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ब्रह्माण्ड के खुलते रहस्य (1) (पृथ्वी -केन्द्रित दृष्टि से मुक्ति)

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(साप्ताहिक स्तम्भ)



 ब्रह्माण्ड के खुलते रहस्य (1) 
(पृथ्वी -केन्द्रित दृष्टि से मुक्ति)
विश्वमोहन तिवारी, पूर्व एयर वाइस मार्शल



विश्व का, कहना चाहिये ब्रह्माण्ड का, सर्वप्रथम तथा सबसे बड़ा आश्चर्य, निस्संदेह स्वयं ब्रह्माण्ड का जन्म है। ब्रह्माण्ड का अन्त चाहे विस्फोट में हो या टाँय टाँय फिस्स में हो उसका जन्म एक विस्फोट से हुआ है। विस्फोट के पूर्व समस्त ब्रह्माण्ड एक बिन्दु में समाया था। वह बिन्दु अकल्पनीय रूप से छोटा था, और ब्रह्माण्ड अकल्पनीय रूप से विराट  है। क्या इससे बड़ा आश्चर्य कुछ हो भी सकता है कि उस सूक्ष्मतम बिन्दु से इस विराटतम ब्रह्माण्ड का जन्म हुआ है। बिन्दु और उसकी विराटता की कल्पना असंभव ही कहलाएगी किन्तु खगोल वैज्ञानिकों ने उस सब की गणना कर ली है।गणित तो अकल्पनीय को भी अंकों में सीमित कर दे या बाँध दे, अकथनीय को कह दे।



13.7 अरब प्रकाश–वर्षों ( 130 लाख करोड़ अरब किमी गहरे (एक प्रकाश–वर्ष में 9.5 लाख करोड़ किमी होते हैं)) गहरे इस ब्रह्माण्ड के गूढ़तम रहस्यों को क्या यह मात्र तेरह सौ घन से. मी. के आयतन वाला हमारा मन मस्तिष्क खोल सकता है? तब भी मानव ने आदि काल से इन रहस्यों को खोलने का प्रयत्न किया है चाहे उसमें यूनानियों का यह विश्वास हो कि आकाशीय गोल तारे वे छिद्र हैं जिनमें से हमें सृष्टि रचना की जलती आग दिखाई देती है, या भारतीय ऋषियों का विश्वास कि आकाशीय पिंड विभिन्न लोक हैं जहाँ की यात्राएँ की जा सकती हैं। खगोल के नक्षत्रों की कुछ जानकारी, जिसे ज्योतिष ज्ञान कहते हैं, हजारों वर्ष पहिले आदमी ने अवलोकन से प्राप्त कर ली थी जिन्हे उसने 27 नक्षत्र मण्डलों में बाँटा तथा जिसका उपयोग उसने फलित ज्योतिष के लिये किया। नक्षत्रों वाला ज्योतिष ज्ञान विज्ञान है किन्तु ‘फलित ज्योतिष’ विज्ञान नहीं है। तारे छिद्र तो नहीं हैं किन्तु उनमें सृष्टि रचना की आग अवश्य जलती है जिसके अध्ययन के द्वारा हम सृष्टि के रहस्य खोल सकते हैं। और अन्तरिक्ष विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी का सबसे मनोहर स्वप्न है अन्तरिक्ष यात्रा।




इन धू धू कर जलते हुए पिण्डों के रहस्य खोलने के लिये अपार धन तथा ऊर्जा खर्च करने में क्या रखा है, जबकि इस सुनील ग्रह की शस्य श्यामला हरित भूमि पर गरीबी का श्राप मानव जाति को दुखी कर रहा है? और वास्तविकता यह है कि ज्यों ज्यों ब्रह्माण्ड के रहस्य खोले गए हैं, मानव ने प्रकृति के नियमों को खोजा है तथा विज्ञान एवं औद्योगिक प्रगति बढ़ती गई है। सोलहवीं शती में कोपर्निकस की खोज (आगे देखें) के बाद ही पश्चिम ने बाइबिल के स्वर्ग का मोह छोड़कर इस जीवन को समुन्नत करना प्रारम्भ किया।



मानव मन स्वयं अत्यन्त रहस्यमय है, और वह स्वयं ही रहस्य खोलने के लिये सदा सहज ही तत्पर रहता है, चाहे वे रहस्य जासूसी उपन्यासों के हों, या ब्रह्माण्ड के। मन तथा ब्रह्माण्ड के रहस्यों को खोलने में प्रबुद्ध तथा रचनाशील व्यक्ति हजारों वर्षों से लगे हुए हैं क्योंकि इन रहस्यों को खोलना हमारे लिये सबसे बड़ी चुनौती है तथा सर्वाधिक आनन्ददायक तथा लाभदायक भी है। ऋषियों तथा चिन्तकों ने ब्रह्माण्ड के रहस्यों को खोलने में अपनी अन्तर्दृष्टि या रचनाशीलता का उपयोग कर अद्भुत मिथक दिये हैं। हो सकता है उनमें विज्ञान हो जिसे सिद्ध करना शेष है, किन्तु उन मिथकों के अद्भुत अर्थ निकलते हैं जो मानव–मन की जानकारी अधिक देते हैं, ब्रह्माण्ड की कम।



पाँचवीं से सत्रहवीं शती तक
पहिले मनुष्य यही मानते थे कि पृथ्वी स्थिर है, केन्द्र में है तथा सूर्य सहित अंतरिक्ष के सभी नक्षत्र उसकी परिक्रमा करते हैं, यही आँखों देखा हाल निर्विवादित सत्य लगता था। ईसा की पाँचवीं शती में विश्व में ब्रह्माण्ड का एक रहस्य सर्वप्रथम भारत में खोजा गया। उस समय बिना किसी दूरदर्शी की सहायता के आर्यभट ने सौर मंडल का उस काल के लिए एक अत्यन्त अविश्वसनीय किन्तु अत्यंत महत्वपूर्ण वैज्ञानिक रहस्य खोला था। और आश्चर्यजनक था कि कैसे, किन गणनाओं का विवेचन कर यह् अद्भुत खोज की गई थी !! भारत में भी वैज्ञानिकों ने इस पर बहुत वाद-विवाद किये। तथा जिसे स्वीकार करने में शेष मानव जाति को एक हजार वर्ष और लगे, – कि सौरमंडल में सूर्य स्थिर है तथा पृथ्वी अपने अक्ष पर प्रचक्रण करती हुई सूर्य की परिक्रमा करती है; कि ग्रहण छाया पड़ने के कारण पड़ते हैं न कि राक्षसों के कारण। इसे सोलहवीं शती में स्वतंत्र रूप से कोपरनिकस ने पाश्चात्य जगत में स्थापित किया। बारहवीं शती में भास्कराचार्य ने गुरुत्वाकर्षण के तीनों नियम खोज निकाले थे, किन्तु इन्हें वैज्ञानिक पद्धति से सिद्ध नहीं किया था। यह् कुछ उसी तरह था जैसे पाइथागोर का प्रमेय युक्लिड के पहले पाइथागोर को ज्ञात था, और उनके भी पहले शुल्व सूत्र नाम से भारतीय ऋषियों को ज्ञात था, किन्तु प्रमाण तो यूक्लिड ने ही दिया था। इसके साथ भारत में की गई अन्य वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकी खोजों तथा आविष्कारों से यह प्रमाणित होता है कि यह आध्यात्मिक भारत बारहवीं शती तक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा आर्थिक समृद्धि में विश्व में सर्वाग्रणी था। गति के नियमों को सत्रहवीं शती में स्वतंत्र रूप से न्यूटन ने वैज्ञानिक रूप से स्थापित किया। और देखा जाए तो इन वैज्ञानिक तथ्यों की स्वीकृति के बाद ही पाश्चात्य संसार में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विकास का ‘बिग बैंग’ (महाविस्फोट) हुआ।




दूरदर्शी
सत्रहवीं शती के दूरदर्शी के आविष्कार तक, पाश्चात्य जगत सौरमंडल को ही समस्त ब्रह्माण्ड मानता था, 1609 में गालिलेओ ने छोटे से दूरदर्शी की सहायता से बृहस्पति ग्रह के चार चाँद देखे तो मानो दूरदर्शी में ही चार चाँद लग गये। और तब से विशाल से विशालतर दूरदर्शी बने जिनसे हम अब लगभग दस अरब प्रकाश–वर्ष (95 लाख करोड़ अरब किमी.) की दूरी तक के नक्षत्रों, मन्दाकिनियों तथा नीहारिकाओं को देख सकते हैं। फिर हजारों मीटरों तक के क्षेत्र में फैले रेडियो दूरदर्शी बनाए गये और अब तो भारतीय मूल के नोबैल पुरस्कृत खगोलज्ञ एस. चन्द्रशेखर के सम्मान में निर्मित उपग्रह स्थित ‘चन्द्र एक्स–किरण’ वेधशाला है जो पृथ्वी के वायुमंडल के पार से ब्रह्माण्ड के रहस्यों को खोल रही है।गुरुत्वाकर्षण तरंगों पर तथा शून्य (निश्चल अवस्था में) या अल्पतम द्रव्यमान तथा आवेशरहित न्यूट्रिनो कणों पर खोज हो रही है।




मजे की बात है कि दूरदर्शी या अन्य उपकरण या वैज्ञानिक कुछ रहस्यों को खोलते हैं तो कुछ नवीन रहस्यों को उत्पन्न भी करते हैं। जब ब्रह्माण्ड में पिण्ड दिखे तो प्रश्न आया कि ये अतिविशाल जलते हुए पिण्डों का निर्माण किस तरह हुआ, मन्दाकिनियों, मन्दाकिनी–गुच्छों, फिर मन्दाकिनी–मण्डलों और फिर मन्दाकिनी–चादरों का निर्माण कैसे होता है? ब्रह्माण्ड का उद्भव तथा विकास कैसे हुआ?


क्रमशः 




आस्ट्रेलिया में हिन्दी पत्रकारिता

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साभार - मीडिया स्कैन

इंदौर दूरदर्शन की 2 फिल्मों का राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए नामांकन

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इंदौर दूरदर्शन की 2 फिल्मों का  राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए नामांकन








सुहानी रात ढल चुकी

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  सुहानी रात ढल चुकी



शकील बदायूँनी के लिखेनौशाद के संगीत निर्देशन में संगीतबद्ध किए इस सुरीले गीत को मोहम्मद रफ़ी ने अपना स्वर दिया|

`सुहानी रात ढल चुकी' गीत की रेकोर्डिंग के क्षणों को रेकोर्ड करने वाले इस  वीडियो में रफ़ी साहब को आप साक्षात गाते तो सुन ही सकते हैं, साथ ही उस समय की संगीत और चित्र की रेकोर्डिंग आदि से जुड़े इतिहास के उस पक्ष को भी देख सकते हैं कि कैसे एक सिटिंग में एक गीत सीधे रेकोर्ड होता था, जिसका आज की तरह तकनीकी सम्पादन न होता था, परन्तु फिर भी संगीत के प्रति वह समर्पण ही संभवतः वह कारक था जो उस समय का संगीत अपनी गुणवत्ता में अधिक कर्णप्रिय, स्तरीय व संपन्न होता था, जिसकी न धुनें चुराई गई होती थीं, न शब्द भरती के होते थे|


 

बाबरी और राव का अंतिम सच

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बाबरी और राव का अंतिम सच
डॉ. वेदप्रताप वैदिक

जस्टिस लिब्रहान ने जिन एक हजार पन्नों पर अपनी रपट लिखी है, वे बर्बाद हो गए। उन्हीं एक हजार पन्नों पर यदि छोटे बच्चों को क ख ग पढ़ाया जाता तो उनका कुछ बेहतर इस्तेमाल होता। यह कैसी रपट है कि बाबरी मस्जिद तोड़नेवाले एक भी कारसेवक पर वह उंगली नहीं रख सकी। वह उस साजिश का पर्दाफाश भी नहीं कर सकी, जिसके तहत मस्जिद गिराई गई लेकिन इस रपट के बहाने देश में जबर्दस्त राजनीतिक लीपा-पोती चल रही है। स्वयं लिब्रहान ने श्री नरसिंह राव पर व्यंग्य-बाण कसे हैं।


इस लीपा-पोती का सबसे दुखद पहलू यह है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है। कोई कह रहा है कि 6 दिसंबर 1992 को वे दिन भर सोते रहे। कोई कह रहा है कि राव और संघ की मिलीभगत थी और मुझे  उद्धृत  करके यह भी कहा जा रहा है कि राव साहब ने मुझे कहा कि ''चलो अच्छा हुआ, मस्जिद टूटी, पिंड कटा।'' ये तीनों बातें बिल्कुल निराधार हैं। 6 दिसंबर 1992 को रविवार था। उसी दिन मस्जिद टूटी थी। उस दिन सुबह साढ़े आठ बजे से रात साढ़े ग्यारह बजे के बीच राव साहब से मेरी कम से कम छह-सात बार बात हुई है। रविवार होने के बावजूद मैं सुबह ठीक आठ बजे अपने दफ्तर (पी.टी.आई.) पहुँच गया था। साढ़े आठ बजे के आस-पास उनसे रोजमर्रा की तरह सामान्य बातचीत हुई। सवा दस बजे के करीब मैंने उन्हें बताया कि मस्जिद के पहले डोम पर लोग चढ़ गए हैं। हम दोनों की बातचीत के बीच आईबी प्रमुख वैद्य ने उन्हें ''रेक्स'' (लाल फोन) पर इसकी पुष्टि की ! राव साहब ने मुझसे कहा कि ''यह तो भयंकर धोखा हुआ।'' ''इन लोगों'' ने आपसे और मुझसे जितने भी वायदे किए थे, सब भंग कर दिए। राव साहब के प्रतिनिधि के तौर पर मैं विहिप, संघ, भाजपा नेताओं, साधु-संतों और मुस्लिम नेताओं से मंदिर-मस्जिद विवाद पर लगभग साल भर से बातचीत चला रहा था। औपचारिक तौर पर यह बातचीत शरद पवार, सुबोधकांत सहाय, कुमारमंगलम और राजेश पायलट चलाते थे। राम-मंदिर आंदोलन के सभी नेताओं ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया था कि उन्हें कार सेवा करने दी जाए। राव साहब कार-सेवा की अनुमति देने के पक्ष में नहीं थे। बातचीत टूटनेवाली थी लेकिन विहिप नेताओं ने मेरे आग्रह पर कार-सेवा की तारीख तीन माह आगे बढ़ाई और छह दिसंबर की तिथि तय हुई। यह समझौता 24 जुलाई को हुआ। इसी बीच प्रधानमंत्री ने राम-मंदिर आंदोलन का समाधान निकालने के लिए क्या-क्या प्रयत्न नहीं किए। इन सबका उल्लेख यहाँ नहीं हो सकता। 3 दिसंबर को मुख्यमंत्री कल्याणसिंह ने मुझे फोन किया और लगभग एक घंटे बात की। सर संघचालक रज्जू भय्या, सुदर्शन जी, अशोक सिंघल जी, डालमिया जी, आडवाणी जी, अटल जी, विनय कटियार आदि से भी स्पष्ट बात हुई। समझौता यह हुआ कि ढाँचे के पास कोई नहीं जाएगा। केवल चबूतरे पर कार-सेवा होगी। कोई तोड़-फोड़ या हिंसा नहीं होगी। ऐसा ही आश्वासन उच्चतम न्यायालय और राष्ट्रीय एकात्मता समिति को भी दिया गया था। लेकिन मुझे काफी शक था, क्योंकि बेकाबू होती भीड़ के कई कड़ुए अनुभव मुझे अपने छात्र-काल में हो चुके थे। मैंने कुछ रक्षा-विशेषज्ञों से बात करके प्रधानमंत्री को सलाह दी थी कि वे रबर-बुलैटों का अग्रिम प्रबंध करें ताकि हिंसक कार सेवकों को घायल किए बिना घटना स्थल से भगाया जा सके। मैंने उनसे यह भी कहा था कि छह दिसंबर के दिन मस्जिद को चारों तरफ से टैंकों से घिरवा दिया जाए।



ज्यों-ज्यों मस्जिद के दूसरे डोमों के गिरने की खबर आती गई, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री शंकरराव चव्हाण, अन्य वरिष्ठ अफसर और मैं कई विकल्पों पर विचार करते रहे। फैजाबाद स्थित पुलिस बल को अयोध्या दौड़ाने, कल्याणसिंह को बर्खास्त करने, ढाँचे  को बचाने, कार-सेवकों को विसर्जित करने आदि का कोई भी निर्णय लागू नहीं हो सका, क्योंकि हर निर्णय में कानूनी अड़चनें थीं और उससे भी ज्यादा आशंका यह थी कि यदि घटना-स्थल पर रक्तपात हो गया तो उसकी आग सारे देश में फैल जाएगी। कोढ़ में खाज क्यों पैदा करना ? मैं स्वयं उस समय तत्काल कठोर कार्रवाई के पक्ष में था लेकिन अब 17 साल बाद सोचता हूँ तो लगता है कि राव साहब ने असाधारण धैर्य का परिचय देकर ठीक किया। लगभग चार बजे राज्यपाल सत्यनारायण रेड्डी ने मुझसे फोन पर पूछा कि ''क्या करें, मुख्यमंत्री राजभवन के गेट पर खड़े हैं ?'' मैंने कहा, 'वही कीजिए, जो गृहमंत्री कहते हैं।'' इस बारे में प्रधानमंत्री से आधा-एक घंटा पहले मेरी बात हो चुकी थी। याद रहे, राव साहब अक्सर पौने तीन बजे लंच के बाद आधा घंटा विश्राम किया करते थे। उस दिन उन्होंने न तो भोजन किया और न ही विश्राम। दूसरे दिन उन्हें तेज बुखार हो गया और गला इतना खराब रहा कि वे फोन पर ठीक से बात भी नहीं कर पा रहे थे। उस रोज मैंने खुद रात को साढ़े ग्यारह बजे वित्त राज्यमंत्री श्री रामेश्वर ठाकुर के घर भोजन किया। उस दिन देश के अनेक प्रमुख नेताओं से दिन-भर फोन पर बात होती रही। पता नहीं क्यों, संघ और कांग्रेस के भी कुछ नेताओं ने प्रधानमंत्री के विरुद्ध तलवारें खींच लीं। उन्हें बदनाम करने और अपदस्थ करने के लिए क्या-क्या षडयंत्र नहीं किए गए ? राव साहब के एक वरिष्ठ मंत्री ने मुझे भी धमकी दी। जब मैं ठाकुरजी के घर भोजन कर रहा था तो उन्होंने कहा ''आपको और आपके मित्र राव साहब को अब हम देख लेंगे।'' हुआ क्या ? वे खुद ही बाहर हो गए और राव साहब पूरे पाँच साल सरकार चलाते रहे। संघ के लोग कहते रहे कि नरसिंहराव से बड़ा शातिर कौन हो सकता है ? उन्होंने बाबरी ढाँचा जान-बूझकर टूटने दिया ताकि संघ और मंदिर-आंदोलन हमेशा के लिए बदनाम हो जाएँ। इस बहाने उन्होंने भाजपा की राज्य-सरकारें भी भंग कर दीं। श्री नरसिंहराव पर मस्जिद तुड़वाने का आरोप वैसा ही है, जैसा यह कहना कि न्यूयार्क के ट्रेड टॉवर अमेरिका के यहूदियों ने गिरवाए या बेनज़ीर भुट्टों की हत्या आसिफ ज़रदारी ने करवाई! अफसोस इस बात का है कि ऐसी बे-सिरपैर की बातों को कांग्रेस के कुछ जिम्मेदार नेताओं ने भी प्रोत्साहित किया, खासतौर से राव साहब के पद से हटने के बाद। वे यह भूल गए कि उनकी यह कृतघ्नता राव साहब से ज्यादा खुद कांग्रेस को बहुत मंहगी पड़ेगी। आश्चर्य है कि आज की कांग्रेस भी राव साहब की भूमिका पर हकला रही है। नरसिंहरावजी की नीयत पर शक करना अपने महान लोकतंत्र की इज्जत को खटाई में डालना है।

(लेखक, प्रधानमंत्री नरसिंहराव के अभिन्न मित्र रहे हैं)
 

चीन अमेरिका की मजबूरी, पर भारत जरूरी

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चीन अमेरिका की मजबूरी, ... पर भारत जरूरी
डॉ. वेदप्रताप वैदिक



प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की वाशिंगटन-यात्रा के दौरान परमाणु-सौदे को लागू करने की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई लेकिन क्या सिर्फ इसीलिए उनकी इस यात्रा को मात्र औपचारिकता मान लिया जाए ? क्या यह मान लिया जाए कि ओबामा ने भारत के उन घावों पर सिर्फ मरहम लगाने का काम किया, जो अचानक ही पिछले हफ्ते उनकी चीन यात्र के दौरान उभर आए थे ? जहाँ तक परमाणु-सौदे का प्रश्न है, स्वयं प्रधानमंत्री ने कहा है कि कुछ ही हफ्तों में सारे मुद्दों पर समझौता हो जाएगा| ओबामा ने भी उनके इस कथन का समर्थन किया है| यह तो हमें पता है कि ओबामा और उनके डेमोक्रेट साथियों ने बुश द्वारा किए गए परमाणु-सौदे के कई प्रावधानों का विरोध किया था और ओबामा प्रशासन परमाणु-अप्रसार का घनघोर समर्थक है| ऐसी हालत में यदि सौदे के कुछ मुद्दों को लेकर दोनों पक्षों के बीच कुछ खींचातानी चल रही है तो यह स्वाभाविक ही है| इसके अलावा सबसे अधिक ध्यातव्य बात यह है कि किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत को पहली बार 'परमाणु शक्ति' कहा है और अगले साल होने वाले परमाणु अप्रसार सम्मेलन में उससे भाग लेने का आग्रह किया है| यह भारत को छठे परमाणु शस्त्र्संपन्न राष्ट्र के तौर पर मिली अनौपचारिक मान्यता ही है|


भारत के प्रधानमंत्री को ओबामा ने अपना पहला औपचारिक मेहमान बनाया, यह तो उल्लेखनीय है ही, इससे भी बड़ी बात यह है कि दोनों देशों के संबंध अब व्यक्तियों और पार्टियों पर निर्भर न होकर राष्ट्रीय स्तर पर पहुँच  गए हैं| अमेरिका में राष्ट्रपति क्लिंटन हैं या बुश हैं या ओबामा हैं और भारत में प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी हैं या मनमोहन सिंह हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता| न ही इस बात से फर्क पड़ता है कि अमेरिका में रिपब्लिकन्स का शासन है या डेमोक्रेटस का और भारत में भाजपाइयों का है या कांग्रेसियों का| रिश्तों का कारवां बराबर आगे बढ़ता चला जा रहा है| इस नए तथ्य को प्रधानमंत्री की इस यात्रा ने रेखांकित किया है|


जहाँ तक चीन का सवाल है, डॉ. सिंह ने बहुत ही सलीके से ओबामा और अमेरिकियों को समझा दिया है कि दोनों एशियाई देशों में बुनियादी फर्क क्या है ? अर्थशास्त्री होते हुए भी उन्होंने किसी दार्शनिक की तरह पूछ लिया कि क्या सकल राष्ट्रीय आय ही प्रगति का एकमात्र पैमाना है ? क्या मानव अधिकार, लोकतंत्र और खुलापन बेकार की बातें हैं ? भारत के ये आदर्श अमेरिका के भी आदर्श हैं| इसीलिए भारत और अमेरिका 'स्वाभाविक मित्र' हैं| क्या यह कम बड़ी बात है कि ओबामा ने भारत-अमेरिकी संबंधों को 21वीं सदी के भविष्य से जोड़ा है और स्पष्ट शब्दों में कहा है कि 'एशिया के नेतृत्व' में भारत की विशिष्ट भूमिका है| यदि चीन और भारत के बारे में ओबामा द्वारा कही गई बातों की बारीक़ी से तुलना की जाए तो यह रहस्य तुरंत समझ में आ जाएगा कि चीन अमेरिका की मजबूरी है और भारत अमेरिका की पंसद है| अमेरिका पर चीन का 800 बिलियन डॉलर का कज़र् चढ़ा हुआ है, चीन की आर्थिक शक्ति बहुत तेज रफ्तार से बढ़ रही है, सैनिक दृष्टि से भी वह एशिया का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र है और वह सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य भी हैं| ऐसी स्थिति में ओबामा चीन की खुशामद न करें, तो क्या करें ? वे चीन के मुकाबले भारत को क्यों खड़ा करें ? जैसा कि शायद बुश चाहते थे, भारत-चीन-अमेरिका - यह नया त्रिकोण क्यों बने ? भारत चीन से प्रतिस्पर्धा में क्या उलझे ? इसीलिए डॉ. सिंह ने ठीक ही कहा कि वे 'शांतिपूर्ण चीन' के नवोदय का स्वागत करते हैं| वे चीन-अमेरिका संबंधों में अपनी टाँग क्यों अड़ाएँ ? लेकिन उन्होंने यह अच्छा किया कि चीन की 'दादागीरी' का खुला जि़क्र कर दिया| यह कम महत्वपूर्ण नहीं कि दोनों देशों के संबंधों को प्रगाढ़ बनाने में अमेरिका में रहनेवाले भारतवंशियों का भी स्पष्ट उल्लेख हुआ| स्वयं ओबामा के प्रशासन में जितने भारतीयों को प्रमुख स्थान मिले हैं, क्या चीनियों को मिले हैं ? ओबामा का हिंदी बोलना, शाकाहारी भोजन परोसना, उनकी पत्नी मिशेल का भारतीय दर्जी से सिला सूट पहनना और हमारे प्रधानमंत्री के सम्मान में इतना बड़ा शामियाना-भोज आयोजित करना क्या विशेष आत्मीयता का परिचायक नहीं है ?


इस आत्मीयता का अर्थ यह नहीं है कि अमेरिका चीन और पाकिस्तान को दरकिनार कर सकता है| ये दोनों राष्ट्र उसकी मजबूरी हैं, लेकिन संयुक्त वक्तव्य में अमेरिका ने दो-टूक शब्दों में कहा है कि आतंकवाद की जड़ भारत के अड़ोस-पड़ोस में ही है| दोनों राष्ट्र आतंकवाद को उखाड़ने के लिए कटिबद्घ हैं| यदि आज अमेरिका का गुप्तचर विभाग भारत की सहायता नहीं करता तो क्या मुंबई-कांड के अपराधियों को पकड़ा जा सकता था ? ओबामा ने अफगानिस्तान में भारत की रचनात्मक भूमिका की तारीफ की लेकिन क्या पाकिस्तान के सहयोग के बिना अफगान-संकट का हल हो सकता है ? फिर भी ओबामा प्रशासन के दौरान ही कैरी-लुगार एक्ट पास हुआ है, जिसके तहत पाकिस्तान को मिलनेवाली मदद पर कड़ी नज़र रखी जाएगी ताकि उसका फौजी इस्तेमाल न हो सके| डॉ. मनमोहन सिंह ने वाशिंगटन-यात्र के दौरान भारत के प्रति पाकिस्तानी रवैए का विवेचन भी सही ढंग से कर दिया है| देखना यही है कि पाकिस्तान को पटरी पर लाने में भारत अमेरिका का कितना इस्तेमाल कर पाता है| यदि अमेरिकी दबाव नहीं होता तो क्या पाकिस्तानी अदालतें मुंबई के दोषियों को पकड़तीं ? डॉ. सिंह ने ओबामा को यह सही सलाह दी है कि वे अफगानिस्तान को अधबीच में छोड़कर न भागें लेकिन अगर वे उन्हें अफगान-चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता बता पाते तो उनकी हैसियत विश्व-नेता की बन जाती| ओबामा ने भारत और अमेरिकी संबंधों को निरंतर घनिष्टतर बनाने की वकालत की है| दोनों पक्षों ने शिक्षा, कृषि, सुरक्षा, पर्यावरण, व्यापार आदि क्षेत्रें में सहयोग बढ़ाने के लिए छोटे-मोटे कई समझौते किए हैं लेकिन अभी भी कई ऐसी तकनीकें हैं, जिन्हें अमेरिका भारत को देने में संकोच करता है| अभी तक अमेरिका ने भारत को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने के बारे में कोई स्पष्ट राय प्रगट नहीं की है| यह ठीक है कि अभी भारत और अमेरिका के रिश्ते उस मुकाम पर नहीं पहुँचे हैं, जिस पर ब्रिटेन और अमेरिका के हैं, लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री की इस वाशिंगटन-यात्रा ने उस मुकाम तक पहुँचने का रास्ता जरूर पक्का किया है|

(लेखक अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञ हैं)




शत्रु मेरा बन गया है छलरहित व्यवहार मेरा

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आज बच्चन जी की जन्मतिथि पर प्रस्तुत इस विशेष लेख के कारण शुक्रवार के मौलिक विज्ञान लेखन स्तम्भ का आज प्रकाशित होना वाला लेख आप इस बार आज शुक्र की अपेक्षा आगामी शुक्र को यहीं पढ़ पाएँगे |
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जन्मदिवस पर विशेष



बच्चन के काव्य में मनुष्य
- डॉ. ऋषभ देव शर्मा






Picture of Harivansh Rai Bachchan         

                    ‘‘मैं छुपाना जानता तो जग मुझे साधू समझता
                      शत्रु मेरा बन गया है छलरहित व्यवहार मेरा।’’


कविता और गद्य दोनों में निरंतर निश्छल रूप से अपने आपको पाठकों में समक्ष प्रस्तुत करने वाले अनन्य शब्दशिल्पी डॉ. हरिवंश राय ‘बच्चन’ (27 नवंबर 1907 - 18 जनवरी 2003) ने कभी इसकी परवाह नहीं कि जग उन्हें साधु समझता है या शैतान। उन्होंने तो सहृदय लोक को अपनी कसौटी माना और उसे ही अपना प्रियतम मानकर अपनी ‘मधुशाला’ समर्पित कर दी, जग तो प्रसाद पाता ही -

'‘पहले भोग लगा लूं तेरा, फिर प्रसाद जग पाएगा।’'


छलरहित व्यवहार, जो जाने कितने अयाचित शत्रुओं को तलवारें भाँजने को प्रेरित करता है - बस निश्छल प्यार भर है। यों तो जग और जीवन भार ही है पर प्यार इसे सह्य और मधुर बना देता है -

'‘मैं जग जीवन का भार लिए फिरता हूँ,
फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ।’'


प्यार लिए फिरोगे तो जग तुम्हें ऐसे कभी न जाने देगा! पर प्यार करने वाले भला जग की परवाह कब करते हैं? यों भी स्नेह-सुरा का सेवन करने वालों को इतनी फुरसत कहां कि दुनिया वालों का कुत्सित प्रलाप सुनते बैठें -

'‘मैं स्नेह सुधा का पान किया करता हूँ,
मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ।’'


लुकाछिपी की जरूरत भी क्या है ? छिपाते तो वे हैं जो प्यार को पाप समझते हैं। बच्चन के मूल्य बोध में प्रेम कोई वर्जित फल नहीं है। वह तो सृष्टि का हेतु है - उतना ही सहज और निष्कलुष जितना दिवा-रात्रि का प्रत्यावर्तन:

'‘सृष्टि के आरंभ में मैंने उषा के गाल चूमे।
बाल रवि के भाग्य वाले दीप्त भाल विशाल चूमे।।
प्रथम संध्या के अरुण दृग चूमकर मैंने सुलाए।
तारिका कलिका सुसज्जित नव निशा के बाल चूमे।।’’


बच्चन के लिए प्रेम प्रकृति का उत्सव है। प्रकृति और पुरुष जब भी जहाँ भी मिल गए, वहीं आनंद की वृष्टि हो गई, वहीं उल्लास की सृष्टि हो गई -

'‘जहाँ कहीं मिल बैठे हम-तुम, वहीं हो गई मधुशाला।’'


मधुशाला भी ऐसी वैसी नहीं, इंद्रधनुष को चुनौती देने वाली -

‘‘महँदी रंजित मृदुल हथेली
में माणिक मधु का प्याला,
अंगूरी अवगुंठन डाले
स्वर्णवर्ण साकी बाला,
पाग पैंजनी जामा नीला
डाट डटे पीने वाले -
इंद्रधनुष से होड़ रही ले
आज रंगीली मधुशाला।’’


ऐसा अवसर मिले और छद्म ओढ़कर मनुष्य उसे छिपने-छिपाने के पापबोध में ही गँवा दे, यह न उचित है न वांछित। यह अवसर है मनुष्य होने का सौभाग्य, और यह मधुशाला है जीवन। मधु शराब नहीं है, प्रेम है - अनिवार प्रेम । काम तो मनुष्य और पशु दोनों में सामान्य है।प्रेम के रूप में आत्मा का विस्तार केवल मनुष्य जीवन की उपलब्धि है। उसे ओक से पीने में कैसी लाज-

‘‘आज मिला अवसर तब क्यों
मैं न छकूँ जी भर हाला,
आज मिला मौका तब फिर क्यों
ढाल न लूं जी भर प्याला ;
छेड़छाड़ अपने साकी से
आज न क्यों जी भर कर लूं -
एक बार ही तो मिलती है
जीवन की यह मधुशाला।’’


जीवन रूपी यह मधुशाला अनंत उल्लास का स्रोत बनी रहे, इसके लिए प्रेमपात्र और प्रिय के मध्य द्वैताद्वैत की क्रीड़ा चला करती है। थकना और सोना इस क्रीड़ा में नहीं चलता। एक सतत चलने वाला रास-महारास! निरंतर चलने वाला संवाद! तभी तो बच्चन को कहना पड़ा :

‘‘साथी! सो न, कर कुछ बात।
बात करते सेा गया तू,
स्वप्न में फिर खो गया तू!
रह गया मैं और आधी बात, आधी रात।’’
असल बात तो यह है कि सो जाना मर जाना है -

‘आओ, सो जाएँ , मर जाएँ ।’


पर मरना न तो कवि स्वीकार करता है, न प्रेमी (‘‘हम न मरैं, मरिहै संसारा’' - कबीर) इसलिए ‘अग्निपथ’ का भी वरण करना पड़े तो बच्चन को स्वीकार है! इस पथ पर धोखा भी मिल जाए, तो कोई शिकवा नहीं-

‘‘किस्मत में था खाली खप्पर
खोज रहा था मैं प्याला,
ढूंढ़ रहा था मैं मृगनयनी
किस्मत में थी मृगछाला ;
किसने अपना भाग्य समझने में
मुझ सा धोखा खाया -
किस्मत में था अवघट मरघट
खोज रहा था मधुशाला।’’


कवि बच्चन के लिए काव्य साधना मानव जीवन को बेहतर और उच्चतर बनाने की साधना थी। साहित्यकार के दायित्व के संबंध में उनका प्रश्न था कि क्या यूरोप के सारे साहित्यकार मिलकर प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध को रोक सके। उनकी दृष्टि में साहित्यकार का अपना क्षेत्र या स्वधर्म मानव को अधिक मानवीय चेतना देना है। वे चाहते थे कि साहित्य मनुष्य को केवल मनुष्य के नाते समझे और उसके अहं को इतना छील दे कि वह दूसरे मनुष्य के साथ अपनी समता देख सके। इससे उसका व्यवहार छलरहित हो सकेगा और तब उसे कुछ भी छिपाने की जरूरत नहीं होगी। वैसे प्रेम तो न छिपाया जा सकता है, न बताया। जिसे छिपाना संभव हो, वह प्यार ही क्या! पर जिसे बताना पड़े, वह प्यार भी क्या -

‘‘प्यार किसी को करना,
लेकिन कहकर उसे बताना क्या?’’


वस्तुतः बच्चन का काव्य उनके जीवनक्रम के साथ-साथ मधुकाव्य, विषादकाव्य, प्रणयकाव्य और राजनैतिक-सामाजिक काव्य जैसे सोपान पार करते हुए अपनी विकासयात्रा संपन्न करता है (डॉ. बच्चन सिंह, हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, 428)। इस विकासयात्रा में उनका काव्यनायक अथवा अभिप्रेत मनुष्य भी निरंतर विकास करता चलता है। मधुकाव्य (मधुशाला, मधुबाला, मधुकलश) का मनुष्य उत्तरछायावाद की प्रवृत्ति के अनुरूप शरीर के अनुभवों को अधिक महत्व देता दिखाई पड़ता है। वह नियति, भाग्यवाद और मृत्युबोध से ग्रस्त होने के दौर को पार करता हुआ क्रमशः यौवन का उल्लास, साहस और चुनौतियों का सामना करने का उत्साह संजोकर अवसाद को जीतने का प्रयास करता है। अकेलेपन के घनघोर अँधेरे के पार झिलझिलाते प्रकाश के प्रति आस्था बच्चन के मधुकाव्य के मनुष्य को ‘साधारण मनुष्यों का नायकत्व’ प्रदान करती है। यह मनुष्य विषादकाव्य (निशानिमंत्रण, एकांत संगीत, आकुल अंतर) में अवसाद की कड़ी चोटें झेलता दिखाई देता है परंतु नीड़ उजड़ जाने पर भी हताश नहीं है तथा अपने शोक को इस प्रकार श्लोकत्व प्रदान करता है कि अनुभूति की सघनता और करुणा के योग से उसमें देवत्व को भी ललकार सकने वाली तेजस्विता जन्म लेती है। इस तेजस्विता में दुर्बलता को दुलराने वाली दुर्लभ मानवता (‘‘दुर्बलता को दुलराने वाली मानवता दुर्लभ है’’- डॉ. बच्चन सिंह, हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, 429) निहित है। इस मनुष्य का अनुभूतिजन्य करुण आत्मविश्वास द्रष्टव्य है :

‘‘मुझ में है देवत्व जहाँ पर,
झुक जाएगा लोक वहाँ पर,
पर न मिलेंगे मेरी दुर्बलता को दुलराने वाले!’’
(निशा निमंत्रण, गीत 70)|


इसी से वह संकल्पवान और आस्थाशील मनुष्य प्रकट होता है जो ‘क्षतशीश’ होकर भी ‘नतशीश’ होने को तत्पर नहीं है। इस मनुष्य का अगला विकास प्रणयकाव्य (सतरंगिनी, मिलनयामिनी, प्रणय पत्रिका) में नीड़ का फिर-फिर निर्माण करने तथा अँधेरी रात के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए भी अँधेरे के सामने आत्मसमर्पण किए बिना दीवा जलाकर अंधकार पर प्रकाश की जीत को सुनिश्चित करने वाले धीर नायक के रूप में सामने आता है। सामाजिक-राजनैतिक कविताओं (बंगाल का काल, खादी के फूल, सूत की माला, धार के इधर-उधर, आरती और अंगारे, बुद्ध और नाचघर, त्रिभंगिमा, चार खेमे चौंसठ खूँटे, दो चट्टानें, जाल समेटा) तक आते-आते बच्चन का यह काव्य-नायक मनुष्य अपने व्यक्तित्व के रूपांतरण और समाजीकरण में सफल हो जाता है ; और यही मनुष्यत्व की सार्थकता है - कवित्व की भी :

‘‘ओ जो तुम बाँधकर चलते हो हिम्मत का हथियार,
ओ जो तुम करते हो मुसीबतों व मुश्किलों का शिकार,
ओ जो तुम मौत के साथ करते हो खिलवार,
ओ जो तुम अपने अट्टहास से डरा देते हो मरघटों का सुनसान,
भर देते हो मुर्दों में जान,
ओ जो तुम उठाते हो नारा - उत्थान, पुनरुत्थान, अभ्युत्थान!
तुम्हारे ही लिए तो उठता है मेरा क़लम,
खुलती है मेरी ज़बान।
ओ जो तुम ताजे़,
ओ जो तुम जवान!’’
(‘आह्वान’, बुद्ध और नाचघर, 28)


बच्चन की दृष्टि में वह मनुष्य मनुष्य नहीं, पशु है जिसका स्वाभिमान जीवित न हो। उनका काव्य ऐसे मनुष्य की ख़ोज का काव्य है जो युद्धक्षेत्र में भुजबल दिखलाता हुआ प्रतिपल अविचल और अविजित रहे। यह मनुष्य अपने खून-पसीने से प्राप्त अधिकार का उपभोग करता है तथा भाग्यवाद का प्रचार करने वाले मठ, मस्जिद और गिरजाघरों को ‘मनुज-पराजय के स्मारक’ मानता है :

‘‘झुकी हुई अभिमानी गर्दन,
बँधे हाथ, नत-निष्प्रभ लोचन!
यह मनुष्य का चित्र नहीं है, पशु का है, रे कायर!
प्रार्थना मत कर, मत कर, मत कर!’’
(बच्चन रचनावली - 1, एकांत संगीत, 254)

बच्चन अपनी कविता में जिस मनुष्य को गढ़ते हैं, वे चाहते हैं कि वह भले ही दोस्तों की बेवफाई का शिकार बनकर अभागा रह जाए लेकिन उनके चेहरे पर पड़े मित्रता के उस आवरण को छिन्न-भिन्न न करे जिसके आधे तार उसके अपने हाथ के काते और बुने हैं ;परंतु शत्रु के समक्ष किसी भी प्रकार की भीरुता उन्हें सह्य नहीं है, तभी तो -

‘‘शत्रु तेरा
आज तुझ पर वार करता
तो तुझे ललकारता मैं -
उठ,
नहीं तू यदि
नपुंसक, भीरु, निर्बल,
चल उठा तलवार
औ’ स्वीकार कर उसकी चुनौती।’’
(बुद्ध और नाचघर, ‘दोस्तों के सदमे’, 91)


यहाँ यह भी स्पष्ट कर देना उचित होगा कि कवि को अपनी कविता के लिए भले और बुरे दोनों ही तरह के मनुष्य मिले हैं, परंतु उसकी खोज का लक्ष्य केवल वही मनुष्य है जो मनुष्यता के उदात्त गुणों से संपन्न हो। यह खोज तब तक चलती रहेगी जब तक विश्वासघात करने वाला आदमजात सचमुच अपने दृष्टिकोण को कम-से-कम इतना बड़ा न बना ले कि किसी का सम्मान कर सके, किसी की कमज़ोरी का आदर कर सके, क्योंकि इसी गुण से मनुष्य को देवत्व प्राप्त होता है :

‘‘बहुत बड़ा कलेजा चाहिए
किसी का करने को सम्मान,
और किसी की कमज़ोरियों का आदर -
यह है फ़रिश्तों के बूते की बात,
देवताओं का काम!’’
(बुद्ध और नाचघर, ‘कडुया अनुभव’, 105)


पहाड़ी चिड़िया के बहाने अपने काव्य नायक को संबोधित करते हुए बच्चन उसे किसी भी प्रकार का प्रलोभन या बंधन स्वीकार करने से रोकते हैं तथा उसे मुक्त आकाश, पृथ्वी और पवन से प्रेरणा प्राप्त करने को कहते हैं। कवि अपने मनुष्य से चाहता है कि वह कभी पराजय स्वीकार न करे बल्कि चुनौतियों का डटकर मुक़ाबला करे -

‘‘बादलों के गर्जनों से,
बात करते तरु-दलों से,
साँस लेते निर्झरों से
राग सीखो। xxx
नीड़ बिजली की लताओं पर बनाओ।
इंद्रधनु के गीत गाओ।’’
(बुद्ध और नाचघर, ‘काल विहंगिनी’, 116)


चिड़िया से आगे बढ़कर कवि चील-कौए और पपीहे के द्वंद्व के माध्यम से मनुष्य की अंतर्वृत्तियों के संघर्ष को रूपायित करता है। सब कुछ को हस्तगत करने की अविवेकपूर्ण क्षुद्र वासना के चील-कौए मनुष्य की अंतश्चेतना में तभी बस पाते हैं जब वह केवल स्वाति-जल की रट लगाने वाले पपीहे की गर्दन तोड़ देता है। मनुष्यत्व का संस्कार जगता है तो मनुष्य फिर से पपीहे की प्रतीक्षा करता है :

‘‘पालना उर में
पपीहे का कठिन है,
चील-कौए का, कठिनतर,
पर कठिनतम
रक्त, मज्जा,
मांस अपना
चील-कौए को खिलाना,
साथ पानी
स्वप्न स्वाती का
पपीहे को पिलाना। xxx
तुम अगर इंसान हो तो
इस विभाजन,
इस लड़ाई
से अपरिचित हो नहीं तुम!’’


बच्चन की कविता के मनुष्य का आदर्श वह स्फटिक निर्मल और दर्पण-स्वच्छ हिमखंड कदापि नहीं हो सकता जो गल-पिघल और नीचे को ढलककर मिट्टी से नहीं मिलता। उसका आदर्श तो वह नदी है जो मिट्टी के कलंक को भी अपने अंक में लेकर जीवन की गत के साथ मचलती है। समाज का वह कथित कुलीन वर्ग जो साधारण जीवन के लोकानुभवों से वंचित है, बच्चन का काव्यनायक नहीं है। हिमखंड अपने ठोस दुर्लभ आभिजात्य में कितना भी इतरा ले, कवि के मनुष्य का आदर्श तो नदी जल की सर्वत्र अयत्न सुलभता ही है -

‘‘उतर आओ
और मिट्टी में सनो,
ज़िंदा बनो,
यह कोढ़ छोड़ो,
रंग लाओ,
खिलखिलाओ,
महमहाओ।
तोड़ते हैं प्रेयसी-प्रियतम तुम्हें ?
सौभाग्य समझो,
हाथ आओ,
साथ जाओ।’’
(बुद्ध और नाचघर, ‘चोटी की बरफ’, 126)


मनुष्यता की जययात्रा के मूल में मनुष्य की अदम्य जिजीविषा तथा अपराजेय संघर्षशीलता की परंपरा विद्यमान रही है। कवि बच्चन का मनुष्य इस परंपरा के दाय को स्वीकार करता है और इसके प्रति अपने उत्तरदायित्व से विमुख नहीं है। परंपरा का ऋण-शोधन करके ही विकास के क्रम को आगे बढ़ाया जा सकता है -

‘‘जो शकट हम
घाटियों से
ठेलकर लाए यहाँ तक,
अब हमारे वंशजों की
आन ,
उसको खींच ऊपर को चढ़ाएँ
चोटियों तक।’’
(बुद्ध और नाचघर, ‘युग का जुआ’, 129)


मनुष्य का जीवन निरंतर ऊहापोह, उत्थान-पतन और परिवर्तन की गाथा है : ऐसे परिवर्तन जो उसके ऊपर एकांत और निर्वासन की त्रासदी को नियति की तरह छोड़ देते हैं। इस एकाकी और निर्वासित मनुष्य की बेचैनी और उदासी साँझ के उस पिछड़े पंछी की तरह है जिसका नीड़ उजड़ चुका है। नीड़ का यह पंछी वह अनिकेतन मनुष्य है जिसकी पीड़ा को कवि ने अपने अनुभव से जाना है -

‘‘अंतरिक्ष में आकुल-आतुर,
कभी इधर उड़, कभी उधर उड़,
पंथ नीड़ का खोज रहा है पिछड़ा पंछी एक - अकेला!
बीत चली संध्या की वेला!’’
(निशानिमंत्रण, गीत - 5)


साँझ की बेला बीतती है, तो अँधियारा और घनघोर तथा भयावह हो जाता है, लेकिन बच्चन का पथिक-मनुष्य इस अँधरे से डरकर न तो रुककर बैठ जाता है, न चुपचाप दबे पाँव चलता है ; इसके विपरीत वह सुनसान अंधकार के डर को ऊँचे स्वर के गीत की आरी से काटता है -

‘‘डर न लगे सुनसान सड़क पर,
इसीलिए कुछ ऊँचा कर स्वर,
विलग साथियों से हो कोई पथिक, सुनो, गाता आता है।
अंधकार बढ़ता जाता है।’’
(निशानिमंत्रण, गीत - 8)


अंधकार बढ़ता है, तो रात और गहरी होती है। रात गहराती है, तो प्रवंचनाओं की संभावना बढ़ जाती है। असंभव सपनों में खोए अपने काव्यनायक को सावधान करते हुए कवि कहता है -

‘‘सत्य कर सपने असंभव!
पर, ठहर, नादान, मानव --
हो रहा है साथ में तेरे बड़ा भारी प्रवंचन
अब निशा देती निमंत्रण।’’
(निशानिमंत्रण, गीत - 17)


काल की प्रवंचना और मनुष्य के प्रयत्न के द्वंद्व से ही मनुष्यता निखरती है। काल से जूझता हुआ यह मनुष्य अब कोई एकाकी व्यक्ति मात्र नहीं है, संपूर्ण मानवजाति का प्रतिनिधि है। कवि इस विश्वमानव के लिए शुभकामना व्यक्त करता है -

‘‘मानव का सच हो सपना सब,
हमें चाहिए और न कुछ अब,
याद रहे हमको बस इतना - मानव जाति हमारी !
जय हो, हे संसार, तुम्हारी!’’
(निशानिमंत्रण, गीत - 98)


इस विश्वमानव का दर्शन कवि बच्चन ने अपनी काव्ययात्रा के आरंभ में ही कर लिया था। उन्हें वह मनुष्य नहीं चाहिए जो संपूर्ण जगत को धर्म, जाति, वर्ग, संप्रदाय आदि के आधार पर बाँटता हो, बल्कि वे केवल ऐसे विद्रोही मनुष्य का ही स्वागत करने को तैयार हैं जो इन तमाम भेदों का अतिक्रमण कर चुका हो और ‘वसुधैव कुटुम्बकं' तथा ‘विश्वबंधुत्व’ का प्रतीक हो -

‘‘धर्म-ग्रंथ सब जला चुकी है
जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मस्जिद, गिरजे-सबको
तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादरि़यों के
फंदों को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का
स्वागत मेरी मधुशाला।’’
(बच्चन रचनावली -1, ‘मधुशाला’, 47)


अपनी शक्ति पर विश्वास तथा संघर्ष के प्रति दृढ़ संकल्प वे मूल्य हैं जिनसे कवि बच्चन ने अपने काव्यनायक के सहज मानवीय व्यक्तित्व को गढ़ा है। ये मूल्य उनके काव्य में अनेक स्थलों पर अनेक प्रकार से व्यक्त हुए हैं। विपरीत परिस्थितियों की भीषणता से भयभीत होकर अपने प्रयत्न को छोड़ बैठना या अंतिम क्षण तक लड़े बिना ही हार मान बैठना बच्चन के मनुष्य का स्वभाव नहीं है ; उसे साधनहीनता के
बावजूद असाध्य ध्येय को भी साध लेने की अपनी क्षमता पर अटूट विश्वास है :
‘‘जायगा उड़ पाल होकर तार-तार विशद गगन में,
टूटकर मस्तूल सिर पर आ गिरेगा एक क्षण में,
नाव से होकर अलग पतवार धारा में बहेगी,
डाँड छूटेगा करों से, पर बचा यदि प्राण तन में

तैर कर ही क्या न अपने ध्येय को मैं जा सकूंगा ;
मथ चुके हैं कर न जाने बार कितनी विश्व-सागर!

धूलिमय नभ, क्या इसी से बाँध दूँ मैं नाव तट पर ?’’
(बच्चन रचनावली -1, 140)


इस सतत संघर्षशील, सहज संकल्पशाली, दृढ़व्रती तथा अपराजेय मनुष्य को अग्नि के अनंत पथ पर चलना स्वीकार है परंतु किसी बड़े वृक्ष से एक पत्ता-भर भी, छाँह माँगना गवारा नहीं। इसने कभी भी न थकने, न थमने और न मुड़ने की शपथ ली है। आँसू, पसीने और खून से लथपथ साधारण मनुष्य का यह संघर्ष असाधारण है; और इसीलिए महान भी :

‘‘अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

वृक्ष हों भले बड़े,
हों घने, हों बड़े,
एक पत्र-छाँह भी माँग मत, माँग मत,माँग मत!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

तू न थकेगा कभी!
तू न थमेगा कभी!
तू न मुड़ेगा कभी! - कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

यह महान दृश्य है -
चल रहा मनुष्य है
अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ, लथपथ, लथपथ!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!’’
(बच्चन रचनावली -1, ‘एकांत गीत’, 247)|



आचार्य एवं अध्यक्ष, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद-500 004

बाजार बनाम साहित्य

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बाजार बनाम साहित्य


राजकिशोर




पहले जिस तरह पूँजी और पूँजीवाद के खिलाफ कविताएँ लिखी जाती थीं, वैसे ही आजकल बाजार और बाजारवाद के विरुद्ध लिखी जा रही हैं--हालाँकि ये उनसे काफी बेहतर हैं, क्योंकि इस बीच हिंदी कविता कई तरह से प्रौढ़ हुई है। चूँकि प्रगतिशील लोगों के लिए आज का युग बोध यही है, इसलिए कहानियाँ भी इस मामले में पीछे नहीं हैं। उदय प्रकाश की पैनी दृष्टि ने काफी पहले ही इस विषय के महत्व को समझ लिया था। अपनी प्रसिद्ध कहानी "पीली छतरी वाली लड़की' में उन्होंने बाजार के इस दर्शन का मार्मिक चित्रण किया है। जिन्होंने यह कहानी नहीं पढ़ी है, उनके लिए : "इससे ज्यादा मत खाओ, इससे ज्यादा मत कमाओ, इससे ज्यादा हिंसा मत करो, इससे ज्यादा संभोग मत करो, इससे ज्यादा मत सोओ, इससे ज्यादा मत नाचो ... वे सारे सिद्धांत, जो धर्म ग्रंथों में भी थे, समाजशास्त्र या विज्ञान अथवा राजनीतिक पुस्तकों में भी, उन्हें कूड़ेदान में डाल दिया गया था। इस आदमी ने बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में पूँजी, सत्ता और तकनीक की समूची ताकत को अपनी मुट्ठियों में भर कर कहा था : स्वतंत्रता! चीखते हुए, आजादी! अपनी सारी एषणाओं को जग जाने दो। अपनी सारी इंद्रियों को इस पृथ्वी पर खुल्ला चरने और विचरने दो। इस धरती पर जो कुछ भी है, तुम्हारे द्वारा भोगे जाने के लिए है। कोई राष्ट्र है, कोई देश। समूचा भूमंडल तुम्हारा है।' अगले परिच्छेद में इसके भारतीय संदर्भ को भी स्पष्ट कर दिया गया है : "उस ताकतवर भोगी लोंदे ने एक नया सिद्धांत दिया था, जिसे भारत के वित्त मंत्री ने मान लिया था और खुद उसकी पर्स में जा कर घुस गया था।"



सच तो यह है कि कोई भी सच्चा लेखक बाजारवाद का समर्थक नहीं हो सकता, क्योंकि बाजार व्यावसायिक विनिमय का एक तंत्र है और साहित्य में वस्तुओं या सेवाओं का विनिमय नहीं, भावों का आदान-प्रदान होता है। कबीर जरूर बाजार में खड़े थे--बाजार ने ही उन्हें स्वतंत्रता का यह तोहफा दिया था कि वे किसी भी झूठ या मिथक का मजाक उड़ा सकें, लेकिन हाथ में लुकाठी लिये हुए। बाजार की संस्कृति जिस घर को भरने के लिए दृढ़ की गयी है, उसे जला देने के आह्वान के साथ। लेकिन बाजार और साहित्य का रिश्ता उतना सरल नहीं है, जैसा कुछ लोग समझते हैं। उदाहरण के लिए, कवि मिथिलेश श्रीवास्तव ने पहले कविता संकलन "किसी उम्मीद की तरह' की पहली कविता ही "बाजार के खिलाफ' है। कविता की पंक्तियाँ है : मैं इनकार करता हूँ कि मैं जो भी बना रहा हूँ/बेचने की खातिर बना रहा हूँ।



कविता के 'मैं' को यदि कवि का सर्वनाम माना जाए, तो आशय यह निकलेगा कि मिथिलेश जो कुछ भी लिख रहे हैं या जो कविता बना रहे हैं, वह बेचने की खातिर नहीं है। कुछ लोगों को 'कविता बनाना' मुहावरे पर एतराज हो सकता है। वे कहेंगे, कविता हृदय से निकलती है कि बनाई जाती है। पर मुझे ऐसा कोई एतराज नहीं है। बोधा जैसे भावुक कवि ने भी कविता बनाना का प्रयोग किया है। जब चित्र बनाया जा सकता है, तो कविता भी क्यों नहीं बनायी जा सकती? खैर, इसमें कोई शक नहीं कि कविता बेचने की खातिर नहीं लिखी जाती। अच्छी होने के बावजूद आजकल वह बिकती भी नहीं। सिर्फ इस आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि वह बाजार की संस्कृति के खिलाफ है या बाजार के लिए नहीं है। तथ्य यह है कि जब वह संकलित की जाती है और उसे पुस्तक रूप में छपाने में सफलता प्राप्त कर ली जाती है, तो वह अर्थशास्त्र के नियमों के अधीन हो जाती है और बाजार के दर्शन का उल्लंघन नहीं कर सकती। आखिर प्रकाशक जब कविताओं की पुस्तकें छापते हैं और विभिन्न कारणों से छापते ही हैं, तो उस पर प्रकाशन व्यवसाय के नियम लागू होने लगते हैं। जिनके कविता संकलन इस गए-गुजरे जमाने में भी बिक ही जाते हैं -- जैसे केदारनाथ सिंह और अशोक वाजपेयी, उन्हें रॉयल्टी भी मिलती ही है। दुष्यंत कुमार का गजल संकलन "साये में धूप ' किसी भी बेस्ट सेलर से ज्यादा हिट हुआ है और आज भी बिकता ही रहता है। दुष्यंत भी बाजार और बाजारवाद के खिलाफ थे, पर उनकी इस अद्भुत कृति को बाजार में अद्भुत सफलता मिली। जिन किताबों को ऐसी सफलता नहीं मिलती या पूरी तरह से विफलता ही मिलती है, उनके बारे में भी किताब में यह घोषणा छपी रहती है कि कॉपीराइट कवि के पास ही है। बाजारवाद (तथा कई अन्य वादों) के खिलाफ लंबी कहानी "पीली छतरी वाली लड़की' पुस्तकाकार प्रकाशित हुई, तब उसमें भी यह घोषणा थी। सिर्फ इन घोषणाओं से ये लेखक बाजारवादी नहीं हो जाते। लेकिन यह सच्चाई जरूर प्रमाणित होती है कि आदमी के विचार जो भी हों, उसकी जीवन पद्धति अपने समय की राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था से ही निर्धारित होती है। दूसरे शब्दों में, संस्कृति का एक पक्ष हमेशा भौतिक होता है और अपने समय के वर्चस्वशाली भौतिक नियमों से ही परिचालित होता है। गांधी जैसा कोई आदमी ही, किसी हद तक, अपनी अलग लीक बना सकता है।



यही कारण है कि समाजवादी व्यवस्था में, जिसमें निजी संपत्ति नही होती, विश्वास करनेवाला व्यक्ति भी पूँजीवादी व्यवस्था में रहते हुए अपना निजी जीवन पूँजीवादी नियमों के तहत बिताता है। बाजारवाद का उपहास करनेवाला लेखक या कलाकार बाजार तंत्र के माध्यम से अपना साहित्यिक उत्पादन वितरित करता है। विवाह संस्था में विश्वास करनेवाले स्त्री-पुरुष वैवाहिक जीवन में सुख खोजते हैं। अंग्रेजी का विरोध करनेवाले माँ-बाप--नेता ही नहीं, लेखक भी--अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में भेजते हैं। महात्मा गाँधी ने "हिन्द स्वराज' में, जिसके महत्व का आविष्कार करनेवाले विचारकों की संख्या इस तरह बढ़ रही है कि डर लगता है, पाखंड की कोई सीमा रहने दी जायेगी या नहीं, रेल, डॉक्टर आदि के खिलाफ लिखा है, पर उन्हें अकसर रेल यात्रा करनी पड़ती थी और अनेक बार डॉक्टरों की शरण में भी जाना पड़ा। किसी के विचार और जीवन में इस स्तर पर अंतर्विरोध दिखाई पड़ता है, तो वह क्षमा का अधिकारी है। हाँ, क्षमा करने के पहले यह जरूर देखा जाना चाहिए कि उसका हृदय किधर है--मौजूदा व्यवस्था का अधिकाधिक लाभ उठाते जाने और फिर भी प्रगतिशील बने रहने की तरफ या मौजूदा व्यवस्था के साथ कम से कम समझौता करते हुए अपने मूल्यों के अनुसार जीवन जीने की तरफ। एक में वंचना है, दूसरे को व्यावहारिकता कहते हैं।




यह हमेशा विवादास्पद रहेगा कि लेखन और जीवन में फर्क को नजरअंदाज किया जाना चाहिए या नहीं। उदार लोग लेखक को कुछ छूट देना चाहेंगे; नैतिकतावादी उससे माँग करेंगे कि वह जैसा लिखता है, उसी तरह जिए भी। दोनों आग्रहों के पीछे ठोस तर्क हैं। इस प्रसंग में यह स्मरणीय है कि लेखन एक प्रकार का स्वप्न भी है--यथार्थ के कीचड़ में खिलनेवाला कमल। इस पुरानी उपमा के लिए माफ किया जाये, पर कीचड़ अब भी है और कमल भी इतने जिद्दी हैं कि खिलते ही रहते हैं। दुहराना जरूरी है कि यह स्वप्नदर्शिता ही लेखक को आदरणीय बनाती है--उसका निजी जीवन जैसा भी हो। लेकिन आज की समस्या कुछ और है। सवाल यह नहीं रह गया है कि कौन लेखक कैसा है। मामला यह है कि एक वर्ग के तौर पर लेखक समुदाय को उसी तरह सामान्य प्राणी माना जाने लगा है जैस दूसरे पेशों के लोग होते हैं। जब लेखक वर्ग की एक नकारात्मक छवि बन जाती है, तो समाज पर साहित्य का वह असर पड़ना बंद हो जाता है, जो अपेक्षित है। जब लोग देखते हैं या सुनते हैं कि लेखकों का बैलेंस शीट उनकी पुस्तक सूची से भारी है, या वे भी एक-दूसरे से कुंजड़ों की तरह लड़ते हैं, उनकी वासनाओं की धधक वही है, जो समाज के अन्य वर्गों की, जो लिखा जाता है, वह महज स्वादिष्ट माल बन कर रह जाता है। जब पाठक को एहसास होता है कि उत्कृष्टतम उपन्यास, कविता या कहानी भी महज एक साहित्यिक उत्पाद है, तो वह भी पाठक से उपभोक्ता में बदलने लगता है। ट्रेजेडी यह है कि सभ्यता जिधर बढ़ रही है, साहित्य की उसकी जरूरत बढ़ती जाती है, पर साहित्य खुद इस सभ्यता के मूल्यों का शिकार हो रहा है। वृंदावन बचा हुआ है, पर कृष्ण द्वारका के लिए कूच कर चुके हैं।



अगर लेखक बिरादरी सचमुच बाजार और बाजारवाद के विरुद्ध है, साहित्य की यह आकांक्षा और शक्ति अगर अभी भी बची हुई है कि वह मनुष्य के नैतिक आयाम को उद्बुद्ध कर सकता है, तो लेखकों को केवल अपने लेखन के माध्यम से इस वाणिज्यिक संस्कृति के मूल्यों के खिलाफ खड़ा होना चाहिए, बल्कि अपनी जीवन शैली के माध्यम से भी अपना संदेश फैलाना चाहिए। जैसे किसी संन्यासी को देखते ही हम समझ जाते हैं कि वह हमारी दुनिया का जीव नहीं है, वैसे ही लेखक की उपस्थिति मात्र से यह प्रभाव पैदा होना चाहिए कि वह एक भिन्न तरह का व्यक्ति है।

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