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स्वैच्छिक हिंदी संस्थाएँ (प्रासंगिकता, उपादेयता एवं सीमाएँ)



3 अंकों में समाप्य लंबा आलेख 
पहला भाग 

स्वैच्छिक हिंदी संस्थाएँ 
(प्रासंगिकता, उपादेयता एवं सीमाएँ) 

- प्रो. दिलीप सिंह 




दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास [तमिलनाडु]
पिछले कुछ वर्षों से हिंदी क्षेत्र के कई स्वनामधन्य आधुनिक हिंदी के स्वघोषित स्तंभ जगह-जगह स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं की प्रासंगिकता और उपादेयता पर प्रश्न खडे़ करने लगे हैं। ये वे लोग हैं जिन्होंने हिंदीतर प्रदेशों में हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में अपना कोई योगदान कभी नहीं दिया है। भारत के बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों में बैठकर तथा हिंदी की समितियों में घुसपैठ करके ये अपने आप को हिंदी का स्वयंभू समझने लगे हैं। 





मुझे पूरा यकीन है कि इनमें से किसी को भी यह पता न होगा कि पूरे भारत में हिंदी की कितनी स्वैच्छिक संस्थाएँ हैं या इनकी कितनी शाखाएँ देश के कोने-कोने में कहाँ-कहाँ, क्या-क्या काम कर रही हैं। वे यह भी न जानते होंगे कि हिंदी क्षेत्र के कौन-कौन से लोगों ने गांधी जी की प्रेरणा से दक्षिण, पश्चिम और पूर्वोत्तर भारत में जाकर, वहाँ रह-बस कर हिंदी का कितना और कैसा काम किया है। इन्हें लगता है कि हिंदी साहित्य में विमर्शों की आवाजाही, आलोचकीय दृष्टिकोणों तथा साहित्यिक प्रवृत्तियों पर ये जो बहसें करते आ रहे हैं उनकी शाश्वतता के आगे हिंदी भाषा को संपर्क भाषा के रूप में स्थापित करने वाले प्रयत्न अनावश्यक हैं, अप्रासंगिक हैं - इनकी अब न तो कोई उपादेयता रह गई है और न ही ज़रूरत। 


  राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा [महाराष्ट्र]
उपयोगिता की चर्चा ; स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं के लिए यूँ तो मुझे निरर्थक लगती है। पर संदेही मनों और हिंदी विरोधी (हिंदी भाषा को सिर्फ हिंदी भाषी क्षेत्र की वस्तु मानना निःसंदेह हिंदी की अखिल भारतीय अस्मिता का विरोध है) मानसिकता वाले दिलों में घर कर गए भ्रमों पर से परदा हटाने के लिए यह चर्चा बामानी भी लगती है। इस अफसोस, खेद और क्षोभ के साथ कि अपने ही देश में हमें स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं की उपादेयता गिनाने की आवश्यकता भला क्यों पड़ रही है। उस देश में जिसकी ‘राष्ट्रभाषा’ हिंदी स्वतंत्रता पूर्व से मान्य और सम्मान्य रही है और जिसके माध्यम से राष्ट्र की भावात्मक और सांस्कृतिक एकता का सपना देखा गया था। और स्वतंत्रता के बाद जिसे राजभाषा की संवैधानिक मान्यता मिली हुई है और ये संस्थाएँ संविधान के अनुच्छेद 351 को अमली जामा पहनाने का काम अपने-अपने स्तर पर जी-जान लगाकर कर रही हैं। 


              मणिपुर हिंदी परिषद्, इम्फाल  [मणिपुर]                                         

मैं अपनी सारी आधुनिक वैचारिकता के बावजूद यह मानता हूँ ; चाहे यह कुछ लोगों को निरी भावुकता ही क्यों न लगे कि ये संस्थाएँ हमारी धरोहर हैं, हमारी जातीय एवं राष्ट्रीय अस्मिता की धरोहर। इस बात पर डॉ. धीरेंद्र वर्मा, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ. राम विलास शर्मा और इन संस्थाओं के साथ जुड़े अनेक भाषाविद् और हिंदी चिंतक अत्यंत तार्किक ढंग से मुहर लगा चुके हैं। विश्व हिंदी सम्मेलनों के अवसर पर प्रकाशित स्मारिकाओं में भी इन संस्थाओं की महती भूमिकाओं और ऐतिहासिक महत्व को बार-बार रेखांकित किया जाता रहा है। हिंदी की इन संस्थाओं का अपना प्रेरक इतिहास तो है ही, इनमें या इनके भीतर भारतीय इतिहास के कई स्वर्णिम पृष्ठ भी अंकित हैं। यदि हम इनकी सही परख करें तो यह साफ दिखाई देता है कि इन संस्थाओं ने इतिहास के साथ रहकर या जरूरत पड़ने पर उससे लड़-भिड़ कर भी अपना इतिहास बनाया है। कई बार इन्होंने इतिहास की वक्र दिशा को सीधी राह भी दिखाई है या कहें उसे सीधी राह पर लाई हैं। कहना न होगा कि इतिहास से यह मुठभेड़ ही इन संस्थाओं को राष्ट्रीय/स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा बनाती है। कई विद्वानों ने इस ओर संकेत किया है कि 1857 की लड़ाई में पराजय का मूल कारण यही था कि हमारे पास तब ‘एकता की भाषा’ का अभाव था। संपर्क भाषा के अभाव से भिन्न-भिन्न सूबों के बीच संप्रेषणीयता और संपर्क की कड़ी न जुड़ सकी सो उत्कट उत्साह और उदात्त बलिदानी तेवर के बावजूद हमें ब्रिटिश हुकूमत के सामने हार का मुँह देखना पड़ा। 1857 की इस पराजय के मूल कारण को गांधी जी समझ गए थे। अतः ‘राष्ट्रभाषा आंदोलन’ को उन्होंने अपने रचनात्मक कार्यक्रमों में जगह दी। स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं की स्थापना की। और राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार का काम इन्हें सौंप कर जीवन पर्यंत इनकी निगहबानी और सरपरस्ती करते रहे। गांधी जी की दूरदृष्टि का नतीजा हमारे सामने है। राष्ट्रभाषा हिंदी के माध्यम से एकजुट राष्ट्र के सामने ब्रिटिश साम्राज्य का कभी न डूबने वाला सूर्य (जैसा कि कहा जाता था) अस्ताचल में डूब गया। 

 क्रमशः 


- प्रो. दिलीप सिंह 




[लेखक प्रतिष्ठित हिंदी भाषा विज्ञानी, शिक्षाविद् एवं दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास के कुलसचिव हैं.]


स्वैच्छिक हिंदी संस्थाएँ (प्रासंगिकता, उपादेयता एवं सीमाएँ) स्वैच्छिक हिंदी संस्थाएँ  (प्रासंगिकता, उपादेयता एवं सीमाएँ) Reviewed by Kavita Vachaknavee on Friday, September 23, 2011 Rating: 5

3 comments:

  1. प्रणाम सर.

    'स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं' की कर्मठता अमूल्य है. और, महान हैं उनसे जुड़े स्वयंसेवक जिन्होंने 'राष्ट्रभाषा' का प्रचार-प्रसार तो किया ही साथ ही गाँव-गाँव जाकर भारत की अनपढ़-गंवार जनता को अंग्रेजों की गुलामी और आजादी के प्रति जागरुक बनाया.
    आज भी ये संस्थाएं हिंदी के प्रचार-प्रसार में लगी हुई हैं. इन संस्थाओं से शिक्षित छात्र अच्छे पदों पर विराजमान हैं. यदि देश भर में सर्वे किया जाए तो इनकी एक बड़ी सूची तैयार हो जाएगी. निसंदेह ये संस्थाएँ हिंदी के माध्यम से देश की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ बनाती हैं.

    अन्य भागों की प्रतीक्षा रहेगी.

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  2. एयर कंडीशन कमरों में बैठे सरकारी सुख सुविधा भोगी तथाकथित हिंदी सेवी क्या जाने कि इन स्वैच्छिक संस्थाएं किन विषम परिस्थितियों में अपना दायित्व निभा रही है। इस चर्चा को व्यापक समर्थन मिलना चाहिए और सत्ता में बैठे कानों तक इसकी आवाज़ पहुंचनी चाहिए॥

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  3. मैं मराठी भाषिक और वाणिज्य स्नातक विद्यार्थी हूँ लेकिन महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा पुणे के तत्कालीन हिंदी प्रचारक एवं हिंदी शिक्षक स्व. देवधर सर के प्रोत्साहन एवं मार्गदर्शन के कारण मैंने हिंदी पंडित परीक्षा उत्तीर्ण की और बाद में पुणे विश्व विद्यालय से हिंदी स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। आज मैं हिंदी के कारण भारत संचार निगम अहमदनगर में राजभाषा अधिकारी के पद पर कार्य कर रहा हूँ। स्वैच्छिक हिंदी संघठणों की इस देश में हिंदी प्रचार प्रसार की विशेष भूमिका रही है और उनका योगदान अमुल्य रहा है। सरकारी एवं शिक्षा के क्षेत्र के हिंदी कर्मी उनसे कही गुना अच्छा वेतन प्राप्त कर रहे लेकिन दुर्भाग्य है कि उनकी जैसी निष्ठा एवं त्याग अब हमारे नए सहयोगियों में नहीं रहा। एक समय था जब दक्षिण के हिंदी प्रचारकों को स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर पेंशन दी जाती थी।

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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