हिंदी में ही काम करने-सोचने वालों को अखर सकते हैं, (जो कि इस लेख में भी दिखता है) लेकिन उनके बारे में सोचें, जो इससे बेहतर हिंदी नहीं जानते या जिनकी आदत में नहीं है। बजाए इसके कि उन्हें यह हिंदी इस्तेमाल करने का भी विरोध किया जाए, उन्हें यहां तक तो पहुंचने दिया जाए। इसके आगे यह संभावना भी तो बनती है कि वे ज्यादा-से ज्यादा हिंदी क्रमशः इस्केमाल करने लगेंगे। वरना, यदि यहीं लोगों को रोक दिया गया तो उस संभावना का भी अंत हो जाएगा।
    -अनुराधा

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  11. सरकारी कड़ी उस आदेश के लिए- http://rajbhasha.nic.in/policy26sep11.pdf

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  12. हाँ, उदारता के सारे कानून केवल हिन्दी के लिए होने चाहिए! जितने महान लोग हैं जिन्हें, भाषा की फ्लेक्सिबिलिटी की चिन्ता है, वे अंग्रेजी में लिखते समय कितने प्रतिशत हिन्दी लिखने को तैयार हैं? यह सवाल होगा अन्तिम तीनों टिप्पणीकारों से। आगे कुछ कहने का मतलब होगा एक विवाद। इसलिए विराम…यहाँ पहुँचा रवि रतलामी साहब के यहाँ से…

    ReplyDelete
  13. एक सवाल और है कि क्या किसी अन्य देश ने इतनी चिन्ता की है जितनी भारत के महाबुद्धिमान मंत्रियों ने…?

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  14. भाई भोपाली (अजित वडनेरकर) पुनः लिखते हैं -


    अनुराधाजी से सहमत ।
    उन्होंने एक और आयाम को सकारात्मकता के साथ
    उभारा है।

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  15. Madhusudan H Jhaveri ✆ mjhaveri@umassd.edu Wrote


    मेरे विचार में
    =====>

    (१) वास्तव में ऐसा हथोड़ा कोई अंग्रेज़ी पर मारने की बात क्यों नहीं करता?
    स्वतंन्त्र भारत में वह अधिक उचित माना जाता।
    आप क्या सोचते हैं?

    (२) मैं मानता हूँ, कि,हिन्दी में, गलतियां होनेपर उन्हें स्वीकारना एक अलग बात है। और गलतियों को ही सही मान लेना दूसरी।
    इसके लिए कोई अधिकृत स्वीकार पत्र देने की ज़रूरत आपको कैसे लगती है?

    (३)अशुद्ध हिन्दी का प्रयोग तो किसी प्रमाण पत्र बिना भी हो रहा है।

    (४) ऐसे प्रयोगसे, कहीं अर्थ का अनर्थ भी हो सकता है।
    इसके कुछ उदाहरण आप निश्चित ही,सोच सकते हैं।

    (५) अल्प विराम का शब्दों के आगे या पीछे होना भी, या ना होना भी अलग अलग अर्थ व्यक्त कर सकता है।
    अभी, अभी (शब्द चर्चा) समूह पर इस की दीर्घ चर्चा भी हुयी, और अर्थान्तर के उदाहरण भी दिए गए।

    मैं मानता हूँ, कि बिना किसी निर्देश भी अशुद्धियां तो रहेगी ही।

    (६) आज भी मुम्बई, हैदराबाद, अहमदाबाद, बंगळूर, तमिलनाडु इत्यादि जगहों पर अलग अलग हिन्दी तो बोली जाती ही है। कोई उन्हें रोकता थोडी है।

    विचारार्थ प्रस्तुत।

    डॉ. मधुसूदन झवेरी
    University of Massachusetts
    (Ph D.--Structural Engineering)

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  16. अनुनाद सिंह पुनः लिखते हैं -

    इस आदेश पर शंका करने के अनेक कारण हैं. आज के 'नई दुनिया' और कुछ अन्य अखबारों ने इसे अनावश्यक बताया है.

    भारत में हिन्दी आज भी लोकप्रिय है; 'सरकारी हिंदी' के समय भी लोकप्रिय थी; स्वतंत्रता संग्राम के समय भी थी; केशवचन्द्र सेन और स्वामी दयानन्द सरस्वती के समय भी यही 'राष्ट्रभाषा' थी; उस समय भी जब भारत में अंग्रेज अपनी जड़ें जमा रहे थे तथा उसके पूर्व भी जब यूरोपीय पादरी 'देसी व्याकरण' लिखना आरम्भ किये थे. यह कहना सही नहीं है कि 'हिंगलिश' के कारण इसे अप्रत्याशित लोकप्रियता मिल रही है.

    वस्तुतः अनुवाद को सरल और सुबोध बनाने के लिए कई बातों का ध्यान रखना पड़ता है- छोटे वाक्य, भावानुवाद, लक्ष्य-भाषा की प्रकृति के अनुसार अनुवाद, पहली बार आने वाले कठिन शब्दों या पारिभाषिक शब्दों के वैकल्पिक शब्द कोष्टक में देना आदि. इनमें से किसी भी बात पर जोर न देकर केवल अंग्रेजी शब्दों का हिन्दी में उपयोग करने की 'विशेष सिफारिस' करना शंका को जन्म दे रहा है.

    अंग्रेजी के फैशन में आजकल 'पैरेंट्स' , 'स्टुडेंट्स' , 'सन्डे' , 'वेजिटेबल' , 'ऐपल' , 'काऊ' , 'टाइम' और ऐसे ही हजारों सरल हिन्दी शब्दों के स्थान पर अंग्रेजी शब्दों का 'सप्रयास' उपयोग किया जा रहा है. क्या अब इन्हें हिन्दी शब्द मानकर लिखित हिन्दी में उपयोग करने को वैध घोषित किया जा सकता है?

    यदि इस आदेश का उद्देश्य पवित्र होता तो इसके साथ सौ-दो सौ 'कठिन शब्दों' की सूची दी गयी होती और कहा गया होता कि कि इन शब्दों को हिन्दी में प्रयोग करते समय इनके हिन्दी समतुल्य के साथ कोष्टक में उनके अंग्रेजी समतुल्य शब्द भी लिखें (केवल पहली बार आने पर, हर बार नहीं ) . इसके साथ यह भी कहा गया होता कि इस बात का विशेष ध्यान हो कि सरल हिन्दी शब्द कभी भी अंग्रेजी शब्दों से प्रतिस्थापित न किये जांय.

    आश्चर्य की बात यह है कि सारी दुनिया अंग्रेजी को कठिन मानती है. विकिपीडिया ने 'अंग्रेजी' के साथ 'सिंपल इंग्लिश' की विकी भी बनायी है. यूके, अमेरिका और कनाडा में 'सिंपल इंग्लिश' के लिए लगभग एक शताब्दी से आन्दोलन चला रहे हैं. किन्तु 'भारतीय अंग्रेजी' को सरल करने की कोई पहल नहीं की जा रही । यदि अमेरिका की अपनी अंग्रेजी हो सकती है, तो भारत की क्यों नहीं?

    -- अनुनाद

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  17. Vinod Sharma ✆ vinodjisharma@gmail.com Wrote -


    अनुनाद जी की बात से सहमत।

    विश्वबैंक का एजेंडा चिदंबरम के माध्यम से लागू किया जा रहा है।
    अगर विकल्पों का तलाश ही करनी है तो पहले स्थानीय, देशज, प्रांतज शब्दों में की जानी चाहिएँ।

    अंग्रेजी भाषा की बजाय भारतीय भाषाओं से विकल्प लिए जाने चाहिएँ। गृह मंत्रालय के स्तर पर ऐसा निदेश जारी होना निश्चय ही अंग्रेजी की जड़ों को मजबूत करने का प्रच्छन्न प्रयास है।

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  18. ePandit ई-पण्डित ✆ लिखते हैं -

    जरा आइ नैक्स्ट में छपने वाली हिंग्लिश पर नजर डालें।

    http://epandit.shrish.in/471/epandit-tools-in-inext-live/

    यह सरकारी आदेश इस तरह की भाषा का रास्ता साफ कर रहा है। अन्तर्जाल को इंटरनेट लिखने पर किसे आपत्ति है लेकिन अन्य/दूसरे को अदर, अलग को डिफरेंट लिखना केवल मानसिक गुलामी की निशानी है जिससे अन्ततः भाषा की सुन्दरता बिगड़ती है।

    ReplyDelete
  19. अनुनाद सिंह पुनः उत्तर में लिखते हैं -

    ज़रा सोचिये कि भारत सरकार निर्णय ले कि सरकारी कामकाज में जो अंग्रेजी प्रयुक्त होगी वह 'सिंपल इंग्लिश' या 'बेसिक इंग्लिश' या 'प्लेन इंग्लिश' होगी तो देश का कितना भला हो? भारत की सभी प्रतियोगिता परीक्षाओं में जहां अंग्रेजी ज्ञान 'आवश्यक' समझा जाता है, उसमे 'सरल अंग्रेजी' के ज्ञान की परीक्षा हो, न कि 'क्वीन्स इंग्लिश' की तो आम जनता का कितना भला हो और कोई काम भी न बिगड़े।

    अंग्रेजी व्याकरण और 'कामन एरर्स' क्यों पूछे जाते हैं, आम जनता तो सामान्यतः गलत व्याकरण ही जानती और प्रयोग करती है. उसी 'देसी व्याकरण' को मान्यता दी जाय और उसे ही तरह-तरह से बढ़ावा दिया जाय. सरकारी आदेश निकले कि अंग्रेजी में भारत की विभिन्न भाषाओँ के शब्दों का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाय. ऐसा करने वालों को पुरस्कृत भी किया जाय तो देश को बिना मेहनत के भारी लाभ हो जाएगा.

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  20. भाई भोपाली ✆ (अजित वडनेरकर) पुनः -

    अनुनादजी की बात से भी सौ फीसद सहमत।
    एकदम वाजिब बात।
    हम तो अंग्रेजी के ही खिलाफ़ हैं।
    अर्थात नौकरियों में अंग्रेजी को योग्यता मानना।
    अंग्रेजी का सहज ज्ञान वैसे भी लोगों को संचार माध्यमों से खुद ब खुद हो ही रहा है।

    अंग्रेजी थोपना गलत है।

    ReplyDelete
  21. ePandit | ई-पण्डित ✆ -

    अनुनाद जी से सहमत,

    आखिर कब तक हमारे बच्चे अपनी एक चौथाई जिन्दगी कठिन अंग्रेजी रटते हुये गुजारेंगे। सिम्पल अंग्रेजी का प्रचार होना चाहिये तथा उसमें हिन्दी सहित अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों को स्थान देकर भारतीय अंग्रेजी के रूप में प्रतिष्ठित, स्वीकृत किया जाना चाहिये। जब हिन्दी में अंग्रेजी के शब्द लिये जा सकते हैं तो अंग्रेजी में हिन्दी के क्यों नहीं।

    ReplyDelete
  22. Reply
    Hariraam ✆ -


    बिल्कुल सही बात कही है। अंग्रेजी के ऐसे ही प्रयोग को सरकारी मान्यता मिलनी चाहिए।

    -- हरिराम

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  23. पुनः Anuradha R. ✆ wrote -

    लेकिन इस बाजार और 'खुली अर्थव्यवस्था' का क्या करेंगे! 'विश्व के साथ कदम मिलाना', 'तरक्की' इत्यादि सरकारी लक्ष्यों का क्या होगा अगर सरकार ऐसे आदेश जारी कर दे! इस उलझन को सिरे से सुलझाने की जरूरत है। कैसे होगा?
    -अनुराधा

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  24. भाई भोपाली (अजित वडनेरकर) wrote -

    जब इस अंग्रेजी को भी मान्यता मिल जाएगी, लोग अपने आप कदम से कदम मिला कर चल सकने वाली अंग्रेजी से भी परिचित हो जाएंगे। तथाकथित सरल अंग्रेजी का प्रयोग उसी तरह होगा जैसे मालवी, भोजपुरी, अवधी क्षेत्र का पढ़ा लिखा आदमी अपनों से इन्हीं बोलियों में बात करता है। हालाँकि सामान्य तोर पर वह रोज़ खड़ीबोली का इस्तेमाल करता है।

    ग़लत अंग्रेजी बोलने से न बोलना बेहतर है। और इस मजबूरी में बाबूसाब बनने से चपरासी बनना ठीक। ऐसी स्थिति तब नहीं आएगी। ग़लत अंग्रेजी को तब सरल अंग्रेजी का रुतबा मिल जाएगा। गलत बोलने वाला अपराधबोध से ग्रस्त न होगा।

    ...आह कितना हसीन ख्वाब दिखाया है अनुनादजी आपने। वाक़ई। कल्पना करने में आनंद आ रहा है कि जस हिन्दी के साथ ग़रीब की जोरू, सबकी भाभी जैसा बर्ताव जब तब देखते रहते हैं और उसे वैधानिक भी होते देख रहे हैं। अगर अंग्रेजी के साथ भी वैसा कुछ हो तो जीवन बहुत आसान हो जाए।

    आखिर आसानी के नाम पर ही तो सब हो रहा है।

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  25. डॉ. ओम विकास जी की प्रतिक्रिया -

    कविता जी,

    आपकी चिंता सत्य है। लेकिन यह राय तो हिन्दी संस्थाओं के शिखर पर बैठे विद्वानों के द्वारा समय समय पर व्यक्त किए गए विचारों के अनुकूल है।

    सरकार में फाइल पूरी करने के बाद ही ऐसा आदेश निकाला जाता है।
    आप उनकी प्रतिक्रिया ले लें, और उसे सरकार को भेज सकती हैं। तभी बदल/संशोधन सम्भव है।

    सहचिंतक ........ ओम

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  26. From: निरवधि सीमा <......@gmail.com>
    To: Kapil Sibal ;

    Dear Mr. Sibal,

    Namaste| This is regarding your controversial decision to intentionally dismantle the use of Devnagri numerals and enforce English numerals in Indian schools and colleges, which has come as an utmost shock and caused grave distress to me and my family. I came to know about your ill-advised proposal through an article "Devanagari numbers thrown out by ministry" which has appeared in The Sunday Guardian. I have attached the PDF of the aforementioned article to this email.

    Mr. Sibal, we are appalled by the actions of your Ministry which is rather than focusing on researching about our rich past and heritage, is instead busy in disinheriting whatever is left of our oldest civilization and its essence. Even other Ministries in this Government have similar attitude. On ९ August, २००८, then Finance Minister P Chidambaram asked college graduates to give importance to English over Hindi. Such misplaced priorities of our Government is of grave concern for us Indian people. In the blind pursuit of fictitious modernity, how can we as a nation afford to divest our tens of thousands of years old language and its attributes. As if global misappropriation of Roman Numerals as derivation of "Arabic Numeral" rather than "Devnagri Numerals" is not enough, that now MHRD wants to also deny the pride and knowledge of writing in Devnagri to our current and future generations. We, the Bharatvaasis, are proud of our Unity in Diversity including different languages. But we should never forget that if there is one common thread that ties most of the Indian languages, it is Devnagri Lipi and Sanskrit. Irrespective of what region, religion or caste we come from, Sanskrit is considered the mother of almost all languages. Sanskrit and Devnagri have been for over २०००० years the common sutradhaar that has brought Indian people together. Understandably, this does not deny the fact that all languages are still equally important.

    (पत्र के शेष भाग को अगली टिप्पणी में पढ़ें )

    ReplyDelete
  27. Your injudicious action to "throw out" Devnagri numerals stands in complete contradiction to what our great Republic's Founding Fathers stood for when they wrote our constitution. I am attaching to this email as an exhibit the debate by the Constituent Assembly of India (Volume ९) on १४ September, १९४९ about the use of Hindi and, specifically, Devnagri numerals in the government and as medium of instruction in schools. Following are the excerpts from the "Directive Principles" adopted by the Assembly:
    It shall be the duty of the Union to promote the spread of Hindi and to develop the language so as to serve as a medium of expression for all the elements of the composite culture of India and to secure its enrichment by assimilating the forms, style and expressions used in the other languages of India and drawing wherever necessary or desirable for its vocabulary primarily on Sanskrit.
    It shall be the duty of the Union to promote the use, of the Devanagari script throughout the territory of India.
    It shall also be the duty of the Union to promote the study of Sanskrit throughout the territory of 'India as it is the source of most of the other languages in India.'


    ( शेष भाग अगली टिप्पणी में पढ़ें )

    ---

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  28. The whole world from China to Italy, from Japan to Mexico takes pride in home grown indigenous languages. And each country gives primary importance to their own language, unfortunately except Bharat. When Israel was founded, the first thing they did was to start a University for promotion of Hebrew. Just look at २००८ Olympics in China. At the opening ceremony, the Chinese Premier spoke in Chinese, their countdown was in Chinese numeral characters, they displayed only Chinese culture during the first २ out of ३ hours ceremony, and even their public service messages including the motto "One world, One dream" were in Chinese. An interesting fact, which allot of us don't even know, is that unlike aboriginal languages and Devnagri Lipi from Indian Sub-Continent, Chinese and most East Asian languages in their traditional form don't even have indigenous linguistic numeral characters. This is precisely why East Asians have to use Roman numerals, for example on Korean language based TV shows, Airports, and Stock markets. Despite the fact that Chinese didn't inherit any autochthonous numerals, still they created their own numeral characters based on their scripts when they reformed traditional Chinese language. China has been aggressively promoting the use of their own numeral system as evident from its use during the Olympic countdown. This is how much they primarily love their language and thereafter use English as secondary tool to take over the world.

    (शेष भाग अगली टिप्पणी में पढ़ें )

    ReplyDelete
  29. But unfortunately, your Ministry and Government of India is doing the opposite by desisting and discouraging the use of Devnagri numerals, instead of censoring the use of misnomers like Arabic numerals. Especially when there has been extensive research and subsequently countless BBC documentaries (http://www.open2.net/whattheancients/indians.html) which prove that Arabs never invented the number system, rather, infact, Persians learnt these from Bharatiya people, morphed them into Arabic script for themselves, and British misattributed them as Arabic numerals because British came in contact with Persians-Arabs first.

    Please see for yourself,
    Devnagri: ० १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९
    Roman: 0 1 2 3 4 5 6 7 8 9
    Arabic: ۰ ۱ ۲ ۳ ۴ ۵ ۶ ۷ ۸ ۹

    I can bet you that even a second grader can tell you just by looking at aforementioned numerals as to what number system stands a higher chance of being evolved out of another. But unfortunately it is still incorrectly taught in NCERT books. Mr. Sibal, our objection today is not based on some triviality of one language versus the other. This is not about anti-English sentiment because we are all mature enough to realize that it is not a zero sum game i.e. pro-Devnagri is NOT equal to anti-English. It is only about giving the most ancient language and script (Devnagri Lipi) in the world its rightful place of honour in its country of origin. The argument that no one uses these numerals these days does not stand because when the Government itself is choosing not to follow what our Founding Fathers stood for and use these numerals in its day to day correspondence, and MHRD does not encourage students to use them, then why will the people use these indigenous numerals. As an Indian, it is so embarrassing to watch the so called Hindi News channels which don't even use Devnagri numerals and still have an audacity to call themselves "the best Hindi channel". The Government of India and MHRD have a constitutional duty to encourage and, if necessary, enforce people to use Devnagri numerals.

    Sanskrit is deemed to be the language of future for futuristic computers by no less than NASA. Please read this eye-opening articlehttp://www.vedicsciences.net/articles/sanskrit-nasa.html. Bharat is one of the oldest and richest civilizations in the world. It is home to the world's first planned cities, where every house had its own bathroom and toilet five thousand years ago. The Ancient Indians have not only given us yoga, meditation and complementary medicines, but they have furthered our knowledge of science, maths - and invented Chaturanga, which became the game of chess. According to Albert Einstein, they "taught us how to count", as they invented the numbers 1-9 and 'zero', without which there would be no computers or digital age. Unfairly we call this system of counting Arabic numbers - a misplaced credit. Two thousand years ago the Indians pioneered plastic surgery, reconstructing the noses and ears on the faces of people who had been disfigured through punishment or warfare. They performed eye operations such as cataract removal and invented inoculation to protect their population from Smallpox, saving thousands of lives.

    (शेष भाग अगली टिप्पणी में पढ़ें )

    ---

    ReplyDelete
  30. Before I finish this letter, I would like to remind you that one cannot build strong proud future by discounting and dismantling ones rich heritage. Devnagri is the soul of India, please don't scorn on it. Shri Panini ji gave us this great language & its grammar, Maharishi Shri Ved Vyas ji, also known as Father of Ancient India, used it to give us our great scriptures, and our Republic's Founding Fathers reinforced our nation's faith in preservation and promotion of the use of Devnagri numerals. Its our humble request to you that please do not deny our future generations the benefits and knowledge of this ancient heritage, which may be old but is still as advanced as any other modern science known to mankind. Please continue with the use of Devnagri numerals in our Education system and revise that imprudent proposal of your Ministry.

    Seema

    ReplyDelete
  31. MRAPSC@gmail.com Wrote -

    Solid proof of existence of Foreign controlled Government.


    The Chinese government has taken measures to stop spread of Chinglish and has so many think tanks working day in and day out to create new and scientific words in Chinese (a language which still in Primitive Form); but on the other hand the British Controlled Congress Party ruling in Bharat is going the other way. Plan is to divide Bharat into several different countries by slowly decreasing the loyalty of Bharatiyas toward Bharat making them confused and thus motivating them towards Hinglish- That's what the Pope sitting in Vatican also wants; besides many debt ridden Western Nations. Then who'll ask for the LOOT of 400 Lakh Crore Rupees. http://www.breakingindia.com/

    Ask any English/ Convent educated kid about DeshBhakti (Loyalty towards Nation) and he will say who cares, Bharat/ India is not for him. He is supposed to serve his masters in Western nations and then he tries his best to satisfy his desire by any hook and crook betraying his Motherland in the end.

    These intellectual idiots don't even realise as they are debarred to know their heritage and culture because of lack of love for the Mother Tongue; that Bharat is still the Most Powerful and Best Country to live, minus crime- corruption-pollution, by God's Divine Grace.

    i) No where you get such Opulent sunshine (Ask any European/ American)
    ii) Opulent Vegetation (Ask Russians/ Japanese/ Chinese, etc)
    iii) Opulent Diversity (Ask Mid-Eastern)
    iv) Ultra-Intellectuals (nowadays they are made to become psuedo intellectuals or, intellectual idiots)
    etc etc.

    This "NEGATIVE PROGRAMMING" OF OUR YOUTH BY WESTERN NATIONS CAN ONLY BE STOPPED IF WE HAVE OUR OWN DESHBHAKT PEOPLE AS RULERS.

    Regards.

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  32. मेरी जानकारी में कपिल सिब्बल को हिन्दी तो समझ आती ही है। अब इतना बड़ा अंग्रेजी पत्र?…चाहे जो हो, इस देश के महामानवों को अंग्रेजी छोड़ना नहीं है, अब बहाना चाहे सरल अंग्रेजी का हो चाहे किसी किस्म की अंग्रेजी का। …आई नेक्स्ट अखबार अगर देखें तो उसमें शीर्षक रोमन में लिखे जाते हैं, रोमन में ही नहीं अंग्रेजी में भी। मेरा दावा है कि एक दिन के आई-नेक्स्ट को (जिस दिन का मन हो, चुन लीजिए), अगर छपने वाले राज्य के दस प्रतिशत लोग पूरा समझा दें, तो कल से मैं अंग्रेजी को स्वीकार लूंगा। कड़ियाँ देना अच्छा नहीं माना जाता शायद, लेकिन http://tewaronline.com/?p=1694 देखा जाय…बेहतर होगा कि हम इस विषय पर बहस न करें।

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  33. Indian rupee symbol Mix Roman "R" and Hindi "RA"--It is clear Violation of ..
    The article 351 constitution of india.
    ” Directive for development of the Hindi language It shall be the duty of the Union to promote the spread of the Hindi language, to develop it so that it may serve as a medium of expression for all the elements of the composite culture of India and to secure its enrichment by assimilating without interfering with its genius, the forms, style and expressions used in Hindustani and in the other languages of India specified in the Eighth Schedule, and by drawing, wherever necessary or desirable, for its vocabulary, primarily on Sanskrit and secondarily on other languages PART XVIII EMERGENCY PROVISIONS”

    2- Vedio confrence vedeo Smt Ambika soni explaned symbol.(Last Question carefully see soni reply given media query ).
    http://www.youtube.com/watch?v=h8Bnq2pDQG4

    Other News Source link.

    http://www.saveindianrupeesymbol.org/

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  34. अब हमें अपनी हिन्दी शुरू करनी पड़ेगी, माद...चो.. चिद्दू, सिब्बल, सा...

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  35. देश के गद्दारों को (चिद्दू, कुटिल, मंदमोहन, एंटोनिया)
    जूते मारो सालों को

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  36. अनुराधा आर. लिखती हैं -


    "सरकारी हिंदी कोई अलग किस्म की हिंदी नहीं है. यह काफ़ी नहीं है कि लिखने वाला खुद अपनी बात समझ सके कि उसमे क्या लिखा है. ज़रूरी तो यह है कि पढ़ने वाले को समझ में आ जाए कि लिखने वाला क्या कहना चाहता है."

    मुद्दा यही है।
    एक उदाहरण-
    पिछले दिनों एक फाइल एक विभाग के राजभाषा अनुभाग से मंत्रालय भेजी गई। उसमें दो-तीन बार 'आपात उपयोगी व्यवस्था' लिखा गया जिसे एक तमिलभाषी और एक उत्तर भारतीय अधिकारी नहीं समझ पाए और फाइल लटकी रह गई। फिर समझाने के लिए एक राजभाषा अधिकारी को वहां जाना पड़ा। उनका अर्थ था- स्टैंडबाई अरेंजमेंट।
    -अनुराधा

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  37. ई-पंडित लिखते हैं -


    अन्तर्जाल को इंटरनेट, अणु-डाक को ईमेल लिखने पर किसे आपत्ति है लेकिन इस पत्र में दिये गये उदाहरण के अनुसार जागरुकता को अवेयरनेस लिखा जाय, क्षेत्र को एरिया, विद्यार्थी को स्टूडेंट लिखा जाय, यह गलत पॉलिसी है।

    सरकारी स्कूल के बच्चे भी जागरुकता का अर्थ समझ लेंगे लेकिन अवेयरनेस का नहीं।

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  38. Vinod Sharma ✆ vinodjisharma@gmail.com लिखते हैं -

    इसी अपमिश्रण से तो हिंदी प्रेमी दुखी हैं। भाषा सरल हो, सबकी समझ में आसानी से आए तभी देश में चतुर्दिश इसकी ग्राह्यता बढ़ सकेगी। अतः भाषा को सरल और सुगम बनाने के प्रयासों के प्रति शायद ही किसी का कोई विरोध होगा। तकलीफ वहाँ होती है जहाँ आसान/सरल शब्द उपलब्ध और प्रचलित होते हुए भी उनके अंग्रेजी पर्याय जबर्दस्ती हिंदी में ठूँसने की कोशिश की जाती है।

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  39. V S Rawat g ✆ vsrawat@gmail.com लिखते हैं -

    वैसे नए क्वाइन किए शब्दों में हमेशा ये समस्या आनी है। फिर जब उनका प्रयोग प्रचलित हो जाता है तो सब समझने लगते हैं।

    जैसे अनुशंसा। ये रिकमंडेशन के लिए हिंदी शब्द है। मैं कई सालों से इसे अजीब सा पा रहा हूँ कि इसका शाब्दिक अर्थ समझे बिना इसे रट के उपयोग कर रहा हूँ, लेकिन अब यह इतना रट गया है कि अपने आप ज़ुबान पर आ जाता है जबकि मैं इसका अर्थ या संबंध अभी भी नहीं समझता हूँ।

    आकाशवाणी और दूरभाष्य या दूरदर्शन के साथ भी शायद ऐसा ही हुआ होगा जो मुझे पता नहीं है क्योंकि वो मेरे जन्म से पहले क्वाइन कर लिए गए थे।

    इसलिए अंतर्जाल या अणुमेल से घबराने की ज़रूरत नही है। 1-2 साल में ये इतने लोकप्रिय हो जाएँगे कि फिर हिंदी के नैसर्गिक स्वाभाविक शब्द लगेंगे।

    रावत

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  40. वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव लिखते हैं -

    हिन्दी के ताबूत में हिन्दी के ही लोगों ने हिन्दी के ही नाम पर अब तक की सबसे बड़ी सरकारी कील ठोंक दी है। हिन्दी पखवाड़े के अंत में, 26 सितंबर 2011 को तत्कालीन राजभाषा सचिव वीणा ने अपनी सेवानिवृत्ति से चार दिन पहले एक परिपत्र (सर्कुलर) जारी कर के हिन्दी की हत्या की मुहिम की आधिकारिक घोषणा कर दी है। यह हिन्दी को सहज और सुगम बनाने के नाम पर किया गया है। परिपत्र कहता है कि सरकारी कामकाज की हिन्दी बहुत कठिन और दुरूह हो गई है। इसलिए उसमें अंग्रेजी के प्रचलित और लोकप्रिय शब्दों को डाल कर सरल करना बहुत जरूरी है। इस महान फैसले के समर्थन में वीणा जी ने प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली केन्द्रीय हिन्दी समिति से लेकर गृहराज्य मंत्री की मंत्रालयी बैठकों और राजभाषा विभाग द्वारा समय समय पर जारी निर्देशों का सहारा लिया है। यह परिपत्र केन्द्र सरकार के सारे कार्यालयों, निगमों को भेजा गया है इसे अमल में लाने के लिए। यानी कुछ दिनों में हम सरकारी दफ्तरों, कामकाज, पत्राचार की भाषा में इसका प्रभाव देखना शुरु कर देंगे। शायद केन्द्रीय मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के उनके सहायकों और राजभाषा अधिकारियों द्वारा लिखे जाने वाले सरकारी भाषणों में भी हमें यह नई सहज, सरल हिन्दी सुनाई पड़ने लगेगी। फिर यह पाठ्यपुस्तकों में, दूसरी पुस्तकों में, अखबारों, पत्रिकाओं में और कुछ साहित्यिक रचनाओं में भी दिखने लगेगी।

    ( शेष भाग अगली टिप्पणी में पढ़ें )
    .....

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  41. सारे अंग्रेजी अखबारों ने इस हिन्दी को हिन्ग्लिश कहा है। वीणा उपाध्याय के पत्र में इस शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है। उसमें इसे हिन्दी को सुबोध और सुगम बनाना कहा गया है। अंग्रेजी और कई हिन्दी अखबारों ने इस ऐतिहासिक पहल का बड़ा स्वागत किया है। इसे शुद्ध, संस्कृतनिष्ठ, कठिन शब्दों की कैद से हिन्दी की मुक्ति कहा है। तो कैसी है यह नई आजाद सरकारी हिन्दी ? यह ऐसी हिन्दी है जिसमें छात्र, विद्यार्थी, प्रधानाचार्य, विद्यालय, विश्वविद्यालय, यंत्र, अनुच्छेद, मध्यान्ह भोजन, व्यंजन, भंडार, प्रकल्प, चेतना, नियमित, परिसर, छात्रवृत्ति, उच्च शिक्षा जैसे शब्द सरकारी कामकाज की हिन्दी से बाहर कर दिए गए हैं क्योंकि ये राजभाषा विभाग को कठिन और अगम लगते हैं। यह केवल उदाहरण है। परिपत्र में हिन्दी और भारतीय भाषाओं में प्रचलित हो गए अंग्रेजी, अरबी, फारसी और तुर्की शब्दों की बाकायदा सूची दी गई है जैसे टिकट, सिग्नल, स्टेशन, रेल, अदालत, कानून, फौज वगैरह।

    परिपत्र ने अपनी नई समझ के आधार के रूप में किन्ही अनाम हिन्दी पत्रिकाओं में आज कल प्रचलित हिन्दी व्यवहार के कई नमूने भी उद्धृत किए हैं। उन्हें कहा है - हिंदी भाषा की आधुनिक शैली के कुछ उदाहरण। इनमें शामिल हैं प्रोजेक्ट, अवेयरनेस, कैम्पस, एरिया, कालेज, रेगुलर, स्टूडेन्ट, प्रोफेशनल सिंगिंग, इंटरनेशनल बिजनेस, स्ट्रीम, कोर्स, एप्लाई, हायर एजूकेशन, प्रतिभाशाली भारतीय स्टूडेन्ट्स वगैरह। तो ये हैं नई सरकारी हिन्दी की आदर्श आधुनिक शैली।

    परिपत्र अपनी वैचारिक भूमिका भी साफ करता है। वह कहता है कि “किसी भी भाषा के दो रूप होते हैं – साहित्यिक और कामकाज की भाषा। कामकाज की भाषा में साहित्यिक शब्दों के इस्तेमाल से उस भाषा की ओर आम आदमी का रुझान कम हो जाता है और उसके प्रति मानसिक विरोध बढ़ता है। इसलिए हिन्दी की शालीनता और मर्यादा को सुरक्षित रखते हुए उसे सुबोध और सुगम बनाना आज के समय की माँग है।“

    हमारे कई हिन्दी प्रेमी मित्रों को इसमें वैश्वीकरण और अंग्रेजी की पोषक शक्तियों का एक सुविचारित षडयंत्र दिखता है। कई पश्चिमी विद्वानों ने वैश्वीकरण के नाम पर अमेरिका के सांस्कृतिक नवउपनिवेशवाद को बढ़ाने वाली शक्तियों के उन षडयंत्रों के बारे में सविस्तार लिखा है जिसमें प्राचीन और समृद्ध समाजों से धीरे धीरे उनकी भाषाएँ छीन कर उसकी जगह अंग्रेजी को स्थापित किया जाता है। और यों उन समाजों को एक स्मृतिहीन, संस्कारहीन, सांस्कृतिक अनाथ और पराई संस्कृति पर आश्रित समाज बना कर अपना उपनिवेश बना लिया जाता है। अफ्रीकी देशों में यह व्यापक स्तर पर हो चुका है।

    मुझे इसमें यह वैश्विक षडयंत्र नहीं सरकार और प्रशासन में बैठे लोगों का मानसिक दिवालियापन, निर्बुद्धिपन और भाषा की समझ और अपनी हिन्दी से लगाव दोनों का भयानक अभाव दिखता है। यह भी साफ दिखता है कि राजभाषा विभाग के मंत्री और शीर्षस्थ अधिकारी भी न तो देश की राजभाषा की अहमियत और व्यवहार की बारीकियाँ समझते हैं न ही भाषा जैसे बेहद गंभीर, जटिल और महत्वपूर्ण विषय की कोई गहरी और सटीक समझ उनमें है। भाषा और राजभाषा, साहित्यिक और कामकाजी भाषा के बीच एक नकली और मूर्खतापूर्ण विभाजन भी उन्होंने कर दिया है। अभी हम यह नहीं जानते कि किसके आदेश से, किन महान हिन्दी भाषाविदों और विद्वानों से चर्चा करके, किस वैचारिक प्रक्रिया के बाद यह परिपत्र जारी किया गया। अभी तो हम इतना ही जानते हैं कि इस सरकारी मूर्खता का तत्काल व्यापक विरोध करके इसे वापस कराया जाना जरूरी है। यह सारे हिन्दी जगत और देश की हर भाषा के समाज के लिए एक चुनौती है।
    - राहुल

    पुनश्च - यह एक संक्षिप्त, फौरी प्रतिक्रिया है। इसका विस्तार करूँगा जल्द।

    --------------

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  42. परियोजना को प्रोजेक्ट करना न हिन्दी का विकास है न ही सरलीकरण. यह जहर दे कर मारना है.

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  43. यह् कैसा जनतंत्र है कि
    जनता को गूंगा बनाया जा रहा है;
    जनता को रोजी रोटी कमाने के लिये, उसकी‌ भाषा नहीं वरन विदेशी‌ भाषा अनिवार्य रखी गई है;
    जब जनता की भाषा की हत्या करने में कठिनाई आ रही है तब उसे हिंग्लिश नाम का मीठा ज़हर दिया जा रहा है;
    शत्रु जानता है कि भाषा सम्स्कृति की वाहिनी होती है, किन्तु हम नहीं जानते, हम तोउसे केवल रोटी की‌भाषा जानते हैं, क्योंकि हमें इन शासकों ने लूट लूट कर एक तरफ़ गरीब बना दिया है और दूसरी‌ तरफ़ टीवी और क्रिकैट के द्वारा क्षुद्रताओं में फ़ंसा दिया है;
    टीवी के नशे में‌आम जनता कहने लगी‌है कि तिवारी‌जी अब तो इंग्ग्लिश आ गई
    आप् व्यर्थ की लड़ाई लड़ रहे हैं;
    आज से दस वर्ष बाद सिवाय बुढ्ढों के कोई भी न केवल हिन्दी‌ वरन भारतीय भाषाएं जानने वाले युवा नहीं रहेंगे ! जनता क्रीयोल - हिंग्लिश्, बंगिंग्लिश्, टमिंग्लिश - आदि बोलेगी;
    जनता कहती है इस जनत्ंत्र में‌ हम कुछ नहीं कर सकते - वे या तो आर्थिक रूप से इतने गरीब हैं कि उऩ्हें सपने में‌ केवल रोटी दिखती है या इतने सांस्क्ऋतिक रूप से गरीब हैं कि उऩ्हें टीवी, औरत और शराब के अतिरिक्त कुछ नही‌दिखता है।
    इस जनतंत्र में वोट बिकता है
    तब हम कुछ जागृत लोग क्या करें यह अत्यंत विचारणीय है।
    मैं तो बालकों को भारतीय भाषाओं से प्रेम करना सिखला रहा हूं, भारतीय संस्कृति के बीज डाल रहा हूं - केवल कहानियां सुनाकर !
    धन्यवादद

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  44. इसमें एक बात शायद बहुत कम लोगों को ज्ञात होगी कि मैडम को रिटायर होने की जल्‍दबाजी में ऐसा सर्कुलर इश्‍यू करना बहुत जरूरी लगा था, यदि सरकारी आदेशों से भाषा का निर्माण होना होता तो जाने क्‍या हो गया होता

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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