मेरी ज़ात है ......



मेरी जात है .........




अगर हम दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को आरक्षण देते रहना चाहते हैं तो जन-गणना में जाति का हिसाब तो रखना ही होगा| उसके बिना सही आरक्षण की व्यवस्था कैसे बनेगी ? हाँ, यह हो सकता है कि जिन्हें आरक्षण नहीं देना है, उन सवर्णों से उनकी जात न पूछी जाए| लेकिन इस देश में मेरे जैसे भी कई लोग हैं, जो कहते हैं कि मेरी जात सिर्फ हिंदुस्तानी है और जो जन्म के आधार पर दिए जानेवाले हर आरक्षण के घोर विरोधी हैं, उनकी मान्यता है कि जन्म याने जाति के आधार पर दिया जाने वाला आरक्षण न केवल राष्ट्र-विरोधी है बल्कि जिन्हें वह दिया जाता है, उन व्यक्तियों और जातियों के लिए भी विनाशकारी है| इसीलिए जन-गणना में से जाति को बिल्कुल उड़ा दिया जाना चाहिए|



जन-गणना में जाति का समावेश किसने किया, कब से किया, क्यों किया, क्या यह हमें पता है ? यह अंग्रेज ने किया, 1871 में किया और इसलिए किया कि हिंदुस्तान को लगातार तोड़े रखा जा सके| 1857 की क्रांति ने भारत में जो राष्ट्रवादी एकता पैदा की थी, उसकी काट का यह सर्वश्रेष्ठ उपाय था कि भारत के लोगों को जातियों, मजहबों और भाषाओं में बाँट दो| 



मज़हबों और भाषाओं की बात कभी और करेंगे, फिलहाल जाति की बात लें| अंग्रेज के आने के पहले भारत में जाति का कितना महत्व था ? क्या जाति का निर्णय जन्म से होता था ? यदि ऐसा होता तो दो सौ साल पहले तक के नामों में कोई जातिसूचक उपनाम या 'सरनेम' क्यों नहीं मिलते ? राम, कृष्ण, शिव, विष्णु, महेश, बुद्घ, महावीर किसी के भी नाम के बाद शर्मा, वर्मा, सिंह या गुप्ता क्यों नहीं लगता ? कालिदास, कौटिल्य, बाणभट्रट, भवभूति और सूर, तुलसी, केशव, कबीर, बिहारी, भूषण आदि सिर्फ अपना नाम क्यों लिखते रहे ? इनके जातिगत उपनामों का क्या हुआ ? वर्णाश्रम धर्म का भ्रष्ट होना कुछ सदियों पहले शुरू जरूर हो गया था, लेकिन उसमें जातियों की सामूहिक राजनीतिक चेतना का ज़हर अंग्रेजों ने ही घोला| अंग्रेजों के इस ज़हर को हम अब भी क्यों पीते रहना चाहते हैं ? मज़हब के ज़हर ने 1947 में देश तोड़ा, भाषाओं का जहर 1964-65 में कंठ तक आ पहुँचा था और अब जातियों का ज़हर 21 वीं सदी के भारत को नष्ट करके रहेगा| जन-गणना में जाति की गिनती इस दिशा में बढ़नेवाला पहला कदम है|



1931 में आखिर अंग्रेज 'सेंसस कमिश्नर' जे.एच. हट्टन ने जनगणना में जाति को घसीटने का विरोध क्यों किया था ? वेकोरे अफसर नहीं थे| वे प्रसिद्घ नृतत्वशास्त्री भी थे| उन्होंने बताया कि हर प्रांत में हजारों-लाखों लोग अपनी फर्जी जातियाँ लिखवा देते हैं ताकि उनकी जातीय हैसियत ऊँची हो जाए| हर जाति में दर्जनों से लेकर सैकड़ों उप-जातियाँ हैं और उनमें ऊँच-नीच का झमेला है| 58 प्रतिशत जातियाँ तो ऐसी हैं, जिनमें 1000 से ज्यादा लोग ही नहीं हैं| उन्हें ब्राह्मण कहें कि शूद्र, अगड़ा कहें कि पिछड़ा, स्पृश्य कहें कि अस्पृश्य - कुछ पता नहीं| आज यह स्थिति पहले से भी बदतर हो गई है, क्योंकि अब जाति के नाम पर नौकरियाँ, संसदीय सीटें, मंत्री और मुख्यमंत्री पद, नेतागीरी और सामाजिक वर्चस्व आदि आसानी से हथियाए जा सकते हैं| लालच बुरी बलाय ! लोग लालच में फँसकर अपनी जात बदलने में भी संकोच नहीं करते| सिर्फ गूजर ही नहीं हैं, जो 'अति पिछड़े' से 'अनुसूचित' बनने के लिए लार टपका रहे हैं, उनके पहले 1921 और 1931 की जन-गणना में अनेक राजपूतों ने खुद को ब्राह्मण, वैश्यों ने राजपूत और कुछ शूद्रों ने अपने आप को वैश्य और ब्राह्मण लिखवा दिया| कोई आश्चर्य नहीं कि जब आरक्षण वाले आज़ाद भारत में कुछ ब्राह्मण अपने आप को दलित लिखवाना पसंद करें; बिल्कुल वैसे ही जैसे कि जिन दलितों ने अपने आप को बौद्घ लिखवाया था, आरक्षण से वंचित हो जाने के डर से उन्होंने अपने आप को दुबारा दलित लिखवा दिया| यह बीमारी अब मुसलमानों और ईसाइयों में भी फैल सकती है| आरक्षण के लालच में फँसकर वे इस्लाम और ईसाइयत के सिद्घांतों की धज्जियाँ उड़ाने पर उतारू हो सकते हैं | जाति की शराब राष्ट्र और मज़हब से भी ज्यादा नशीली सिद्घ हो सकती है|



आश्चर्य है कि जिस कांग्रेस के विरोध के कारण 1931 के बाद अंग्रेजों ने जन-गणना से जाति को हटा दिया था और जिस सिद्घांत पर आज़ाद भारत में अभी तक अमल हो रहा था, उसी सिद्घांत को कांग्रेस ने सिर के बल खड़ा कर दिया है| कांग्रेस जैसी महान पार्टी का कैसा दुर्भाग्य है कि आज उसके पास न तो इतना सक्षम नेतृत्व है और न ही इतनी शक्ति कि वह इस राष्ट्र-भंजक-माँग को रद्द कर दे| उसे अपनी सरकार चलाने के लिए तरह-तरह के समझौते करने पड़ते हैं| भाजपा ने अपने बौद्घिक दिवालिएपन के ऐसे अकाट्रय प्रमाण पिछले दिनों पेश किए हैं कि जाति के सवाल पर वह कोई राष्ट्रवादी स्वर कैसे उठाएगी? आश्चर्य तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मौन पर है, जो हिंदुत्व की ध्वजा उठाए हुए है लेकिन हिंदुत्व को ध्वस्त करनेवाले जातिवाद के विरूद्घ वह खड़गहस्त होने को तैयार नहीं है| सबसे बड़ी विडंबना हमारे तथाकथित समाजवादियों की है| कार्ल मार्क्स कहा करते थे कि मेरा गुरू हीगल सिर के बल खड़ा था| मैंने उसे पाँव के बल खड़ा कर दिया है लेकिन जातिवाद का सहारा लेकर लोहिया के चेलों ने लोहिया जी को सिर के बल खड़ा कर दिया है| लोहियाजी कहते थे, जात तोड़ो| उनके चेले कहते हैं, जात जोड़ो| नहीं जोड़ेंगे तो कुर्सी कैसे जुड़ेगी ? लोहिया ने पिछड़ों को आगे बढ़ाने की बात इसीलिए कही थी कि समता लाओ और समता से जात तोड़ो| रोटी-बेटी के संबंध खोलो| जन-गणना में जात गिनाने से जात टूटेगी या मजबूत होगी ? जो अभी अपनी जात गिनाएँगे, वे फिर अपनी जात दिखाएँगे| कुर्सियों की नई बंदर-बाँट का महाभारत शुरू हो जाएगा| जातीय ईष्या का समुद्र फट पड़ेगा|



दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, ग्रामीणों, गरीबों को आगे बढ़ाने का अब एक ही तरीका है| सिर्फ शिक्षा में आरक्षण हो, पहली से 10 वीं कक्षा तक| आरक्षण का आधार सिर्फ आर्थिक हो| जन्म नहीं, कर्म ! आरक्षण याने सिर्फ शिक्षा ही नहीं, भोजन, वस्त्र, आवास और चिकित्सा भी मुफ्त हो| इस व्यवस्था में जिसको जरूरत है, वह छूटेगा नहीं और जिसको जरूरत नहीं है, वह घुस नहीं पाएगा, उसकी जात चाहे जो हो| जात घटेगी तो देश बढ़ेगा| जन-गणना से जाति को हटाना काफी नहीं है, जातिसूचक नामों और उपनामों को हटाना भी जरूरी है| जातिसूचक नाम लिखनेवालों को सरकारी नौकरियों से वंचित किया जाना चाहिए| यदि मजबूर सरकार के गणक लोगों से उनकी जाति पूछें तो वे या तो मौन रहें या लिखवाएँ - मैं हिंदुस्तानी हूँ| हिंदुस्तानी के अलावा मेरी कोई जात नहीं है|

- डॉ.वेदप्रताप वैदिक

7 comments:

  1. बहुत सार्थक पोस्ट...यदि सच में ऐसा हो जाये तो हिन्दुस्तान में अमन चैन आ जाये.....इतनी सार्थक पोस्ट के लिए बधाई

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  2. काश हमारे देश से जाति की परिपाटी और उससे जुड़ी राजनीति का नाश हो जाता। समाज में फैली अनेक समस्याओं की जड़ में यह जाति ही है। अफ़सोस यह है कि आज के हुक्मरान इस जहर को और अधिक फैलाने की राह पर चल पड़े हैं।

    वैदिक जी के विचार यदि फलित हों तो यह किसी क्रान्ति से कम न होंगे। प्रश्न यह है कि हममे से कितने इसके लिए तैयार हैं।

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  3. सही समय पर सही बात..........

    यही इस आलेख की खूबी है........

    बधाई !

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  4. सही है जातिगत आधार पर जनगणना

    यदि कई लोग आरक्षण के लिए अपनी जात बदल कर दलित हो जाएँगे तो विचारनीय बात यह है की इसकी आवश्यकता उन्हें क्यों पड़ रही है. सीधा सा अर्थ है की भारतीय सरकार तरेसठ वर्षों में न सिर्फ पिछड़ों बल्कि अगड़ों को भी एक सुरक्षित वर्तमान और सुन्दर भविष्य देने में नाकामयाब रही है. बल्कि सही कहें तो सरकारी प्रणाली ने जहाँ एक समाज का शोषण करने वाले चंद पूंजीपतियों के हाथों देश को बेच दिया है, वहीँ अगड़ों को भी पिछड़ा बना कार छोड़. दिया है.

    दूसरी बात यह है कि क्या एक बड़े समुदाय को गरीब और शोषित रख कर सिर्फ रष्ट्रीय एकता के नाम पर उनके उत्थान अवं विकास को नज़रअंदाज करना सही होगा? यदि कोई अपनी जाती बदल कार दलित बन कर अपना वर्तमान और भविष्य सुधारना चाहता है तो इससे भारत टूटेगा नहीं वरन देश के संसाधनों, पूंजी, व्यापार, उधोगों, रजनीति, विचारों अदि में अत्यधिक लोगों की भागीदारी बढ़ेगी न कि सिर्फ चंद पूंजीपतियों का अधिकार जमा रहेगा. और इससे देश में आर्थिक और सामाजिक मजबूती होगी जिससे की देश मजबूत होगा न की बिखरेगा.

    निखिल सबलानिया

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  5. ईमेल द्वारा प्राप्त -

    Re: [हिन्दी-भारत] मेरी ज़ात है.....

    आदरणीय वेद प्रताप जी ने बडे विद्वत्ता तथा तर्क पूर्ण ढंग से " जात" के बारे मे हमारा मार्ग प्रशस्त किया है.
    व्यक्तिगत रूप से कोइ तीन सौ वर्ष पुरानी मेरे परिवार के पूर्वजों की एक वंशावली मुझे प्राप्त हुयी . इस मे १९३० से पहले किसी भी पूर्वज के नाम के साथ जाति सूचक कोई भी शब्द प्रयोग मे नही मिलता. प्रयोग मे भी जो आया वह गोत्र सूचक था. गोत्र से जाति का केवल एक अनुमान ही सम्भव रह्ता है. भारतीय जनगणना की आज की नीति, हमारी राजनैतिक दलों की सोच का दीवालिया पन और भविष्य को वर्तमान की बलि देना मात्र है.
    इसी विषय पर भारतीय परम्परा मे सपिण्ड विवाह को त्याज्य मान कर सगोत्र विवाह निषेध भी एक अत्याधुनिक वैज्ञानिक सोच पर आधारित है.
    खेप विवाद मे जहां तक सपिण्ड सगोत्र के आधार पर 'हिंदु विवाह कानून ' का विरोध है वह वैज्ञानिक आधार पर है. उसे रूढिवाद नही समझना चाहिये.

    सुबोध कुमार

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  6. एम वेँकटेश्वर जी का E-mail

    वैदिक जी का लेख बहुत सही समय पर आया है. यह हमारे देश का दुर्भाग्य है अजादी मिलने अर्ध शती बाद भी हमारे देश की राजनीति सिर्फ वोट बैँक की ही राजनीति बनकर रह गयी है.सत्ता प्राप्त करना ही एक मात्र - उद्देश्य है राजनीतिक पार्टियोँ का.सत्ता की राजनीति ने देश को जाति,कुल, स्थानीयता,प्रांत, क्षेत्र, गाँव और शहर, सवर्ण और दलित मेँ खण्डित करके रख दिया है.शिक्षण सँस्थानोँ से लेकर कामकाज के हर क्षेत्र मेँ, घर और बाहर हर स्थान लोग जाति के आधार पर विभाजित हो गये हैँ. देश की राजनीति देशवासियोँ को तोड रही है/तोड चुकी है.

    सभी राजनीतिक पर्टियाँ एक ही काम कर रही हैँ.आरक्षण का आधार का औचित्य आज तक सही रूप मेँ किसी को समझ मेँ नही आया है. आरक्षण की प्रक्रिया/सुविधा ने देश के उस साँस्कृतिक ढाँचे को ध्वस्त कर दिया जिसके लिए भारत विश्व मेँ अनुकरणीय माना जाता था. आज बाहुबल, धनबल और राजनीतिक कुछ भी करवा सकती है. एक ओर हम वर्ग-विहीन, जाति-विहीन समाज के निर्माण का सपना देखते हैँ और दूसरी ओर जातिवाद को ही बढावा देते हैँ. जाति के आधार पर जनगणना का विचार देश की एकता के लिए गम्भीर समस्या बन सकता है.

    एम वेँकटेश्वर

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  7. दिविक रमेश जी का ईमेल से प्राप्त सन्देश -

    बहुत ही सारगर्भित, सटीक ऒर मॊजू आलेख । खुले मन से पढ़ें । बधाई ।


    दिविक रमेश

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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