ब्रह्माण्ड के खुलते रहस्य (३) : मौलिक-विज्ञानलेखन

 साप्ताहिक स्तम्भ


गतांक से आगे

ब्रह्माण्ड के खुलते रहस्य (३)
(स्थाई दशा एवं प्रसारी सिद्धान्त)
विश्वमोहन तिवारी (पूर्व एयर वाइस मार्शल)



स्थायी दशा सिद्धान्त (स्टडी स्टेट थ्योरी)

तीसरे दशक के बाद अनेक वैज्ञानिक, जिनके मन को यह प्रसारी ब्रह्माण्ड नहीं भा रहा था, यह प्रश्न कर रहे थे कि यदि ब्रह्माण्ड का प्रारंभ हुआ था, तब उस क्षण के पहले क्या स्थिति थी? अत्यन्त विशाल ब्रह्माण्ड एक अत्यन्त सूक्ष्म बिन्दु में कैसे संकेन्द्रित हो सकता है? उस बिन्दु में समाहित पदार्थ का विस्फोट क्यों हुआ? उतना अकल्पनीय पदार्थ कहां से आ गया? और प्रसार या विस्तार के बाद ब्रह्माण्ड का अन्त क्या होगा? इनमें से कुछ प्रश्न तो मुख्यतया विज्ञान के प्रश्न नहीं वरन दर्शन विषय के प्रश्न हैं, अर्थात यह दर्शाता है कि वैज्ञानिक भी कभी कभी प्रत्यक्ष की तुलना में दार्शनिक अवधारणाओं को अधिक महत्व देते हैं। अस्तु! तीन वैज्ञानिकों गोल्ड, बान्डी तथा हॉयल ने 1948 में एक संवर्धित सिद्धान्त प्रस्तुत किया – ‘स्थायी दशा सिद्धान्त’। अथार्त यह ब्रह्माण्ड प्रत्येक काल में तथा हर दिशा में एक-सा ही रहता है, उसमें परिवर्तन नहीं होता। इस तरह उपरोक्त प्रश्नों को निरस्त्र कर दिया गया। क्योंकि इस सिद्धान्त के तहत ब्रह्माण्ड अनादि तथा अनन्त माना गया है। इसलिये इसमें न तो प्रारम्भ का प्रश्न है और न अन्त का। किन्तु प्रसारण तो तथ्य है, इसके कारण उत्पन्न विषमता को कैसे बराबर किया जा सकता है? ऐसे स्थायी ब्रह्माण्ड में मन्दाकिनियों के प्रसारण के कारण पदार्थ के वितरण में अन्तर अवश्य आएगा, क्योंकि प्रसार के केन्द्र में शून्य बनेगा, और् ज्यों‌ज्यों दूरियां बढेंगी, घनत्व कम होगा। इस आरोप से बचने के लिये उन्होंने घोषणा की कि ऐसे केन्द्र पर ऊर्जा स्वयं पदार्थ में बदल जाएगी और वह पदार्थों के लिये एक फव्वारे की तरह स्रोत बन जाएगा जो पदार्थ वितरण की एकरूपता को बनाकर रखेगा। यह अवधारणा भी अनेकों प्रश्न पैदा करती है। उस स्थान पर अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा कैसे आएगी, और अनन्तकाल तक कैसे आती रहेगी। ऐसे प्रश्नों को उन्होंने व्यर्थ तथा निरर्थक प्रश्न कहकर टाल दिया। और लगभग दस वर्ष तक यह सिद्धान्त अनेक वैज्ञानिकों में मान्य रहा क्योंकि इस सिद्धान्त ने ब्रह्माण्ड में हाइड्रोजन तथा हीलियम के बाहुल्य को, सुपरनोवा की कार्यप्रणाली के द्वारा समझाया था जिसे मूल प्रसारी सिद्धान्त नहीं समझा पाया था। इसे जार्ज गैमो ने बाद में क्वाण्टम सिद्धान्त के आधार पर ‘प्रसारी सिद्धान्त’ के तहत सिद्ध किया : प्रथम तीन मिनिटों में ड्यूटीरियम, तथा हीलियम एवं लिथियम के आइसोटोप घोषित अनुपात में बन गये थे। ‘स्थायी दशा सिद्धान्त’ को 1941 में घोषित किये गये व्हीलर तथा फाइनमान के एक अनोखे सिद्धान्त से भी बल मिला। इस सिद्धान्त में गणितीय सूत्रों के आधार पर यह माना गया कि समय पीछे की ओर भी चल सकता है, अर्थात भविष्य से भूतकाल की ओर चल सकता है। यह ब्रह्माण्ड के समय में समांग (सिमिट्रिक) होने की पुष्टि करता है। किन्तु अवलोकनों से प्राप्त तथ्यों के द्वारा स्थायी दशा सिद्धान्त के लिये कठिनाइयां उत्पन्न होती गईं। उनमें से एक है ‘रेडियो स्रोतों’ का अधिक दूरियों, अथार्त प्रारंभिक अवस्था में आज की अपेक्षा आधिक्य, अथार्त ब्रह्माण्ड की दशा में समय या दूरी के आधार पर अन्तर का होना, स्थाई न होना। 1966 में क्वेसारों की खोज हुई। क्वेसार परिमाण में छोटे किन्तु दीप्ति में बहुत तेज पिण्ड होते हैं, और ये केवल अधिक दूरी पर ही मिलते हैं। अथार्त कुछ सैकड़ों करोड़ों वर्ष पूर्व ब्रह्माण्ड की दशा बहुत भिन्न थी। और भी कि पृष्ठभूमिक सूक्ष्मतरंग विकिरण का तापक्रम प्रारम्भ से ही बदलता आया है।


पृष्ठभूमिक सूक्ष्मतरंग विकिरण

1965 में ब्रह्माण्ड में ‘पृष्ठभूमिक सूक्ष्मतरंग विकिरण’ (पृ सू वि) (बैकग्राउण्ड माइक्रोवेव रेडियेशन) की खोज हुई। पृ सू वि की खोज करने वाले दो वैज्ञानिकों पैन्जियास तथा विल्सन को 1978 में नोबेल पुरस्कार मिला, हालां कि मजे की बात यह है कि वे इनकी खोज ही‌ नहीं कर रहे थे। प्रसारी सिद्धान्त के अनुसार प्रारंभ में जब पदार्थ के सूक्ष्मतम तथा घनतम बिन्दु (अंड) का विस्फोट हुआ था, उस समय जो विकिरण हुए थे, सारे ब्रह्माण्ड में उनके अवशेष होना चाहिये। उन्हीं अवशेषों की एक पृष्ठभूमि की तरह उपस्थिति की खोज हुई। चूँकि यह सूक्ष्मतरंग विकिरण सभी दिशाओं में समान रूप से उपस्थित मिलता है, इसका नाम ‘पृष्ठभूमिक सूक्ष्म तरंग विकिरण’ रखा गया। यह प्रसारी सिद्धान्त का एक अकाट्य प्रमाण स्थापित हुआ और अधिकांश विद्वानों ने स्थायी दशा सिद्धान्त के बरअक्स ब्रह्माण्ड के विकास का प्रसारी सिद्धान्त स्वीकार किया। प्रसार का एक और प्रमाण महत्वपूर्ण है। पुणे स्थित खगोल विज्ञान एवं खगोल भौतिकी के अन्तर–विश्वविद्यालय केन्द्र के डा रघुनाथन. श्री आनन्द ने अपने साथियों के साथ एक क्वेसार से निकले प्रकाश का अध्ययन किया। उस समय ब्रह्माण्ड की आयु आज की आयु का पंचमांश थी। उस प्रकाश ने काबर्न के एक अणु को उद्दीप्त किया। इस उद्दीप्त कार्बन के अणु से विकिरित प्रकाश को उन्होंने पकड़ा जिससे उन्हें ज्ञात हुआ कि उस कार्बन का तापक्रम परमशून्य से 6 से 14 अंश कैल्विन अधिक था। आज तो ब्रह्माण्ड का तापक्रम 3 कैल्विन से भी कम है। यह न केवल दर्शाता है कि महाविस्फोट के पश्चात ब्रह्माण्ड का तापक्रम कम होता जा रहा है, वरन यह भी कि यह अन्तर प्रसारी सिद्धान्त के अनुकूल सही मात्रा में भी है, न कि स्थाई दशा के अनुसार अपरिवर्तनशील है।



ब्रह्माण्ड का विकास

प्रसारी सिद्धान्त के अनुसार ब्रह्माण्ड का विकास कैसे होता है। इस सिद्धान्त के निर्माण के लिये कुछ मूलभूत मान्यताओं से प्रारम्भ करते हैं; कि एड्विन हबल के अभिरक्त (अवरक्त या इन्फ़्रारेड) विस्थापन के अवलोकनों के आधार पर ब्रह्माण्ड का प्रसार हो रहा है, तथा दूरी के अनुपात में तीव्रतर होता जाता है। प्रसारी सिद्धान्त के यह दो –अवरक्त विस्थापन तथा प्रसार – वे आधार स्तम्भ हैं जिन पर प्रसारी सिद्धान्त खड़ा है। यह दो स्तम्भ स्वयं अन्य दो मान्यताओं के स्तंभ पर खड़े हैं कि ब्रह्माण्ड विशाल अर्थ में समांगी (होमोजीनियस – समान पदार्थों का समान वितरण) तथा समदैशिक (आइसोट्रोपिक -सभी दिशाओं में एक सा फ़ैलाव) है। तथा यह स्थिति न केवल आज है वरन विस्फोट की अवधि में भी थी। इसमें तथा स्थायी दशा सिद्धान्त की मान्यताओं में जो मुख्य अन्तर है वह यह कि प्रसारी सिद्धान्त के अनुसार ‘दिक्काल’ में ब्रह्माण्ड परिवर्तनीय है जबकि ‘स्थायीदशा’ में ‘दिक्काल’ में भी अपरिवर्तनीय है। इन सिद्धान्तों पर 1922 रूसी गणितज्ञ अलेक्सान्द्र फ्रीडमान ने कुछ गणितीय सूत्रों का निर्माण किया था जिनके द्वारा प्रसारी ब्रह्माण्ड की व्याख्या की जा सकती है। 1927 में बेल्जियन वैज्ञानिक ल मेत्र ने इन सूत्रों के आधार पर उस मूल क्षण का आकलन किया जब उस “आद्य अणु” (ब्रह्म–अण्ड) ने विस्फोट कर प्रसार प्रारंभ किया था और अणु, मन्दाकिनियां तथा तारों आदि का निर्माण प्रारंभ हुआ था। इस ‘महाविस्फोट’ (यह नाम मजाक में फ्रैड हॉयल ने दिया था) के सिद्धान्त को ‘फ्रीडमान–ल मेत्र’ सिद्धान्त कहते हैं।


मूलभूत बल


ब्रह्माण्ड में केवल चार बल हैं जो मूलभूत माने जाते हैं – गुरुत्वाकर्षण, विद्युत चुम्बकीय, दुर्बल एवं सशक्त नाभिक बल। विद्युतचुम्बकीय बल विद्युत, चुम्बकत्व तथा विद्युतचुम्बकीय विकिरण पर नियंत्रण रखता है। दुर्बल नाभिक बल अत्यंत कम दूरियों पर ही प्रभावी होता है तथा रेडियो एक्टिव क्षय का नियंत्रण करता है। सशक्त नाभिक बल नाभिक में प्रोटानों तथा न्यूट्रानों को बाँधकर रखता है। आइन्स्टाइन ने व्यापक आपेक्षिकी सिद्धान्त के उपरान्त शेष जीवन मुख्यतया इन्हीं चारों बलों को मूलरूप से एक ही सिद्ध करने के प्रयास में लगाया था, जिसे 'एकीकृत क्षेत्र सिद्धान्त' कहते हैं। (ऐसी अवधारणा भी मुण्डक उपनिषद में मिलती है - 'वह क्या है जिसे जानने से यह सब जाना जाता है?') आज कल मूलभूत बलों की संख्या, सिद्धान्तत: तीन ही रह गई है, विद्युत चुम्बकीय तथा दुबर्ल नाभिक बलों में सिद्धान्तत: एकता स्थापित की जा चुकी है। यह चारों बल मूल ब्रह्म–अण्ड में एकीकृत रूप में रहते थे और सहज ही आपस में परिवर्तनशील रहते थे तथा इसी तरह पदार्थ तथा ऊर्जा आपस में पूर्ण रूप से परिवर्तनशील थे। (स्विट्ज़ेरलैन्ड तथा फ़्रान्स स्थित सर्न (सी ई आर एन ) के 'विशाल हेड्रान कोलाइडर' में आजकल कुछ विशिष्ट प्रयोग हो रहे हैं जो इस विषय प उपयोगी प्रकाश डाल सकते हैं, कहा तो यह भॆ जा रहा है कि इन प्रयोगों से 'ईश्वर कण' ( गाड पार्टिकल) की‌ खोज हो सकेगी। वैसे इसका सही नाम ' 'हिग्ज़ बोसोन' है; बोसोन एक अद्भुत मूल कण है, और हिग्ज़ ऐसा क्षेत्र है जो कणों को द्रव्यमान देता है। समस्त् ब्रह्माण्ड हिग्ज़ क्षेत्र से पूर्ण है। इस पर विस्तृत चर्चा बाद में।) पदार्थ तथा ऊर्जा की तुल्यता (ई = एम.सी स्क्वेअर) सिद्ध करने के लिये आइन्स्टाइन को, सोलह वर्षों बाद, 1921 में नोबेल पुरस्कार मिला।


क्रमशः



4 comments:

  1. कितने-कितने रहस्य हैं संसार में। आइंस्टीन को उनके ऊर्जा सिद्धान्त के लिये ही मिला था नोबेल!

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  2. रहस्यमयी दुनिया के रहस्य
    " वह क्या है जिसे जानने से सब जाना जाता है "
    फ़ॉन्ट साइज़ थोड़ा बढ़ा लें तो पढ़ने में आसानी होगी

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  3. बढिया वैज्ञानिक लेख ।
    लेकिन आइंस्‍टीन को नोबेल प्राइज photo-electric
    effect पर मिला था । जिसका आधार प्‍लांक का क्‍वांटम सिद्धांत था । न कि ई = एमसी स्‍क्‍वायर पर ।

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  4. अर्कजेश का कथन सत्य है।
    उऩ्हें नोबेल पुरस्कार प्रकाश विद्युत प्रभाव पर ही मिला था।
    शायद यहां यह बतलाना उचित होगा कि ई = एम सी स्क्वएअर सूत्र का उऩ्होने प्रकाश विद्युत प्रभाव वाले प्रपत्र भेजने के तुरंत बाद ही उसी के सिद्धान्त पर आविष्कार किया था। और् उसे तुरंत ही प्रकाशन के लिये भेज दिया था इस अनुरोध के साथ कि उसे प्रकाश विद्युत प्रभाव के प्रपत्र के साथ ही प्रकाशित किया जाए। किन्तु तब तक वह प्रपत्र प्रकाशित हो चुका था अतएव वह एक् स्वतंत्र प्रपत्र के रूप में प्रकाशित हुआ।

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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