‘महा एकीकरण युग’







‘महा एकीकरण युग
गतांक से आगे 



आज अधिकांश वैज्ञानिक सहमत हैं कि मूल ब्रह्म–अण्ड का महान विस्फोट (‘बिग बैंग’) लगभग 1370 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ था। विस्फोट के शून्य सैकैण्ड से 10–43 सैकैण्ड तक क्या हुआ यह नहीं जाना जा सकता क्योंकि उस काल खण्ड में भौतिकी के ज्ञात नियम कार्य नहीं कर रहे थे। यह दृष्टव्य है कि विज्ञान ने इस ब्रह्माण्ड में पहली बार ‘कुछ’ तो अज्ञेय माना है क्योंकि अध्यात्म में ब्रह्म तो अज्ञेय ही है। विज्ञान में इसके पहले जो अज्ञेय थे वे सशर्त थे, यथा हाइज़ैनवर्ग का अनिर्धार्यता का नियम जिसके अनुसार स्थिति तथा वेग इन दोनों का साथ साथ निर्धारण एक सीमित याथार्थिकता के भीतर ही किया जा सकता है, यद्यपि किसी एक का निर्धारण वांछित याथार्थिकता के साथ किया जाता है। हाइजै.नबर्ग के अनिर्धार्यता सिद्धान्त के अतिरिक्त, प्रथम 10–45 [1]सैकैण्ड भी अज्ञेय है, तथा समय को 5 .4 × 10–44 सैकैण्ड, तथा लम्बाई को 1 .6 × 10–35 मीटर की याथार्थिकता से बेहतर नहीं नापा जा सकता। दूसरा अज्ञेय जो है वह है ‘सांख्यिकी’ जिसमें घटनाओं के होने का निश्चित ज्ञान न होकर ‘संभाविता’ (जिसे प्रतिशत में अभिव्यक्त करते हैं) के रूप में होता है।



10–43 सैकैण्ड से लेकर 10–35 सैकैण्ड और और भी बाद तक ज्ञात नियम लग रहे थे जिनके तहत सभी पदार्थ, ऊर्जा, दिक् तथा काल का निर्माण हुआ था। इसलिये 5 .4×10–44 सैकैण्ड को ‘प्लान्क समय’ नियतांक कहते हैं। इस समय अर्थात एकीकरण युग के प्रारम्भ में ब्रह्माण्ड का विस्तार 1.6×10–33 से.मी. (प्लान्क लम्बाई नियतांक) था तथा तापक्रम 10+32 कैल्विन था, अर्थात लगभग एक लाख अरब अरब अरब कैल्विन था। अर्थात ताप ही प्रमुख गुण था। शायद यही सत्य तैत्तिरीय उपनिषद के (3 .2) मंत्र में कहा गया है, “तपो ब्रह्मेति।” तप ही ब्रह्म है। सामान्यतया इसका अर्थ लिया जाता है कि तप करने से ब्रह्म का ज्ञान होता है। यहां मुझे लगता है कि ऋषि कह रहे हैं कि तप ही अर्थात ताप ही ब्रह्म है। तथा इसके बाद मुण्डक उपनिषद (1.1.8) के मंत्र ‘तपसाचीयते ब्रह्म’ के अनुसार तप से ब्रह्माण्ड का विस्तार होता है।



‘महान एकीकरण युग’ के प्रारंभ होते ही गुरुत्वाकर्षण बल ने अलग हो कर अपना कार्य शुरु कर दिया था, किन्तु अन्य तीन बल एकीकृत होकर कार्य करते रहे। एक सैकैण्ड के अकल्पनीय अतिसूक्ष्मतम अंश (10–43 सैकैण्ड से 10–35 सैकैण्ड तक) में पदार्थ तथा ऊर्जा सहज ही एक दूसरे में परिवर्तनशील थे। अतः एक सैकैण्ड के इस अकल्पनीय सूक्षमतम अंश को ‘महान एकीकरण युग’ (ग्रैन्ड युनिफिकेशन एरा) कहते हैं। छान्दोग्य उपनिषद (3.14.1) का एक मंत्र है - सर्वं खलु इदं ब्रह्म . . .। यह सृष्टि सब सचमुच में ब्रह्म ही है। इस ब्रह्माण्ड (सृष्टि) की स्वयं उसी ब्रह्म से उत्पत्ति होती है, स्वयं उसी ब्रह्म में इस ब्रह्माण्ड का लय होता है, और यह उसी ब्रह्म से अनुप्राणित है। अर्थात इसमें पदार्थ तथा ऊर्जा की जो भिन्नता दिखती है, वह वास्तव में एक ही हैं, सारे पदार्थ जो भिन्न दिखते हैं एक ही हैं। और आज का विज्ञान जिसे उपरोक्त शैली में कहता है। इसमें जो शक्ति या बल या चेतना है, उसी ब्रह्म से है। इसे उपरोक्त पैरा में विज्ञान की शैली में ‘मूलभूत बल’ कहा गया है। बल वास्तव में वे नियम हैं जिनके अनुसार पदार्थ तथा ऊर्जा व्यवहार करते हैं। यह नियम, जिसे संस्कृत में ऋत कहते हैं, भी उसी ब्रह्म से उपजे हैं। छान्दोग्य उपनिषद में ही ब्रह्म के विषय में कहा है (6.2.1), “एकमेव अद्वितीयम्’ –वह एक ही है, उसके अतिरिक्त ब्रह्माण्ड में दूसरा नहीं है – यही सत्य वैज्ञानिक भाषा में ‘महान एकीकरण युग’ में 10–45 सैकैण्ड्स के पूर्व मिलता है। और भी छान्दोग्य (6.2.3) में कहा है, “तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति। . . .” उस सत् अथवा ब्रह्म ने इच्छा की कि ‘मैं बहुत हो जाऊं’। यही सत्य तैत्तिरीय उपनिषद (2.6) में कहा है। यही विस्फ़ोट तथा प्रसार का कार्य 10–45 सैकैण्ड के बाद प्रारम्भ हुआ।



यह कहा जा सकता है कि वह सूक्ष्म ब्रह्माण्ड क्वार्कों तथा प्रतिक्वार्कों आदि के गाढ़े गरमागरम रस से सराबोर था। आज वैज्ञानिक क्वार्क तथा लैप्टॉन को पदार्थ के मूलभूत कण मानते हैं। क्वार्क द्वारा भारी कण यथा प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन बनते हैं, तथा लैप्टॉन से इलैक्ट्रॉन तथा न्यूट्रिनो आदि हल्के कण बनते हैं। उस युग में इनके साथ इनके विरोधी कण भी होते थे – ‘प्रतिक्वार्क‘ तथा ‘प्रतिलैप्टॉन’ आदि। कण तथा प्रतिकण उस समय आपस में टकराते और प्रकाश ऊर्जा में बदल जाते थे तथा दो फोटान (प्रकाश) कण आपस में टकराकर पदार्थ तथा प्रतिपदार्थ उत्पन्न करते थे। क्वार्क तथा लैप्टान भी आपस में बदल सकते थे। प्रारंभ में पदार्थ, प्रतिपदार्थ तथा विकिरण (ऊर्जा) लगभग बराबर मात्रा में थे। और अब तो प्रतिपदार्थ के दर्शन नहीं होते। महान एकीकरण युग के अन्त के थोड़ा सा पहिले पदार्थ की मात्रा प्रति पदार्थ की मात्रा से, अति नगण्य रूप में ही सही, किन्तु अधिक थी। विस्तार के साथ तापक्रम कम हुआ और तब पदार्थ तथा प्रतिपदार्थ तो टकराए और प्रकाश- ऊर्जा में बदल गए। किन्तु फोटानों ने आपस में टकराकर पदार्थ तथा प्रतिपदार्थ बनाना बन्द कर दिया। अतएव जब क्वार्क तथा प्रतिक्वार्क टकराते हैं तब अधिकांश पदार्थ तो ऊर्जा में बदल जाता है, किन्तु थोड़ा सा क्वार्क बच जाता है, जो ‘हेड्रान’ में बदल कर प्रोटान जैसा भारी कण बनता है। इस समय पदार्थ की तुलना में ऊर्जा की मात्रा करोड़ों गुना अधिक थी। दृष्टव्य है कि जैसे जैसे ब्रह्माण्ड का विस्तार होता है, उसका तापक्रम कम होता है तथा बलों एवं पदार्थों की विविधता बढ़ती जाती है।



हम देखते हैं कि पिण्डों के बीच में बहुत बड़ा शून्य – सा अंतराल होता है, जैसे सूर्य और पृथ्वी के बीच में। हमें चाहे आज का ब्रह्माण्ड अपने पैमानों पर 'समांगी' न दिखे, किन्तु ब्रह्माण्ड के पैमाने पर समांगी है। यह इससे भी प्रमाणित होता है कि पृष्ठभूमि सूक्ष्म तरंग विकिरण भी बहुत अधिक समांगी है। किंतु इससे यह निष्कर्ष- सा निकलता है कि महान विस्फ़ोट के कुछ अकल्पनीय सूक्श्म क्षणों तक भी ब्रहमाण्ड समांगी होगा, और प्रसार के समय भी समांगी बना रहा होगा। किन्तु आइन्स्टाइन के सामान्य सापेक्ष सिद्धान्त के अनुसार दिक वक्र हो सकता है, तब यह आज के लगभग समान 'समतल' कैसे हो सकता था, यह वैज्ञानिकों के लिये एक पहेली थी।

 विश्वमोहन तिवारी (पूर्व एयर वाइस मार्शल)


1 comment:

  1. हिन्दी में ऐसी अत्युपयोगी जानकारी देने के लिये आभार। लिखते रहिये।

    ReplyDelete

आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

Comments system

Disqus Shortname