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ब्रह्माण्ड के खुलते रहस्य (२)

(साप्ताहिक स्तम्भ) 



गतांक से आगे

 ब्रह्माण्ड के खुलते रहस्य (२)
(रहस्य खोलने की चाबियाँ  )
विश्वमोहन तिवारी (पूर्व एयर वाइस मार्शल )



चाबियाँ

ब्रह्माण्ड का रहस्य खोलने के लिए दो चाबियाँ  नितान्त आवश्यक हैं। एक तो सैद्धान्तिक चाबी और दूसरे कोई दूरदर्शियों जैसे उपकरण जो ब्रह्माण्ड का वांछित अवलोकन कर सकें। और ये दोनों चाबियाँ अन्योन्याश्रित होती हैं। ब्रह्माण्ड के विषय में व्यापक आपेक्षिक सिद्धान्त 191५   में आइन्स्टाइन ने प्रतिपादित किया था, उसकी एक चाबी थी ‘ब्रह्माण्ड की स्थिर दशा’; सारे दिक में नक्षत्रों आदि के वितरण को देखते हुए बीसवीं शती के प्रारम्भ में वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष, निकाला था, सही कहें तब उनकी मान्यता या विश्वास था, कि ब्रह्माण्ड में तारे समांगी या समरूप से वितरित हैं। इनके वितरण की समरूपता में न तो दिक में और न तो काल में कोई विशेष अन्तर आता है। अर्थात अनन्त काल से ब्रह्माण्ड ऐसा ही है और अनन्त काल तक ऐसा ही रहेगा। उस समय की आधिकांश वैज्ञानिक सोच ब्रह्माण्ड की ‘स्थिर दशा’ को मानती थी। उस समय मन्दाकिनियों के प्रसारण का न तो किसी को ज्ञान था और न किसी ने कल्पना ही की थी। जब कि भारत के पुराणों में ऐसी कल्पनाएँ  बहुत मिलती‌ हैं।



मजे की बात यह कि 191५ में आइन्स्टाइन ने जब अपने क्रान्तिकारी व्यापक आपेक्षिकता के सिद्धान्त अर्थात आपेक्षिकी के आधार पर ब्रह्माण्ड का जो मॉडल प्रतिपादित किया था तब उसमें बह्माण्ड का प्रसारी होना स्वत: ही उद्भासित हो रहा था! किन्तु आइन्स्टाइन के मन में या विश्वास में ब्रह्माण्ड का माना हुआ मॉडल स्थिर समरूप तथा गोलीय ज्यामिति वाला था। अतएव आइन्स्टाइन ने अपने उस क्रान्तिकारी गणितीय सूत्र में प्रसार को रोकने के लिये एक ‘ब्रह्माण्डीय नियतांक घटक’ डाल दिया था। इस ब्रह्माण्डीय नियतांक घटक को प्रतिगुरुत्वाकर्षण प्रभाव कहा गया, अर्थात यह गुरुत्वाकर्षण को रोकता है। यह इसलिये भी उऩ्हें स्वीकार्य था कि यही तो ब्रह्माण्ड की गुरुत्वाकर्षण शक्ति द्वारा स्वयं ब्रह्माण्ड को सिमटाए जाने की प्रक्रिया को संतुलित कर सकता है, अन्यथा ब्रह्माण्ड की गुरुत्वाकर्षण शक्ति उसे एक बिन्दु में समेट लेगी। आइन्स्टाइन ने यदि अपने गणितीय सूत्र पर भरोसा किया होता तब उस काल में ही ब्रह्माण्ड- विज्ञान ने कितनी प्रगति कर ली होती। बाद में आइन्स्टाइन ने उस क्रिया को अपने जीवन की सब से बड़ी गलती मानी। गौर से देखा जाए तब आइन्स्टाइन के सामने ऐसा कुछ भी नहीं था कि जिसके आधार पर वे स्थाई ब्रह्माण्ड की अवधारणा पर संदेह करते, सिवाय इसके कि उऩ्हें अपने सूत्रों पर अधिक विश्वास करना था। जब कि आइन्स्टाइन ऐसे व्यक्ति थे जिऩ्हें अपने सूत्रों पर पूरा विश्वास होता था| जैसे कि उस क्रान्तिकारी खोज के समय था, कि सूर्य का गुरुत्वाकर्षण प्रकाश की किरण का पथ बदल देगा, और जब शेष विश्व इसे नहीं मान रहा था।



ब्रह्माण्ड की निर्मिति या बनावट को समझने के लिये एक सैद्धान्तिक चाबी जिसे आज अधिकांश वैज्ञानिक मानते हैं, और जो बीसवीं सदी के तीसरे दशक में हबल के अवलोकनों तथा निष्कर्षों पर आधारित है, वह है ‘प्रसारी ब्रह्माण्ड सिद्धान्त’ (एक्स्पांडिंग यूनिवर्स थ्योरी)। इसके अनुसार विश्व या ब्रह्माण्ड का उद्भव एक बिन्दु में समाए समस्त ब्रह्माण्ड के विस्फोट से होता है। ब्रह्माण्ड के सभी पिण्ड तीव्र गति से भाग रहे हैं। इसीलिये इस सिद्धान्त का नाम ‘प्रसारी ब्रह्माण्ड’ रखा गया जिसे आम भाषा में ‘महाविस्फोट’ भी बोलते हैं। इस विस्तार को हम एक फूलते हुए गुब्बारे की तरह भी देख सकते हैं, यद्यपि इस उपमा की, सभी उपमाओं की तरह, सीमाएं हैं। इस ब्रह्माण्ड में जो पिण्ड जितनी दूर है वह उतनी ही तेजी से भाग रहा है। (यह भी दृष्टव्य है कि भारतीय शास्त्रों में ब्रह्म का एक अर्थ विस्तार या विस्तृत या विराट भी है। मुण्डक उपनिषद में (1.1.8 ‘तपसा चीयते ब्रह्म’) कहा है कि ‘तप’ से ब्रह्म का प्रसार होता है। (यह मंत्र संयोग मात्र नहीं है, किन्तु यह शोध का विषय है कि उनके पास ऐसी कौन सी शक्ति थी जिसके द्वारा वे यह जान सके।) हबल ने दूरी तथा वेग के अनुपात के नियतांक का मान भी निकाला था जो 100 था, इसका मान आधुनिकतम अवलोकनों तथा गणनाओं से 70–75 के बीच में माना जाता है। इस नियतांक का नाम हबल नियतांक है। हबल ने मन्दाकिनियों के वेग का निष्कर्ष डाप्लर सिद्धान्त के अनुसार ‘अवरक्त विस्थापन’ को मापकर निकाला।



अवरक्त – विस्थापन (इन्फ्रारेड शिफ्ट)

डॉ. हबल ने बीसवीं शती की तीसरी दशाब्दि में नक्षत्रों तथा मन्दाकिनियों का सूक्ष्म निरीक्षण किया। उस अवलोकन में वे उन तारों या मन्दाकिनियों के प्रकाशीय वर्णक्रम को बारीकी से परख रहे थे। प्रत्येक तारे में हाइड्रोजन, हीलियम आदि गैसें होती हैं जो प्रकाश के वर्णक्रम में कुछ चारित्रिक (फ्राउन हौफ़र) पंक्तियाँ देती हैं। कुछ निश्चित दशाओं में इन पंक्तियों का वर्णक्रम में स्थान निश्चित होता है। जब ये पंक्तियाँ अपने स्थानों पर नहीं होतीं तब वे विस्थापित कही जाती हैं। किन्तु, सभी पिण्डों के वर्णक्रम में उन्होंने भिन्न मात्राओं में अवरक्त विस्थापन पाया। जिस तरह आती हुई रेल की सीटी की ध्वनि का तारत्व (आवृत्ति) बढ़ जाता है, और जाती हुई रेल की सीटी ध्वनि का तारत्व कम होता सुनाई देता है, उसी तरह जब प्रकाश का स्रोत जैसे मन्दाकिनी जब हम से तेजी से दूर भागती है तब प्रकाश–तंरगों की आवृत्ति कम होती है अर्थात वह लाल रंग की तरफ विस्थापित होती है।और यदि वह पास आ रही हो तो नीले रंग (ब्लू शिफ़्ट) की तरफ विस्थापित होती है। डॉप्लर के इसी सिद्धान्त के आधार पर इस अवरक्त विस्थापन का अर्थ उन्होंने निकाला कि ब्रह्माण्ड में सभी पिण्ड तेजी से एक दूसरे से दूर भाग रहे हैं। यह खगोल विज्ञान में बीसवीं शती की सर्वाधिक क्रान्तिकारी खोज थी कि ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है। हबल ने पिछली शती के तीसरे दशक में किये अपने दीर्धकालीन अवलोकनों के आधार पर एक नियम बनाया कि, 'जो मन्दाकिनी जितनी दूर है वह उतनी ही तेजी से भाग रही है।'



हबल के नियम के अनेक क्रान्तिकारी परिणाम थे, उनमें यह भी था कि ब्रह्माण्ड का जो प्रसार हो रहा है, वह अनन्तकाल से तो नहीं हो सकता, अथार्त उसका किसी क्षण प्रारंभ हुआ होगा। उस उद्भव के क्षण की गणना की जा सकती है। तथा इस सिद्धान्त के अनुसार उस क्षण ब्रह्माण्ड का समस्त पदार्थ सुई की नोक से भी अत्यन्त छोटे बिन्दु में समाहित था। मैंने कहा था न कि ब्रह्माण्ड की बातें कल्पनातीत लगती हैं। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि करोड़ों करोड़ों और इस तरह से हम ऐसा एक करोड़ बार कहें उतने सूर्यों के पदार्थों से भी अधिक पदार्थ सुई की नोक से भी छोटे बिन्दु में समाया था – सुई की नोक से कितना छोटा – सुई की नोक के बराबर के बिन्दु के एक करोड़ के करोड़वें हिस्से से भी छोटा! (कठोपनिषद 1.2.20 में लिखा है, अणोरणीयान महतो महीयान. . . अर्थात वह (ब्रह्म) अणुओं का भी अणु है और महत का भी महत है, महान विस्फोट की इस जानकारी के बाद कठोपनिषद के इस मंत्र का अर्थ प्रचलित अर्थ के अतिरिक्त एक नए रूप में दृष्टिगत होता है।) और आज वही पदार्थ अकल्पनीय रूप से विराट दिक या जगह में फैला हुआ है। कितना विराट ? प्रकाश एक सैकैण्ड में 3 लाख किलोमीटर की यात्रा करता है, तथा एक वर्ष में लगभग साढ़े नौ लाख करोड़ किमी की यात्रा करता है। ब्रह्माण्ड की त्रिज्या इतनी लम्बी है कि उसे किलोमीटर में नहीं नापते वरन प्रकाश–वर्षों में नापते हैं। ब्रह्माण्ड का उद्भव बिन्दु लगभग 1370 करोड़ प्रकाशवर्ष दूर है,. हम अभी तक ब्रह्माण्ड (लगभग दस करोड़ प्रकाशवर्ष) को लगभग 1000 करोड प्रकाश वर्ष की दूरी तक ही देख सके हैं। ब्रह्माण्ड की सीमा का निरन्तर प्रसार हो रहा है। क्या भारतीय शास्त्रों में इसीलिये ब्रह्म को निस्सीम कहते हैं?


ब्रह्माण्ड विज्ञान या ब्रह्माण्डिकी के मुख्य प्रश्न हैं, ब्रह्माण्ड का उदभव, आयु तथा विस्तार, ब्रह्माण्ड में पदार्थ की संरचना, प्रकार तथा परिमाण, तथा ब्रह्माण्ड की दशा अर्थात ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है, किस गति से हो रहा है, कब तक होता रहेगा आदि।
( क्रमशः )


ब्रह्माण्ड के खुलते रहस्य (२) ब्रह्माण्ड के खुलते रहस्य (२) Reviewed by डॉ.कविता वाचक्नवी Dr.Kavita Vachaknavee on Friday, December 11, 2009 Rating: 5

5 comments:

  1. वेद सव सत्य विद्याओं की पुस्तक है!
    वैदिक ज्ञान सारे रहस्यों पर से परदा उठा सकता है!

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  2. thank you very much for posting such a beautiful essay in hindi.i especially liked the relevant ref

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  3. बहुत बढिया श्रृंखला है यह ।
    काश आइंस्‍टीन अपने सूत्र पर भरोसा कर पाते या उन्‍हे यह पता होता कि ब्रहम का अर्थ फैलना होता है ।

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  4. thanks for scientific-brahm gyan.other essay about anicent india aero.......ashwini mawali

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  5. thanks for scientific-brahm gyan.other essay about anicent india aero.......ashwini mawali

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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