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इक्कीसवीं सदी आम लोगों की ?

इक्कीसवीं सदी आम लोगों की ? 
 -  डॉ. ओम विकास
Mobile : 098 6840 4129 
     



20वीं सदी में मशीनीकरण से मानव-शक्ति के परे सुनियोजित ढंग से अभिनव जटिल कार्य करना संभव हुआ । कुछ विचारकों ने प्रकृति को ध्यान से देखा, प्रकृति में गति है, घटनाओं में कुछ क्रम है, एक दूसरे पर प्रभाव है - कहीं आकर्षण / खिंचाव है, तो कहीं विकर्षण / हटाव है, आकार और स्वरूप में परिवर्तन भी । नियंता कोई एक होगा पता नहीं, लेकिन प्रकृति के व्यवहार में नियम अवश्य हैं । इन नियमों के आधार पर मानवकृत घटनाएं भी सम्भव हो सकती हैं । प्राकृतिक घटनाओं के अवलोकन, परीक्षण, सत्यापन के आधार पर नियम और उनके आधार पर अन्य घटनाओं का विश्लेषण अध्ययन विज्ञान कहलाया । विज्ञान के सहारे नए यंत्र, प्रविधि, उत्पाद बनने लगे, उद्योग विकसित हुए । इसे प्रौद्योगिकी/तकनीकी/ टैक्नोलॉजी कहा जाने लगा - प्राकृतिक नियमों के आधार पर मानवकृतियों के बनाने की युक्ति/यंत्रादि । 




शक्ति के मशीनीकरण से उद्योग धंधे बढ़े, कम कीमत पर रोजमर्रा के काम की चीज़ें सुलभ होने लगीं । इसे औद्योगिक क्रांति कहा गया । पश्चिमी देशों ने औद्योगिक क्रांति का खूब लाभ उठाया, दूसरे देशों में फैलने लगे, उपनिवेशवाद को पनपाया । विश्व स्तर पर सत्ता का केन्द्रीकरण बढ़ा, सत्ता में मानवीय मूल्यों का लोप होने लगा । परंपरागत ज्ञान का ह्रास हुआ, जनता की दुर्दशा बढ़ती गई। सामाजिक व्यवस्था में विषमता बढ़ी । इसे सोशल डिवाइड अर्थात् समाज विखंडन कह सकते हैं । 




20वीं सदी के उत्तरार्ध में सेमीकंडक्टर के आधार पर ऐसे इलेक्ट्रोनिक्स उपकरणों का अविष्कार हुआ जिनसे किसी इलेक्ट्रिक सिग्नल को नियमित ढंग से बढ़ाना, स्टोर करना और सुचारू तार माध्यम से एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजना आसान हुआ । सही और तेज गति से जटिल गणना करने के लिए कंप्यूटर विकसित हुए । 1980 के दशक से सूचना की उपयोगिता उद्योगों, प्रशासन और वैयक्तिक स्तर पर तेजी से बढ़ने लगी । इसे सूचना क्रांति कहा जाने लगा । सूचना संसाधन में मानव मस्तिष्क की विश्लेषणात्मक प्रतिभा की अनुकृति के प्रयास सघन होने लगे । मस्तिष्क के मशीनीकरण की दिशा में बढ़ रहे हैं । मानव जैसा सामान्य विवेक और ज्ञान कंप्यूटर में भी सुलभ होगा । 21वीं सदी में ‘ज्ञान पोषित समाज’(Knowledge based society) के उदय होने की अवधारणा के साथ ज्ञान तकनीकी/टैक्नोलॉजी (Knowledge Technology) का विकास तेजी से होने लगा है । 




‘ज्ञान पोषित समाज’ की अवधारणा पर आधारित नीतियों से सामाजिक व्यवस्था फिर चरमरायी । अब ज्ञान का पात्र भी धन और भाषा के आधार पर अवसर पाता है । वैश्वीकरण ने राज-नेतृत्व को वशीभूत ऐसा किया है कि अपनी सोच पर भरोसा नहीं । जिस तरह से टैक्नोलॉजी और अन्य उत्पादों का आयात करते हैं, उसी सहजता से ज्ञान/शिक्षा के मॉडल/प्रविधि के आयात के प्रयास होने लगे हैं । इंग्लिश कक्षा- 1 से और विज्ञान की पढ़ाई/रटाई इंग्लिश में राष्ट्रीय नीति का हिस्सा बनते जा रहे हैं । परिवेश में पारस्परिक विनिमय से सीखने और ज्ञान वृद्धि का कोई अवसर नहीं । मनोगृंथि में परिवेश पिछड़ा है । वैश्वीकरण का चोला पहने योजनाकार बगुला भगतों की पोल तब खुलेगी, जब विदेश के वैज्ञानिकों के सम्मुख नई पीढ़ी के अधिकांश विज्ञानियों में न तो अविष्कारोन्मुखी नवाचार (Innovation) प्रवृत्ति होगी और न ही आधारभूत संकल्पनाओं की सही समझ । नवाचार के अभाव में कोई भी समाज अग्रणी नहीं बन पाता । घर पर मां ने प्राकृतिक घटनाओं को निकट परिवेश की चीजों के माध्यम से मातृभाषा में समझाया, जिसे बालक ने परिवेश में लोगों से मिलते-जुलते लोकभाषा में दुहराया, परिमार्जित किया । मुस्कराता बड़ा हुआ । बालक स्कूल में जाते ही इंग्लिश में शब्द ज्ञान करता है, पहाड़े-पोइम इंग्लिश में रटता है, घर लौट कर परिवेश में घूमते हुए क्लास में रटे हुए शब्द सुनाई नहीं देते । वह भी बोले तो किससे बोले, क्योंकि परिवेश तो अपना है, ज्ञान अन्य भाषा में थोपा हुआ । कॉलेज में ज्ञान की तह पर तह जुड़ती हैं, ढहती हैं, जैसे बालू पर भवन निर्माण किया जा रहा हो । देश-विदेश के मनोवैज्ञानिकों का स्पष्ट अध्ययन है कि प्राथमिक शिक्षा लोकभाषा में दी जानी चाहिए, अन्यथा सार्थकता कम होगी, नवाचार भी कम अथवा नगण्य होगा । 




वैश्वीकरण के मंच पर जल्दी पहचान बने इसलिए शासक और प्रशासक वर्ग पश्चिमी ज्ञान मॉडल को उपयुक्त मानते हैं । बिल्लियों की लड़ाई का लाभ बंदर को होता है । भारत में भाषा वैविध्य है, सो लाभ इंग्लिश को होता है । समाज में विषमता बढ़ती जा रही है । समाज बंटने लगा - अवसरवादी, बेवस और परंपरावादी । बेवस जनता का हिस्सा तीन चौथाई से अधिक होता जा रहा है। यानि 75 करोड़ लोगों को ज्ञान सुलभ नहीं, जो ज्ञान मिला वह उपयोगी कम है, उससे नवाचार और उद्यमिता की संभावनाएं भी कम हैं । संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की 2004 की (HDI) रिपोर्ट के अनुसार मानव विकास सूचकांक (HDI) भारत का 0.559, जबकि प्रतिद्वंदी चीन का 0.745 और संयुक्त राज्य अमेरिका का 0.939 है। HDI की गणना औसत आयु, ज्ञान और आय के आधार पर करते हैं । इन आँकड़ों से यह बात स्वयं सिद्ध है ।




NASSCOM रिपोर्ट के अनुसार केवल 15-20 प्रतिशत ग्रेज्युएट ही इन्फोर्मेशन टैक्नोलॉजी इंडस्ट्री में काम करने लायक निकलते हैं । शिक्षा में गुणवत्ता का अभाव है । INSDOC की रिपोर्ट के अनुसार भारत के वैज्ञानिकों का जो दुनिया की तीसरी तादाद हैं, शोध-परक प्रकाशन 1.6 प्रतिशत से कम है । यहां के लेवर (श्रमिक) की कुशलता में गुणवत्ता का अभाव है । कारण पढ़ाई-प्रशिक्षण परिवेश से काटकर कराते हैं । इन्फॉरर्मेशन टैक्नॉलोजी में हमारे उद्यमी लागों ने नाम कमाया - मुख्यत: कार्मिक की तरह, अविष्कारक की तरह नहीं नगण्य, विश्व स्तरीय नया उत्पाद/सेवा देकर नहीं । कारण परिवेश से कटकर पढ़ाई की । नवाचार एवं उद्यमिता पनपने का अवसर न मिला । वैश्विक समस्या पर्यावरण प्रदूषण की है ।‘पर्यावरण विज्ञान’ विषय स्कूलों, कॉलेजों में पढ़ाया जाने लगा , लेकिन उदाहरण विदेशी मॉडल से ही । पहले भाषा और विज्ञान में मेल-जोल था, कवियों ने पेड़, पौधों, मौसम, प्रकृति आदि के सुन्दर वर्णन किए हैं । अब इन कवियों को पढ़ने, सुनने का भी अवसर नहीं, पाठ्यक्रम इतना भारी बना दिया कि बिना यतन के परिवेश से कटने लगे । भाषा में वर्ण, अक्षर और शब्द के गुणबोधक अर्थ होते हैं । मूल संकल्पनाओं से जटिल संश्लेषित संकल्पनाओं की समझ शब्दों के सहारे आसान होती है । फूल-पौधों के नाम लैटिन में रटाते हैं, अपनी भाषा में नहीं । संस्कृत शब्द सभी भारतीय भाषाओं में 40-80% तक मिल जाते हैं । इसका लाभ उठाना आवश्यक है । हिन्दी 60% से अधिक लोग समझते हैं । देश की इतनी बड़ी आबादी (600 मिलियन से अधिक) हिन्दी में काम कर सकती है, लेकिन सरकारी विकास कार्य सीमित ही रह जाते हैं । जनगणना के रिकोर्ड अंग्रेजी और स्थानीय भाषा में होते हैं । नाम–पते अंग्रेजी में सही उच्चरित न होने पर भी मान्य हैं, लेकिन राजभाषा हिन्दी में नहीं । न्याय भी अंग्रेजी में मान्य है । सिफारिश भी अंग्रेजी में चलती है । मीडिया भी आम आदमी की आपदा-घटनाओं को अंग्रेजी शब्दों से संवेष्टित कर परोसता है, जो आम आदमी की समझ के परे है । 




अभी तक द्विलिपिक (नागरी-रोमन) की-बोर्ड बाजार में बिकते नहीं । सरकारी दफ्तरों में भी इनकी जरूरत महसूस नहीं होती । हिंदी के सॉफ्टवेयर अलग-अलग, फाइलों की अदला-बदली सुगम नहीं, प्रिंट अलग-अलग कंप्यूटर पर अटपटा से, टूटे अक्षर-मात्राएं आदि। मुफ्त सॉफ्टवेयर (FOSS) का डंका पिटा जाता है, लेकिन काम लायक कम । वह भी कंप्यूटरों पर ऑपरेटिंग सिस्टम के साथ पूर्व लोडित नहीं । स्पीच टैक्नोलॉजी पर काम हो रहा है । अमेरिका और जापान के विज्ञानियों के द्वारा इंग्लिश के लिए विकसित मॉडल पर ही काम करते हैं । संस्कृत में ध्वनि विज्ञान पर शिक्षा शास्त्र प्रातिसाख्य पर लगभग 60 पुस्तकें हैं । भारतीय विज्ञानियों को इस भारतीय ज्ञान को जानने, परखनें की कोई चाह नहीं । वैश्वीकरण की होड़ में परिवेश से कटे हैं, विदेश भ्रमण और (शोध) प्रकाशन की अवसरवादिता की होड़ और दौड़ में व्यस्त हैं । कंप्यूटर विज्ञान का भावी विकास श्रुति (Speech) और संज्ञानिक (Cognition) तकनीकी पर केन्द्रित होगा । 




डिजिटल डिवाइड का भय दिखाकर विदेशी कंप्यूटर और सॉफ्टवेयर का बाजार बढ़ाते जा रहे हैं । विदेशी डिजिटल डिवाइड की अवधारणाओं और तदनुसार समाधान से समाज विश्रृंखलित होता जा रहा है । साधनयुक्त एवं साधनहीन के बीच की विषमता खाई बढ़ती जा रही है । साधनहीन 80 प्रतिशत होते जा रहें हैं, यह खतरे का चिह्न है – सामाजिक क्रांति का पूर्व संदेश । ‘डिजिटल डिवाइड’ के बजाय ‘डिजिटल यूनाइट’ अर्थात् इलेक्ट्रॉनिक सूचना को ज्ञान-गैप को कम करने, विषमता को मिटाने और समाज को जोड़ने में उपयोगी बनाने पर बल दिया जाए, तदनुसार परियोजनाएं चलाएं । ‘ज्ञान पोषित समाज’ की रचना और संवर्धन अपने परंपरागत ज्ञान को जोड़ते हुए नवाचार के साथ करें । सामाजिक और आर्थिक प्रगति के लिए यही एक व्यावहारिक उपाय है । 




UNDP मानव विकास रिपोर्ट 2010 के लिए सदस्य देशों के बहु-आयामी गरीबी सूचकांक (MPI) शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास आदि दस मूलभूत आवश्यकताओं के आधार पर Oxford Poverty & Human Development Initiative (OPHI) ने तैयार किए हैं । इसके अनुसार भारत के 55% यानि लगभग 64.5 करोड़ लोग गरीब हैं । अधिकांश स्कूली बालक कुपोषण के शिकार हैं । गरीब लोग बिहार में सर्वाधिक 81.4% हैं, उत्तर प्रदेश में 59.6%, उत्तर-पूर्वी प्रांतों में 60% हैं । गौरतलब है कि योजना आयोग के गरीबी के आँकड़ों (29%) से दुगनी जनसंख्या (55%) गरीब है ।( संदर्भ : TOI, 15 जुलाई, 2010). आम आदमी के विकास के लिए बहुत अधिक प्रयास किए जाने की जरूरत है । जनसंख्या को जनशक्ति बनाने की आवश्यकता है । 




संवेदनशून्य औद्योगिकीकरण और पूंजीवाद के एकत्व और प्रकृति दोहन से समाज और प्रकृति का संतुलन बिगड़ा है, विकृतियां त्रास और आपदाओं में मुखरित हैं । 21वीं सदी में सामाजिक आलोडन होगा, वैश्विक स्तर पर चर्चाएं आम आदमी की भागेदारी पर केन्द्रित होंगी । विषमता-वैविध्य समता-रचनात्मकता को स्वर देगा । समवेत स्वर गूंजेगा, ‘व्यवस्था आम आदमी पर केन्द्रित लोकपरक हो ‘। बहुत हुआ अंतर-विखंडन देखने और पाटने के प्रयासों का, अब समानता-एकता देखें और तदनुसार प्रयास करें । समेकित टैक्नोलॉजी से सुविधा और संस्कृति से रचनात्मकता का समष्टिगत सुख भोग संभव है। टैक्नोलॉजी का विकास संस्कृति की संरक्षा और संवर्धन को लक्षित हो । संस्कृति आम आदमी की अभिव्यंजना है । आज जो नेतृत्व में हैं विचार करें, 21वीं सदी का विकास आम आदमी पर केन्द्रित हो । अन्य विकल्प कारगर न होंगे ।




इक्कीसवीं सदी आम लोगों की ? इक्कीसवीं सदी आम लोगों की ? Reviewed by Kavita Vachaknavee on Thursday, August 12, 2010 Rating: 5

2 comments:

  1. Aankhe kholane wale aankde. par pichle 15 20 salon men in aankdon men kuch fark hua ya nahee humare statistics bhee to 10 sal purane hote hain. ye lekh padh kar dil se dhuaan sa uthne laga.

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  2. असंतुलित प्रगति की गति बताता यह लेख स्तुतीय है। आभार॥

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