"अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु"

हिन्दी भारत

" - हिन्दी भारत - " (भारत व भारतीयता से जुड़े सभी साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक प्रयासों, हिन्दी में रचनात्मक लेखन (विविध विधाएँ), भाषिक मंतव्यों, जीवनमूल्यों, पारस्परिक आदान-प्रदान की अभिवृद्धि हेतु) ***** हिन्दी भारत ***** "

साप्ताहिकी

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साप्ताहिकी
Monday, December 14, 2009


 
विद्या विवादाय धनं मदाय, शक्ति परेषां परिपीडनाय (खलस्य)


कल रवि जी ने  श्री  देवाशीष   तथा  श्री रमण कौल  के एकल प्रयासों से बनी चिट्ठा निर्देशिका  का उल्लेख यहाँ किया तो कई चिट्ठाकारों ने अपना उल्लेख उसमें न होने की बात दुहराई| अब यदि कोई वहाँ रजिस्टर्ड ही नहीं हुआ स्वयं जा कर, तो वह स्वयं को वहाँ पाएगा कैसे ? इसलिए महत्वपूर्ण बात यह है कि चिट्ठाकार साथी अपने ब्लॉग को वहाँ रजिस्टर्ड करवाने के साथ ही साथ  आँकड़ों का एक विभाग तक भी जाएँ, अपने सम्बन्ध में जानकारी आदि दे कर तथ्यपूर्ण बनाएँ|  देखिए --

इस पोस्ट के बहाने सभी चिट्ठाकारों और चिट्ठे पढ़ने वालों और नेट पर हिन्दी के चाहने वालों से निवेदन हैं कि वे हिन्दी ब्लॉग्स चिट्ठादर्शिका पर पंजीकृत हों, अपने प्रोफाईल में सारी जानकारी भरें और यदि चिट्ठा लिखते हैं तो उसे निर्देशिका में जोड़ने के उपरांत उसे क्लेम भी करें। इससे हमें समय समय पर जाल पर हिन्दी प्रयोग और प्रयोक्ताओं के बारे में जानकारी मिलती रहेगी।


  उसे अद्यतन बनाने में अपनी अपनी भूमिका का निर्वाह तो आप को व हमें ही करना है ना ! अस्तु !!


 गत  दिनों (बल्कि माहों) से हिन्दी चिट्ठा संसार पर मुख्यतः विग्रह, विवाद और वर्चस्व के बादल बहुधा छाए दिखाई देते रहे हैं| मेरे जैसा कड़े जी वाला व्यक्ति तक भी इस हाहाकार, छीना छपटी, अहमन्यता और पारस्परिक दोषारोपणों के जंजाल से विचलित ही नहीं विरक्त भी हो उठा मानो| जाने क्या तो बँट रहा है जिसके लिए युद्धक भूमिका में सब तने बैठे हैं ?  हम एक दूसरे की रेखा को छोटी कर के अपनी रेखा को बड़ा दिखाने के भ्रम में क्या तो पा लेंगे? पता नहीं !!



 आसपास के परिवेश, समय और परिस्थिति से अनजान समय और मनुष्य अपना कोई सकारात्मक योगदान देने की अपेक्षा किंचित भी संसाधनों और स्रोतों का दुरुपयोग करता है तो वह अपनी आने वाली नस्लों का अपराधी है| उदाहरण के लिए इस रिपोर्ट को देखें कि प्रति व्यक्ति की जाने वाली बर्बादी का दुष्परिणाम संसार के अलग अलग कोने में बैठे व्यक्तियों तक को कैसे भोगना पड़ जाता है | ऐसे में किसी का भी अनुत्तरदायी एक भी एक्शन (किसी भी कार्य/ व्यवहार का) बड़े भावी और समकालिक अर्थ रखता है|



स्वास्थ्य और विज्ञान में रूचि रखने वालों के लिए गत दिनों कुछ महत्वपूर्ण चीजें पढ़ने देखने को मिलीं| सर्वप्रथम आप अतिरिक्त भार को कम करने के प्रयास में जुटे एक व्यक्ति के प्रयासों और परिणाम  को सचित्र देखें-  ( चित्र मैंने सकारण हटा दिए हैं, आप लिंक पर ही उन्हें देखें ) |




दूसरा समाचार  मेडिकल से जुड़े हमारे साथी चिट्ठाकारों के साथ साथ स्वास्थ्य के प्रति सकारात्मक जागरूकता अपनाने वाले पाठकों  के लिए भी अतीव   महत्वपूर्ण शोध  है|


Alcohol consumption has long been linked to cancer and its spread, but the underlying mechanism has never been clear. Now, researchers at Rush University Medical Center have identified a cellular pathway that may explain the link.


हमारे साथी चिट्ठाकार बंधु ऐसे महत्त्व के विज्ञान लेखों का भी हिन्दी उल्था करके इतनी आवश्यक जानकारियों को निरंतर हिन्दी के पाठकों के लिए प्रस्तुत करने का काम करें तो लोक कल्याण की दृष्टि से व जन जागृति की दिशा में देश कुछ आगे बढ़े|



यहाँ अपनी भाषा के प्रति भावों की अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में एक ऐसी कल्पना का रूप निरख कर एक बार अवश्य आप का भी वाह वाह कहने का मन हो आएगा |


Apostrophe
Brackets
Colon
Comma
Dash
Ellipsis
Exclamation Point
Hyphen
Parentheses
Period

Question Mark
Quotes
Semicolon




अब  गत दिनों हिन्दी ब्लॉग जगत की कुछ पठनीय प्रविष्टियों पर एक दृष्टि डालें तो डॉ. पद्मजा शर्मा की यह कविता बरबस संवेदना से सराबोर कर देती है -

कविता

पिता की मृत्यु  के बाद

माँ बहुत रोती है पिताजी
बेटा  दफ्तर जाते समय
न मिले तो / आंसू
पोता न सुने कहानी
घर में हो ब्याह
या जाया हो नाती
हर मौके बस रोती / माँ


आप जानते हो पिताजी
आपके खाने से पहले
खाती नहीं थी माँ


जब तक आपसे  नहीं कर लेती थी तकरार
कहाँ शुरू होता था उसका दिन
आपका भी कहाँ लगता था मन
जब हो जाती थी नाराज
कितना मनाते थे आप


सुनाकर माँ को / मुझसे कहते थे-
' तेरी माँ का स्वभाव फूल सरीखा है
जो दूसरों को बांटकर सुगंध
बिख़र जाता है ख़ुद '


तब माँ फेर लेती थी पीढ़ा
और आँखों की कौर से
पौछती थी गीलापन


जब से आप गए हो / पिताजी
बैठी रहती है आपकी तस्वीर के आगे
बिना कुछ खाए पिए
काट देती  है सारा  दिन


माँ की आँखों से
हंसी ख़ुशी उदासी की
जो त्रिवेणी बहती है
कभी पलट कर देखो तो सही / पिताजी


पोते को हँसता बोलता देखकर
कभी कभी रोते हुए माँ
कहती है  धीरे से -
' तेरे पिता हंस रहे हैं '


पर आप पहले की तरह
सिर्फ माँ के लिए
कब हंसोगे पिताजी



गत दिनों नंदिनी की एक कविता पर कवि ओम की एक टिप्पणी से जिस प्रकार की गलतफहमियाँ हुई और उस प्रकरण में विलंबित उत्तर के चलते जिस प्रकार नंदिनी ने अपना ब्लॉग बंद किया, नंदिनी के ब्लॉग बंद होने के चलते कई जगह विचलित होकर प्रतिक्रियाएँ आदि हुई, वह सब  घटनाक्रम काफी अजीबोगरीब व क्विक रिएक्शन के साथ मुझे व्यक्तिगत स्तर पर बहुत विगलित भावुकता से पूर्ण व कमजोर मनःस्थिति का वाचक प्रतीत होता रहा है|  मेरे ऐसा प्रतीत होने की जी भर आलोचना की जा सकती है किन्तु इधर युवा संभावनाशील लेखन की जो हल्की-सी छवि बननी प्रारम्भ हुई थी, उसका गुलशन नंदा टाईप कायांतरण मेरे गले नहीं उतरता| लेखन अथवा सम्बन्ध व्यक्ति की शक्ति हैं, उन्हें अपनी कमजोरी के भार से दबा देना आत्मघाती ऐसा कदम हैं कि जिसके लिए दया नहीं, सहानुभूति नहीं अपितु आक्रोश भर जाता है मन में| कोरी भावुकता के चलते, लेखन के डगमग होने की छवि के चलते किसी का कोई कल्याण उसमें निहित नहीं है| अतः ऐसे प्रसंगों से किसी भवितव्यता की अपेक्षा नहीं जन्मती|





२ दिन पूर्व वरिष्ठ कथाकार सुधा अरोड़ा जी ने वर्तमान की युवतियों और विवाह संबंधों पर बातों बातों में एक प्रसंग में मुझे कहा कि अमृता जी बहुत भाग्यशाली थीं जो उन्हें इमरोज जैसा व्यक्ति उनके जीवन में मिला; और साथ ही यह भी जोड़ा कि दुनिया में कौन लड़की उतनी सौभाग्यशाली होती है भला?


कल के एक महत्वपूर्ण पाठ्य को पढ़ कर सुधा जी की इस बात के सोलह आना खरे होने से आप पुनः सहमत होंगे-


अमृता -इमरोज और साझा नज्म

पंद्रह दिनों पहले अमृता एक बार फिर इमरोज़ के सपनों में आई, बादामी रंग का समीज सलवार पहने | 'सुनते हो ,कमरे में इतनी पेंटिंग क्यूँ इकठ्ठा कर रखी है ?अच्छा नहीं लग रहा ,कुछ कम कर दो "|अमृता कहें और इमरोज़ न माने ,ये तो कभी हुआ नहीं ,अब इमरोज़ ने कमरे से पेंटिंग कम कर दी हैं ,कमरे में फिर से रंगों रोगन करा दिया है |हाँ ,अपने बिस्तर के पैताने या कहें आँखों के दायरों तक ,और मेज़ पर रखे रंगों और ब्रशों के बीच अमृता की तस्वीरें टांग रखी है |इन तस्वीरों को देखकर यूँ लगता है जैसे हर वक़्त अमृता आज भी इमरोज़ की निगहबानी कर रही है ,इमरोज़ घर से बाहर कम जाते हैं ,क्यूँकर जाते ?

 

 


डॉ. अजित गुप्ता वर्तमान में मनुष्य के मन में बसे भय को तोल कर और टटोल कर देखती हैं-

 

डर कैसे बस गया जीवन में?

बचपन शहर से दूर रेत के समन्‍दर के बीच व्‍यतीत हुआ। साँप और बिच्‍छू जैसे जीव रोज के ही साथी थे। वे बेखौफ कभी भी घर में अतिथी बन जाते थे। लेकिन डर पास नहीं फटकता था। घर के आसपास रेत के टीले थे, रोज शाम को सहेलियों के साथ वहाँ जाकर टीलों के ऊपर बैठते थे। कभी-कभी तो किसी एक सहेली के साथ ही जाकर बैठ जाते थे, लेकिन डर नहीं लगता था। उस जमाने में मोपेड बाजार में आयी तो घर में भी भाई ने खरीदी। हम उनकी आँख बचाकर निकल जाते सूनी सुनसान सड़क पर। चारों तरफ रेत ही रेत और बीच में काली सड़क। लेकिन फिर भी डर नहीं लगता था। सायकिल से कॉलेज जाते, रास्‍ते में कोई बदमाश छेड़ देता तो सामने तनकर खड़े हो जाते, क्‍योंकि डर नहीं था।

 

 

जिन महिला चिट्ठाकारों ने अथक श्रम द्वारा कुछ ही समय में निरंतरता बनाए रखते हुए विविध प्रकार से अवदान दिया है, उनमें संगीता पुरी जी का नाम उल्लेखनीय है| ज्योतिष से इतर उन्होंने तकनीकी शब्दावली को नेट पर टाईप कर डालने का कार्य भी अपने बूते हाथ में लिया व अपने सगोत्री समाज पर केन्द्रित ब्लॉग भी वे निरंतर लिख रही हैं| जिन विषयों पर बहुधा वाह वाह नहीं मिल सकती वैसे विषय भी उन्होंने जिम्मे लिए | इसी प्रकार का एक विशेष लेख उनका कल मेरे पढने में आया -


क्‍या ईश्‍वर ने शूद्रो को सेवा करने के लिए ही जन्‍म दिया था ??

प्रारम्भ में वर्ण व्यवस्था कर्म के आधार पर थी, पर धीरे-धीरे यह व्यवस्था जन्म आधारित होने लगी । पहले वर्ण के लोग विद्या , दूसरे वर्ण के लोग शक्ति और तीसरे वर्ण के लोग पैसों के बल पर अपना महत्‍व बनाए रखने में सक्षम हुए , पर चौथे वर्ण अर्थात् शूद्र की दुर्दशा प्रारम्भ हो गयी। अहम्, दुराग्रह और भेदभाव की आग भयावह रूप धरने लगी। लेकिन इसके बावजूद यह निश्चित है कि प्राचीन सामाजिक विभाजन ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों में था जिसका अन्तर्निहित उद्देश्य सामाजिक संगठन, समृद्धि, सुव्यवस्था को बनाये रखना था। समाज के हर वर्ग का अलग अलग महत्‍व था और एक वर्ग के बिना दूसरों का काम बिल्‍कुल नहीं चल पाता था।




 समय की सुई तेजी से बढ़ रही है|

अतः अंत में केवल कुछ और प्रविष्टियों के लिंक आप को थमा रही हूँ जो मुझे विचारणीय व महत्त्व के प्रतीत हुए ( आपकी पसंद व महत्त्व देने  की कसौटी नितांत भिन्न भी हो सकती है )|


पहला लेख पढने पर उसमें वर्णित शोध परिणाम के बारे में जान  मुझे अपनी पुस्तक कविता की जातीयता  का एक अध्याय स्मरण हो आया|  




धीरे-धीरे ये स्ट्रेस दिमाग़ के उस हिस्से (हाइपोथेलमस) पर असर डालता है जो हमारे शरीर के कई एक्शन्स को कंट्रोल करता है...। इस स्ट्रेस की वजह से शरीर में ऐसे हारमोन्स का रिसाव होने लगता है जो शरीर को कमज़ोर कर देते हैं और बुढ़ापा समय से पहले ही आ जाता है...।




मान लीजिए अगर आप किसी को धोखा देते हैं तो आपके मन में कहीं न कहीं इस बात का पछतावा रहता है..। चाहे आपको इस बात का मलाल भी न हो लेकिन कहीं न कहीं ये बात आपके दिमाग पर गुपचुप तरीके से असर डाल रही होती है...।




सतीश चंद्र श्रीवास्तव द्वारा लिखित इस लेख को पढ़ कर मेरा तो मन जार जार रोने को हो आया था| शहीदों की चिताओं पर मेले लगना तो दूर ....


सोनिया गांधी और अंबिका सोनी की तस्वीरों से युक्त विज्ञापन प्रकाशित और प्रसारित किया गया। अब एक साल बाद सिर्फ 16 शहीदों के परिजनों का पता लगा पाना क्या कौम के खात्मे का गंभीर संकेत नहीं दे रहा? क्या पूंजीवाद और भूमंडलीकरण के दौर में राष्ट्रीयता और राष्ट्रभक्ति जैसी बातें अप्रासंगिक और दकियानूसी नहीं हो गई हैं? परंतु इस बात का जवाब भी तो सोचना पड़ेगा कि राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा करके अमेरिका-इंग्लैंड ही नहीं, चीन और जापान भी कोई कदम क्यों नहीं नहीं उठाते? ऐसे में भारतीय व्यवस्था आखिर किनके हाथों में खेल रही है?
सवालों में इतिहासकार
इतिहास के पन्नों में सभी ने पढ़ा है कि 13 अप्रैल 1919 को 'वैशाखी वाले दिन' जनरल डॉयर के नेतृत्व में ब्रिटिश फौज ने अमृतसर के जलियांवाला बाग में निहत्थे लोगों पर अंधाधुंध फायरिंग की थी। हजारों की संख्या में लोग मारे गए थे। इतिहासकारों के पास इस बात का जवाब नहीं है कि किसे भ्रम में डालने के लिए और किसकी चापलूसी करते हुए पुस्तकों में 'वैशाखी वाले दिन' का इस्तेमाल किया गया। हकीकत यह है कि अमृतसर में वैशाखी मेला की कोई परंपरा नहीं है। पंजाब में वैशाखी का मेला आनंदपुर साहिब में लगता है। जलियांवाला बाग में न पहले कभी मेला लगता था और न आज ही कोई परंपरागत आयोजन होता है। कड़वी सचाई यह भी है कि आज के अमृतसर में पांच प्रतिशत लोग भी नहीं जानते कि मजदूर और मानवाधिकारों के विरोधी रॉलेट एक्ट के खिलाफ 31 मार्च और 6 अप्रैल को पूर्ण बंदी तथा 9 अप्रैल को रामनवमी के जुलूस में हिंदू-मुस्लिम एकता ने अंग्रेजों को हिला कर रख दिया था। आंदोलन प्रभावित करने के लिए 10 अप्रैल 1919 को प्रमुख नेता डा. सैफुद्दीन किचलू और डा. सत्यपाल को गिरफ्तार किया गया तो युवा हिंसक हो उठे। अंग्रेजों पर हमला बोला। स्टेशन, बैंक, डाकघर को निशाना बनाया। देशभक्तों पर हुई फायरिंग में 35 शहीद हुए। 13 अप्रैल को इसी सिलसिले में शोकसभा थी, जिसमें 20 हजार से अधिक लोग मौजूद थे। मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में सेवा समिति के दल ने 1500 से अधिक शहीदों की सूची तैयार की थी। उक्त सूची अब गायब है।



आचार्य रामचंद्र शुक्ल की १२५ वीं जयन्ती पर आयोजित एक गंभीर विमर्श की रिपोर्ट  तैयार की है अमिताभ त्रिपाठी जी ने इलाहाबाद से  |










अनंतिम



जाते जाते 
नेट पर हिन्दी लेखन के लिए दिए जाने वाले पुरस्कारों में सम्मिलित होइए, किन्तु कुछ तथ्य ध्यान में रखे रहते हुए|


आप का पूरा सप्ताह सर्व मंगल से परिपूर्ण हो |

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की १२५ वीं जयन्ती पर संगोष्ठी

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आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की १२५ वीं जयन्ती पर संगोष्ठी






आज दिनांक १३ दिसम्बर २००९ को महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के इलाहाबाद स्थित क्षेत्रीय केन्द्र में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के १२५ वीं जयन्ती के अवसर पर, ’आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और आलोचना का वर्तमान’ विषय पर एक संगोष्टी का आयोजन किया गया था। संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रख्यात कथाकार एवं इलाहाबाद विवि के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष दूधनाथ सिंह ने की और म.गा.अ.हि.वि.वि. के कुलपति प्रसिद्ध साहित्यकार विभूति नारायण राय इसके मुख्य अतिथि रहे। प्रमुख वक्ताओं में अध्यक्ष एवं मुख्यअतिथि के अतिरिक्त गोपेश्वर सिंह, भारत भारद्वाज, मुश्ताक़ अली, राकेश, उपेन्द्र कुमार एवं महेश कटारे थे। इसका संयोजन संतोष भदौरिया ने किया|


विषय प्रवर्तन करते हुये दिल्ली से पधारे हुये गोपेश्वर सिंह ने शुक्ल जी के आलोचना की आलोचनाओं पर विशेष प्रकाश डाला और बहुत सीमा तक शुक्ल जी के पक्ष की रक्षा करते हुये भी दिखे। उन्होने शुक्ल जी पर लगने वाले ब्राह्मणवाद एवं साम्प्रदायिकता के आरोपों का भी शुक्ल-साहित्य के अन्तःसाक्ष्यों के आधार पर खण्डन किया। उन्होने जब शुक्ल जी के अन्तर्विरोधों का उल्लेख किया तो वर्तमान आलोचना के सबसे बड़े नाम के भी अन्तर्विरोधों का संकेत देने में नहीं चूके। नामवर जी ने मलयज जी और नीलकान्त जी के आचार्य शुक्ल सम्बन्धी अलग विवेचनाओं में परस्पर विरोधी मन्तव्य व्यक्त किया है इसे उन्होने उद्धरण सहित प्रदर्शित किया। संयोग से नीलकान्त जी वहाँ उपस्थित थे और मुख्य अतिथि महोदय के विशेष आग्रह पर उन्होने अपना पक्ष संक्षेप में रखा लेकिन वे भी गोपेश्वर जी के विचारों के प्रति सहिष्णु रहे। गोपेश्वर जी ने कहा कि बहुत से दलित चिंतक और अतिउत्साही मार्क्सवादी उनपर इतिहास दृष्टि से हीन होने तथा ब्राह्मणवाद और साम्प्रदायिकता का आरोप लगाते हैं। ब्राह्मणवाद को परिभाषित करते हुये गोपेश्वर जी का कहना था कि जो वर्णाश्रम, पुनर्जन्म, अवतार और वेदान्त को मानता हो वह ब्राह्मणवादी है और इस दृष्टि से वे महात्मा गांधी, विवेकानन्द आदि को भी ब्राह्मणवादी बताकर शुक्ल जी के विचारों का रक्षा करते दिखे। उन्होने शुक्ल जी के अवदानो को रेखांकित करते हुये उनके काव्य-विवेक का विशेष उल्लेख किया। हिन्दी ’साहित्य का इतिहास’ लिख कर जो कार्य शुक्ल जी ने किया वह बाद के लोगों के लिये मार्ग दर्शक बना। शुक्ल जी द्वारा सिद्धों और नाथों की परम्परा तथा कबीर की उपेक्षा का कारण वे उनकी शुद्धतावादी सोच को बताते हैं। वे रहस्यवादिता के पक्षधर नहीं हैं। शुक्ल जी के अनुसार जगत एक ब्रह्म की अभिव्यक्ति है और कविता जगत की अभिव्यक्ति है। शुक्ल जी ने आलोचना के जो मानदण्ड स्थापित किये उसकी उपेक्षा परवर्ती काल के आलोचक उनकी आलोचना करते हुये भी नहीं कर सके। गोपेश्वर जी ने राम विलास शर्मा का भी सन्दर्भ देते हुये बताया कि किस प्रकार शर्मा जी ने शुक्ल जी पर लगने वाले ब्राह्मणवाद के आरोप का खन्डन किया था।


गोपेश्वर जी के बाद मुख्य अतिथि महोदय को आमंत्रित किया गया। विभूति जी ने एक प्रकार से शुक्ल जी पर ब्राह्मणवादी होने और साम्प्रदायिक होने के वामपन्थी आरोपों की रक्षा की लेकिन दबे स्वर में। इसके लिये उन्होने समय के दबाव को कारण माना। परन्तु एक बात उन्होने मुक्त कंठ से स्वीकार की कि साहित्य के इतिहास का वैज्ञानिक लेखन शुक्ल जी की ही देन है। बाद के जितने भी आलोचक या साहित्येतिहाकार आये उन्होने या तो उससे बड़ी लकीर खींचने की कोशिश की या छोटी लेकिन वे मूल लकीर को प्रतिस्थापित नहीं कर पाये। इसीलिये आज १२५ वर्ष बाद भी हम उन्हे याद कर रहे हैं।


इसके बाद ग्वालियर के महेश कटारे जी ने वातावरण को हल्का करने का प्रयत्न किया कि आलोचना वही सही है जो समझ में आये। आलोचना में गूढ़ता की उन्होने आलोचना की। उनके वक्तव्य की दो बाते प्रमुख थीं एक तो वर्तमान आलोचना में ग़ज़लों को कोई स्थान नहीं दिया जाता और दूसरा कि आलोचनायें रचनाओं के प्रमोशन के उद्देश्य से हो रही हैं उनके मूल्यांकन के लिये नहीं।


इसके बाद विवि के विशेष कार्याधिकारी राकेश जी का क्रम था। राकेश जी मुख्यरूप से रंगमच से जुड़े हैं। उन्होने भी अपनी पीड़ा व्यक्त की कि नाटकों को साहित्य की मुख्यविधा नहीं माना जाता और इस पर गम्भीर आलोचना नहीं होती। इसी क्रम में उन्होने आलोचना को अनवश्यक भी बता दिया।


राकेश जी के बाद उपेन्द्र कुमार एवं मुश्ताक़ अली का भी वक्तव्य हुआ जिसे मैं कतिपय कारणों से नहीं सुन पाया। जब मैं दुबारा सभागार में पहुँचा तो मुश्ताक़ जी अपना वक्तव्य समाप्त कर रहे थे जो सम्भवतः लम्बा खिंच गया था। ऐसा सचालक के बाद में दिये गये संकेतों से पता चला।


अब बारी थी भारत भारद्वाज की। भारत जी वर्धा विवि से प्रकाशित द्वैमासिक पत्रिका पुस्तक वार्ता के सम्पादक भी हैं। उन्होने इसके नवीनतम अंक(सितम्बर-अक्तूबर) में ’हिन्दी आलोचना के हिमालय : आचार्य रामचन्द्र शुक्ल’ के नाम से सम्पादकीय लिखा है जो रोचक व पठनीय है। भारत जी अपने उद्बोधन में भावुक और किंचित विचलित से दिखे। सम्भवतः वे शुक्ल जी पर हो रही आलोचनात्मक टिप्पणियों से आहत थे। अपने वक्तव्य में उन्होने लगभग वही बातें कहीं जो उन्होने अपने संपादकीय में लिखी हैं अतः उन्हे यहाँ दुहराना उचित नहीं होगा(भारत जी से सम्पर्क का पता दे रहा हूँ इच्छुक जन उनसे सम्पर्क करके शायद सामग्री प्राप्त कर सकें)। अन्त में उन्होने यह कह कर अपनी बात समाप्त की कि शुक्ल जी के हिमालय पर चढ़ने का यत्न तो बहुतों ने किया लेकिन लौट कर कोई नहीं आया।
(इंटरनेट पर सार्वजनिक रूप में संपर्क सूत्र सदा के लिए टाँक देना सुरक्षा कारणों से उचित न होने के कारण उन्हें हटा दिया है| क.वा.)


अन्त में अपने अध्यक्षीय सम्बोधन में दूधनाथ जी ने आरम्भ में ही स्थापना दी कि शुक्ल जी के निश्कर्षों का दायरा अन्तर्विरोधी है। उन्होने शुक्ल जी के उस विचार के बारे में भी बताया कि कविता के आस्वाद और विश्लेषण में अन्तर है। अच्छा लगना ही अच्छी कविता का मानदण्ड नहीं है।


दूधनाथ जी ने साहित्य के क्रमबद्ध इतिहास का श्रेय शुक्ल जी को ही दिया। उनके इतिहास लेखन पर प्रकाश डालते हुये उन्होने कहा कि रासो साहित्य को शुक्ल जी ने इतिहास में इसलिये शामिल किया क्योंकि उनका मानना था कि प्रसिद्धि भी किसी काल के लोकप्रवृत्ति की प्रतिध्वनि है। जो प्रासंगिक नहीं है वह महत्त्वपूर्ण नहीं होता तथा साहित्य इतिहास के अन्दर का इतिहास है जैसी उक्तियाँ भी दूधनाथ जी से सुनने को मिलीं।


दूधनाथ जी का यह भी कहना था कि उनके अनुसार विषय था ’आचार्य शुक्ल और आलोचना का वर्तमान’ लेकिन चर्चा शुक्ल जी को लेकर ज्यादा हुई आलोचना को लेकर कम। उनके अनुसार शुक्ल जी के पूर्व हिन्दी साहित्य में आलोचना थी ही नहीं। किसी वक्ता के द्वारा एक नाम याद दिलाने पर उन्होने उसे महत्त्व नहीं दिया। शुक्ल जी के कुछ पूर्वाग्रहों की चर्चा करते हुये उन्होने कहा कि शुक्ल जी सिद्धों के रहस्यवादी वचनों को साहित्य नहीं मानते लेकिन गोरखनाथ को वे एक हिन्दू योगी मानते हैं। यहाँ वे गोरखनाथ को वज्रयानियों या तंत्रमार्गियों से अलग करते हैं। शुक्ल जी के ब्राह्मणवाद की रक्षा तो दूधनाथ जी नहीं करते लेकिन साम्प्रदायिकता के आरोप से बहुत विद्वतापूर्ण ढंग से उन्हे निकालने का प्रयत्न करते हैं। इसके लिये वे मुस्लिम शासकों के समय शासन में जन की भागीदारी के अभाव को कारण मानते हैं। इसीलिये वे भक्तिकाल के साहित्य को जन के मौन को भंग करने का साहित्य मानते हैं। भक्ति को शुक्ल जी धर्म की भावात्मक अनुभूति कहते हैं। दूधनाथ जी के अनुसार सारा मध्यकालीन साहित्य वेदान्त के त्रिकोण (प्रस्थानत्रयी) पर टिका है। अतः भक्तिकालीन इतिहास लिखते समय शुक्ल जी ने तत्कालीन प्रवृत्तियों को प्रदर्शित किया है। अध्यक्ष महोदय ने छायावादी कवियों के बारे में शुक्ल जी के दृष्टिकोण को रेखांकित करते हुये बताया वे पन्त को चित्रभाषा का कवि कहते हैं। महादेवी के बारे में उन्होने इतिहास के पहले लेखन में स्थान नहीं दिया था लेकिन बाद में उन्होने उनके दो उल्लेख किये हैं एक बार उन्होने कहा है कि ’लगता है महादेवी को पीड़ा का चस्का लग गया है।’और दूसरी बार कहा है कि ’यह बताना मुश्किल है कि यह पीड़ा वास्तविक है या पीड़ा की रमणीय कल्पना’। दूधनाथ जी दूसरी बात से इसलिए असमत हैं कि केवल अनुभव से लिखना तो अनुभववाद हो जायेगा। यदि कल्पना नहीं होगी तो कविता ही सम्भव नहीं होगी। उन्होने छायावाद के दो प्रमुख लक्षण बताये एक - चित्रछवि, दो - रहस्यानुभूति। इसी आधार पर दूधनाथ जी के अनुसार शुक्ल जी ने बाद मे महादेवी को सर्वश्रेष्ठ छायावादी कवि माना है। (दूधनाथ जी ने महादेवी वर्मा पर अभी एक पुस्तक लिखी है) लेकिन वे कहते हैं कि यदि शुक्ल जी को ’निराला’ की बाद की कवितायें पढ़ने का अवसर मिला होता तो वे निश्चित ही ’निराला’ को श्रेष्ठ छायावादी कवि बताते। यहाँ जो कारण दूधनाथ जी ने बताया वह चौंकाने वाला था। उन्होने कहा कि शुक्ल जी वेदान्तवादी और ब्राह्मणवादी थे, तुलसीदास भी थे और मुझे अब लगने लगा है कि निराला भी अपने अन्तिम दिनो में ब्राह्मणवादी हो गये थे। अतः निराला भी तुलसीदास की तरह प्रिय कवि होते। इसके पूर्व उन्होने निराला के उन दो लेखों की भी चर्चा की थी जिसके द्वारा उन्होने शुक्ल जी के आलोचना की खबर ली थी और उन्हे खूब खरी-खोटी सुनाई थी।


शुक्ल जी के अलोचना की पुनः चर्चा करते हुये उन्होने समय की कठिनाइयों का वर्णन भी किया कि उन्हे किस प्रकार तत्कालीन साहित्यकारों की मुखर आलोचना से बचना होता था और किस प्रकार बाबू श्याम सुन्दरदास चाहते थे कि हिन्दी साहित्य का इतिहास उन्ही के(श्याम सुन्दर दास) के नाम से छपे (इस सम्बन्ध में भारत भारद्वाज का सम्पादकीय पठनीय है) आदि। तत्कालीन परिस्थितियों और उपलब्ध संसाधनो के आधार पर उन्होने हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन का जो कार्य किया उसे बाद के इतिहास लेखकों ने भी अपनाया। बहुत से लोगों ने नया लिखने का दम भरते हुये भी शुक्ल जी की ही नकल की, वे कोई मौलिक कार्य नहीं कर सके।


और भी बहुत कुछ कहा गया इस अवसर पर परन्तु स्मृति, समय एवं स्थान की सीमा के कारण इतना ही।


सबसे अन्त में संयोजक और संचालक संतोष भदौरिया जी ने धन्यवाद ज्ञापन किया और स्वल्पाहार के बाद यह गोष्ठी सम्पन्न हुई। यह अनुभव किया गया कि गोष्ठी लम्बी हो गयी। कई आमंत्रित श्रोता अन्त तक धैर्य धारण नहीं कर सके। कुछ के पास वापस जाने सही जुगाड़ नहीं था इसलिये देर होती देख किसी के साथ लटक कर निकल लिये।


मेरे लिये यह अनुभव लाभकारी रहा। मैं विशेष रूप से भारत भारद्वाज और दूधनाथ जी को सुनने आया था परन्तु गोपेश्वर जी को भी सुनना एक सुखद अनुभव था। किसी साहित्यकार को यदि उसके जन्म के १२५ वर्ष बाद भी याद किया जाता है तो लगता है कि बन्दे में था दम। हिन्दी आलोचना और इतिहास की जब भी चर्चा होगी तो उसके आदिपुरुष के रूप में उन्हे याद किया जायेगा।

वर्धा विवि को मैं ऐसे कार्यक्रम के लिये धन्यवाद देता हूँ।


रूस की सर्दियों में भारत का बसंत

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रूस की सर्दियों में भारत का बसंत
डॉ. वेदप्रताप वैदिक



प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहनसिंह की मास्को-यात्रा की तुलना यदि उनकी वाशिंगटन-यात्रा से और ओबामा की पेइचिंग-यात्रा से की जाए तो माना जाएगा कि यह मास्को-यात्रा अधिक सगुण और अधिक सार्थक रही है| इस मास्को-यात्रा का कोई खास शोर-शराबा नहीं था, जैसा कि उल्लिखित दोनों यात्राओं का था लेकिन इस यात्रा में से जैसे समझौते और दिशा-निर्देश निकले हैं, वे सिर्फ भारत-रूस संबंधों में ही गर्माहट पैदा नहीं करेंगे, वे दक्षिण एशिया और विश्व-राजनीति पर भी अपना गहरा प्रभाव डालेंगे|


दो साल पहले प्रधानमंत्री की मास्को-यात्रा में जिस तरह का मोह-भंग हुआ था, उसने भारत-रूस संबंधों को लगभग बर्फ में जमा दिया था| गोर्शकोव-सौदा तो अधर में झूल ही रहा था, परमाणु-सौदे भी खटाई में पड़ गए थे| भारत को यह समझ ही नहीं पड़ रहा था कि अमेरिकी सौदा संपन्न होने के पहले वह रूस से सौदा करे या न करे| भारत-रूस व्यापार भी सिर्फ चार बिलियन डॉलर पर अटका हुआ था| इधर अमेरिका और रूस में परमाणु-छतरी को लेकर तनाव बढ़ गया था और भारत अमेरिका के नज़दीक जाने के लिए बेताब हो रहा था| यह भी पता नहीं चल रहा था कि अफगानिस्तान, पाकिस्तान और ईरान आदि के प्रति भारत और रूस के रवैए में कितनी समानता हो सकती है| लेकिन पिछले साल रूसी प्रधानमंत्री विक्तोर झिबकोव की भारत-यात्रा के दौरान जो हल्के-से संकेत उभरे थे, उन्हें हमारे प्रधानमंत्री की इस मास्को-यात्र ने गरज़ती हुई प्रतिध्वनियों में बदल दिया है| इधर भारत में मनमोहन सिंह दुबारा प्रधानमंत्री बने और उधर रूस में मई 2008 में व्लादिमीर पुतिन खुद प्रधानमंत्री बने और उन्होंने अपने शिष्य दिमित्री मेदवेदेव को राष्ट्रपति बना दिया| इस पट-परिवर्तन के साथ-साथ भारत-अमेरिकी परमाणु-सौदा भी संपन्न हो गया| इन घटनाओं ने भारत और रूस के सामने संभावनाओं के नए द्वार खोल दिए| इसीलिए रूस के साथ हुआ परमाणु-सौदा अमेरिकी सौदे से भी काफी आगे निकल गया| रूस की सर्दियों में भारत का बसंत खिल गया|


भारत-अमेरिकी सौदे पर पाँच साल की खींचातानी के बावजूद प्रधानमंत्री की वाशिंगटन-यात्रा के दौरान परमाणु-ईंधन का मामला अधर में ही लटका रहा लेकिन मास्को-यात्रा के दौरान रूस ने भारत को वे रियायतें दे दी हैं, जो अमेरिका उसे सपने में भी नहीं दे सकता| अमेरिका की शर्त है कि अगर परमाणु-सौदा भंग होता है तो ईंधन की सप्लाई तुरंत बंद हो जाएगी और सारे संयंत्र लौटाने होंगे याने भारत ने यदि कोई परमाणु-विस्फोट कर दिया तो उसे लेने के देने पड़ जाएँगे | अमेरिकी ईंधन से चलनेवाले उसके संयंत्र ठप्प हो जाएँगे और अरबों रूपए के अमेरिकी संयंत्र उसे वापस लौटाने होंगे जबकि उसी स्थिति में रूसी ईंधन की सप्लाय जारी रहेगी| रूस जी-8 के उस प्रस्ताव को भी नहीं मानेगा जो कहता है कि भारत-जैसे परमाणु-अप्रसार संधि (एनपीटी) पर दस्तखत नहीं करनेवाले राष्ट्रों को ईंधन संशोधन और परिवर्द्धन की तकनीक न दी जाए| इसका अर्थ यह हुआ कि रूस ने भारत को व्यावहारिक तौर पर छठा परमाणु शक्तिसंपन्न राष्ट्र मान लिया है| अमेरिका के 123 समझौते ने जो बंधन भारत पर डाले हैं, उन्हें रूसी सौदे ने दरी के नीचे सरका दिया है| अब ऐसा लग रहा है कि दो साल पहले भारत और रूस जो अचानक ठिठक गए थे, वह उन्होंने ठीक ही किया था| अब अमेरिका सौदे ने भारत का मार्ग प्रशस्त कर दिया है| इसका लाभ उठाकर भारत ने फ्रांस, केनाडा, नामीबिया, मंगोलिया, कजाकिस्तान, नाइजीरिया आदि के साथ भी परमाणु संयंत्रें और ईंधन के समझौते कर लिये हैं| रूस के साथ हुआ यह समझौता न केवल भारत को छह नए परमाणु-संयंत्र देगा बल्कि लगभग 20 संयंत्र अलग-अलग प्रांतों में भी लगाएगा| राष्ट्रपति मेदवेदेव ने दो-टूक शब्दों में कहा है कि भारत को परमाणु संयंत्र, तकनीक या ईंधन देते समय रूस किसी के दबाव में आनेवाला नहीं है और ये समझौते सिर्फ क्रय-विक्रय संबंधी नहीं हैं| इनके तहत दोनों देशों के बीच परमाणु-शोध और व्यापक उर्जा सहयोग को प्रोत्साहित किया जाएगा| इसमें संदेह नहीं है कि रूस और फ्रांस ने परमाणु-उर्जा से बिजली बनाने के जो सफल प्रयोग किए हैं, उनका लाभ भारत को मिलेगा|


भारत ने सिर्फ परमाणु-उर्जा ही नहीं, तेल और गैस देने के लिए भी रूस को पटा लिया है| रूस के ताइमन पेचोरा क्षेत्र के त्रेब और तीतोव में भारत अब तेलोत्खनन करेगा और यह सुविधा उसे अब सखालिन-3 में भी मिल सकती है| अब भारत अपनी युद्ध-क्षमता बढ़ाने के लिए दुबारा रूस की तरफ अभिमुख हो रहा है| उसने यातायात और युद्धक विमान बनाने के नए समझौते तो किए ही हैं, विमानवाहक पोत गोर्शकोव का सौदा भी सुलझा लिया है| भारत रूस व्यापार को अगले कुछ वर्षों में तिगुना करने का संकल्प भी लिया गया है| दोनों देशों ने अफगानिस्तान की स्थिरता और पुनर्निर्माण पर भी विचार किया है| ईरान के बारे में दोनों देशों का रवैया अन्य महाशक्तियों से ज़रा भिन्न हैं और दोनों ने पाकिस्तान के आतंकवादी तत्वों पर खुले-आम उंगली उठाई है| भारत और रूस की इस लौटती हुई घनिष्टता से अमेरिका और चीन जैसे राष्ट्रों को चिंतित होने की जरूरत नहीं है, यह बात रूसी राष्ट्रपति और भारतीय प्रधानमंत्री ने एकदम स्पष्ट कर दी है| चीन और अमेरिका के साथ रूस और भारत अपने द्विपक्षीय संबंध अपने-अपने ढंग से आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन इन दो पुराने मित्रों की घनिष्टता विश्व-राजनीति के दादाओं के कान खड़े कर सकती है| यह मित्रता विश्व-राजनीति को बहुध्रुवीय बनाने में तो सहायक होगी ही, वैश्विक और क्षेत्रीय स्तर पर चलनेवाली अनेक अंतरराष्ट्रीय दादागीरियों पर ब्रेक लगाने में भी सक्षम हो सकती है| इस समय भारत को रूस की जितनी जरूरत है उतनी ही जरूरत रूस को भारत की है| पाँच-सात साल पहले तक रूस अपने गैस और तेल की उपलब्धि के दम पर भारत जैसे मित्रें को हाशिए में डालता चला जा रहा था| उसे न तो अपने पारंपरिक शस्त्र-बाजार की परवाह रह गई थी और न ही वह अपने पुराने परखे हुए संबंधों को निभाते रहना चाहता था| लेकिन अब जबकि तेल और गैस के अंतरराष्ट्रीय दाम काफी गिर गए हैं, रूस को अब अपने पुराने ग्राहकों, दोस्तों और भारत जैसी नई विश्व-शक्तियों का दुबारा ध्यान आ रहा है| साम्यवाद के चंगुल से छूटा हुआ रूस अभी तक अपनी नई ज़मीन नहीं तलाश पाया है| वह अब भी विचारधारा के शिशिर में ठिठुर रहा है| भारत का लोकतंत्र और प्रगति के पथ पर बढ़ता हुआ अर्थतंत्र रूस की सर्दियों में बसंत को खिला सकता है|

ए-19 प्रेस एन्क्लेव नई दिल्ली-17

ब्रह्माण्ड के खुलते रहस्य (२)

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(साप्ताहिक स्तम्भ) 



गतांक से आगे

 ब्रह्माण्ड के खुलते रहस्य (२)
(रहस्य खोलने की चाबियाँ  )
विश्वमोहन तिवारी (पूर्व एयर वाइस मार्शल )



चाबियाँ

ब्रह्माण्ड का रहस्य खोलने के लिए दो चाबियाँ  नितान्त आवश्यक हैं। एक तो सैद्धान्तिक चाबी और दूसरे कोई दूरदर्शियों जैसे उपकरण जो ब्रह्माण्ड का वांछित अवलोकन कर सकें। और ये दोनों चाबियाँ अन्योन्याश्रित होती हैं। ब्रह्माण्ड के विषय में व्यापक आपेक्षिक सिद्धान्त 191५   में आइन्स्टाइन ने प्रतिपादित किया था, उसकी एक चाबी थी ‘ब्रह्माण्ड की स्थिर दशा’; सारे दिक में नक्षत्रों आदि के वितरण को देखते हुए बीसवीं शती के प्रारम्भ में वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष, निकाला था, सही कहें तब उनकी मान्यता या विश्वास था, कि ब्रह्माण्ड में तारे समांगी या समरूप से वितरित हैं। इनके वितरण की समरूपता में न तो दिक में और न तो काल में कोई विशेष अन्तर आता है। अर्थात अनन्त काल से ब्रह्माण्ड ऐसा ही है और अनन्त काल तक ऐसा ही रहेगा। उस समय की आधिकांश वैज्ञानिक सोच ब्रह्माण्ड की ‘स्थिर दशा’ को मानती थी। उस समय मन्दाकिनियों के प्रसारण का न तो किसी को ज्ञान था और न किसी ने कल्पना ही की थी। जब कि भारत के पुराणों में ऐसी कल्पनाएँ  बहुत मिलती‌ हैं।



मजे की बात यह कि 191५ में आइन्स्टाइन ने जब अपने क्रान्तिकारी व्यापक आपेक्षिकता के सिद्धान्त अर्थात आपेक्षिकी के आधार पर ब्रह्माण्ड का जो मॉडल प्रतिपादित किया था तब उसमें बह्माण्ड का प्रसारी होना स्वत: ही उद्भासित हो रहा था! किन्तु आइन्स्टाइन के मन में या विश्वास में ब्रह्माण्ड का माना हुआ मॉडल स्थिर समरूप तथा गोलीय ज्यामिति वाला था। अतएव आइन्स्टाइन ने अपने उस क्रान्तिकारी गणितीय सूत्र में प्रसार को रोकने के लिये एक ‘ब्रह्माण्डीय नियतांक घटक’ डाल दिया था। इस ब्रह्माण्डीय नियतांक घटक को प्रतिगुरुत्वाकर्षण प्रभाव कहा गया, अर्थात यह गुरुत्वाकर्षण को रोकता है। यह इसलिये भी उऩ्हें स्वीकार्य था कि यही तो ब्रह्माण्ड की गुरुत्वाकर्षण शक्ति द्वारा स्वयं ब्रह्माण्ड को सिमटाए जाने की प्रक्रिया को संतुलित कर सकता है, अन्यथा ब्रह्माण्ड की गुरुत्वाकर्षण शक्ति उसे एक बिन्दु में समेट लेगी। आइन्स्टाइन ने यदि अपने गणितीय सूत्र पर भरोसा किया होता तब उस काल में ही ब्रह्माण्ड- विज्ञान ने कितनी प्रगति कर ली होती। बाद में आइन्स्टाइन ने उस क्रिया को अपने जीवन की सब से बड़ी गलती मानी। गौर से देखा जाए तब आइन्स्टाइन के सामने ऐसा कुछ भी नहीं था कि जिसके आधार पर वे स्थाई ब्रह्माण्ड की अवधारणा पर संदेह करते, सिवाय इसके कि उऩ्हें अपने सूत्रों पर अधिक विश्वास करना था। जब कि आइन्स्टाइन ऐसे व्यक्ति थे जिऩ्हें अपने सूत्रों पर पूरा विश्वास होता था| जैसे कि उस क्रान्तिकारी खोज के समय था, कि सूर्य का गुरुत्वाकर्षण प्रकाश की किरण का पथ बदल देगा, और जब शेष विश्व इसे नहीं मान रहा था।



ब्रह्माण्ड की निर्मिति या बनावट को समझने के लिये एक सैद्धान्तिक चाबी जिसे आज अधिकांश वैज्ञानिक मानते हैं, और जो बीसवीं सदी के तीसरे दशक में हबल के अवलोकनों तथा निष्कर्षों पर आधारित है, वह है ‘प्रसारी ब्रह्माण्ड सिद्धान्त’ (एक्स्पांडिंग यूनिवर्स थ्योरी)। इसके अनुसार विश्व या ब्रह्माण्ड का उद्भव एक बिन्दु में समाए समस्त ब्रह्माण्ड के विस्फोट से होता है। ब्रह्माण्ड के सभी पिण्ड तीव्र गति से भाग रहे हैं। इसीलिये इस सिद्धान्त का नाम ‘प्रसारी ब्रह्माण्ड’ रखा गया जिसे आम भाषा में ‘महाविस्फोट’ भी बोलते हैं। इस विस्तार को हम एक फूलते हुए गुब्बारे की तरह भी देख सकते हैं, यद्यपि इस उपमा की, सभी उपमाओं की तरह, सीमाएं हैं। इस ब्रह्माण्ड में जो पिण्ड जितनी दूर है वह उतनी ही तेजी से भाग रहा है। (यह भी दृष्टव्य है कि भारतीय शास्त्रों में ब्रह्म का एक अर्थ विस्तार या विस्तृत या विराट भी है। मुण्डक उपनिषद में (1.1.8 ‘तपसा चीयते ब्रह्म’) कहा है कि ‘तप’ से ब्रह्म का प्रसार होता है। (यह मंत्र संयोग मात्र नहीं है, किन्तु यह शोध का विषय है कि उनके पास ऐसी कौन सी शक्ति थी जिसके द्वारा वे यह जान सके।) हबल ने दूरी तथा वेग के अनुपात के नियतांक का मान भी निकाला था जो 100 था, इसका मान आधुनिकतम अवलोकनों तथा गणनाओं से 70–75 के बीच में माना जाता है। इस नियतांक का नाम हबल नियतांक है। हबल ने मन्दाकिनियों के वेग का निष्कर्ष डाप्लर सिद्धान्त के अनुसार ‘अवरक्त विस्थापन’ को मापकर निकाला।



अवरक्त – विस्थापन (इन्फ्रारेड शिफ्ट)

डॉ. हबल ने बीसवीं शती की तीसरी दशाब्दि में नक्षत्रों तथा मन्दाकिनियों का सूक्ष्म निरीक्षण किया। उस अवलोकन में वे उन तारों या मन्दाकिनियों के प्रकाशीय वर्णक्रम को बारीकी से परख रहे थे। प्रत्येक तारे में हाइड्रोजन, हीलियम आदि गैसें होती हैं जो प्रकाश के वर्णक्रम में कुछ चारित्रिक (फ्राउन हौफ़र) पंक्तियाँ देती हैं। कुछ निश्चित दशाओं में इन पंक्तियों का वर्णक्रम में स्थान निश्चित होता है। जब ये पंक्तियाँ अपने स्थानों पर नहीं होतीं तब वे विस्थापित कही जाती हैं। किन्तु, सभी पिण्डों के वर्णक्रम में उन्होंने भिन्न मात्राओं में अवरक्त विस्थापन पाया। जिस तरह आती हुई रेल की सीटी की ध्वनि का तारत्व (आवृत्ति) बढ़ जाता है, और जाती हुई रेल की सीटी ध्वनि का तारत्व कम होता सुनाई देता है, उसी तरह जब प्रकाश का स्रोत जैसे मन्दाकिनी जब हम से तेजी से दूर भागती है तब प्रकाश–तंरगों की आवृत्ति कम होती है अर्थात वह लाल रंग की तरफ विस्थापित होती है।और यदि वह पास आ रही हो तो नीले रंग (ब्लू शिफ़्ट) की तरफ विस्थापित होती है। डॉप्लर के इसी सिद्धान्त के आधार पर इस अवरक्त विस्थापन का अर्थ उन्होंने निकाला कि ब्रह्माण्ड में सभी पिण्ड तेजी से एक दूसरे से दूर भाग रहे हैं। यह खगोल विज्ञान में बीसवीं शती की सर्वाधिक क्रान्तिकारी खोज थी कि ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है। हबल ने पिछली शती के तीसरे दशक में किये अपने दीर्धकालीन अवलोकनों के आधार पर एक नियम बनाया कि, 'जो मन्दाकिनी जितनी दूर है वह उतनी ही तेजी से भाग रही है।'



हबल के नियम के अनेक क्रान्तिकारी परिणाम थे, उनमें यह भी था कि ब्रह्माण्ड का जो प्रसार हो रहा है, वह अनन्तकाल से तो नहीं हो सकता, अथार्त उसका किसी क्षण प्रारंभ हुआ होगा। उस उद्भव के क्षण की गणना की जा सकती है। तथा इस सिद्धान्त के अनुसार उस क्षण ब्रह्माण्ड का समस्त पदार्थ सुई की नोक से भी अत्यन्त छोटे बिन्दु में समाहित था। मैंने कहा था न कि ब्रह्माण्ड की बातें कल्पनातीत लगती हैं। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि करोड़ों करोड़ों और इस तरह से हम ऐसा एक करोड़ बार कहें उतने सूर्यों के पदार्थों से भी अधिक पदार्थ सुई की नोक से भी छोटे बिन्दु में समाया था – सुई की नोक से कितना छोटा – सुई की नोक के बराबर के बिन्दु के एक करोड़ के करोड़वें हिस्से से भी छोटा! (कठोपनिषद 1.2.20 में लिखा है, अणोरणीयान महतो महीयान. . . अर्थात वह (ब्रह्म) अणुओं का भी अणु है और महत का भी महत है, महान विस्फोट की इस जानकारी के बाद कठोपनिषद के इस मंत्र का अर्थ प्रचलित अर्थ के अतिरिक्त एक नए रूप में दृष्टिगत होता है।) और आज वही पदार्थ अकल्पनीय रूप से विराट दिक या जगह में फैला हुआ है। कितना विराट ? प्रकाश एक सैकैण्ड में 3 लाख किलोमीटर की यात्रा करता है, तथा एक वर्ष में लगभग साढ़े नौ लाख करोड़ किमी की यात्रा करता है। ब्रह्माण्ड की त्रिज्या इतनी लम्बी है कि उसे किलोमीटर में नहीं नापते वरन प्रकाश–वर्षों में नापते हैं। ब्रह्माण्ड का उद्भव बिन्दु लगभग 1370 करोड़ प्रकाशवर्ष दूर है,. हम अभी तक ब्रह्माण्ड (लगभग दस करोड़ प्रकाशवर्ष) को लगभग 1000 करोड प्रकाश वर्ष की दूरी तक ही देख सके हैं। ब्रह्माण्ड की सीमा का निरन्तर प्रसार हो रहा है। क्या भारतीय शास्त्रों में इसीलिये ब्रह्म को निस्सीम कहते हैं?


ब्रह्माण्ड विज्ञान या ब्रह्माण्डिकी के मुख्य प्रश्न हैं, ब्रह्माण्ड का उदभव, आयु तथा विस्तार, ब्रह्माण्ड में पदार्थ की संरचना, प्रकार तथा परिमाण, तथा ब्रह्माण्ड की दशा अर्थात ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है, किस गति से हो रहा है, कब तक होता रहेगा आदि।
( क्रमशः )


सिर्फ फौज की वापसी ही समाधान नहीं

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सिर्फ फौज की वापसी ही समाधान नहीं
डा. वेदप्रताप वैदिक
  

 
 
ओबामा की नई अफगान-नीति में नया क्या है ? उसमें ऐसा क्या है, जिसके कारण उसे बुश से अलग कहा जा सके ? सिर्फ एक बात है| वह यह कि अब से 18 माह बाद अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों की वापसी शुरू हो जाएगी| वापसी की बात कभी बुश के दिमाग में आई ही नहीं| शायद इतनी दूर की बात सोचने की क्षमता बुश में थी ही नहीं| ओबामा बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने यह घोषणा की| उन्होंने ''डेढ़ साल'' कहा है और मैंने ''एक साल'' कहा था| वास्तव में वह अवधि व्यावहारिक रूप में एक साल की ही होगी, क्योंकि 30 हजार नए फौजियों को अफगानिस्तान पहुँचते पहुँचते छह माह लग जाएँगे | दूसरे शब्दों में अमेरिका के लगभग एक लाख जवानों और नाटों के लगभग 50 हजार जवानों को एक साल की मोहलत मिली है कि वे इस युद्घ को जीत कर दिखाएँ !


  
ओबामा के प्रतिद्वंद्वी मेककैन ने वापसी की घोषणा को गलत बताया है| उनका तर्क है कि वापसी की घोषणा की वजह से अफगान सरकार, फौज और जनता का मनोबल भी गिरेगा| तालिबान डेढ़ साल तक चुप बैठ जाएँगे और वापसी शुरू होते ही अफगान सरकार पर टूट पड़ेंगे| मेककैन के ये तर्क बिल्कुल गलत हैं| अमेरिकी वापसी की घोषणा का सबसे पहला असर अफगानिस्तान की जनता पर यह होगा कि अमेरिका की छवि सुधरेगी| यह धारणा निर्मूल होगी कि अमेरिका अफगानिस्तान को अनंत काल तक कब्जाए रहेगा| वे अब जानेंगे कि अमेरिका जिस सीमित उद्देश्य के लिए अफगानिस्तान में आया था, उसके पूरे होते ही वापस चला जाएगा| यों भी आम अफगानों के मन में पश्चिमी फौजों (इसाफ) के लिए सराहना का वह उत्कट भाव अब नहीं है, जो 2001 में था| दूसरा, पश्चिमी फौजों की उपस्थिति ही तालिबान की वापसी का सबसे बड़ा कारण है| तालिबान बड़ी तरकीब से काम ले रहे हैं| वे अफगानों को समझा रहे हैं कि ब्रिटिश और सोवियत फौजों की तरह अमेरिकी फौजों ने अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया है और काबुल में उन्होंने कठपुतली सरकार बिठा रखी है| यह लड़ाई सिर्फ इस्लामी जिहाद की ही नहीं है, अफगानिस्तान की आज़ादी की भी है| अब ओबामा की घोषणा से यह तर्क अपने आप गल जाएगा| तीसरा, वापसी की घोषणा अफगान सरकार को अपनी कमर कसने पर मजबूर करेगी| ओबामा ने दो-टूक शब्दों में कहा है कि अब 'ब्लेंक चेक' का ज़माना लद गया है याने 'करो या मरो'| यदि अगले एक-डेढ़ साल में अफगान सरकार अपने पाँव पर खड़ी नहीं हो सकी तो उसे हटना पड़ेगा| इस चुनौती के कारण उसे कठोर निर्णय लेने ही पड़ेंगे| चौथा, पश्चिमी (इसाफ) सेनाओं को अब किसी भी बहानेबाजी का मौका नहीं मिलेगा| उन्हें पता चल गया है कि अब एक-डेढ़ साल में उन्हें अपना लक्ष्य प्राप्त करना है| पाँचवाँ, ओबामा की वापसी की घोषणा से आम अमेरिकी को काफी सांत्वना मिल रही है| उन्हें एराक़ और अफगानिस्तान की अंधी सुरंगों के पार अब आशा की किरण दिखाई पड़ने लगी है|

   
 
अमेरिकी वापसी की सराहना में मैंने ये तर्क जरूर दिए हैं लेकिन क्या फौजी वापसी अपने आप में कोई समाधान है ? नहीं है| क्यों ? पहला, अमेरिका और नाटो के डेढ़ लाख जवान सफल कैसे होंगे ? वे अल़-क़ायदा और तालिबान को कैसे हराएँगे  ? यदि एक लाख उन्हें नहीं हरा सके तो डेढ़ लाख क्या कर लेंगे ? पश्चिमी जवान आमने-सामने लड़ने से बहुत घबराते हैं| उन्हें न तो स्थानीय भूगोल का पता होता है, न स्थानीय भाषा आती है, न स्थानीय लोग उनका साथ देते हैं, न यथेष्ट गुप्त सूचनाएँ उनके पास होती हैं और न ही अफगान सैनिकों के साथ उनका जरूरी ताल-मेल होता है| इस साल के शुरू में ही ओबामा ने लगभग 20 हजार नए फौजी भिजवा दिए थे लेकिन इस साल जितने अमेरिकी फौजी मारे गए, पहले कभी नहीं मारे गए| तालिबान प्रवक्ता ने अब 30 हजार नए जवानों की घोषणा के बाद कहा है कि वे अमेरिका को और ज्यादा कड़ुआ पाठ पढ़ाएँगे  इसमें शक नहीं कि 30 साल से लगातार गृह-युद्घ में फँसे अफगानिस्तान को काबू करने के लिए एक लाख फौजी काफी नहीं हैं लेकिन सिर्फ 30 हजार जवान बढ़ाने से क्या होगा ? तालिबान का असर अब उत्तर और पश्चिमी अफगानिस्तान में भी फैल रहा है| इस समय कम से कम दो लाख जवानों की जरूरत है| अब से 36 साल पहले जब जाहिरशाह ने काबुल छोड़ा था, उनके पास दो लाख से भी ज्यादा जवान और सिपाही थे| हर अफगान नौजवान के लिए सैन्य-शिक्षा अनिवार्य थी| यदि ओबामा कोशिश करते तो पिछले एक साल में वे दर्जनों एशियाई और अफ्रीकी देशों को तैयार कर लेते, जो एक लाख से भी ज्यादा जवान काबुल भिजवा देते| ये जवान सस्ते भी पड़ते और लड़ते भी बेहतर ! लेकिन ओबामा ने मूलत: बुश की राह ही पकड़ी है| जवानों की संख्या बढ़ाने के अलावा उन्होंने जीत की कौनसी रणनीति बनाई है? उनके सलाहकारों ने साल भर पहाड़ खोदा और उसमें से निकाली चुहिया !

   
 
ओबामा ने न तो राष्ट्रीय अफगान सेना के बड़े पैमाने पर नव-निर्माण की बात कहीं है और न ही अफगान-सरकार को समस्त सैन्य-गतिविधियों के संचालन का अधिकार दिया है| यदि अब भी वे पांच लाख जवानों की स्थानीय फौज खड़ी करने का संकल्प करें तो अफगानिस्तान में बेकार नौजवानों को ढूँढना मुश्किल हो जाएगा| तालिबान को जिहादी कहाँ से मिलेंगे ? इसी प्रकार ओबामा ने अफगान अफीम के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा है| जब तक जिहादियों का पैसों का स्त्रेत आप नहीं सुखाएँगे|  आप उन पर काबू कैसे पाएँगे  ? अफगानिस्तान में राजनीतिक दलों के अभाव तथा अन्य लोकतांत्रिक संस्थाओं के बारे में भी ओबामा मौन रहे| उन्होंने फौज पर 30 बिलियन डॉलर (लगभग सवाल लाख करोड़ रू.) के नए खर्च की घोषणा तो कर दी लेकिन अगर एक साल में वे सिर्फ 20 बिलियन डॉलर विकास-कार्यों के लिए दे देते तो चमत्कार हो जाता| विदेशों से मिलनेवाली मदद फौजी खर्च के मुकाबले नगण्य है और उसका भी सिर्फ चार-पांच प्रतिशत ही काबुल-सरकार के हाथों में होता है| यह स्थिति उलटनी चाहिए थी|

   
 
अफगानिस्तान के पुननिर्माण में भारत ने अदभुत भूमिका निभाई है| यही भूमिका अब उसे अफगानिस्तान की रक्षा में निभानी चाहिए| पांच लाख की अफगान-फौज खड़ी करने का जिम्मा भारत को लेना चाहिए| ओबामा ने अपने भाषण में पाकिस्तान को काफी थपकी दी है| वह जरूरी भी है लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि जो आज उनका सिरदर्द है, डेढ़ साल बाद, वह भारत का सिरदर्द बनेगा| क्या ओबामा अफगानिस्तान को पाकिस्तान की दया पर छोड़कर वापस लौटना चाहते हैं ? कहीं ऐसा तो नहीं कि ओबामा अफगान-चक्रव्यूह में बुश से भी अधिक गहरे उलझ जाएँगे ? मुझे डर यही है कि ओबामा कहीं बुश से भी बड़े अभिमन्यु सिद्घ न हों ? अफगानिस्तान कहीं उन्हें ही न ले बैठे ?

 
(लेखक, अफगान मामलों के प्रसिद्घ विशेषज्ञ हैं| वे पिछले 40 साल में दर्जनों बार अफगानिस्तान की यात्रा कर चुके हैं और वे प्रमुख अफगान नेताओं के साथ सतत संपर्क में रहे है)
ए-19 प्रेस एन्क्लेव नई दिल्ली-17

ब्रह्माण्ड के खुलते रहस्य (1) (पृथ्वी -केन्द्रित दृष्टि से मुक्ति)

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(साप्ताहिक स्तम्भ)



 ब्रह्माण्ड के खुलते रहस्य (1) 
(पृथ्वी -केन्द्रित दृष्टि से मुक्ति)
विश्वमोहन तिवारी, पूर्व एयर वाइस मार्शल



विश्व का, कहना चाहिये ब्रह्माण्ड का, सर्वप्रथम तथा सबसे बड़ा आश्चर्य, निस्संदेह स्वयं ब्रह्माण्ड का जन्म है। ब्रह्माण्ड का अन्त चाहे विस्फोट में हो या टाँय टाँय फिस्स में हो उसका जन्म एक विस्फोट से हुआ है। विस्फोट के पूर्व समस्त ब्रह्माण्ड एक बिन्दु में समाया था। वह बिन्दु अकल्पनीय रूप से छोटा था, और ब्रह्माण्ड अकल्पनीय रूप से विराट  है। क्या इससे बड़ा आश्चर्य कुछ हो भी सकता है कि उस सूक्ष्मतम बिन्दु से इस विराटतम ब्रह्माण्ड का जन्म हुआ है। बिन्दु और उसकी विराटता की कल्पना असंभव ही कहलाएगी किन्तु खगोल वैज्ञानिकों ने उस सब की गणना कर ली है।गणित तो अकल्पनीय को भी अंकों में सीमित कर दे या बाँध दे, अकथनीय को कह दे।



13.7 अरब प्रकाश–वर्षों ( 130 लाख करोड़ अरब किमी गहरे (एक प्रकाश–वर्ष में 9.5 लाख करोड़ किमी होते हैं)) गहरे इस ब्रह्माण्ड के गूढ़तम रहस्यों को क्या यह मात्र तेरह सौ घन से. मी. के आयतन वाला हमारा मन मस्तिष्क खोल सकता है? तब भी मानव ने आदि काल से इन रहस्यों को खोलने का प्रयत्न किया है चाहे उसमें यूनानियों का यह विश्वास हो कि आकाशीय गोल तारे वे छिद्र हैं जिनमें से हमें सृष्टि रचना की जलती आग दिखाई देती है, या भारतीय ऋषियों का विश्वास कि आकाशीय पिंड विभिन्न लोक हैं जहाँ की यात्राएँ की जा सकती हैं। खगोल के नक्षत्रों की कुछ जानकारी, जिसे ज्योतिष ज्ञान कहते हैं, हजारों वर्ष पहिले आदमी ने अवलोकन से प्राप्त कर ली थी जिन्हे उसने 27 नक्षत्र मण्डलों में बाँटा तथा जिसका उपयोग उसने फलित ज्योतिष के लिये किया। नक्षत्रों वाला ज्योतिष ज्ञान विज्ञान है किन्तु ‘फलित ज्योतिष’ विज्ञान नहीं है। तारे छिद्र तो नहीं हैं किन्तु उनमें सृष्टि रचना की आग अवश्य जलती है जिसके अध्ययन के द्वारा हम सृष्टि के रहस्य खोल सकते हैं। और अन्तरिक्ष विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी का सबसे मनोहर स्वप्न है अन्तरिक्ष यात्रा।




इन धू धू कर जलते हुए पिण्डों के रहस्य खोलने के लिये अपार धन तथा ऊर्जा खर्च करने में क्या रखा है, जबकि इस सुनील ग्रह की शस्य श्यामला हरित भूमि पर गरीबी का श्राप मानव जाति को दुखी कर रहा है? और वास्तविकता यह है कि ज्यों ज्यों ब्रह्माण्ड के रहस्य खोले गए हैं, मानव ने प्रकृति के नियमों को खोजा है तथा विज्ञान एवं औद्योगिक प्रगति बढ़ती गई है। सोलहवीं शती में कोपर्निकस की खोज (आगे देखें) के बाद ही पश्चिम ने बाइबिल के स्वर्ग का मोह छोड़कर इस जीवन को समुन्नत करना प्रारम्भ किया।



मानव मन स्वयं अत्यन्त रहस्यमय है, और वह स्वयं ही रहस्य खोलने के लिये सदा सहज ही तत्पर रहता है, चाहे वे रहस्य जासूसी उपन्यासों के हों, या ब्रह्माण्ड के। मन तथा ब्रह्माण्ड के रहस्यों को खोलने में प्रबुद्ध तथा रचनाशील व्यक्ति हजारों वर्षों से लगे हुए हैं क्योंकि इन रहस्यों को खोलना हमारे लिये सबसे बड़ी चुनौती है तथा सर्वाधिक आनन्ददायक तथा लाभदायक भी है। ऋषियों तथा चिन्तकों ने ब्रह्माण्ड के रहस्यों को खोलने में अपनी अन्तर्दृष्टि या रचनाशीलता का उपयोग कर अद्भुत मिथक दिये हैं। हो सकता है उनमें विज्ञान हो जिसे सिद्ध करना शेष है, किन्तु उन मिथकों के अद्भुत अर्थ निकलते हैं जो मानव–मन की जानकारी अधिक देते हैं, ब्रह्माण्ड की कम।



पाँचवीं से सत्रहवीं शती तक
पहिले मनुष्य यही मानते थे कि पृथ्वी स्थिर है, केन्द्र में है तथा सूर्य सहित अंतरिक्ष के सभी नक्षत्र उसकी परिक्रमा करते हैं, यही आँखों देखा हाल निर्विवादित सत्य लगता था। ईसा की पाँचवीं शती में विश्व में ब्रह्माण्ड का एक रहस्य सर्वप्रथम भारत में खोजा गया। उस समय बिना किसी दूरदर्शी की सहायता के आर्यभट ने सौर मंडल का उस काल के लिए एक अत्यन्त अविश्वसनीय किन्तु अत्यंत महत्वपूर्ण वैज्ञानिक रहस्य खोला था। और आश्चर्यजनक था कि कैसे, किन गणनाओं का विवेचन कर यह् अद्भुत खोज की गई थी !! भारत में भी वैज्ञानिकों ने इस पर बहुत वाद-विवाद किये। तथा जिसे स्वीकार करने में शेष मानव जाति को एक हजार वर्ष और लगे, – कि सौरमंडल में सूर्य स्थिर है तथा पृथ्वी अपने अक्ष पर प्रचक्रण करती हुई सूर्य की परिक्रमा करती है; कि ग्रहण छाया पड़ने के कारण पड़ते हैं न कि राक्षसों के कारण। इसे सोलहवीं शती में स्वतंत्र रूप से कोपरनिकस ने पाश्चात्य जगत में स्थापित किया। बारहवीं शती में भास्कराचार्य ने गुरुत्वाकर्षण के तीनों नियम खोज निकाले थे, किन्तु इन्हें वैज्ञानिक पद्धति से सिद्ध नहीं किया था। यह् कुछ उसी तरह था जैसे पाइथागोर का प्रमेय युक्लिड के पहले पाइथागोर को ज्ञात था, और उनके भी पहले शुल्व सूत्र नाम से भारतीय ऋषियों को ज्ञात था, किन्तु प्रमाण तो यूक्लिड ने ही दिया था। इसके साथ भारत में की गई अन्य वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकी खोजों तथा आविष्कारों से यह प्रमाणित होता है कि यह आध्यात्मिक भारत बारहवीं शती तक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा आर्थिक समृद्धि में विश्व में सर्वाग्रणी था। गति के नियमों को सत्रहवीं शती में स्वतंत्र रूप से न्यूटन ने वैज्ञानिक रूप से स्थापित किया। और देखा जाए तो इन वैज्ञानिक तथ्यों की स्वीकृति के बाद ही पाश्चात्य संसार में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विकास का ‘बिग बैंग’ (महाविस्फोट) हुआ।




दूरदर्शी
सत्रहवीं शती के दूरदर्शी के आविष्कार तक, पाश्चात्य जगत सौरमंडल को ही समस्त ब्रह्माण्ड मानता था, 1609 में गालिलेओ ने छोटे से दूरदर्शी की सहायता से बृहस्पति ग्रह के चार चाँद देखे तो मानो दूरदर्शी में ही चार चाँद लग गये। और तब से विशाल से विशालतर दूरदर्शी बने जिनसे हम अब लगभग दस अरब प्रकाश–वर्ष (95 लाख करोड़ अरब किमी.) की दूरी तक के नक्षत्रों, मन्दाकिनियों तथा नीहारिकाओं को देख सकते हैं। फिर हजारों मीटरों तक के क्षेत्र में फैले रेडियो दूरदर्शी बनाए गये और अब तो भारतीय मूल के नोबैल पुरस्कृत खगोलज्ञ एस. चन्द्रशेखर के सम्मान में निर्मित उपग्रह स्थित ‘चन्द्र एक्स–किरण’ वेधशाला है जो पृथ्वी के वायुमंडल के पार से ब्रह्माण्ड के रहस्यों को खोल रही है।गुरुत्वाकर्षण तरंगों पर तथा शून्य (निश्चल अवस्था में) या अल्पतम द्रव्यमान तथा आवेशरहित न्यूट्रिनो कणों पर खोज हो रही है।




मजे की बात है कि दूरदर्शी या अन्य उपकरण या वैज्ञानिक कुछ रहस्यों को खोलते हैं तो कुछ नवीन रहस्यों को उत्पन्न भी करते हैं। जब ब्रह्माण्ड में पिण्ड दिखे तो प्रश्न आया कि ये अतिविशाल जलते हुए पिण्डों का निर्माण किस तरह हुआ, मन्दाकिनियों, मन्दाकिनी–गुच्छों, फिर मन्दाकिनी–मण्डलों और फिर मन्दाकिनी–चादरों का निर्माण कैसे होता है? ब्रह्माण्ड का उद्भव तथा विकास कैसे हुआ?


क्रमशः 




आस्ट्रेलिया में हिन्दी पत्रकारिता

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साभार - मीडिया स्कैन

इंदौर दूरदर्शन की 2 फिल्मों का राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए नामांकन

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इंदौर दूरदर्शन की 2 फिल्मों का  राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए नामांकन








बाबरी और राव का अंतिम सच

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बाबरी और राव का अंतिम सच
डॉ. वेदप्रताप वैदिक

जस्टिस लिब्रहान ने जिन एक हजार पन्नों पर अपनी रपट लिखी है, वे बर्बाद हो गए। उन्हीं एक हजार पन्नों पर यदि छोटे बच्चों को क ख ग पढ़ाया जाता तो उनका कुछ बेहतर इस्तेमाल होता। यह कैसी रपट है कि बाबरी मस्जिद तोड़नेवाले एक भी कारसेवक पर वह उंगली नहीं रख सकी। वह उस साजिश का पर्दाफाश भी नहीं कर सकी, जिसके तहत मस्जिद गिराई गई लेकिन इस रपट के बहाने देश में जबर्दस्त राजनीतिक लीपा-पोती चल रही है। स्वयं लिब्रहान ने श्री नरसिंह राव पर व्यंग्य-बाण कसे हैं।


इस लीपा-पोती का सबसे दुखद पहलू यह है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है। कोई कह रहा है कि 6 दिसंबर 1992 को वे दिन भर सोते रहे। कोई कह रहा है कि राव और संघ की मिलीभगत थी और मुझे  उद्धृत  करके यह भी कहा जा रहा है कि राव साहब ने मुझे कहा कि ''चलो अच्छा हुआ, मस्जिद टूटी, पिंड कटा।'' ये तीनों बातें बिल्कुल निराधार हैं। 6 दिसंबर 1992 को रविवार था। उसी दिन मस्जिद टूटी थी। उस दिन सुबह साढ़े आठ बजे से रात साढ़े ग्यारह बजे के बीच राव साहब से मेरी कम से कम छह-सात बार बात हुई है। रविवार होने के बावजूद मैं सुबह ठीक आठ बजे अपने दफ्तर (पी.टी.आई.) पहुँच गया था। साढ़े आठ बजे के आस-पास उनसे रोजमर्रा की तरह सामान्य बातचीत हुई। सवा दस बजे के करीब मैंने उन्हें बताया कि मस्जिद के पहले डोम पर लोग चढ़ गए हैं। हम दोनों की बातचीत के बीच आईबी प्रमुख वैद्य ने उन्हें ''रेक्स'' (लाल फोन) पर इसकी पुष्टि की ! राव साहब ने मुझसे कहा कि ''यह तो भयंकर धोखा हुआ।'' ''इन लोगों'' ने आपसे और मुझसे जितने भी वायदे किए थे, सब भंग कर दिए। राव साहब के प्रतिनिधि के तौर पर मैं विहिप, संघ, भाजपा नेताओं, साधु-संतों और मुस्लिम नेताओं से मंदिर-मस्जिद विवाद पर लगभग साल भर से बातचीत चला रहा था। औपचारिक तौर पर यह बातचीत शरद पवार, सुबोधकांत सहाय, कुमारमंगलम और राजेश पायलट चलाते थे। राम-मंदिर आंदोलन के सभी नेताओं ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया था कि उन्हें कार सेवा करने दी जाए। राव साहब कार-सेवा की अनुमति देने के पक्ष में नहीं थे। बातचीत टूटनेवाली थी लेकिन विहिप नेताओं ने मेरे आग्रह पर कार-सेवा की तारीख तीन माह आगे बढ़ाई और छह दिसंबर की तिथि तय हुई। यह समझौता 24 जुलाई को हुआ। इसी बीच प्रधानमंत्री ने राम-मंदिर आंदोलन का समाधान निकालने के लिए क्या-क्या प्रयत्न नहीं किए। इन सबका उल्लेख यहाँ नहीं हो सकता। 3 दिसंबर को मुख्यमंत्री कल्याणसिंह ने मुझे फोन किया और लगभग एक घंटे बात की। सर संघचालक रज्जू भय्या, सुदर्शन जी, अशोक सिंघल जी, डालमिया जी, आडवाणी जी, अटल जी, विनय कटियार आदि से भी स्पष्ट बात हुई। समझौता यह हुआ कि ढाँचे के पास कोई नहीं जाएगा। केवल चबूतरे पर कार-सेवा होगी। कोई तोड़-फोड़ या हिंसा नहीं होगी। ऐसा ही आश्वासन उच्चतम न्यायालय और राष्ट्रीय एकात्मता समिति को भी दिया गया था। लेकिन मुझे काफी शक था, क्योंकि बेकाबू होती भीड़ के कई कड़ुए अनुभव मुझे अपने छात्र-काल में हो चुके थे। मैंने कुछ रक्षा-विशेषज्ञों से बात करके प्रधानमंत्री को सलाह दी थी कि वे रबर-बुलैटों का अग्रिम प्रबंध करें ताकि हिंसक कार सेवकों को घायल किए बिना घटना स्थल से भगाया जा सके। मैंने उनसे यह भी कहा था कि छह दिसंबर के दिन मस्जिद को चारों तरफ से टैंकों से घिरवा दिया जाए।



ज्यों-ज्यों मस्जिद के दूसरे डोमों के गिरने की खबर आती गई, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री शंकरराव चव्हाण, अन्य वरिष्ठ अफसर और मैं कई विकल्पों पर विचार करते रहे। फैजाबाद स्थित पुलिस बल को अयोध्या दौड़ाने, कल्याणसिंह को बर्खास्त करने, ढाँचे  को बचाने, कार-सेवकों को विसर्जित करने आदि का कोई भी निर्णय लागू नहीं हो सका, क्योंकि हर निर्णय में कानूनी अड़चनें थीं और उससे भी ज्यादा आशंका यह थी कि यदि घटना-स्थल पर रक्तपात हो गया तो उसकी आग सारे देश में फैल जाएगी। कोढ़ में खाज क्यों पैदा करना ? मैं स्वयं उस समय तत्काल कठोर कार्रवाई के पक्ष में था लेकिन अब 17 साल बाद सोचता हूँ तो लगता है कि राव साहब ने असाधारण धैर्य का परिचय देकर ठीक किया। लगभग चार बजे राज्यपाल सत्यनारायण रेड्डी ने मुझसे फोन पर पूछा कि ''क्या करें, मुख्यमंत्री राजभवन के गेट पर खड़े हैं ?'' मैंने कहा, 'वही कीजिए, जो गृहमंत्री कहते हैं।'' इस बारे में प्रधानमंत्री से आधा-एक घंटा पहले मेरी बात हो चुकी थी। याद रहे, राव साहब अक्सर पौने तीन बजे लंच के बाद आधा घंटा विश्राम किया करते थे। उस दिन उन्होंने न तो भोजन किया और न ही विश्राम। दूसरे दिन उन्हें तेज बुखार हो गया और गला इतना खराब रहा कि वे फोन पर ठीक से बात भी नहीं कर पा रहे थे। उस रोज मैंने खुद रात को साढ़े ग्यारह बजे वित्त राज्यमंत्री श्री रामेश्वर ठाकुर के घर भोजन किया। उस दिन देश के अनेक प्रमुख नेताओं से दिन-भर फोन पर बात होती रही। पता नहीं क्यों, संघ और कांग्रेस के भी कुछ नेताओं ने प्रधानमंत्री के विरुद्ध तलवारें खींच लीं। उन्हें बदनाम करने और अपदस्थ करने के लिए क्या-क्या षडयंत्र नहीं किए गए ? राव साहब के एक वरिष्ठ मंत्री ने मुझे भी धमकी दी। जब मैं ठाकुरजी के घर भोजन कर रहा था तो उन्होंने कहा ''आपको और आपके मित्र राव साहब को अब हम देख लेंगे।'' हुआ क्या ? वे खुद ही बाहर हो गए और राव साहब पूरे पाँच साल सरकार चलाते रहे। संघ के लोग कहते रहे कि नरसिंहराव से बड़ा शातिर कौन हो सकता है ? उन्होंने बाबरी ढाँचा जान-बूझकर टूटने दिया ताकि संघ और मंदिर-आंदोलन हमेशा के लिए बदनाम हो जाएँ। इस बहाने उन्होंने भाजपा की राज्य-सरकारें भी भंग कर दीं। श्री नरसिंहराव पर मस्जिद तुड़वाने का आरोप वैसा ही है, जैसा यह कहना कि न्यूयार्क के ट्रेड टॉवर अमेरिका के यहूदियों ने गिरवाए या बेनज़ीर भुट्टों की हत्या आसिफ ज़रदारी ने करवाई! अफसोस इस बात का है कि ऐसी बे-सिरपैर की बातों को कांग्रेस के कुछ जिम्मेदार नेताओं ने भी प्रोत्साहित किया, खासतौर से राव साहब के पद से हटने के बाद। वे यह भूल गए कि उनकी यह कृतघ्नता राव साहब से ज्यादा खुद कांग्रेस को बहुत मंहगी पड़ेगी। आश्चर्य है कि आज की कांग्रेस भी राव साहब की भूमिका पर हकला रही है। नरसिंहरावजी की नीयत पर शक करना अपने महान लोकतंत्र की इज्जत को खटाई में डालना है।

(लेखक, प्रधानमंत्री नरसिंहराव के अभिन्न मित्र रहे हैं)
 

चीन अमेरिका की मजबूरी, पर भारत जरूरी

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चीन अमेरिका की मजबूरी, ... पर भारत जरूरी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक



प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की वाशिंगटन-यात्रा के दौरान परमाणु-सौदे को लागू करने की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई लेकिन क्या सिर्फ इसीलिए उनकी इस यात्रा को मात्र औपचारिकता मान लिया जाए ? क्या यह मान लिया जाए कि ओबामा ने भारत के उन घावों पर सिर्फ मरहम लगाने का काम किया, जो अचानक ही पिछले हफ्ते उनकी चीन यात्र के दौरान उभर आए थे ? जहाँ तक परमाणु-सौदे का प्रश्न है, स्वयं प्रधानमंत्री ने कहा है कि कुछ ही हफ्तों में सारे मुद्दों पर समझौता हो जाएगा| ओबामा ने भी उनके इस कथन का समर्थन किया है| यह तो हमें पता है कि ओबामा और उनके डेमोक्रेट साथियों ने बुश द्वारा किए गए परमाणु-सौदे के कई प्रावधानों का विरोध किया था और ओबामा प्रशासन परमाणु-अप्रसार का घनघोर समर्थक है| ऐसी हालत में यदि सौदे के कुछ मुद्दों को लेकर दोनों पक्षों के बीच कुछ खींचातानी चल रही है तो यह स्वाभाविक ही है| इसके अलावा सबसे अधिक ध्यातव्य बात यह है कि किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत को पहली बार 'परमाणु शक्ति' कहा है और अगले साल होने वाले परमाणु अप्रसार सम्मेलन में उससे भाग लेने का आग्रह किया है| यह भारत को छठे परमाणु शस्त्र्संपन्न राष्ट्र के तौर पर मिली अनौपचारिक मान्यता ही है|


भारत के प्रधानमंत्री को ओबामा ने अपना पहला औपचारिक मेहमान बनाया, यह तो उल्लेखनीय है ही, इससे भी बड़ी बात यह है कि दोनों देशों के संबंध अब व्यक्तियों और पार्टियों पर निर्भर न होकर राष्ट्रीय स्तर पर पहुँच  गए हैं| अमेरिका में राष्ट्रपति क्लिंटन हैं या बुश हैं या ओबामा हैं और भारत में प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी हैं या मनमोहन सिंह हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता| न ही इस बात से फर्क पड़ता है कि अमेरिका में रिपब्लिकन्स का शासन है या डेमोक्रेटस का और भारत में भाजपाइयों का है या कांग्रेसियों का| रिश्तों का कारवां बराबर आगे बढ़ता चला जा रहा है| इस नए तथ्य को प्रधानमंत्री की इस यात्रा ने रेखांकित किया है|


जहाँ तक चीन का सवाल है, डॉ. सिंह ने बहुत ही सलीके से ओबामा और अमेरिकियों को समझा दिया है कि दोनों एशियाई देशों में बुनियादी फर्क क्या है ? अर्थशास्त्री होते हुए भी उन्होंने किसी दार्शनिक की तरह पूछ लिया कि क्या सकल राष्ट्रीय आय ही प्रगति का एकमात्र पैमाना है ? क्या मानव अधिकार, लोकतंत्र और खुलापन बेकार की बातें हैं ? भारत के ये आदर्श अमेरिका के भी आदर्श हैं| इसीलिए भारत और अमेरिका 'स्वाभाविक मित्र' हैं| क्या यह कम बड़ी बात है कि ओबामा ने भारत-अमेरिकी संबंधों को 21वीं सदी के भविष्य से जोड़ा है और स्पष्ट शब्दों में कहा है कि 'एशिया के नेतृत्व' में भारत की विशिष्ट भूमिका है| यदि चीन और भारत के बारे में ओबामा द्वारा कही गई बातों की बारीक़ी से तुलना की जाए तो यह रहस्य तुरंत समझ में आ जाएगा कि चीन अमेरिका की मजबूरी है और भारत अमेरिका की पंसद है| अमेरिका पर चीन का 800 बिलियन डॉलर का कज़र् चढ़ा हुआ है, चीन की आर्थिक शक्ति बहुत तेज रफ्तार से बढ़ रही है, सैनिक दृष्टि से भी वह एशिया का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र है और वह सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य भी हैं| ऐसी स्थिति में ओबामा चीन की खुशामद न करें, तो क्या करें ? वे चीन के मुकाबले भारत को क्यों खड़ा करें ? जैसा कि शायद बुश चाहते थे, भारत-चीन-अमेरिका - यह नया त्रिकोण क्यों बने ? भारत चीन से प्रतिस्पर्धा में क्या उलझे ? इसीलिए डॉ. सिंह ने ठीक ही कहा कि वे 'शांतिपूर्ण चीन' के नवोदय का स्वागत करते हैं| वे चीन-अमेरिका संबंधों में अपनी टाँग क्यों अड़ाएँ ? लेकिन उन्होंने यह अच्छा किया कि चीन की 'दादागीरी' का खुला जि़क्र कर दिया| यह कम महत्वपूर्ण नहीं कि दोनों देशों के संबंधों को प्रगाढ़ बनाने में अमेरिका में रहनेवाले भारतवंशियों का भी स्पष्ट उल्लेख हुआ| स्वयं ओबामा के प्रशासन में जितने भारतीयों को प्रमुख स्थान मिले हैं, क्या चीनियों को मिले हैं ? ओबामा का हिंदी बोलना, शाकाहारी भोजन परोसना, उनकी पत्नी मिशेल का भारतीय दर्जी से सिला सूट पहनना और हमारे प्रधानमंत्री के सम्मान में इतना बड़ा शामियाना-भोज आयोजित करना क्या विशेष आत्मीयता का परिचायक नहीं है ?


इस आत्मीयता का अर्थ यह नहीं है कि अमेरिका चीन और पाकिस्तान को दरकिनार कर सकता है| ये दोनों राष्ट्र उसकी मजबूरी हैं, लेकिन संयुक्त वक्तव्य में अमेरिका ने दो-टूक शब्दों में कहा है कि आतंकवाद की जड़ भारत के अड़ोस-पड़ोस में ही है| दोनों राष्ट्र आतंकवाद को उखाड़ने के लिए कटिबद्घ हैं| यदि आज अमेरिका का गुप्तचर विभाग भारत की सहायता नहीं करता तो क्या मुंबई-कांड के अपराधियों को पकड़ा जा सकता था ? ओबामा ने अफगानिस्तान में भारत की रचनात्मक भूमिका की तारीफ की लेकिन क्या पाकिस्तान के सहयोग के बिना अफगान-संकट का हल हो सकता है ? फिर भी ओबामा प्रशासन के दौरान ही कैरी-लुगार एक्ट पास हुआ है, जिसके तहत पाकिस्तान को मिलनेवाली मदद पर कड़ी नज़र रखी जाएगी ताकि उसका फौजी इस्तेमाल न हो सके| डॉ. मनमोहन सिंह ने वाशिंगटन-यात्र के दौरान भारत के प्रति पाकिस्तानी रवैए का विवेचन भी सही ढंग से कर दिया है| देखना यही है कि पाकिस्तान को पटरी पर लाने में भारत अमेरिका का कितना इस्तेमाल कर पाता है| यदि अमेरिकी दबाव नहीं होता तो क्या पाकिस्तानी अदालतें मुंबई के दोषियों को पकड़तीं ? डॉ. सिंह ने ओबामा को यह सही सलाह दी है कि वे अफगानिस्तान को अधबीच में छोड़कर न भागें लेकिन अगर वे उन्हें अफगान-चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता बता पाते तो उनकी हैसियत विश्व-नेता की बन जाती| ओबामा ने भारत और अमेरिकी संबंधों को निरंतर घनिष्टतर बनाने की वकालत की है| दोनों पक्षों ने शिक्षा, कृषि, सुरक्षा, पर्यावरण, व्यापार आदि क्षेत्रें में सहयोग बढ़ाने के लिए छोटे-मोटे कई समझौते किए हैं लेकिन अभी भी कई ऐसी तकनीकें हैं, जिन्हें अमेरिका भारत को देने में संकोच करता है| अभी तक अमेरिका ने भारत को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने के बारे में कोई स्पष्ट राय प्रगट नहीं की है| यह ठीक है कि अभी भारत और अमेरिका के रिश्ते उस मुकाम पर नहीं पहुँचे हैं, जिस पर ब्रिटेन और अमेरिका के हैं, लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री की इस वाशिंगटन-यात्रा ने उस मुकाम तक पहुँचने का रास्ता जरूर पक्का किया है|

(लेखक अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञ हैं)




शत्रु मेरा बन गया है छलरहित व्यवहार मेरा

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आज बच्चन जी की जन्मतिथि पर प्रस्तुत इस विशेष लेख के कारण शुक्रवार के मौलिक विज्ञान लेखन स्तम्भ का आज प्रकाशित होना वाला लेख आप इस बार आज शुक्र की अपेक्षा आगामी शुक्र को यहीं पढ़ पाएँगे |
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जन्मदिवस पर विशेष



बच्चन के काव्य में मनुष्य
- डॉ. ऋषभ देव शर्मा






Picture of Harivansh Rai Bachchan         

                    ‘‘मैं छुपाना जानता तो जग मुझे साधू समझता
                      शत्रु मेरा बन गया है छलरहित व्यवहार मेरा।’’


कविता और गद्य दोनों में निरंतर निश्छल रूप से अपने आपको पाठकों में समक्ष प्रस्तुत करने वाले अनन्य शब्दशिल्पी डॉ. हरिवंश राय ‘बच्चन’ (27 नवंबर 1907 - 18 जनवरी 2003) ने कभी इसकी परवाह नहीं कि जग उन्हें साधु समझता है या शैतान। उन्होंने तो सहृदय लोक को अपनी कसौटी माना और उसे ही अपना प्रियतम मानकर अपनी ‘मधुशाला’ समर्पित कर दी, जग तो प्रसाद पाता ही -

'‘पहले भोग लगा लूं तेरा, फिर प्रसाद जग पाएगा।’'


छलरहित व्यवहार, जो जाने कितने अयाचित शत्रुओं को तलवारें भाँजने को प्रेरित करता है - बस निश्छल प्यार भर है। यों तो जग और जीवन भार ही है पर प्यार इसे सह्य और मधुर बना देता है -

'‘मैं जग जीवन का भार लिए फिरता हूँ,
फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ।’'


प्यार लिए फिरोगे तो जग तुम्हें ऐसे कभी न जाने देगा! पर प्यार करने वाले भला जग की परवाह कब करते हैं? यों भी स्नेह-सुरा का सेवन करने वालों को इतनी फुरसत कहां कि दुनिया वालों का कुत्सित प्रलाप सुनते बैठें -

'‘मैं स्नेह सुधा का पान किया करता हूँ,
मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ।’'


लुकाछिपी की जरूरत भी क्या है ? छिपाते तो वे हैं जो प्यार को पाप समझते हैं। बच्चन के मूल्य बोध में प्रेम कोई वर्जित फल नहीं है। वह तो सृष्टि का हेतु है - उतना ही सहज और निष्कलुष जितना दिवा-रात्रि का प्रत्यावर्तन:

'‘सृष्टि के आरंभ में मैंने उषा के गाल चूमे।
बाल रवि के भाग्य वाले दीप्त भाल विशाल चूमे।।
प्रथम संध्या के अरुण दृग चूमकर मैंने सुलाए।
तारिका कलिका सुसज्जित नव निशा के बाल चूमे।।’’


बच्चन के लिए प्रेम प्रकृति का उत्सव है। प्रकृति और पुरुष जब भी जहाँ भी मिल गए, वहीं आनंद की वृष्टि हो गई, वहीं उल्लास की सृष्टि हो गई -

'‘जहाँ कहीं मिल बैठे हम-तुम, वहीं हो गई मधुशाला।’'


मधुशाला भी ऐसी वैसी नहीं, इंद्रधनुष को चुनौती देने वाली -

‘‘महँदी रंजित मृदुल हथेली
में माणिक मधु का प्याला,
अंगूरी अवगुंठन डाले
स्वर्णवर्ण साकी बाला,
पाग पैंजनी जामा नीला
डाट डटे पीने वाले -
इंद्रधनुष से होड़ रही ले
आज रंगीली मधुशाला।’’


ऐसा अवसर मिले और छद्म ओढ़कर मनुष्य उसे छिपने-छिपाने के पापबोध में ही गँवा दे, यह न उचित है न वांछित। यह अवसर है मनुष्य होने का सौभाग्य, और यह मधुशाला है जीवन। मधु शराब नहीं है, प्रेम है - अनिवार प्रेम । काम तो मनुष्य और पशु दोनों में सामान्य है।प्रेम के रूप में आत्मा का विस्तार केवल मनुष्य जीवन की उपलब्धि है। उसे ओक से पीने में कैसी लाज-

‘‘आज मिला अवसर तब क्यों
मैं न छकूँ जी भर हाला,
आज मिला मौका तब फिर क्यों
ढाल न लूं जी भर प्याला ;
छेड़छाड़ अपने साकी से
आज न क्यों जी भर कर लूं -
एक बार ही तो मिलती है
जीवन की यह मधुशाला।’’


जीवन रूपी यह मधुशाला अनंत उल्लास का स्रोत बनी रहे, इसके लिए प्रेमपात्र और प्रिय के मध्य द्वैताद्वैत की क्रीड़ा चला करती है। थकना और सोना इस क्रीड़ा में नहीं चलता। एक सतत चलने वाला रास-महारास! निरंतर चलने वाला संवाद! तभी तो बच्चन को कहना पड़ा :

‘‘साथी! सो न, कर कुछ बात।
बात करते सेा गया तू,
स्वप्न में फिर खो गया तू!
रह गया मैं और आधी बात, आधी रात।’’
असल बात तो यह है कि सो जाना मर जाना है -

‘आओ, सो जाएँ , मर जाएँ ।’


पर मरना न तो कवि स्वीकार करता है, न प्रेमी (‘‘हम न मरैं, मरिहै संसारा’' - कबीर) इसलिए ‘अग्निपथ’ का भी वरण करना पड़े तो बच्चन को स्वीकार है! इस पथ पर धोखा भी मिल जाए, तो कोई शिकवा नहीं-

‘‘किस्मत में था खाली खप्पर
खोज रहा था मैं प्याला,
ढूंढ़ रहा था मैं मृगनयनी
किस्मत में थी मृगछाला ;
किसने अपना भाग्य समझने में
मुझ सा धोखा खाया -
किस्मत में था अवघट मरघट
खोज रहा था मधुशाला।’’


कवि बच्चन के लिए काव्य साधना मानव जीवन को बेहतर और उच्चतर बनाने की साधना थी। साहित्यकार के दायित्व के संबंध में उनका प्रश्न था कि क्या यूरोप के सारे साहित्यकार मिलकर प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध को रोक सके। उनकी दृष्टि में साहित्यकार का अपना क्षेत्र या स्वधर्म मानव को अधिक मानवीय चेतना देना है। वे चाहते थे कि साहित्य मनुष्य को केवल मनुष्य के नाते समझे और उसके अहं को इतना छील दे कि वह दूसरे मनुष्य के साथ अपनी समता देख सके। इससे उसका व्यवहार छलरहित हो सकेगा और तब उसे कुछ भी छिपाने की जरूरत नहीं होगी। वैसे प्रेम तो न छिपाया जा सकता है, न बताया। जिसे छिपाना संभव हो, वह प्यार ही क्या! पर जिसे बताना पड़े, वह प्यार भी क्या -

‘‘प्यार किसी को करना,
लेकिन कहकर उसे बताना क्या?’’


वस्तुतः बच्चन का काव्य उनके जीवनक्रम के साथ-साथ मधुकाव्य, विषादकाव्य, प्रणयकाव्य और राजनैतिक-सामाजिक काव्य जैसे सोपान पार करते हुए अपनी विकासयात्रा संपन्न करता है (डॉ. बच्चन सिंह, हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, 428)। इस विकासयात्रा में उनका काव्यनायक अथवा अभिप्रेत मनुष्य भी निरंतर विकास करता चलता है। मधुकाव्य (मधुशाला, मधुबाला, मधुकलश) का मनुष्य उत्तरछायावाद की प्रवृत्ति के अनुरूप शरीर के अनुभवों को अधिक महत्व देता दिखाई पड़ता है। वह नियति, भाग्यवाद और मृत्युबोध से ग्रस्त होने के दौर को पार करता हुआ क्रमशः यौवन का उल्लास, साहस और चुनौतियों का सामना करने का उत्साह संजोकर अवसाद को जीतने का प्रयास करता है। अकेलेपन के घनघोर अँधेरे के पार झिलझिलाते प्रकाश के प्रति आस्था बच्चन के मधुकाव्य के मनुष्य को ‘साधारण मनुष्यों का नायकत्व’ प्रदान करती है। यह मनुष्य विषादकाव्य (निशानिमंत्रण, एकांत संगीत, आकुल अंतर) में अवसाद की कड़ी चोटें झेलता दिखाई देता है परंतु नीड़ उजड़ जाने पर भी हताश नहीं है तथा अपने शोक को इस प्रकार श्लोकत्व प्रदान करता है कि अनुभूति की सघनता और करुणा के योग से उसमें देवत्व को भी ललकार सकने वाली तेजस्विता जन्म लेती है। इस तेजस्विता में दुर्बलता को दुलराने वाली दुर्लभ मानवता (‘‘दुर्बलता को दुलराने वाली मानवता दुर्लभ है’’- डॉ. बच्चन सिंह, हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, 429) निहित है। इस मनुष्य का अनुभूतिजन्य करुण आत्मविश्वास द्रष्टव्य है :

‘‘मुझ में है देवत्व जहाँ पर,
झुक जाएगा लोक वहाँ पर,
पर न मिलेंगे मेरी दुर्बलता को दुलराने वाले!’’
(निशा निमंत्रण, गीत 70)|


इसी से वह संकल्पवान और आस्थाशील मनुष्य प्रकट होता है जो ‘क्षतशीश’ होकर भी ‘नतशीश’ होने को तत्पर नहीं है। इस मनुष्य का अगला विकास प्रणयकाव्य (सतरंगिनी, मिलनयामिनी, प्रणय पत्रिका) में नीड़ का फिर-फिर निर्माण करने तथा अँधेरी रात के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए भी अँधेरे के सामने आत्मसमर्पण किए बिना दीवा जलाकर अंधकार पर प्रकाश की जीत को सुनिश्चित करने वाले धीर नायक के रूप में सामने आता है। सामाजिक-राजनैतिक कविताओं (बंगाल का काल, खादी के फूल, सूत की माला, धार के इधर-उधर, आरती और अंगारे, बुद्ध और नाचघर, त्रिभंगिमा, चार खेमे चौंसठ खूँटे, दो चट्टानें, जाल समेटा) तक आते-आते बच्चन का यह काव्य-नायक मनुष्य अपने व्यक्तित्व के रूपांतरण और समाजीकरण में सफल हो जाता है ; और यही मनुष्यत्व की सार्थकता है - कवित्व की भी :

‘‘ओ जो तुम बाँधकर चलते हो हिम्मत का हथियार,
ओ जो तुम करते हो मुसीबतों व मुश्किलों का शिकार,
ओ जो तुम मौत के साथ करते हो खिलवार,
ओ जो तुम अपने अट्टहास से डरा देते हो मरघटों का सुनसान,
भर देते हो मुर्दों में जान,
ओ जो तुम उठाते हो नारा - उत्थान, पुनरुत्थान, अभ्युत्थान!
तुम्हारे ही लिए तो उठता है मेरा क़लम,
खुलती है मेरी ज़बान।
ओ जो तुम ताजे़,
ओ जो तुम जवान!’’
(‘आह्वान’, बुद्ध और नाचघर, 28)


बच्चन की दृष्टि में वह मनुष्य मनुष्य नहीं, पशु है जिसका स्वाभिमान जीवित न हो। उनका काव्य ऐसे मनुष्य की ख़ोज का काव्य है जो युद्धक्षेत्र में भुजबल दिखलाता हुआ प्रतिपल अविचल और अविजित रहे। यह मनुष्य अपने खून-पसीने से प्राप्त अधिकार का उपभोग करता है तथा भाग्यवाद का प्रचार करने वाले मठ, मस्जिद और गिरजाघरों को ‘मनुज-पराजय के स्मारक’ मानता है :

‘‘झुकी हुई अभिमानी गर्दन,
बँधे हाथ, नत-निष्प्रभ लोचन!
यह मनुष्य का चित्र नहीं है, पशु का है, रे कायर!
प्रार्थना मत कर, मत कर, मत कर!’’
(बच्चन रचनावली - 1, एकांत संगीत, 254)

बच्चन अपनी कविता में जिस मनुष्य को गढ़ते हैं, वे चाहते हैं कि वह भले ही दोस्तों की बेवफाई का शिकार बनकर अभागा रह जाए लेकिन उनके चेहरे पर पड़े मित्रता के उस आवरण को छिन्न-भिन्न न करे जिसके आधे तार उसके अपने हाथ के काते और बुने हैं ;परंतु शत्रु के समक्ष किसी भी प्रकार की भीरुता उन्हें सह्य नहीं है, तभी तो -

‘‘शत्रु तेरा
आज तुझ पर वार करता
तो तुझे ललकारता मैं -
उठ,
नहीं तू यदि
नपुंसक, भीरु, निर्बल,
चल उठा तलवार
औ’ स्वीकार कर उसकी चुनौती।’’
(बुद्ध और नाचघर, ‘दोस्तों के सदमे’, 91)


यहाँ यह भी स्पष्ट कर देना उचित होगा कि कवि को अपनी कविता के लिए भले और बुरे दोनों ही तरह के मनुष्य मिले हैं, परंतु उसकी खोज का लक्ष्य केवल वही मनुष्य है जो मनुष्यता के उदात्त गुणों से संपन्न हो। यह खोज तब तक चलती रहेगी जब तक विश्वासघात करने वाला आदमजात सचमुच अपने दृष्टिकोण को कम-से-कम इतना बड़ा न बना ले कि किसी का सम्मान कर सके, किसी की कमज़ोरी का आदर कर सके, क्योंकि इसी गुण से मनुष्य को देवत्व प्राप्त होता है :

‘‘बहुत बड़ा कलेजा चाहिए
किसी का करने को सम्मान,
और किसी की कमज़ोरियों का आदर -
यह है फ़रिश्तों के बूते की बात,
देवताओं का काम!’’
(बुद्ध और नाचघर, ‘कडुया अनुभव’, 105)


पहाड़ी चिड़िया के बहाने अपने काव्य नायक को संबोधित करते हुए बच्चन उसे किसी भी प्रकार का प्रलोभन या बंधन स्वीकार करने से रोकते हैं तथा उसे मुक्त आकाश, पृथ्वी और पवन से प्रेरणा प्राप्त करने को कहते हैं। कवि अपने मनुष्य से चाहता है कि वह कभी पराजय स्वीकार न करे बल्कि चुनौतियों का डटकर मुक़ाबला करे -

‘‘बादलों के गर्जनों से,
बात करते तरु-दलों से,
साँस लेते निर्झरों से
राग सीखो। xxx
नीड़ बिजली की लताओं पर बनाओ।
इंद्रधनु के गीत गाओ।’’
(बुद्ध और नाचघर, ‘काल विहंगिनी’, 116)


चिड़िया से आगे बढ़कर कवि चील-कौए और पपीहे के द्वंद्व के माध्यम से मनुष्य की अंतर्वृत्तियों के संघर्ष को रूपायित करता है। सब कुछ को हस्तगत करने की अविवेकपूर्ण क्षुद्र वासना के चील-कौए मनुष्य की अंतश्चेतना में तभी बस पाते हैं जब वह केवल स्वाति-जल की रट लगाने वाले पपीहे की गर्दन तोड़ देता है। मनुष्यत्व का संस्कार जगता है तो मनुष्य फिर से पपीहे की प्रतीक्षा करता है :

‘‘पालना उर में
पपीहे का कठिन है,
चील-कौए का, कठिनतर,
पर कठिनतम
रक्त, मज्जा,
मांस अपना
चील-कौए को खिलाना,
साथ पानी
स्वप्न स्वाती का
पपीहे को पिलाना। xxx
तुम अगर इंसान हो तो
इस विभाजन,
इस लड़ाई
से अपरिचित हो नहीं तुम!’’


बच्चन की कविता के मनुष्य का आदर्श वह स्फटिक निर्मल और दर्पण-स्वच्छ हिमखंड कदापि नहीं हो सकता जो गल-पिघल और नीचे को ढलककर मिट्टी से नहीं मिलता। उसका आदर्श तो वह नदी है जो मिट्टी के कलंक को भी अपने अंक में लेकर जीवन की गत के साथ मचलती है। समाज का वह कथित कुलीन वर्ग जो साधारण जीवन के लोकानुभवों से वंचित है, बच्चन का काव्यनायक नहीं है। हिमखंड अपने ठोस दुर्लभ आभिजात्य में कितना भी इतरा ले, कवि के मनुष्य का आदर्श तो नदी जल की सर्वत्र अयत्न सुलभता ही है -

‘‘उतर आओ
और मिट्टी में सनो,
ज़िंदा बनो,
यह कोढ़ छोड़ो,
रंग लाओ,
खिलखिलाओ,
महमहाओ।
तोड़ते हैं प्रेयसी-प्रियतम तुम्हें ?
सौभाग्य समझो,
हाथ आओ,
साथ जाओ।’’
(बुद्ध और नाचघर, ‘चोटी की बरफ’, 126)


मनुष्यता की जययात्रा के मूल में मनुष्य की अदम्य जिजीविषा तथा अपराजेय संघर्षशीलता की परंपरा विद्यमान रही है। कवि बच्चन का मनुष्य इस परंपरा के दाय को स्वीकार करता है और इसके प्रति अपने उत्तरदायित्व से विमुख नहीं है। परंपरा का ऋण-शोधन करके ही विकास के क्रम को आगे बढ़ाया जा सकता है -

‘‘जो शकट हम
घाटियों से
ठेलकर लाए यहाँ तक,
अब हमारे वंशजों की
आन ,
उसको खींच ऊपर को चढ़ाएँ
चोटियों तक।’’
(बुद्ध और नाचघर, ‘युग का जुआ’, 129)


मनुष्य का जीवन निरंतर ऊहापोह, उत्थान-पतन और परिवर्तन की गाथा है : ऐसे परिवर्तन जो उसके ऊपर एकांत और निर्वासन की त्रासदी को नियति की तरह छोड़ देते हैं। इस एकाकी और निर्वासित मनुष्य की बेचैनी और उदासी साँझ के उस पिछड़े पंछी की तरह है जिसका नीड़ उजड़ चुका है। नीड़ का यह पंछी वह अनिकेतन मनुष्य है जिसकी पीड़ा को कवि ने अपने अनुभव से जाना है -

‘‘अंतरिक्ष में आकुल-आतुर,
कभी इधर उड़, कभी उधर उड़,
पंथ नीड़ का खोज रहा है पिछड़ा पंछी एक - अकेला!
बीत चली संध्या की वेला!’’
(निशानिमंत्रण, गीत - 5)


साँझ की बेला बीतती है, तो अँधियारा और घनघोर तथा भयावह हो जाता है, लेकिन बच्चन का पथिक-मनुष्य इस अँधरे से डरकर न तो रुककर बैठ जाता है, न चुपचाप दबे पाँव चलता है ; इसके विपरीत वह सुनसान अंधकार के डर को ऊँचे स्वर के गीत की आरी से काटता है -

‘‘डर न लगे सुनसान सड़क पर,
इसीलिए कुछ ऊँचा कर स्वर,
विलग साथियों से हो कोई पथिक, सुनो, गाता आता है।
अंधकार बढ़ता जाता है।’’
(निशानिमंत्रण, गीत - 8)


अंधकार बढ़ता है, तो रात और गहरी होती है। रात गहराती है, तो प्रवंचनाओं की संभावना बढ़ जाती है। असंभव सपनों में खोए अपने काव्यनायक को सावधान करते हुए कवि कहता है -

‘‘सत्य कर सपने असंभव!
पर, ठहर, नादान, मानव --
हो रहा है साथ में तेरे बड़ा भारी प्रवंचन
अब निशा देती निमंत्रण।’’
(निशानिमंत्रण, गीत - 17)


काल की प्रवंचना और मनुष्य के प्रयत्न के द्वंद्व से ही मनुष्यता निखरती है। काल से जूझता हुआ यह मनुष्य अब कोई एकाकी व्यक्ति मात्र नहीं है, संपूर्ण मानवजाति का प्रतिनिधि है। कवि इस विश्वमानव के लिए शुभकामना व्यक्त करता है -

‘‘मानव का सच हो सपना सब,
हमें चाहिए और न कुछ अब,
याद रहे हमको बस इतना - मानव जाति हमारी !
जय हो, हे संसार, तुम्हारी!’’
(निशानिमंत्रण, गीत - 98)


इस विश्वमानव का दर्शन कवि बच्चन ने अपनी काव्ययात्रा के आरंभ में ही कर लिया था। उन्हें वह मनुष्य नहीं चाहिए जो संपूर्ण जगत को धर्म, जाति, वर्ग, संप्रदाय आदि के आधार पर बाँटता हो, बल्कि वे केवल ऐसे विद्रोही मनुष्य का ही स्वागत करने को तैयार हैं जो इन तमाम भेदों का अतिक्रमण कर चुका हो और ‘वसुधैव कुटुम्बकं' तथा ‘विश्वबंधुत्व’ का प्रतीक हो -

‘‘धर्म-ग्रंथ सब जला चुकी है
जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मस्जिद, गिरजे-सबको
तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादरि़यों के
फंदों को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का
स्वागत मेरी मधुशाला।’’
(बच्चन रचनावली -1, ‘मधुशाला’, 47)


अपनी शक्ति पर विश्वास तथा संघर्ष के प्रति दृढ़ संकल्प वे मूल्य हैं जिनसे कवि बच्चन ने अपने काव्यनायक के सहज मानवीय व्यक्तित्व को गढ़ा है। ये मूल्य उनके काव्य में अनेक स्थलों पर अनेक प्रकार से व्यक्त हुए हैं। विपरीत परिस्थितियों की भीषणता से भयभीत होकर अपने प्रयत्न को छोड़ बैठना या अंतिम क्षण तक लड़े बिना ही हार मान बैठना बच्चन के मनुष्य का स्वभाव नहीं है ; उसे साधनहीनता के
बावजूद असाध्य ध्येय को भी साध लेने की अपनी क्षमता पर अटूट विश्वास है :
‘‘जायगा उड़ पाल होकर तार-तार विशद गगन में,
टूटकर मस्तूल सिर पर आ गिरेगा एक क्षण में,
नाव से होकर अलग पतवार धारा में बहेगी,
डाँड छूटेगा करों से, पर बचा यदि प्राण तन में

तैर कर ही क्या न अपने ध्येय को मैं जा सकूंगा ;
मथ चुके हैं कर न जाने बार कितनी विश्व-सागर!

धूलिमय नभ, क्या इसी से बाँध दूँ मैं नाव तट पर ?’’
(बच्चन रचनावली -1, 140)


इस सतत संघर्षशील, सहज संकल्पशाली, दृढ़व्रती तथा अपराजेय मनुष्य को अग्नि के अनंत पथ पर चलना स्वीकार है परंतु किसी बड़े वृक्ष से एक पत्ता-भर भी, छाँह माँगना गवारा नहीं। इसने कभी भी न थकने, न थमने और न मुड़ने की शपथ ली है। आँसू, पसीने और खून से लथपथ साधारण मनुष्य का यह संघर्ष असाधारण है; और इसीलिए महान भी :

‘‘अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

वृक्ष हों भले बड़े,
हों घने, हों बड़े,
एक पत्र-छाँह भी माँग मत, माँग मत,माँग मत!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

तू न थकेगा कभी!
तू न थमेगा कभी!
तू न मुड़ेगा कभी! - कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

यह महान दृश्य है -
चल रहा मनुष्य है
अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ, लथपथ, लथपथ!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!’’
(बच्चन रचनावली -1, ‘एकांत गीत’, 247)|



आचार्य एवं अध्यक्ष, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद-500 004
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