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'गर्म हवा...' : सच्ची घटना पर आधारित

कहानी 

'गर्म हवा...' 
(एक सच्ची घटना पर आधारित)
ललित अहलूवालिया 'आतिश' 



फिलाडेल्फिया से न्यू योर्क वापसी पर रूट ८३ साउथ से आते हुए, पार्सिपनी से कुछ पहले, बांये हाथ पे एक एक्सिट है; जिसका रैम्प दूर तक उतर जाता है! ये रास्ता आगे से दाँए, गोल घूमता हुआ ८३ नोर्थ, यानी उलटे रास्ते हो लेता है; या सीधे जा कर फिर से ८३ साउथ में मिल जाता है! इस रास्ते पर दाँए गोल घूमने के बजाय यदि सीधा जाएं तो लगभग एक मील पर छोटा सा, पिछड़ा हुआ सा टाउन है! मील भर के इस फासले के बीच केवल दो पम्प वाला छोटा सा पट्रोल-पम्प है; और उसी में एक छोटी सी सिग्रट, सोडा, दूध इत्यादि की दूकान भी सटी है! इक्का दुक्का खरीदार कभी कभार शायद आ भी जाते होंगे; अन्यथा ऐसी जगह पर व्यवसाय का आईडिया जाने किस दिमाग की उपज था!



जुलाई के अंतिम सप्ताह, दोपहर लगभग एक बजे, चिलचिलाती धूप में, शायद ९० डिग्री तापमान रहा होगा; मैंने रास्ते पर पेट्रोल-पम्प का साइन देखा और अचानक ये सोच कर एक्सिट ले लिया की गाड़ी का टेंक भरवा लूँगा, और इतनी गर्मी में रास्ते के लिए कुछ बियर भी रख लूँगा! पहुँचने पर देखा, वहां तो दिन में ही उल्लू बोल रहे थे! दूकान का दरवाज़ा भी बंद था, और उस पर साइन लगा था, 'जुलाई और अगस्त' माह में पट्रोल-पम्प दोपहर १२ से ३ बजे तक बंद रहेगा'! मैं वापस आ कर गाड़ी में बैठ गया, और फिर से हाई-वे की ओर गाड़ी घुमा ली! मैं ज्यों ही चलने को हुआ, देखा पम्प से कुछ दूरी पर एक पुराने मॉडल की लेकिन साफ़, सिल्वर कार के पास लगभग ८० बरस की एक व्हाइट-अमेरिकेन बुढ़िया सड़क पर ही कार से टेक लगा कर बेठी थी! मैंने जैसे ही उसकी ओर देखा, उसने तुरंत ही हाथ हिला कर पास आने का संकेत किया! बुढ़िया की हालत देख कर मैं फ़ौरन ही गाड़ी से उतर कर उसके पास पहुंचा! धो कर निचोड़ी हुई चूनर जैसी चेहरे की बारीक झुर्रियों से पसीना, झूलती हुई गर्दन तक बह निकला था! पतली टहनी से पाँव में प्लास्टिक के बीच-सेंडल, और हलकी वन-पीस नारंगी ड्रेस के अन्दर इकहरा बदन मानो सूखे पत्ते सा लहरा रहा था!




"Is everything OK ma'm? What's the matter?" मैंने खैरियत पूछते हुए हाथ पकड़ कर कर उसे उठाया!



"Please save my Roxy, please, have somebody." उसके खुश्क होटों से आवाज़ नहीं निकल पाई!



इससे पहले के बुढ़िया बेहोश हो कर गिर पड़ती, मैंने उसे अपनी गाड़ी में बैठाया, और एयर-कंडीशन चला दिया! बोतल में कुछ पानी बचा था, जिसे पी कर उसकी सांस में सांस आयी! उसने अपना नाम एस्टेला बताया और हमारी तमाम बातचीत अंग्रेजी में ही हुई! एस्टेला ने बताया की एक घंटे पहले लगभग १२ बजे वो अपनी पोती बैक्की के साथ बीच के लिए निकली थी! बैक्की उसे कार में छोड कुछ सामान, जूस, सोडा वगैरा, लेने दूकान पर गयी थी, और अब तक वापस नही लौटी थी! इस दौरान, मेरे यहाँ पहुँचने से पहले, एस्टेला उसे दूकान पर देखने कार से बाहर निकली थी, गलती से चाबी अन्दर रह गयी और कार बहार से बंद हो गयी थी! दो घंटे होने को थे, और बैक्की का कुछ पता नही था! कार में बंद उसका कुत्ता रोक्सी गरमी से मरने को था! मैं तुरंत ही एस्टेला की सिल्वर कार की ओर दौड़ा! कार की खिड़की से मैंने अन्दर झाँक कर देखा, एक छोटा सा सफ़ेद बालों वाला झबरा कुत्ता रोक्सी शून्य आँखों से रहम की आस लगाये पिछली सीट पर बैठा था! मुझे अन्दर झांकता देख विनती के लिए उससे ठीक प्रकार से दुम्म भी नही हिल रही थी! बस आगे के दो पंजों पर मूह टिकाये देख भर रहा था! उसकी अंखों के कोयों पर जमी कीच की लीक, उसके सूख चुके आंसुओं की कहानी कह रही थी! सामने की सीटों के बीच पानी की एक बड़ी बोतल भी थी, लेकिन बोतल इतनी बड़ी थी की रोक्सी का मूंह उसमे दांत गड़ाने के लिए बहुत छोटा था! मैंने नज़र घुमा कर चारों ओर देखा, कहीं कोई आता जाता दिखाई नही पड़ा! तेज़ गर्म हवा आस-पास की धूल को घागर सा घुमाती चोट पे चोट कर रही थी! एस्टेला से बैक्की का सेल्ल नंबर ले कर फ़ोन भी किया, लेकिन उसका सेल्ल भी कार में ही बजता रहा! तीन बजने में अभी काफी समय था, सो दूकान खुलने की भी कोई उम्मीद नही थी!




जब कोई चारा न रहा, तो हार कर पुलिस को फ़ोन किया! पुलिस को लोकेशन समझाने में भी काफी समय लगा! लगभग चालीस मिनट बाद पुलिस वहां पहुंची! एस्टेला भी मेरी गाड़ी से निकल कर बहार आ पहुंची और पुलिस को फिर से कहानी दोहराने लगी! एस्टेला की कार का ख़ास मॉडल होने के कारण लम्बी कोशिश के बाद ही दरवाज़ा खुल पाया! दरवाज़ा खुलते ही रोक्सी ने एक लम्बी छलांग भरी और एस्टेला के पावों में आ गिरा! और फिर देखते ही देखते दम तोड़ दिया! पुलिस का एक मुलाजिम दुकान के पास गया! दरवाज़े पर लगे ताले को देख कर, कुछ सोच कर, वो दूकान के पिछले हिस्से की ओर चला गया! कुछ ही देर में एक लड़की के चीखने की आवाज़ सुनाई दी और पल भर में ही पुलिस के मुलाजिम के साथ एक युवा लड़की और एक अधेड़ युवक लड़खड़ाते हुए आते दिखाई दिए! 




बातों से पता चला की अधेड़ युवक दूकान का मालिक था, और वो लड़की बैक्की थी! दुकानदार, बैक्की को पहले से ही जानता था, और बैक्की अक्सर उसकी दूकान पर नशा करने आया करती थी! पुलिस ने बताया के नशे के सिलसिले में वो दोनों कई बार पहले भी पकड़े जा चुके थे! बैक्की नशे में इतनी धुत्त थी के एस्टेला से माफ़ी तक नही मांग सकी! पुलिस अधिकारियों ने पहले रोक्सी के मरने पर एस्टेला से अफ़सोस ज़ाहिर किया, और फिर मेरा शुक्रिया अता कर, बैक्की और दुकानदार को अपने साथ ले कर र'वाना हो गए! एस्टेला ने बैक्की को नज़र उठा कर भी नही देखा, बस रोक्सी की लाश पर हाथ फेरती रही और रोती रही! पुलिस के जाने के बाद मैंने एस्टेला से पूछा यदि मैं उसकी कुछ मदद कर सकता हूँ? उसने डबडबाई आँखों से देखते हुए बस इतना कहा... 



"मुझे पेट्ट सेमेट्री पहुँचा सकते हो?" 



***
'गर्म हवा...' : सच्ची घटना पर आधारित 'गर्म हवा...'  :  सच्ची घटना पर आधारित Reviewed by Kavita Vachaknavee on Thursday, August 12, 2010 Rating: 5

5 comments:

  1. ओह दिल में नश्‍तर की तरह चुभने वाली कहानी। सुखों से परिपूर्ण दुनिया का नवीन रूप।

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  2. जीवन का हर पहलू उजागर करती एक दर्दनाक कहानी !

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  3. ये नशा भी मनुष्य को अमानुस बना देता है।

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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