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तब यह धोखा कैसे सम्भव है ?

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मौलिक विज्ञान लेखन







झूम रहे थे जुगनू नाना
विश्वमोहन तिवारी, एयर वाइस मार्शल, (से.नि.)  



जुगनू का नाम लेते ही मन में एक खुशी की लहर दौड़ जाती है। बरसात की नहाई संध्या की इन्द्रधनुषी मुस्कान याद आ जाती है। वर्षा ऋतु में तारों की आँख मिचौनी याद आ जाती है। आकाश के तारों की जगमग को भी हराने वाले जमीन पर जगमगाते जुगनू, और उन जुगनुओं के पीछे भागता बचपन याद आ जाता है।


भ्रमर तथा जुगनू के परिवारों में गहरा सम्बंध है। भ्रमर यदि गान के लिये प्रसिद्ध हैं तो जुगनू अपने मोहक हरे रंग के जगमग करते प्रकाश के लिये। गुनगुनाते भ्रमर कवियों के बहुत प्रिय रहे हैं। भ्रमरों से सम्बंधित उच्चकोटि की कविताएँ बहुत मिलेंगी। किन्तु जुगनुओं पर - बहुत ढूँढ़ने पर शायद कहीं कोई कविता मिल जाए। मुझे महाकवि सुमित्रानंदन पंत की एक कविता ‘प्रथम रश्मि’ में जुगनू का सुंदर उपयोग मिला:-

प्रथम रश्मि का आना रंगिणि
                            तूने कैसे पहचाना !
कहाँ कहाँ हे बालविहंगिनि
                            पाया तूने यह गाना !
सोई थी तू स्वप्न नीड़ में
                            पंखों के सुख में छुपकर
झूम रहे थे, धूम द्वार पर
                            प्रहरी से जुगनू नाना।


देखिये बाल पंछी के प्रति प्रेम दर्शाने के लिये पंत ने जुगनुओं को रात्रि में उनका प्रहरी बना दिया ! कितनी अच्छी उपमा है - नाना जुगनू प्रहरी के समान रात्रि में ज्योति हिलाते हुए पहरा देते हैं।

जुगनू को लेकर एक दोहा बहुत प्रसिद्ध है -

‘सूर सूर तुलसी ससी, उड्गण केशव दास
बाकी के खद्योत सम, जहं तहं करत प्रकास’

इस दोहे में जुगनू को सम्मान नहीं दिया गया। जबकि भ्रमर का सम्मान दिखलाने के लिये एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा, सूरदास की तो बात ही छोड़ दें, महादेवी वर्मा की कविता की एक पंक्ति ही देखिए -

 ‘विश्व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुन गुन।’

भ्रमर तथा जुगनू में समानताएँ देखने लायक हैं। दानों ही कीट हैं, दोनों के चार चार पंख होते हैं। किन्ही किन्ही जाति की मादा जुगनू के पंख नहीं होते इसलिये अंग्रेजी में उन्हे ‘फायर फ्लाई’ न कहकर ‘ग्लो वर्म’ कहते हैं। इन दोनों परिवारों के सामने के दो पंख कड़े होते हैं जिनसे उड़ने का काम नहीं लिया जा सकता। हाँ उड़ान वाले पंखों तथा पूरे शरीर की रक्षा करने का काम ये कड़े पंख करते हैं। अतएव इन्हे ‘कवच पंख’ कहते हैं, तथा ऐसे कीटों को ‘कवच-पंखी’ कीट कहते हैं।


जुगनू अथवा खद्योत अद्भुत कीट है। यह पूर्णतया निशिचर कीट है। खद्योत कीटों की लगभग 1000 जातियाँ हैं जो विश्व के भूमध्यरैखिक तथा समशीतोष्ण क्षेत्रों को प्रकाशित करती हैं। खद्योत कीट के नर तथा मादा दोनों उड़ते हैं। इनका मुख्य भोजन पराग, मकरंद हैं। किन्तु जब ये इल्ली अवस्था में होते हैं तब ये घोंघे (स्नेल) तथा शंबुक (स्लग) को आहार बनाते हैं। इनमें ये एक ऐसा द्रव, डाक्टर की सुई समान, अपने मुख की सुई जैसी नलिका से डाल देते हैं कि वह मरने लगता है। थोड़ी ही देर में उस द्रव द्वारा शिकार का आधा पचा हुआ भोजन उस नलिका से खींच लेते हैं। और मजे की बात यह भी है कि ये जुगनू इल्ली अवस्था में भी जगमग करने लगते हैं। और ये खद्योत तथा उनकी इल्लियाँ क्यों ऐसा करते हैं ? सम्भवतः, मेंढक, साँप, पक्षी जैसे शिकारियों को अपने कड़ुए स्वाद से आगाह करना चाहते हैं। और देखिए, मेढकों की कुछ जातियों ने इनके कड़ुएपन का इलाज कर लिया है, और वे मजे से रात में जगमगाते इन अपने को सुरक्षित समझने वालों को इतना तक खा लेते हैं कि वे स्वयं जगमगाने लगते हैं - एक जगमगाता मेंढक देखते ही अचम्भा हो।


जुगनुओं को अंग्रेजी में ‘फायर फ्लाई’ कहते हैं। इनका प्रकाश आग या गरमी के कारण नहीं निकलता जैसा कि कागज या लकड़ी के जलने पर निकलता है। इनके प्रकाश विकिरण की क्रिया ‘जैव-द्युति’ होती है। अर्थात वह अजैव रासायनिक प्रक्रियाओं से भिन्न होती है।


इस जैव प्रक्रिया के लिये इनमें एक विशेष प्रकिण्व (एन्ज़ाइम) भाग लेते हैं जिसमें आक्सीजन का उपयोग रहता है। हमारे शरीर की पाचन क्रिया में भी प्रकिण्वों का बहुत महत्त्व है। इनकी यह क्रिया ‘ट्यूब-लाइट’ के समान नहीं होती, किंतु इनका प्रकाश उसी के समान ठंडा रहता है। प्रयोगशालाओं में तथा उद्योगों में इस तरह के प्रकाश विकिरक पदार्थों का अजैव - रासायनिक - प्रक्रियाओं द्वारा उत्पादन किया जा रहा है। आश्चर्यजनक बात यह है कि कृत्रिम विधियों की दक्षता प्राकृतिक विधियों की दक्षता की तुलना में बहुत कम है।


जुगनू अपना शीतल प्रकाश किस तरह पैदा करते हैं यह समझने के बाद यह प्रश्न उठता है कि वे क्यों ऐसा करते हैं ! ये कीट अपने स्वभाव से निशाचर हैं क्योंकि रात में शिकारी पक्षियों, मेंढकों, तथा अन्य कीटों के हमले का खतरा बहुत कम हो जाता है। किन्तु रात्रि में जीवन बिताने में अनेक समस्याएं भी होती हैं। प्रजनन के लिये नर तथा मादा का मिलना अनिवार्य है। और इनकी संख्या वातावरण की विशालता को देखते हुए कम ही है। फलस्वरूप, नर और मादा अँधेरे में एक दूसरे को कैसे ढूँढें ? कैसे अपनी ही जाति की पहचान करें ? इसलिए विकास के दौरान इन कीटों में प्रकाश का उपयोग आया। भिन्न जातियों के जीव मिलकर सन्तान नहीं पैदा कर सकते जैसे कि सिंह तथा शेरनी मिलकर सन्तान नहीं पैदा कर सकते और यदि ऐसी संतान हो भी जाए तो वह आगे संतान उत्पन्न नहीं कर सकती। उसी तरह एक जाति का जुगनू नर दूसरी जाति के मादा जुगनू से संतान नहीं पैदा कर सकता। एक जाति की जुगनू से दूसरी जाति की जुगनू के प्रकाश में किस तरह भिन्नता लाई जाये ? मजे की बात है कि इसके लिये जुगनू के पास चार ही विधियाँ हो सकती हैं। 
             
 पहली - हर एक जाति की जुगनू के रंग अलग हों।
 दूसरी - एक जाति का जुगनू अपनी द्युति की ‘जल - बुझ’ की आवृत्ति अन्य से अलग रखे।
 तीसरी - इस आवृत्ति में द्युतिमान रहने की अर्थात ‘द्युतिकाल’ अवधि  भी अलग रखे। और
 चौथी - मादा जब अपनी जाति के नर के प्रकाश-संकेत को पहचानने के बाद स्वयं का संकेत भेजे तब, एक, उसके संकेत भी उपरोक्त तीनों प्रकार से अन्य जाति की मादाओं के संकेतों से भिन्न होते हैं, साथ ही वह नर के संकेत का उत्तर देने में जो विलम्ब करती है, उस विलम्ब की मात्रा भी अन्य जातियों द्वारा रखे गये विलम्ब की मात्रा से भिन्न रखी जाती है। बहुत कम जीवधारियों में ये रंग अलग अलग होते हैं, किन्तु रंगों को हजारों प्रकार के बनाना और समझना अधिक कठिन काम है। इसीलिये प्रकाश के जगमगाने (जल-बुझने) की आवृत्ति भिन्न जातियों की भिन्न होती है, किन्तु यह भी हजारों जातियों को अलग अलग पहचान देने में कठिनाई पैदा करती है। रात के अँधेरे में खद्योतों की प्रत्येक जाति अपनी प्रकाश के ‘जल-बुझने’ की आवृति तथा द्युतिकाल की अवधि को और उत्तर के विलम्ब की मात्रा को अच्छी तरह समझती है और अन्य जातियों से भेद कर सकती है।


प्रकृति में नर की उपादयेता मादा से, अक्सर कम होती है। इसलिये ‘नर’ अधिक खतरा मोल ले सकता है। इसीलिये नर पक्षी मादा पक्षी से अक्सर, अधिक तथा चटखदार रंगों वाले होते हैं। जुगनुओं में भी नर जब मादा की खोज में रात के अँधेरे में निकलता है तो उसका जगमगाना बराबर चलता रहता  है। जब कि मादा जुगनू किसी घास पर या छोटी झाड़ी की फुनगी पर ‘चुपचाप’ बैठी देखती रहती है। ज्योंही उसे अपनी ही जाति के नर का द्युति संकेत दिखता है तब वह उत्तर में अपने प्रकाश संकेत का जगमगाना प्रारम्भ करती है। मादा की द्युति की आवृत्ति तथा द्युति-काल भी नर से भिन्न होता है किन्तु एक जाति की मादा का निश्चित होता है। नर उस मादा के उत्तर के द्युति संकेत को पहचानकर उसके पास आ जाता है। इतने छोटे से कीट के कितने अद्भुत व्यवहार !


न केवल नर खद्योत अधिक खतरा लेने के लिये तैयार रहता है, उसे मालूम हे कि उसका जीवन बहुत अल्प है, कोई एक दो रातें ! इसलिये उसे संतानोत्पत्ति के कार्य के अतिरिक्त कोई कार्य नहीं सूझता। यहाँ तक कि अनेक खद्योत जातियों के नर भोजन ही नहीं करते, केवल मादाएँ भोजन करती हैं। यहाँ तक कि कुछ मादाएँ दूसरी जाति के खद्योत नरों को धोखा देकर अपने पास बुला लेती हैं और खा जाती हैं। जब हर एक जाति के प्रकाश संकेत निश्चित रूप से तथा जटिल रूप से भिन्न होते हें, तब यह धोखा कैसे सम्भव है ?


‘फोट्युरिस’ वंश की मादा खद्योत भिन्न वंश की ‘फोटिनुस’ वंश की मादा की आवृत्ति, द्युति-काल तथा विलम्ब पैदा कर सकती है। जब उसे भूख लगी होती है और उस समय यदि कोई फ़ोटिनुस जाति का नर अपना द्युति संकेत करता हुआ निकलता है तब वह फोटिनुस मादा का द्युति संकेत पैदा करती है। फोटिनुस नर तुरन्त खिंचा आता है। और उसके आते ही वह मादा उस भोले भाले नर को अचानक धर दबोचती है। यह धर दबोचना संभव हो सकता है क्योंकि नर जब मादा के पास आता है तब अपनी जाति की पहचान को अंतिम बार सुनिश्चित करने के लिये उसे सूँघता है। उनकी सुगंध भी जाति -विशेष होती है, अर्थात प्रत्येक जाति की अपनी सुगंध होती है। इस सूंघने की प्रक्रिया के समय धोखेबाज तथा तैयार मादा उस कामातुर नर को खा जाती है। प्रकृति में ‘जीवः जीवस्य भोजनम्’ एक सामान्य नियम है जिसके अनुसार एक जीव, यथा बाघ, अन्य जीव, यथा हिरन, को अपना आहार बनाता है। ऐसा समझकर हम इस बहुत अजीब घटना पर आश्चर्य प्रकट करने के बाद छोड़ सकते हैं किन्तु वैज्ञानिक नहीं छोड़ता। वह जानना चाहता है कि इस एक जीव, यथा फोट्यूरिस मादा खद्योत, ने फ़ोटिनुस नर खद्योत को ही क्यों भोजन बनाया ? अपने पराग तथा मकरन्द के सामान्य आहार से वह संतुष्ट क्यों नहीं हुई ? यह जो धोखा दिया वह आहार के लिए दिया गया है ; किसी शिकारी से अपने को बचाने के लिए दिया गया धोखा नहीं है। तितली की कुछ जातियाँ, यथा ‘दानाउस प्लैक्सिप्पुस’ अपना बचाव करने के लिए जहरीली होती हैं। और कुछ जातियाँ जो जहरीली नहीं होतीं, यथा ‘लिमेनितिस आर्किप्पुस’, वे रंग रूप में जहरीली जातियों (यथा, दानाउस प्लैक्सिप्पुस) के यथेष्ठ समरूप हो जाती हैं और शिकारी पक्षी उन निर्विष तितलियों को विषैली समझकर छोड़ देते हैं। यह समरूपता द्वारा दिया गया धोखा अपने बचाव के लिए दिया गया है। इस धोखे में दोनों शिकारी और शिकार को लाभ होता है। किंतु मादा फोट्युरिस खद्योत, लगता है, कि मात्र अपने स्वार्थ के लिए धोखा दे रही है। जब बाघ किसी मृग का शिकार करता है तब अधिकतर वह कमजोर मृगों को ही पकड़ता है। इससे और दुर्बल मृगों की छटनी हो जाती है और मृगों में मृगों की अतिजीविता बढ़ती है। और यहाँ इस तरह का कोई लाभ फोटिनुस वंश के खद्योतों को होता नज़र नहीं आता। तब ?


फोटिनुस वंश के खद्योतों ने इस धोखे से अपने बचाव के लिए क्यों कोई प्रतिकार पैदा नहीं किया? शायद, फोेट्युरिस खद्योत की मादाएँ बहुत कम ऐसा धोखा करती हों। क्यों ? खद्योतों तथा उनकी इल्लियों का स्वाद बहुत कड़ुआ होता है, जिसके फलस्वरूप मेंढक, साँप तथा पक्षी उन्हें नहीं खाते। बाल स्वाद के कड़ुएपन की नहीं है, बात उनके विषैला होने की है। ये उन खद्योतों तथा इल्लियों को उनके विषैलेपन के कारण नहीं खाते। स्वाद नवसिखिये शिकारियों को मदद करता है। कड़ुआ स्वाद आते ही वे अपने पिछले अनुभव के आधार पर कड़ुए शिकार को तुरंत थूक देते हैं। न थूकें तो उन्हें कै हो सकती है, बेहोशी हो सकती है और अधिक मात्रा में खाने पर मृत्यु भी। इसलिए वयस्क शिकारी ऐसे जगमगाते खद्योतों तथा इल्लियों को देखते ही छोड़ देते हैं।


ऐसा विष खद्योतों को अपने भोजन से ही मिलता है। इस विष का नाम है ‘ल्युसिबुफाजिन्स’ (लातिन में इसका अर्थ है ‘हल्का भेक’ या ‘हल्का टोड’, क्योंकि यही विष कुछ ‘भेक’ की जातियों में पाया जाता है।) ‘फोटिनुस’ वंश के वयस्क मादाओं में भी हमेशा मिलता है, किन्तु किशोर मादाओं में नहीं मिलता। वैज्ञानिकों ने प्रयोग कर यह देखा कि उन फोट्युरिस मादाओं को जिन्होंने कभी फोटिनुस खद्योतों को नहीं खाया, मकड़ियों ने मजे से खाया। किंतु जब भी उन मकड़ियों ने ऐसी फोट्युरिस मादाओं को जिन्होंने कभी भी फोटिनुस खद्योतों को खाया था या जिन्हें ‘ल्युसिबुफाजिन्स’ खिलाया गया था, मुँह में पकड़ा, उसे उन्होंने तुरंत ही छोड़ दिया। और यह भी पता लगाया कि एक मादा फोट्युरिस खद्योत को एक फोटिनुस नर खद्योत की खुराक जीवन भर के लिए पर्याप्त है। अर्थात यह धोखा आहार के लिए नहीं किया गया था, वरन एक रक्षात्मक विष की जीवनभर की आवश्यकता के लिए जीवन में एक बार किया गया था।


नर तथा मादा खद्योत अपनी द्युतियों पर कुछ नियंत्रण तो कर ही सकते हैं। एक वृक्ष  में एक ही स्थान पर कुछ नर खद्योत हों तब अधिकांशतया वे एक साथ द्युति का ‘जलना-बुझना’ करते हैं - यह दृश्य बहुत मनोहर लगता है। यदि एक सीध में कुछ वृक्ष हों और उन वृक्षों पर एक ही जाति के जुगनू हों, तब तो और भी मनोहर दृश्य प्रस्तुत होते हैं। सारे जुगनू एक वृक्ष के बाद दूसरे फिर तीसरे से अपनी द्युति बारी बारी से आलोकित करते हैं - लगता है मानो प्रकाश की लहर जा रही हो। कभी कभी एक ही वृक्ष पर ऊपर तथा नीचे दो झुण्ड बारी बारी से द्युति पैदा करते हैं। जुगनुओं की नाना द्युतियों को देखकर लगता है कि प्रकृति दीपावली मना रही है। कुछ अपवादों के साथ, खद्योत हरे रंग की द्युति ही बिखेरते हैं।


खद्योत हैं तो कीट, और इनका; परिवारद्ध कुल है भृन्गों का ‘लाम्पाइरिदी’ जो ‘कोलेऔप्टेरा’ गण का सदस्य है। ये भूमध्यरैखिक तथा समशीतोष्ण जलवायु वाले क्षेत्रों को ही जगमगाते हैं। इनके पंख कड़े होते हैं किन्तु उदर नरम। उदर में ही इनका हरा जगमगाने वाला ‘बल्ब’ लगा रहता है। इनकी लंबाई कम ही होती है 5 से 25 मिलि मीटर तक। इनका ऊपर के शरीर का रंग अधिकांशतया प्रगाढ़ कत्थई या काला होता है जिस पर पीला या नारंगी चेतावनी देने वाला निशान रहता है।


प्रकृति में केवल जुगनू ही ऐसे जीव नहीं हैं जो द्युति उत्पन्न करते हैं। ऐसे अन्य जीव हैं जैसे कुछ मछलियों की जातियां, ‘नॉक्टिलुका’ नामक आदि जंतु (प्रोटोज़ोअन), कवक (फंगस), मक्खियाँ, कनखजूरे; कवचधारी जंतु में जुगनुओं के अतिरिक्त क्लिक बीटल आदि भी प्रकाश उत्पन्न करते हैं। एक ऐसा जीव तो रात के अंधेरे में देखने पर लगता है मानो एक एंजिन लाल बत्ती लिये रेलगाड़ी लेकर चला आ रहा हो - ऐसे कीट का नाम हे रेल्वे कीट (रेल रोडवर्म) - इसके शरीर में दो लम्बी धारियों के रूप में प्रकाश उत्पन्न होता है तथा उसके सिर पर लाल प्रकाश।


वाल्मीकि रामायण में संजीवनी बूटी का वर्णन है। तथा यह भी कि वे बूटियाँ रात्रि में स्वयं की द्युति से चमकती हैं। अब आपको यह विश्वास तो हो जाएगा कि वाल्मीकि ऋषि को ऐसी द्युतिमान औषधियों के विषय में ज्ञान था, और वह किसी कवि की कोरी कल्पना नहीं थी।



लक्ष्मी का वाहन उल्लू क्यों

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लक्ष्मी का वाहन उल्लू क्यों
विश्वमोहन तिवारी, एयर वाइस मार्शल, से. नि.   



पुराणों में वर्णित विभिन्न देवी देवताओं के अपने अपने निश्चित वाहन हैं, यथा लक्ष्मी का वाहन उल्लू,  कार्तिकेय का  मयूर, सरस्वती का हंस, गणेश जी का वाहन चूहा इत्यादि। यह विचित्र लगते हैं यह तो निश्चित है कि ये वाहन प्रतीक हैं, यथार्थ नहीं। हाथी के सिर वाले, लम्बोदर गणेश जी चूहे पर वास्तव में सवारी तो नहीं कर सकते, या लक्ष्मी देवी उल्लू जैसे छोटे पक्षी पर। जब मैंने इन प्रतीकों पर वैज्ञानिक सोच के साथ शोध किया तब मुझे सुखद आश्चर्य पर सुखद आश्चर्य हुए। मैंने इन पर जो लेख लिखे और व्याख्यान दिये वे बहुत लोकप्रिय रहे। इन लेखों को रोचक बनाना भी अनिवार्य है। किन्तु उनके पौराणिक होने का लाभ यह है कि, उदाहरणार्थ, इस प्रश्न पर कि ‘लक्ष्मी का वाहन उल्लू क्यों ?’, पाठकों तथा श्रोताओं में जिज्ञासा एकदम जाग उठती है।


इन सारे वाहनों के वैज्ञानिक कारणों का विस्तृत वर्णन तो इस प्रपत्र में उचित नहीं। किन्तु अपनी अवधारणा को सिद्ध करने के लिये उदाहरण स्वरूप लक्ष्मी के वाहन उल्लू का संक्षिप्त वर्णन उचित होगा। यह उल्लू के लक्ष्मी जी के वाहन होने की संकल्पना कृषि युग की है। वैसे यह आज भी सत्य है कि किसान अनाज की खेती कर ‘धन’ पैदा करता है। किसान के दो प्रमुख शत्रु हैं कीड़े और चूहे। कीड़ों का सफाया तो सभी पक्षी करते रहते हैं और उन पर नियंत्रण रखते हैं, जो इसके लिये सर्वोत्तम तरीका है। किन्तु चूहों का शिकार बहुत कम पक्षी कर पाते हैं। एक तो इसलिये कि वे काले रंग के होते हैं जो सरलता पूर्वक नहीं दिखते। साथ ही वे बहुत चपल, चौकस और चतुर होते हैं। इसलिये मुख्यतया बाज वंश के पक्षी और साँप इत्यादि इनके शिकार में कुछ हद तक सफल हो पाते हैं। दूसरे, चूहे अपनी सुरक्षा बढ़ाने के लिये रात्रि में फसलों पर, अनाज पर आक्रमण करते हैं और तब बाज तथा साँप आदि भी इनका शिकार नहीं कर सकते। एक मात्र उल्लू कुल के पक्षी ही रात्रि में इनका शिकार कर सकते हैं।


जो कार्य बाज जैसे सशक्त पक्षी नहीं कर सकते, उल्लू किस तरह करते हैं? सबसे पहले तो रात्रि के अंधकार में काले चूहों का शिकार करने के लिये आँखों का अधिक संवेदनशील होना आवश्यक है। सभी स्तनपायी प्राणियों तथा पक्षियों में उल्लू की आँखें उसके शरीर की तुलना में बहुत बड़ी हैं, वरन इतनी बड़ी हैं कि वह आँखों को अपने कोटर में घुमा भी नहीं सकता जैसा कि अन्य सभी पक्षी कर सकते हैं। अब न घुमा सकने वाली कमजोरी को दूर करने के लिये वह अपनी गर्दन तेजी से तथा पूरे पीछे तक घुमा सकता है।


दूसरी योग्यता, जाति पक्षी के लिये और भी कठिन है। जब उल्लू या कोई भी पक्षी चूहे पर आक्रमण करते हैं, तब उनके उड़ान की फड़फड़ाहट को सुनकर चूहे चपलता से भाग कर छिप जाते हैं। इसलिये बाज भी चूहों का शिकार अपेक्षाकृत खुले स्थानों में कर सकते हैं ताकि वे भागते हुए चूहों को भी पकड़ सकें। किन्तु चूहे अधिकांशतया खुले स्थानों के बजाय लहलहाते खेतों या झाड़ियों में छिपकर अपना आहार खोजते हैं, और वह भी रात में। वहाँ यदि चूहे ने शिकारी पक्षी की फड़फड़ाहट सुन ली तो वे तुरन्त कहीं भी छिप जाते हैं। उल्लू की दूसरी अद्वितीय योग्यता है कि उसके उड़ते समय फड़फड़ाहट की आवाज नहीं आती। यह क्षमता उसके पंखों के अस्तरों के नरम रोमों की बनावट के कारण आती है।


उल्लू को तीसरी आवश्यकता होती है तेज उड़ान की क्षमता के साथ धीमी उड़ान की भी। यह तो हम विमानों के संसार में भी हमेशा देखते हैं कि तेज उड़ान वाले विमान की धीमी गति भी कम तेज उड़ने वाले विमान की धीमी गति से तेज होती है। तेज उड़ान की आवश्यकता तो उल्लू को अपने बचाव के लिये तथा ऊपर से एक बार चूहे को ‘देखने’ पर तेजी से चूहे तक पहुँचने के लिये होती है। तथा झाड़ियों आदि के पास पहुँच कर धीमी उड़ान की आवश्यकता इसलिए होती है कि वह उस घिरे स्थान में चपल चूहे को बदलती दिशाओं में भागने के बावजूद पकड़ सके। यह योग्यता भी अपने विशेष नरम परों के कारण उल्लू में है, बाज पक्षियों में नहीं।


यदि चूहा अधिकांशतया लहलहाते खेतो में या झाड़ियों में छिपते हुए अपना कार्य करता है तब उड़ते हुए पक्षी द्वारा उसे देखना तो दुर्लभ ही होगा। चूहे आपस में चूँ चूँ करते हुए एक दूसरे से सम्पर्क रखते हैं। क्या यह महीन तथा धीमी चूँ चूँ कोई पक्षी सुन सकता है? उल्लू न केवल सुन सकता है वरन सबसे अधिक संवेदनशीलता से सुन सकता है। चूहे की चूँ चूँ की प्रमुख ध्वनि–आवृत्ति 8000 हर्ट्ज़ के आसपास होती है, और उल्लू के कानों की श्रवण शक्ति 8000 हर्ट्ज़ के आसपास अधिकतम संवेदनशील होती है! साथ ही इस ऊँची आवाज का लाभ उल्लू को  यह मिलता है कि वह उस आवाज को सुनकर अधिक परिशुद्धता से उसकी दिशा का निर्धारण कर सकता है। यह हुई उल्लू की चौथी अद्वितीयता। उल्लू में एक और गुण है जो उसके काम में आता है, यद्यपि वह अद्वितीय नहीं। चूँकि उसे शीत ऋतु की रातों में भी उड़ना पड़ता है, उसके अस्तर के रोएँ उसे भयंकर शीत से बचाने में सक्षम है।यह उसकी पाँचवीं अद्वितीयता है।


उल्लू की छठवीं अद्वितीयता है उसकी छोटी चोँच। यह कैसे? चोँच हड्डियों के समान भारी होती है।


इस सब गुणों के बल पर इस पृथ्वी पर चूहों का सर्वाधिक सफल शिकार उल्लू ही करते हैं। और चूहे किसानों के अनाज का सर्वाधिक नुकसान कर सकते हैं। इसलिये उल्लू किसानों के अनाज में वृद्धि करते हैं, अर्थात वे उसके घर में लक्ष्मी लाते हैं, अर्थात लक्ष्मी का वाहन उल्लू है। इसकी उपरोक्त चार योग्यताओं के अतिरिक्त, जो कि वैज्ञानिक विश्लेषण से समझ में आई हैं, लक्ष्मी का एक सामाजिक गुण भी है, जिसके फलस्वरूप उल्लू लक्ष्मी का वाहन बन सका है। किसी व्यक्ति के पास कब अचानक लक्ष्मी आ जाएगी और कब चली जाएगी, कोई नहीं जानता – प्रेम जी अचानक कुछ महीने भारत के सर्वाधिक धनवान व्यक्ति रहे, और अचानक ‘साफ्टवेअर’ उद्योग ढीला पड़ने के कारण वे नीचे गिर गये। चूँकि उल्लू के उड़ने की आहट भी नहीं आती, अतएव लक्ष्मी उस पर सवार होकर कब आ जाएँगी या चली जाएँगी, पता नहीं चलता।


यद्यपि हमारे ऋषियों के पास वैज्ञानिक उपकरण नहीं थे, तथापि उनकी अवलोकन दृष्टि, विश्लेषण करने और संश्लेषण करने की शक्ति तीव्र थी। उल्लू को श्री लक्ष्मी का वाहन बनाना यह सब हमारे ऋषियों की तीक्ष्ण अवलोकन दृष्टि, घटनाओं को समझने की वैज्ञानिक दृष्टि और सामाजिक–हित की भावना दर्शाता है। आमतौर पर उल्लू को लोग निशाचर मानते हैं, उसकी आवाज को अपशकुन मानते हैं, उसे खंडहर बनाने वाला मानते हैं। इसलिये आम लोगों के मन में उल्लू के प्रति सहानुभूति तथा प्रेम न होकर घृणा ही रहती है। इस दुर्भावना को ठीक करने के लिये भी उल्लू को लक्ष्मी का वाहन बनाया गया। और यह उदाहरण कोई एक अकेला उदाहरण नहीं है। सरस्वती का वाहन हंस, कार्तिकेय का वाहन मयूर, गणेश जी का वाहन चूहा भी वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत समाजोपयोगी संकल्पनाएँ हैं। इन अवधारणाओं का प्रचार अत्यंत सीमित होता यदि इन्हें पुराणों में रखकर धार्मिक रूप न दिया होता। इसलिए इस देश में उल्लू, मयूर, हंस, सारस, चकवा, नीलकंठ, तोता, सुपर्ण (गरूड़), मेंढक, गिद्ध आदि को, और भी वृक्षों को, जंगलों को इस तरह धार्मिक उपाख्यानों से जोड़कर, उनकी रक्षा अर्थात पर्यावरण की रक्षा हजारों वर्षों से की गई है। किन्तु अब अंग्रेजी की शिक्षा ने तो नहीं किन्तु अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा ने हमारी आज की पीढ़ी को इस सब ज्ञान से काट दिया है। और आज हम भी पाश्चात्य संसार की तरह प्रकृति का शोषण करने में लग गये हैं। तथा पर्यावरण एवं प्रकृति का संरक्षण जो हमारी संस्कृति में रचा बसा था उसे हम भूल गये हैं। यह संरक्षण की भावना, अब कुछ पाश्चात्य प्रकृति–प्रेमियों द्वारा वापिस लाई जा रही है। एक बात को स्पष्ट करना आवश्यक है कि इन प्रतीकों का वैज्ञानिक तथा सामाजिक के अतिरिक्त आध्यात्मिक अर्थ भी होता है।


निष्कर्ष यह है कि हमारी पुरानी संस्कृति में वैज्ञानिक सोच तथा समझ है, उसके तहत हम विज्ञान पढ़ते हुए आधुनिक बनकर ‘पोषणीय उन्नति’  (सस्टेनैबल प्रोग्रैस) कर सकते हैं। आवश्यकता है विज्ञान के प्रभावी संचार की जिस हेतु पुराणों के उपाख्यान एक उत्तम दिशा दे सकते हैं। और इस तरह हम मैकाले की शिक्षा नीति (फरवरी, 1835) – “ब्रिटिश शासन का महत् उद्देश्य (भारत में (उपनिवेशों में)) यूरोपीय साहित्य तथा विज्ञान का प्रचार–प्रसार करना होना चाहिये।”  के द्वारा व्यवहार में भ्रष्ट की गई अपनी उदात्त संस्कृति की पुनर्स्थापना कर सकते हैं। वे विज्ञान का प्रसार तो कम ही कर पाए यद्यपि अंग्रेजी का प्रचार–प्रसार करने में उन्होंने आशातीत सफलता पाई। हमारा उद्देश्य पाश्चात्यों की नकल करना छोड़कर, भारतीय भाषाओं में ही प्रौविज्ञान का प्रचार–प्रसार करना होना चाहिये और तभी वह अधिक सफल भी होगा। तभी हम प्रौविज्ञान के क्षेत्र में, वास्तव में, अपनी अनुसन्धान शक्ति से, विश्व के अग्रणी देशों में समादृत नाम स्थापित कर सकेंगे। तब हम और भी अधिक गर्व से कह सकेंगे कि हम हिन्दू हैं। वैसे यह भी आज के दिनों में कम गर्व की बात नहीं कि विश्व में केवल हिन्दू धर्म है जो पूर्णतः न सही किन्तु सर्वाधिक विज्ञान–संगत है।

'ईश्वर कण' (गाड पार्टिकल)

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'ईश्वर कण' (गाड पार्टिकल)
- विश्व मोहन तिवारी, एयर वाइस मार्शल, से. नि. 




 'ईश्वर कणकी खोज का प्रयास 'लार्ज हेड्रान कोलाइडर' की मदद से हो रहा है जिसमें दस अरब डालर (विश्व का सर्वाधिक खर्चीला वैज्ञानिक प्रयोगलग चुका है। 'ईश्वर कण' 'हिग्ग्ज़ कण' का ही लोकप्रिय नाम है। १९६४ में पीटर हिग्ग्ज़ ने 'हिग्ग्ज़ कणकी परिकल्पना में कहा कि ब्रह्माण्ड में सब जगह हिग्ग्ज़ क्षेत्र और हिग्ग्ज़ कण व्याप्त हैं। और नोबेल सम्मानित वैज्ञानिक लेओन लेडरमैन ने इसके मह्त्व को देखते हुए इसे 'ईश्वर कणकी संज्ञा दी थी। इस 'ईश्वर कणके दर्शन अभी तक नहीं हो सके हैं। कुछ वैज्ञानिक इसके होने में भी संदेह करते हैं। स्टीफ़ैन हाकिंग ने हिग्ग्ज़ से १०० डालर की शर्त लगा ली है कि यह नहीं दिखेगा।
            

  यह प्रयोग अद्वितीय है और अद्भुत है क्योंकि इसे स्विस और फ़्रैन्च भूमि के १०० मीटर के नीचे २७ किलोमीटर गोल सुरंग में किया जा रहा है। इस सुरंग में एक विशेष नली है जिसमें प्रोटान या सीसे के आयनों आदि परमाण्विक कणों को लगभग प्रकाश के वेग पर पहुँचाकर उनमें मुर्गों की तरह टक्कर कराई जाती है,  किन्तु यह टक्कर मनोरंजन के लिये नहींवरन उस टक्कर से उत्पन्न नए कणों की 'आतिशबाजीका सूक्ष्म अध्ययन किया जाता है। क्वार्क्स के बने भारी परमाण्विक कणजैसे प्रोटान,  'हेड्रान' कहलाते हैं। इसीलिये इस भूमिगत 'महाचक्रका नाम 'लार्ज हेड्रान कोलाइडर' ( विशाल हेड्रान संघट्टक) है। इससे सभी वैज्ञानिकों को बड़ी आशाएँ हैं,  बहुत मह्त्वपूर्ण खोजों में इससे सहायता मिलेगी।
             

 इस समय इसका प्रमुख लक्ष्य है 'ईश्वर कणकी खोज।  

 क्या है यह ईश्वर कण ?
             

 डाहिग्ज़ की संकल्पना है कि समस्त दिक मेंशून्य में भीएक 'क्षेत्र' (फ़ील्डहैजोउपयुक्त दशाओं में पदार्थों को द्रव्यमान देता है। जिस भी कण में द्रव्यमान हैउसे वह हिग्ग्ज़ क्षेत्र से प्रतिक्रिया करने पर प्राप्त हुआ है। अर्थात यदि हिग्ग्ज़ क्षेत्र नहीं होता तो हमें यह समझ में ही नहीं आता कि पदार्थों में द्रव्यमान कैसे आता है। हिग्ग्ज़ क्षेत्र में 'हिग्ग्ज़कण होता है जिसे 'हिग्ग्ज़ बोसानकहते हैं।              

क्या है यह 'हिग्ग्ज़ बोसान'?
             

 ब्रह्माण्ड में कुछ मूल कण हैं जैसे इलैक्ट्रानक्वार्कन्यूट्रिनो फ़ोटानग्लुआनआदि,  और कुछ संयुक्त कणजैसे प्रोटानन्यूट्रान आदिजो इन मूल कणों के संयोग से निर्मित होते हैं। सारे पदार्थ इऩ्ही मूल कणों तथा संयुक्त कणों से निर्मित हैं। हिग्ग्ज़ क्रिया विधि से पदार्थों में द्रव्यमान आता है जिससे उनमें गुरुत्व बल आता है। इसे सरलरूप में समझने के लिये मान लें कि हिग्ग्ज़ क्षेत्र 'शहदसे भरा है। अब जो भी कण इसके सम्पर्क में आएगाउसमें उसकी क्षमता के अनुसार शहद चिपक जाएगीऔर उसका द्रव्यमान बढ़ जाएगा। यह 'हिग्ग्ज़ बोसानमूलकण भौतिकी के अनेक प्रश्नों के सही उत्तर दे रहा हैऔर भौतिकी के विकास में यह मह्त्वपूर्ण स्थान रखता है। जब कि अन्य सब मूल कण देखे परखे जा चुके हैंकिन्तु 'हिग्ग्ज़ बोसान' अभी तक देखा नहीं जा सका है। इसके नाम में हिग्ग्ज़ के साथ बोस का नाम क्यों जोड़ा गया ?
           

   सत्येन्द्र नाथ बसु विश्व के प्रसिद्ध वैज्ञानिक हुए हैंजिऩ्होंने१९२० मेंएक प्रकार के मूल कणों के व्यवहार के सांख्यिकी सूत्र आइन्स्टाइन को लिख कर भेजेक्योंकि उऩ्हें आशंका थी कि उनकी क्रान्तिकारी बात को अन्य वैज्ञानिक समुचित महत्व न दें। उस समय केवल 'फ़र्मियानकण का ही व्यवहार समझा गया थाजो कि वे मूल कण हैं जो 'फ़र्मी डिरैक' के सांख्यिकी सूत्रों के अनुसार व्यवहार करते हैं। आइन्स्टाइन ने बसु के सूत्रों को संवर्धित कर प्रकाशित करवाया। उनके सूत्र इतने क्रान्तिकारी थे कि उऩ्होंने एक नए प्रकार के कण के अस्तित्व की भविष्यवाणी की। उन नए मूल कणों का नामजो उनके सूत्रों के अनुसार व्यवहार करते हैं,  'बोसान' रखा गया। अर्थात अब व्यवहार की दृष्टि से मूल कण दो प्रकार के माने जाने लगे 'फ़र्मियानतथा 'बोसान'। और 'ईश्वर कणया 'हिग्ग्ज़ कणजिसकी खोज चल रही है मूलतबोसान कण हैअत:  'हिग्ग्ज़ बोसान' !
             

 इस प्रयोग से विज्ञान के किन रहस्यों को समझा जा सकेगा?
              

ब्रह्माण्ड में कुल चार प्रकार के ही बल मूल हैंतीव्र बलदुर्बल बलविद्युत चुम्बकीय बल तथा गुरुत्व बल। जब चारों एकीकृत हो जाएंगे तब 'आइन्स्टाइन का 'एकीकृत क्षेत्र सिद्धान्त' का स्वप्न भी साकार हो जाएगा। हिग्ग्ज़ बोसान को समझने से गुरुत्वबल को समझने में और उसके अन्य तीन मूल बलों के साथ संबन्ध समझने में मदद मिलेगी।
            

  आइन्स्टाइन के दोनों आपेक्षिक सिद्धान्त ब्रह्माण्ड के विशाल रूप को ही समझा पाते हैंऔर क्वाण्टम सिद्धान्त केवल अणु के भीतर के सूक्ष्म जगत को। एक सौ वर्षों के बाद भी वैज्ञानिक अभी तक इनमें सामन्जस्य पैदा नहीं कर पाए हैं। हिग्ग्ज़ बोसान पर यह प्रयोग क्वाण्टम सिद्धान्त तथा व्यापक आपेक्षिक सिद्धान्त में भी सामंजस्य पैदा कर सकेगा।
            

  ब्रह्माण्ड में हमें जितना भी पदार्थ दिख रहा है वह कुल का मात्र ४ है२३ अदृश्य पदार्थ है और ७३ अदृश्य ऊर्जा है। यह प्रयोग इस अदृश्य ऊर्जा तथा अदृश्य पदार्थ को समझने में भी मदद करेगा।
             

 महान विस्फ़ोट में जब ऊर्जा कणों में बदलने लगी तब कण तथा 'प्रतिकण', जैसे इलैक्ट्रान और पाज़ीट्रान,  बराबर मात्रा में उत्पन्न हुए थेकिन्तु अब तो प्रतिकण नज़र ही नहीं आते। कहाँ गएक्या हुआ उनकाइसकी भी छानबीन यह 'महाचक्रइसी ईश्वर कण के माध्यम से करेगा।              यह भी कि क्या दिक के तीन से भी अधिक आयाम हैंऔर क्या गुरुत्व का कुछ प्रभाव उन आयामों में बँट जाता है !
           

   महान विस्फ़ोट के एक सैकैण्ड के एक अरबवें हिस्से में क्या हो रहा था इसकी एक झलक सूक्ष्म रूप में यह प्रयोग दिखला सकता है।  
            

  महान विस्फ़ोट के एक सैकैण्ड के भीतरजब तापक्रम बहुत ठंडा होकर लगभग १००० अरब सैल्सियस हुआतब जो ऊर्जा थी वह कणों में बदलने लगी थी। तब उस समय की प्रक्रिया को समझने के लिये हमें महान विस्फ़ोट पैदा करना होगावह तो ब्रह्माण्ड को भस्म कर देगाकिन्तु यह प्रयोग एक अति सूक्ष्म 'महान विस्फ़ोट'  पैदा करेगा इसके लिये सीसे के नाभिकों को निकट प्रकाश वेग पर यह 'महाचक्र' (विशाल हेग़्रान संघट्टकउनमें टक्कर कराएगा। उस क्षण उन कणों में जो ऊर्जा रही होगीवही ऊर्जा प्रकाश वेग निकट से चलने वाले हेड्रान कणों में होती है। इस तरह हेड्रान कणों को समझने से हमें यह समझ में आ सकेगा कि ब्रह्माण्ड का उद्भव और विकास किस प्रक्रिया से हुआ थातब हम आज की बहुत सी वैज्ञानिक समस्याओं को समझ सकते हैंप्रकृति के नियमों को बेहतर समझ सकते हैं। यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं है कि हम इस विशाल जगत को बेहतर समझ सकते हैं यदि हम सूक्ष्म जगत को समझ लेंऔर इसका विलोम भी सत्य है कि विशाल जगत को समझने से हम सूक्ष्म जगत बेहतर समझ सकते हैं। अर्थात दोनो में सामन्जस्य का होना बहुत आवश्यक है। यह सिद्धान्त आध्यात्मिक आयाम में भी सत्य है; यदि अमृतत्व प्राप्त करना हैतब विद्या भी आवश्यक है और अविद्या भी ।
             

 यह तो स्पष्ट है कि यदि ईश्वर कण दिख भी गयातब भी वैज्ञानिक ईश्वर में विश्वास करने नहीं लग जाएंगे । अत:  इसे 'ईश्वर कणकह देना अवैज्ञानिक तो है, और कुछ अतिशयोक्ति भी हैकिन्तु बहुत अधिक नहीं,  क्योंकि यह नाम उसका विशेष मह्त्व निश्चित दर्शाता है।
              

सर्न यूरोपीय नाभिकीय अनुसंधान केन्द्र)  स्थित इस महाचक्र यंत्र में अद्वितीय़ तथा अकल्पनीय प्रयोग हो रहे हैं, 'ईश्वर कण'  की खोज हो रही है। इसमें ऊर्जा की अकल्पनीय मात्रा से लदे प्रोटानों की टक्कर की जा रही है। इसमें कुछ वैज्ञानिक बड़े खतरे की संभावना की चेतावनी दे रहे हैं कि इस टक्कर से 'कृष्ण विवर'  (ब्लैक होलउत्पन्न होंगेजो पृथ्वी को ही लील जाएँगे। ऊर्जा की अकल्पनीय मात्रा से लदे इन प्रोटानों में यथार्थ में एक या दो मच्छड़ों के बराबर ऊर्जा होती है !! सर्न के वैज्ञानिक कहते हैं कि वे इस खतरे को समझते हैं और यह कि 'कृष्ण विवरबनेगा ही नहीं। और यदि मान लें कि बन भी गया तब अधिक से अधिक वह कृष्ण विवर कुछ ही क्षणों में बिना नुकसान किये फ़ूट जाएगा।
             

 ३० मार्च १० के प्रयोग में 'महाचक्रने ३.५ TeV टेरा (३५ खरब इवो)  इलेक्ट्रान वोल्ट ऊर्जा के प्रति कणों की टक्कर कराने का एक विश्व कीर्तिमान स्थापित किया है। कितनी ऊर्जा होती है 'टेरा इवोमें ?  जब एक प्रोटान की ऊर्जा १ टेरा इवो होती है तब उसका द्रव्यमान स्थिर दशा की अपेक्षा १००० गुना बढ़ जाता है अर्थात जब एक प्रोटान के वेग को इतना बढ़ाया जाए कि उसकी ऊर्जा ३.५ टेरा इवो हो जाएतब उसका द्रव्यमान बढ़कर ३५०० गुना हो जाएगा किन्तु महत्वपूर्ण परिणाम देखने के लिये ७ टेरा इवो. (TeV)  प्रति कण की ऊर्जा चाहियेजिसकी तैयारी चल रही है। और सीसे के नाभिक की टक्कर के लिये तो ५७४ TeV प्रति नाभिक की ऊर्जा चाहिये होगी। सूक्ष्म विस्फ़ोट के लिये भी बहुत सम्हलकर चलना पड़ता है।
              

और यदि स्टीफ़ैन हाकिंग अपनी शर्त जीतते हैंतब भी वैज्ञानिकों को बहुत निराशा नहीं होगीक्योंकि विज्ञान के मह्त्वपूर्ण प्रयोगों में नकारात्मक परिणाम भी मह्त्वशायद अधिक महत्वरखते हैं। ऐसे में क्रान्तिकारी परिकल्पनाएँ सामने आती हैंजैसे कि आइन्स्टाइन की विशेष आपेक्षिक सिद्धान्त की `१९०५' में आई थी जब १८८७ में माईकल्सन मोर्ले ईथर के अस्तित्व को सिद्ध नहीं कर सके थे।
             

  ऐसा आरोप भी अनेक विद्वान लगा रहे हैं कि जब विश्व में इतनी भयंकर दरिद्रता छाई है तब खरबों डालर इस नास्तिक ईश्वर कण पर क्यों खर्च किये जा रहे हैं!! मुझे फ़्रान्स की प्रसिद्ध क्रान्ति की एक घटना याद आ रही है। आधुनिक रसायन शास्त्र के जन्मदाता लावासिए, जिऩ्होंने पदार्थ के कभी भी नष्ट न होने के सिद्धान्त को स्थापित किया था, को उस क्रान्ति के दौरान फाँसी का दण्ड घोषित किया गया, केवल इसलिये कि वे राजा लुई चौदह के राजस्व अधिकारी थे। कुछ समझदार लोगों ने जज के सामने पैरवी की कि लावासिए बहुत ही प्रतिभाशाली व्यक्ति हैं, तब उस जज ने जो उत्तर दिया वह चकित करने वाला है, कि जनतंत्र को प्रतिभाशाली व्यक्तियों की आवश्यकता नहीं है।

भगवान भला करें उस नास्तिक वैज्ञानिक का जिसने एक अज्ञात कण को 'ईश्वर कण' का नाम दिया। वरना ऐसे समाचार पत्र कम ही हैं जो विज्ञान के प्रयोगों के समाचार देते हैं।


ई १४३, सैक्टर २१, नौएडा, २०१३०१.

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