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स्वैच्छिक हिंदी संस्थाएँ (प्रासंगिकता, उपादेयता एवं सीमाएँ) - भाग-3



कल आपने पढ़ा -

"..... ये दोनों प्रश्न हिंदी प्रदेश के सभी हिंदी पुरोधाओं से भी पूछे जाने चाहिए कि उनमें से कितनों ने भारतीय भाषाओं से हिंदी में अथवा हिंदी से किसी भारतीय भाषा में अनुवाद किया है? या दक्षिण भारत में हिंदी से और हिंदी में किए गए अनुवाद कार्य की उन्हें जानकारी भी है? और यह भी कि क्या आप हिंदी के ‘बेसिक ग्रामर’ की समझ रखते हैं? कहना न होगा कि तब हिंदी के अधिकतर झंडाबरदार भी बगलें झाँकते नजर आएँगे। "



स्वैच्छिक हिंदी संस्थाएँ (प्रासंगिकता, उपादेयता एवं सीमाएँ) - भाग-3 

भाग - 2  से आगे 

- प्रो. दिलीप सिंह 




समय के साथ चलने की ललक हिंदी की स्वैच्छिक संस्थाओं में भरपूर है। ये आगे बढ़ने का प्रयास भी कर रही हैं। एक ओर साधनों की कमी ने इन्हें बाँधे रखा है तो दूसरी ओर हिंदी क्षेत्र की निरंतर उपेक्षा से ये दुखी हैं। मुझे बार-बार यह लगता है कि थोड़े-से प्रयास यदि एकजुट हो कर किए जाएँ तो इनकी उपादेयता और भी बढ़ाई जा सकती है। यह पूरे भारत का दायित्व है, इस देश के प्रत्येक व्यक्ति का कि वह अपनी मातृभाषा और अपनी राष्ट्रभाषा के उत्थान, विस्तार और प्रचलन के लिए डट कर इन संस्थाओं के साथ खड़ा हो। दक्षिण भारत में हिंदी की एकमात्र ‘राष्ट्रीय महत्व की संस्था’ में अपने सुदीर्घ अनुभव के आधार पर मैं यह पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि इन संस्थाओं की उपयोगिता को दोबाला करने का एक ही सूत्र है - नव्यता। आधुनिकता, इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि इस शब्द के आज कई भिन्नार्थ (शेड्स) या कहें अनेक प्रत्याख्यान (इंटरप्रेटेशन) तैयार किए जा चुके हैं। नव्यता कई स्तरों पर और कई तरह की चाहिए होगी। इनमें से कुछ के प्रति दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास प्रयत्नशील भी है पर सुविधाओं की कमी और संस्था के कई लोगों के भीतर जड़ जमा चुका यथास्थितिवाद इन प्रयत्नों की अपेक्षित त्वरा को कच्छप गति में बदल देता है। नव्यता के स्तर हैं: 



(1)  भाषा, साहित्य, शिक्षण पद्धतियों, शिक्षण सामग्री आदि को अकादमिक विकास के परिप्रेक्ष्य में नए और ताज़े की ओर ले जाने वाले दृष्टिकोण या एप्रोच की नव्यता ; 

(2)  हिंदी के द्वितीय भाषा उपभोक्ता की एक सीमा-सी बाँध दी गई है। इस सीमा को तोड़ते हुए हिंदी भाषा की सामयिक भूमिका को पहचान करते हुए ‘बोलचाल की हिंदी’, ‘व्यावहारिक हिंदी’, ‘मीडिया की हिंदी’ जैसे अल्पकालिक कार्यक्रमों अथवा दक्षिण भारतीय भाषाओं के ‘सम्प्रेषणपरक भाषा’ कार्यक्रमों को अधुनातन भाषा शिक्षण प्रविधियों के अनुसार विकसित करने की नव्यता ; 

(3)  नवोन्मेषी तथा सतत विकासशील (आधुनिकीकृत) भाषा के रूप में विज्ञापन, बाजार, फैशन, नए उत्पाद, पाक कला में प्रयुक्त हिंदी प्रयुक्तियों (रजिस्टरों) के विश्लेषण तथा उन्हें पाठ्यक्रमों में स्थान देने की नव्यता ; 

(4)  पाठ्यक्रमों में सामयिक, आधुनिक और वैश्विक संदर्भों को स्थान देने की नव्यता ; 

(5)  प्रवेश प्रक्रिया, परीक्षा प्रणाली तथा मूल्यांकन आदि को वेब-साइट के माध्यम से पारदर्शी बनाने की नव्यता ; 

(6)  सभी स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं के बीच परस्पर विचार-विमर्श की अनिवार्यता है। ‘अखिल भारतीय हिंदी संस्था संघ’ के होते हुए भी इन संस्थाओं के बीच अकादमिक अथवा कार्यक्रम केंद्रित सामूहिक बहस, आदान-प्रदान और सहयोग का नितांत अभाव है। नतीजतन हिंदी भाषा के वैश्विक प्रसार एवं विश्व में चल रहे हिंदी कार्यक्रमों को इन संस्थाओं द्वारा मिल सकने वाली अपेक्षित मदद/सहयोग के लिए उपयोगी योजना नहीं बन पा रही है। और इस तरह ‘विश्व में हिंदी’ का ढाँचा, उसकी आवश्यकताओं तथा भारतीय परिवेश में इनकी प्रासंगिकता को नया रूप-संदर्भ दे पाने का लक्ष्य पूरा नहीं हो पा रहा है। 

(7)  हिंदी भाषा और साहित्य को लेकर नवीन दृष्टि से पुस्तकें तैयार करना भी इन संस्थाओं का दायित्व है जिसका निर्वाह उन्होंने अपनी स्थापना के साथ ही करना प्रारंभ कर दिया था। कहना न होगा कि इन प्रकाशनों ने हिंदी संबंधी तत्कालीन ज़रूरतों की पूर्ति ही नहीं की, मापदंड भी रचे। पर पिछले कुछ दशकों से यह काम थोड़ा शिथिल पड़ा है। आज यदि ये संस्थाएँ निम्नलिखित दिशा में अपनी रचनाधर्मिता प्रदर्शित कर सकें तो निश्चित ही वे हिंदी भाषा और साहित्य के लिए गंभीर काम कर सकेंगी क्योंकि अनावश्यक बहसों और विमर्शों ने इन गंभीर दायित्वों से हिंदी जगत को छिटका रखा है - 


(क) व्यावहारिक/संप्रेषणपरक हिंदी व्याकरण लेखन (पत्र-पत्रिकाओं, मीडिया और समाजी हिंदी डाटा पर आधारित) 

(ख) वार्तालाप केंद्रित हिंदी का ‘डिस्कोर्स ग्रामर’ लेखन (साहित्यिक कथा-पाठों पर आधारित) 

(ग) ‘हिंदी साहित्य का समेकित इतिहास’ लेखन (जिसमें हिंदीतर क्षेत्रों में मौलिक हिंदी लेखन तथा अनूदित साहित्य का विशेष बल देते हुए समावेश हो) 

(घ) हिंदी की स्वैच्छिक संस्थाओं का इतिहास लेखन (मात्र स्थापना, कार्य एवं प्रकाशन आदि का विवरण या आंकड़ा ही नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक परिवर्तन, स्वतंत्रता आंदोलन और साहित्यिक धाराओं के बदलाव में इनकी भूमिका का रेखांकन) 

(च) हिंदी भाषा विकास को केंद्रीयता प्रदान करते हुए हिंदी का साहित्येतिहास लेखन 

(छ) हिंदी वैयाकरणों के योगदान पर लेखन (जिसमें भिन्न भारतीय भाषाभाषियों तथा विदेशी वैयाकरणों के योगदान पर भी विश्लेषणात्मक टिप्पणी हो) 

(ज) हिंदी भाषाविज्ञान की परंपरा के बहाने हिंदी भाषा की संरचना पर किए गए विवेचनों पर तुलनात्मक लेखन। 


निश्चित ही स्वैच्छिक हिंदी संस्थाएँ इस ऐतिहासिक महत्व के लेखन को संभव बना सकती हैं। इन संस्थाओं के प्रबुद्ध हिंदी सेवी तथा भारत-भर के हिंदीतर क्षेत्रों में कार्य करने वाले ‘रिसोर्स पर्सन्स’ के सहयोग से ये काम योजनाबद्ध और समयबद्ध ढंग से करके हिंदी भाषा के अद्यतन स्वरूप और पुरोधाओं के योगदान को हिंदी जगत के समक्ष रखा जा सकता है और पिछड़ा, पुराना-धुराना, रूढ़िवादी होने का जो आरोप तथाकथित प्रबुद्धजन हमारी संस्थाओं पर लगाते रहते हैं, उन्हें मुँहतोड़ जवाब देकर आगे के इतिहास में इन संस्थाओं का नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज कराया जा सकता है। संदेही मानसिकता वालों को यह लग सकता है कि स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं के बस का नहीं है कि वे इन कामों को अंजाम दे सकें। पर हम जैसे लोग जो दक्षिण भारत में गांधी जी द्वारा स्थापित हिंदी संस्था में काम कर रहे हैं, इनकी क्षमता को पहचानते हैं। पिछले तीन-चार दशकों में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास ने जिन दिशाओं की ओर बढ़ने का साहस दिखाया है और असंभव-से लगने वाले काम कर दिखाए हैं, वह उनकी क्षमता, दक्षता, लगन और उत्साह का स्वतः प्रमाण है।


हिंदी की स्वैच्छिक संस्थाओं की सीमाएँ और कमियाँ भी हैं। एक तो इन्हें सामान्य नियम मानकर अनदेखा भी किया जा सकता है। पर यह प्रवृत्ति ठीक नहीं कि ‘ऐसा तो सभी संस्थाओं या संगठनों में होता है’ कहकर अपना दामन बचा लिया जाय। यदि बड़े-बड़े दायित्वों को हमें अंजाम देना है तो अपनी इन कमियों पर भी हमें आलोचनात्मक और कड़ी दृष्टि रखनी होगी. इन्हें दूर करने के हरसंभव और त्वरित उपाय भी करने होंगे। इस बात को स्वीकारने में कोई संशय नहीं है कि ये संस्थाएँ अपनी-अपनी तरह से हिंदी के प्रचार-प्रसार में लगी हुई हैं पर इनकी गति अपेक्षाकृत धीमी है। हम जो कुछ कर रहे हैं उसे प्रचार माध्यमों से लोगों तक पहुँचाने के प्रति भी हम अधिकतर उदासीन ही दिखाई देते हैं। 



हम जगाने-चेताने वाली भाषा की प्रतिनिधि संस्थाएँ हैं, पर हममें ऊर्जा की कमी है। हमने ढर्रे पर चलने को और लीक न तोड़ने की प्रवृत्ति को अपनी आदत में शुमार कर लिया है। हम नए बनना चाहते हैं, पर हिचकते हुए। ‘हम हिंदी जैसी दरिद्र भाषा की बेचारी संस्थाएँ हैं’ - यह हीन ग्रंथि हमारे कार्यकर्ताओं को भी ग्रसे हुए है। हिंदी को ‘मातृभाषा-अन्य भाषा’ के घेरे से बाहर खींच कर उसे ‘भारतीय भाषा’ कहने, मानने और बनाने की आवाज उठाने में हम संकोच करने लगे हैं। हमारी रगों में हिंदी है लेकिन हमारी आत्मा हिंदी में नहीं है। हिंदी या मातृभाषाओं को पीछे ढकेलने वाले रथों के चक्र को पीछे ढकेलने की जगह हम बस हाथ उठा-उठा कर चिल्ला रहे हैं कि देखो-देखो वे रथ को चढ़ाए आ रहे हैं - चाहे वह अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व का रथ हो, चाहे हिंदी-विरोध का, चाहे प्रशासनिक स्तर पर भारतीय भाषाओं की अवहेलना का या चाहे भारतीय भाषाओं की अस्मिता को येन केन प्रकारेण झुठलाने और चुनौती देने का। लगता है कि हमारी जुझारू वृत्ति चुकती-सी जा रही है। इसकी जगह आपसी टकराव की प्रवृत्ति में इजाफा हो रहा है। हिंदी संस्थाएँ एक दूसरे से अलग-थलग रह कर ‘अपनी ढपली अपना राग’ की कहावत को चरितार्थ करने लगी हैं। हम एक जुट हो कर साथ-साथ क्यों नहीं चल सकते? इस अलगाव की वजह से न जाने कितनी कमियाँ आ सिमटी हैं हमारे भीतर. इन सबसे छूटे बिना निस्तार नहीं। हम मिल कर प्रोजेक्ट करें जो भी हमने किया है, या कर रहे हैं तो सही मायनों में अखिल भारतीय स्तर पर हिंदी के गौरव और उसे मिलने वाले सम्मान का स्वतः ही प्रोजेक्शन होगा। फिर कोई भी हमारी ‘पहचान’ को चैलेंज करने का साहस नहीं कर सकेगा। 



हमने बरसों-बरस हिंदीतर भाषी ज़मीन पर हिंदी का पौधा रोपा है। अपनी दीवानगी का खाद-पानी दे कर हमारे पूर्वजों ने इसे सींचा है। क्या इस लहलहा रहे पौधे को हम यों ही सेंत में मुर्झाने देंगे। कदापि नहीं। सीमाएँ कोई ऐसी विकट नहीं हैं जिनसे पार न पाया जा सके। हम इनसे टकराने की शपथ ले लें तो ये कहाँ टिक पाएँगी। संकटों का सामना करने और डट कर संघर्ष करने का इतिहास गवाह है कि ये संस्थाएँ जनता की संपत्ति हैं, धरोहर हैं। उनके प्रेम ने, गांधी और हिंदी में उनके विश्वास ने हिंदी भाषा को ‘हिंदी क्षेत्र’ की सीमा से बाहर निकाल कर सुदूर क्षेत्रों के गाँव-गाँव तक पहुँचा दिया है। हिंदीतर भाषाभाषी आमजन जब हमारे साथ हैं, इन संस्थाओं में उनका विश्वास है, हज़ारो-लाखों की संख्या में जो हिंदी सीखने, हिंदी का काम करने के लिए हमसे जुड़ने को आतुर हैं तब चिंता किस बात की है। 



हाँ, अब वह भी कह देना चाहिए जिसकी वजह से मेरा मन उद्वेलित हुआ। मैं जानता हूँ कि मेरी लेखन-शैली इतनी आक्रामक पहले कभी नहीं हुई है। पर मजबूर हूँ। बहरों को सुनाने के लिए तेज़ आवाज़ में बोलना पड़ा। संयम फिर भी बरता गया है। कुछ ही माह पहले हिंदी के एक स्वनामधन्य मठाधीश दक्षिण भारत की किसी हिंदी संस्था में अपने ‘पधारने’ का किस्सा सुनाते हुए मुँह बिचका कर कह रहे थे - ‘कैसी हैं ये संस्थाएँ। न ढंग की बिल्डिंग, न कैंपस। छोटे-छोटे कमरे, स्कूली बरामदे, हुँह।’ फिर मुझसे पूछा ‘क्या आपके यहाँ का भी यही हाल है?’ मेरे जवाब की परवाह किए बिना अपनी ही रौ में कटाक्ष-भाव से शातिर मुस्कान बिखेरते हुए बोले - ‘चलते समय उस संस्था के अध्यक्ष ने मुझसे पूछा कि आपको कैसा लगा तो मैंने कह दिया कि मुझे तो यही लगा कि ऐसी हिंदी संस्थाओं को आग लगा देनी चाहिए। आज हिंदी कहाँ की कहाँ पहुँच गई है फिर जरूरत क्या है इस प्रचार-फ्रचार की।’   मैंने अब अपनी बात कही संक्षेप में, वही सब जो इस लेख में लिखा है। पर वे तो ठाने हुए थे और हिंदी का भाग्यविधाता होने के अहं में चूर थे। अपनी इस खामखयाली से भी वे पूरी तरह मुतमइन थे कि आज नहीं तो कल ये संस्थाएँ अपनी मौत आप मरेंगी। इन्हें तो खत्म होना ही है। बकने दीजिए उन्हें जो ठीक से हमें जानते भी नहीं। ऐसे अनजानों के प्रलाप पर हम कान भी क्यों धरें। इनकी ओर उपेक्षा भरी नज़रों से देखते हुए गालिब की तरह यही कहेंगे और हमें मिटता देखने की इनकी तमन्ना पर हम भी कटाक्ष करेंगे कि - 

सुना था परखचे गालिब के कल उड़ेंगे मगर 

देखने हम भी गए थे प ’ तमाशा न हुआ।

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास [तमिलनाडु]                                                                          राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा [महाराष्ट्र]


मणिपुर हिंदी परिषद्, इम्फाल  [मणिपुर] 



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पूर्व भाग पढने के लिए क्लिक करें   -     भाग प्रथम ,    भाग द्वितीय  




- प्रो. दिलीप सिंह 

[लेखक प्रतिष्ठित हिंदी भाषा-विज्ञानी, शिक्षाविद् एवं दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास के कुलसचिव हैं.]

और भाषाविज्ञान/ समाज-भाषाविज्ञान के मेरे गुरु भी.... 







स्वैच्छिक हिंदी संस्थाएँ (प्रासंगिकता, उपादेयता एवं सीमाएँ) - भाग-3 स्वैच्छिक हिंदी संस्थाएँ (प्रासंगिकता, उपादेयता एवं सीमाएँ) - भाग-3 Reviewed by Kavita Vachaknavee on Tuesday, September 27, 2011 Rating: 5

4 comments:

  1. तमाशबीनों का क्या है,
    दूर झरोखे में शान से बैठे तमाशा देख रहे हैं;
    वे क्या जानें भूखे जमूरे पर क्या गुज़र रही है!

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  2. स्वनामधन्य मठाधीश को दूर से ही नमन जो भाषा की खाते तो है पर उसे मटियामेट करने पर तुले हैं और हिंदी की सेवा करने वाले संस्थानों को जलाने पर तुले हैं। शर्म करो भाई॥

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  3. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा हिन्दी की स्वैच्छिक संस्थाओं में सबसे अधिक महत्वपूर्ण है. यही अकेली ऐसी हिन्दी संस्था है जिसे विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त है (राष्ट्रीय महत्त्व की संस्था). लेकिन इस संस्था के कुल सचिव प्रो.दिलीप सिंह जी (जो मेरे श्रद्धेय गुरु हैं) के लेख में यह पढ़कर बहुत दुःख हुआ, शरम भी आई कि राष्ट्रीय महत्त्व की इस संस्था के प्रति सरकार और जनता दोनों का रुख अत्यंत उपेक्षापूर्ण है.क्या हम इन्टरनेट पर इस संबंध में कोई हस्ताक्षर अभियान नहीं चला सकते? हिंदी भारत के माध्यम से देश के कर्णधारों के कानों तक यह माँग पहुँचाने का कोई तो रास्ता होगा कि सरकार इस तरह हिंदी संस्थाओं और हिंदी को अब और अपमानित न करें.

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