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काश, यही काम भारत करता !




काश, यही काम भारत करता !
डॉ. वेदप्रताप वैदिक


कई बार मैं सोचता हूँ  कि क्या दुनिया में ईरान जैसा भी कोई देश है ? इतना निडर, इतना निष्पक्ष और इतना सच बोलनेवाला देश ईरान के अलावा कौनसा है ?किसी ज़माने में माना जाता था कि गाँधी और नेहरू का भारत निष्पक्ष है, निडर है और सत्यनिष्ठ है| इस मान्यता के बावजूद जवाहरलाल नेहरू की नीतियाँ  किस मुद्दे पर कितनी लोच खा जाती थीं, यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विद्यार्थी भली-भांति जानते हैं| लेकिन ईरान में जबसे इस्लामी क्रांति हुई है, ईरान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बहादुरी का नया रेकार्ड कायम किया है| इस्लामी क्रांति के पिता आयतुल्लाह खुमैनी कहा करते थे कि अमेरिका बड़ा शैतान है और रूस छोटा शैतान है| हम दोनों शैतानों से अलग रहना चाहते हैं| एक अर्थ में ईरान ने दुनिया को बताया कि सच्ची निर्गुटता क्या होती है| अब जबकि गुट खत्म हो गए हैं, ईरान अकेलादेश है, जो विश्व अंत:करण की आवाज़ बन गया है| काश कि यह काम भारत करता ! ईरान ने सारे परमाणु शस्त्र को खत्म करने का शंखनाद कर दिया है|



ईरान की हिम्मत देखिए कि उसने तेहरान में परमाणु निरस्त्रीकरण सम्मेलन कर डाला| अभी ओबामा के वाशिंगटन-सम्मेलन की स्याही सूखी भी न थी कि तेहरान ने वही मुद्दा उठाया और नारा लगाया कि परमाणु ऊर्जा सबको और परमाणु हथियार किसी को नहीं| जैसा सम्मेलन अमेरिका ने किया, वैसा ही ईरान ने भी कर दिया लेकिन ईरान के सम्मेलन में 60 देश पहुँचे  जबकि अमेरिका में 47 ! यह ठीक है कि वाशिंगटन में राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों की भीड़ थी और तेहरान में ज्यादातर विदेश मंत्री और अफसरगण थे, लेकिन तेहरान के भाषणों और प्रस्ताव पर गौर करें तो हम चकित रह जाते हैं|



वाशिंगटन सम्मेलन की मूल चिंता ईरान थी और तेहरान सम्मेलन की अमेरिका| ये दोनों सम्मेलन एक-दूसरे के विरूद्घ थे| अमेरिका ने ईरान को नहीं बुलाया लेकिन ईरान ने अमेरिका को बुलाया| ईरानी सम्मेलन में अमेरिका शामिल हुआ| अन्य परमाणु महाशक्तियों के प्रतिनिधि भी आए| भारत और पाकिस्तान के प्रतिनिधि भी ! ईरान को अमेरिका ने इसलिए नहीं बुलाया कि वह सम्मेलन परमाणु प्रसार के खिलाफ था और ईरान के बारे में अमेरिका को गहरा शक है कि वह परमाणु हथियार बना रहा है| अमेरिकी सम्मेलन का दूसरा प्रमुख लक्ष्य परमाणु हथियारों को आतंकवादियों के हाथों में जाने से रोकना था| इन दोनों लक्ष्यों का उल्लंघन करनेवाला पाकिस्तान वाशिंगटन में बुलबुल  की तरह चहक रहा था| उसके प्रधानमंत्री ने अपने देश की कारस्तानियों के लिए क्षमा माँगने  की बजाय परमाणु-सुरक्षा के बारे में तरह-तरह के उपदेश झाड़े| ओबामा उनसे अलग से मिले भी ! अमेरिकी सम्मेलन में अनेक मीठी-मीठी बातें कही गईं| दुनिया को परमाणु-शस्त्र रहित बनाने की बातें भी कही गईं लेकिन किसी भी परमाणु-शक्ति ने यह नहीं बताया कि वे अपने शस्त्र-भंडार में कहाँ तक कटौती कर रहे हैं| यह ठीक है कि अमेरिका और रूस ने आठ अप्रैल को चेक राजधानी प्राहा में एक संधि पर दस्तखत किए, जिसके तहत वे अपने परमाणु-शस्त्र में 30 प्रतिशत की कटौती करेंगे लेकिन जो शेष 70 प्रतिशत शस्त्र हैं, वे इस समूची दुनिया का समूल नाश कई बार करने में समर्थ हैं| यह भी सराहनीय है कि कुछ राष्ट्रों ने अपने-अपने परमाणु-ईंधन के भंडारों को घटाने का भी वादा किया है लेकिन अमेरिका में आयोजित यह विश्व सम्मेलन कुछ इस अदा से संपन्न हुआ कि मानो कुछ बड़े पहलवान अपनी चर्बी घटाने के नाम पर अपने बाल कटवाने को तैयार हो गए हों| ऐसा लगता है कि ओबामा ने यह सम्मेलन अपनी चौपड़ बिछाने के लिए आयोजित किया था| हमले की चौपड़ ! ईरान पर हमला करने के पहले वे शायद विश्व जनमत को अपने पक्ष में करने की जुगत भिड़ा रहे हैं| वे नहीं जानते कि वे क्लिटन और बुश से भी ज्यादा दुर्गति को प्राप्त होंगे| ईरान एराक़ नहीं है| क्या वे भूल गए कि राष्ट्रपति जिमी कार्टर को ईरान ने कितना कड़ा सबक सिखाया था ? दुनिया के देश ईरान पर हमले का घोर विरोध तो करेंगे ही, वे उस पर कठोर प्रतिबंध लगाने के भी विरूद्घ हैं| भारत, रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रों ने प्रतिबंधों का तीव्र विरोध किया है| भारत और रूस चाहते हैं कि ईरान परमाणु अप्रसार संधि का उल्लंघन नहीं करे लेकिन अगर अमेरिका इन दोनों राष्ट्रों पर दबाव डालेगा तो उसे निराशा ही हाथ लगेगी| ईरान ऐसा राष्ट्र नहीं है कि जिसे कोई ब्लेकमेल कर सके| अमेरिका की खातिर भारत और रूस ईरान को क्यों दबाएँगे ? ईरान को दबाया नहीं जा सकता| उसे समझाया जा सकता है|



ईरान कैसा राष्ट्र है, इसका अंदाज़ सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनई, राष्ट्रपति अहमदीनिजाद और विदेश मंत्री मुत्तकी के भाषणों से ही हो जाना चाहिए| इन नेताओं ने अमेरिका को दुनिया का सबसे बड़ा दुश्मन घोषित किया है| खामेनई ने पूछा है कि मानव जाति के इतिहास में परमाणु बम-जैसा पापपूर्ण हथियार सबसे पहले किसने बनाया और किसने उसे चलाया ? अमेरिका ने ! इस्लाम के मुताबिक यह 'हराम' है| ऐसा काम करनेवाले देश को विश्व के सभ्य समाज से निकाल बाहर क्यों नहीं किया जाए ? ऐसा धाँसू बयान तो निकिता ख्रश्चेव ने महासभा में जूता बजाते समय भी नहीं दिया था| अहमदीनिजाद ने माँग की है कि सुरक्षापरिषद में पाँचो महाशक्तियों को वीटो से वंचित किया जाए या अन्य महत्वपूर्ण देशों को भी यह अधिकार दिया जाए| अमेरिका को क्या अधिकार है कि वह जून में परमाणु-अप्रसार सम्मेलन बुलवाए ? जिस देश ने परमाणु प्रसार में सबसे कुटिल भूमिका अदा की, जिसने इस्राइल जैसे देश को गुपचुप मदद की, वह राष्ट्रअंतरराष्ट्रीय परमाणु उर्जा एजेंसी का सदस्य रहने के काबिल नहीं है| विदेश मंत्री मुत्तकी ने माँग की है कि कुछ ईमानदार राष्ट्र मिलकर परमाणु अप्रसार संधि के प्रावधान चार और छह को लागू करवाने पर ज़ोर दें ताकि हम सचमुच परमाणु शास्त्र रहित विश्व का निर्माण कर सकें| वास्तव में 40 साल पहले संपन्न हुई यह संधि घोर सामंती है| भारत इसका सदस्य नहीं बना लेकिन उसने इसका कड़ा विरोध भी नहीं किया| यह परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों को हथियार बढ़ाने की पूरी छूट देतीहै लेकिन परमाणु शक्ति रहित राष्ट्रों का गला घोंट देती है| ईरान की कमजोरी यह है कि उसने इस संधि पर उस समय दस्तखत कर दिए थे और अब वह इसका विरोध कर रहा है| इस मामले में भारत का पक्ष कहीं अधिक मजबूत है| वास्तव में भारत को चाहिए था कि परमाणु शक्ति बनते ही वह परमाणु विश्व-निरस्त्रीकरणका शंखनाद करता|



1959 में नेहरू ने जिस पूर्ण और व्यापक निरस्त्रीकरण की बात महासभा में कहीं थी, उसे अमली जामा पहलाने का सही वक्त यही है| जो झंडा आज ईरान उठाए हुआ है, वह आज भारत के हाथ में होता तो बात ही कुछ और होती !





काश, यही काम भारत करता ! काश, यही काम भारत करता ! Reviewed by Kavita Vachaknavee on Wednesday, April 28, 2010 Rating: 5

6 comments:

  1. बहुत ही बढिया कहा आपने।

    बडी ही ओजपूर्ण प्रस्‍तुति।

    आपके इन विचारों से मैं बिलकुल सहमत हूं पर शायद भारत के शाशन की बागडोर गलत हांथों में है जो अमेरिका की जी हुजूरी ज्‍यादा पशंद करते हैं।

    कहां गये हमारे चन्‍द्रशेखर, सुभाष, भगत।

    क्‍या अब ये वीरप्रसवा धरा वीरों को जन्‍म नहीं देगी,,,


    शायद अब हम ब्‍लागपरिवारियों को ही नयी क्रान्ति करनी होगी।

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  2. वैदिक जी, कुछ जरूरी गलतियाँ सुधार लें

    - इरान के सम्मलेन में 60 देश पहुंचे जबकि अमेरिका में 47... See More !

    अमेरिका में सम्मलेन परमाणु-सुरक्षा के बारे में था, जाहिर है इसमें ऐसे ही देश आयेंगे जिनके पास कुछ ना कुछ परमाणु उद्योग है जिसकी सुरखा अब जरूरी समझी जा रही है....इरान निरस्त्रीकरण पर बुलाएगा तो तकनीकी और पर सभी देशों को आना चाहिए..सिर्फ साठ आये.

    - इरान के बारे में अमेरिका को शक है की वह परमाणु बम बना रहा है

    - यह शक अमेरिका को ही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी और आर्म्स कंट्रोल असोशियेशन जैसे कई स्वतंत्र संस्थानों को भी है. 'परमाणु ऊर्जा सभी के लिए, बम किसी के लिए भी नहीं' का इरान का नारा सिर्फ तब तक है जब तक वह परमाणु बिजली की तकनीक का बम बनाने में उपयोग नहीं कर लेता...

    अमेरिका को क्या अधिकार है की वह जून में अप्रसार सम्मलेन बुलवाए?
    - जून में नहीं मई में. और इसे अमेरिका नहीं बुलाता. हर पांच साल के बाद एन.पी.टी. की समीक्षा होती है जो जरूरी है. इसमें दुनिया के सारे देश मिलकर परमाणु-संपन्न देशों से उनका निरस्त्रीकरण का वादा पूरा करने की मांग करेंगे.

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  3. आपका यह लेख बहोत कुछ सिखाता है पर सिखता कौन है। एक ईरान है जिसने सारे परमाणु शस्त्रों को खत्म करने का शंखनाद कर दिया है। पर यहाँ तो अमरिका को मखन लगाने से फ़ुरसद हो तभी ना!!!!

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  4. ईमेल से प्राप्त प्रतिक्रिया -

    कविता जी,
    मैं नम्रता से निवेदन करना चाहूंगा कि मुझे बहुत निराशा हुई यह लेख पढ़ कर. क्या आप इस लेख में प्रकट विचारों से सहमत हैं? यदि ऐसा है तो बहुत दुःख कि बात है. यदि ऐसा नहीं है तो आपको यह लेख आगे नहीं बढ़ाना चाहिए था.

    "...इतना निडर, इतना निष्पक्ष और इतना सच बोलनेवाला देश ईरान के अलावा कौनसा है ? ..."

    निडर - जैसे कि वो आत्मघाती जिन्होंने मुंबई में महा-आतंक मचाया ताज होटल में और सारे मुंबई में. निडरता हमेशा प्रशंशा के लायक नहीं होती और ईरान के बारे में यह निडरता एक खोखला और क्रूरता पूर्ण चेहरा है जिससे वो क्रूर इस्लाम के मानने वालों को काबू में रखते हैं. वाह, क्या निडरता है ?

    निष्पक्ष - निष्पक्ष तब तक जब तक आप उन्ही के सम्प्रदाय को मानने वाले हों. अगर आप इस्लाम को नहीं मानते, तो आप काफिर हैं और आपका अंत ही ईरान का लक्ष्य है. वाह, क्या निष्पक्षता है !

    सच बोलने वाला - पूरे विश्व में एक ही सच है और वो उनकी एक किताब में लिखा है जो की १५०० वर्षा पहले किसी ने किखी थी एक वहशी काबिले को काबू में करने के लिए. जो कुछ भी उससे पहले लिखा गया, और जो कुछ भी उसके बाद लिखा गया, सब झूठ है. वाह, मेरे सत्यवादी !

    ये तो केवल पहली पंक्ति के बारे में ही है. यदि मैं पूर्ण लेख पर लिखना आरम्भ करूं तो इस लेख के लिखने वाले का सिर लज्जा से इतना झुक जाएगा की धरती को छू जाएगा. परन्तु ऐसा तभी होगा यदि मौलिक लेखक इस विषय पर न्यायपूर्ण विचार करें.

    धन्यवाद
    राजीव अग्रवाल

    ReplyDelete
  5. डॉ राजीव जी,

    ईमेल व स्पष्ट / सार्थक प्रतिक्रिया के लिए अत्यन्त आभार।

    १)
    आपकी प्रतिक्रिया यथावत् लेख के पेज पर लगा रही हूँ ।

    २)
    ईराक के साहस व निडरता आदि का उल्लेख भारत की नीतियों के ढुलमुलपने व अमेरिका के सन्दर्भ (विरोध) के प्रसंग से जुड़ा मात्र है, न कि भारतीय चरित्र के सन्दर्भ में - ऐसा मुझे लगता है। यों मैं राजनीति की विद्यार्थी नहीं हूँ, सो गलत भी हो सकती हूँ।

    हाँ, वैदिक जी को आपका सन्देश अग्रेषित कर रही हूँ।
    आशा है, वे इस पर विचार करेंगे।

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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