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अब से साहित्य अकादमी पुरस्कार के प्रायोजक हैं ......





अभी कुछ ही दिन पूर्व मुझे आलोक तोमर जी का एक अत्यंत सामयिक आलेख मिला जिसे मैंने अपने समूह हिन्दीभारत के साथियों को भी भेजा | लेख तो महत्वपूर्ण व विचारणीय था ही, आलेख पर जो प्रतिक्रियाएँ आईं वे भी बहुत सधी हुई व विमर्श की अपेक्षा करती हैं| इसलिए आज पहले उस आलेख को पढ़ें व नीचे क्रम से एक एक कर उस पर आए प्रतिलेखों को भी पढ़ें| विषय इतना जटिल व महत्वपूर्ण है कि अधिकाधिक कलमकारों की सहभागिता व विचारों की अपेक्षा करता है | अतः अपनी राय हमें देना ना भूलें कि आप क्या सोचते हैं इस विषय में | तो चलिए सर्वप्रथम सीधे पढ़ते हैं वह आलेख व फिर एक एक कर आए मान्य विचारकों की राय |
कविता वाचक्नवी




सैमसंग- साहित्य अकादमी पुरस्कार!
आलोक तोमर



साहित्य अकादमी पुरस्कार देश के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से एक है। इस साल से इस पुरस्कार का नाम होगा सैमसंग साहित्य अकादमी पुरस्कार। अभी तक बड़ी और मल्टीनेशनल कंपनियां टीवी और सिनेमा के पुरस्कारों तक ही सीमित थी और क्रिकेट के मैच प्रायोजित करती थी, मगर अब कोरिया की इस कंपनी ने भारतीय साहित्य पर भी कब्जा कर लिया है। शुरूआत रवींद्र नाथ ठाकुर के नाम पर दिए जाने वाले पुरस्कार से हो रही है।


भारतीय शिक्षा और साहित्य जगत का लगभग सब कुछ बर्बाद कर देने वाले केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने कोरिया की सैमसंग कंपनी के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है और सैमसंग के दक्षिण पश्चिमी एशिया के सीईओ जे जी छीन और एकेडमी सेक्रेटरी अग्रहरा कृष्णमूर्ति ने पिछले सप्ताह इस समझौते पर दस्तखत किए। अब सफाई में यह कहा जा रहा है कि पुरस्कार में सैमसंग का नाम नहीं जोड़ा जाएगा मगर पुरस्कार समारोह में साहित्य से ज्यादा सैमसंग के बैनर नजर आएंगे। टैगोर साहित्य सम्मान हर साल दिसंबर में घोषित किया जाता है और अभी साहित्य अकादमी के दूसरे पुरस्कार सैमसंग के घेरे से बचे हुए हैं। टैगोर पुरस्कार बांग्ला, हिंदी, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, पंजाबी, तेलगु और वोडो भाषाओं में साहित्य के सम्मान के लिए दिए जाने है।


सैमसंग का कोई विद्वान निर्णायक मंडल में होगा या नहीं यह पता नहीं मगर सैमसंग के तरफ से कहा गया है कि कोरिया में साहित्य का बड़ा आदर होता है। सही बात तो यह है कि इस बात के भी कोई प्रमाण नहीं हैं कि कोरिया में कोई ठीक से हिंदी जानता है भी या नही। सैमसंग वालों के लिए, जैसे दूसरी कंपनियों के लिए भारत एक बड़ा बाजार है और इस बाजार में साहित्य में पूंजी निवेश उसके लिए बहुत बड़ा सौदा है। हम इस सौदे में शामिल हैं। सवाल है कि क्या हम इतने गरीब हो चुके हैं कि अपने साहित्यकारों को सम्मान और पुरस्कार देने के लिए हमें किसी विदेशी कंपनी की जरूरत पड़ती है? क्या भारतीय साहित्य में भी गरीबी की कोई सीमा रेखा है? अगर है तो साहित्य पर भी नरेगा कानून लागू क्यों नहीं किया जाता? भारत में साहित्य के नाम पर प्रकाशकों के गोरख धंधे से ले कर साहित्यिक शोध के नाम पर जो भयानक चोरी चकारी चलती है वह अपने आप में भयानक शर्मिंदगी का विषय है। लेकिन सैमसंग- साहित्य अकादमी संगम ने तो सबसे ज्यादा शर्मिंदा किया है। सैमसंग को अगर भारतीय साहित्य में इतनी ही रूचि थी तो अपना सैमसंग साहित्य पुरस्कार घोषित कर दिया होता। सैमसंग तो खैर धंधा कर रहा है मगर भारतीय साहित्य इतना बिकाऊ कैसे बन गया?


इस पर अनिल जनविजय जी ने लिखा 
                                                                        

हम भारतीय लेखकों को इस तरह के कुकृत्य का कड़ा विरोध करना चाहिए। साहित्य अकादमी जैसी संस्थाएँ भी अब बेची और ख़रीदी जाने लगी हैं। मैं आलोक भाई से पूरी तरह सहमत हूँ कि साहित्य अकादमी को बाज़ार से न जोड़ा जाए। अगर ख़ुद लेखक विरोध करेंगे और यह पुरस्कार लेने से मना करेंगे तभी इस तरह की कार्रवाईयों पर रोक लगेगी। लेकिन विडम्बना तो यह है कि भारत में ज़्यादातर लेखक भी तो बिकाऊ हैं और गले में अपना मूल्य लटकाए बिकने के लिए तैयार बैठे हैं।



चन्द्रमौलेश्वर जी ने कहा
                                                                                            



अब तो हर क्षेत्र बाज़ारवादी हो गया है तो पुरस्कारों का क्षेत्र पीछे क्यों रहे। तो.... अब पुरस्कार भी मल्टीनेशनल हो गए



वरिष्ठ भाषाविद प्रो.सुरेश कुमार जी ने कहा

सीमित टिप्पणी : दक्षिण कोरिया से हिन्दी पढने के लिए केन्द्रीय हिन्दी संस्थान आगरा में छात्र आते हैं. सोल (Seoul) स्थित वि.वि. में हिन्दी पढाने भारत से अध्यापक गये हैं और मैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानता हूं. परन्तु केवल इतने से सैमसंग का साहित्य अकादमी से इतनी गहराई से जुड जाने का औचित्य बन जाता है ? मैं भी कहूंगा नहीं. यह तो हमारे शेयर बाज़ार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश जैसी बात हो गई. लेखक समुदाय चुप क्यॊं है ?


प्रो. ऋषभदेव शर्मा जी ने कहा

यह तो जी देखिए कोरी दुकानदारी लग रही है. अनुचित भी ,और अपमानजनक भी!
बेहतर शायद यह हो सकता था कि यदि संयुक्त या प्रायोजित पुरस्कार देने ही थे तो नया पुरस्कार खड़ा कर लिया होता.




अनूप भार्गव जी ने लिखा

इस विषय पर कई उन व्यक्तियों की टिप्पणियां पढने को मिली जिन का मैं बहुत आदर करता हूँ लेकिन फ़िर भी अपनी बात कहने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ जो शायद उन के विचारों से अलग हो । अग्रिम माफ़ी के साथ कुछ बिन्दु रखना चाहता हूँ :



· बात इस बात की नहीं होनी चाहिये कि सैमसंग का नाम पुरुस्कार के साथ हो या न हो , बात इस बात की होनी चाहिये कि हम पुरुस्कार की निष्पक्षता को बनाये रख सकते हैं या नहीं ?

· अभी तक इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि सैमसंग पुरुस्कार के निर्णय में कोई हाथ चाहता है ।

· सैमसंग का निहित स्वार्थ स्पष्ट है । वह भारतीय बाज़ार चाहता है । वह सिर्फ़ इस बात से खुश हो सकता है कि उस का नाम एक प्रतिष्टित कार्यक्रम/पुरुस्कार के साथ जुड़े और वह इस के लिये पैसा खर्च करने को तैयार है ।

· जहां तक मेरी समझ है , सैमसंग को कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि पुरुस्कार ’क’ को मिले या ’ख’ को । बल्कि यह सैमसंग के हित में ही होगा कि पुरुस्कार की निष्पक्षता बनी रहे क्यों कि पुरुस्कार की गरिमा और सम्मान के साथ ही उस के व्यापरिक हित भी जुड़े हैं ।

· यह ज़रूरी नहीं कि प्रायोजकों के रहते हुए पुरुस्कार निष्पक्ष नहीं बनाये जा सकते । अमेरिका के औस्कर (अकेडमी) पुरुस्कार के साथ दर्जनों प्रायोजक जुड़े होते हैं लेकिन फ़िर भी उन की निष्पक्षता पर शायद ही किसी नें कभी संदेह किया हो । उन की तुलना भारतीय फ़िल्म फ़ेयर या अन्य पुरुस्कारों से कर के देखें जहां विजेताओं के नाम पहले से तय होते हैं ।

· सरकारी तंत्र में रह कर साहित्यिक पुरुस्कारों की निष्पक्षता हम जानते हैं ।

· सिर्फ़ पुरुस्कार की चाह रखने से लेखक ’बिकाऊ’ नहीं हो जाता । हम सभी जानते हैं कि पुरुस्कारों के साथ किताब की खरीद जुड़ी होती है और अपनी किताब को बिकता कौन लेखक नहीं चाहता ? क्यों सिर्फ़ लेखकों से ही यह अपेक्षा की जाती है कि वह सिर्फ़ ’जन हित’ का सोच कर लिखें और कुछ नहीं । यह शायद हम लोगों के लिये कहना सरल होगा जिन का पूर्ण व्यवसाय लेखन नहीं है लेकिन जो अपने व्यवसाय के लिये लेखन से जुड़े हैं , उनका क्या ?

· जहां लेखको के बिकाऊ होने की बात की जाती है , उस से जुड़ी प्रकाशकों द्वारा लेखको के शोषण की भी चर्चा ज़रूरी है । दोनो विषय एक दूसरे से जुड़े हैं ।

· यदि हम सैमसंग की सहायता से पुरुस्कार की राशि बढा सकें तो क्या यह लेखकों के लिये अच्छा नहीं होगा ? नोबल पुरुस्कार की महत्ता का एक कारण यह भी है कि उस के साथ एक बड़ी पुरुस्कार राशि जुड़ी होती है ।

· यदि एक ’अल्फ़्रेड नोबल’ अपने निजी धन से एक ऐसा पुरुस्कार स्थापित कर सकता है जिसे पूरी दुनिया सम्मान से देखे और वह पुरुस्कार आने वाले वर्षों में कभी किसी पर निर्भर न रहे तो ऐसा पुरुस्कार हमारे अम्बानी , बिरला या मित्तल क्यों नहीं स्थापित कर सकते ? हमें किसी विदेशी कम्पनी सैमसंग पर निर्भर नहीं रहना होगा ।

· इस दुनिया में कुछ भी मुफ़्त नहीं मिलता । हम मुफ़्त ’टेलीविज़न’ भी तभी देख पाते हैं जब प्रायोजक उस के लिये पैसा देते हैं । किसी भी पुरुस्कार को बनाये रखने के लिये धन की ज़रूरत होती है और वह कहीं न कहीं से आना ज़रूरी है । धन का स्त्रोत जो भी होगा कुछ सीमाएं और बंधन तो ले कर आयेगा ही । हमें देखना यह है कि किस में हम अपनी स्वतंत्रता को कम से कम खोते हैं ।

· बाज़ारीकरण हर समस्या का समाधान नहीं है लेकिन बाज़ारीकरण से लड़ाई उन के ही हथियारों से लड़ी जा सकती है और तभी लड़ी जा सकती है जब हम एक बेहतर, व्यवहारिक विकल्प सुझा सकें ।

अभी बस इतना ही ...
सादर स्नेह के साथ



समीक्षक दुर्गाप्रसाद अग्रवाल जी ने लिखा                                                                                 


मित्रों,
मुझे लगता है कि श्री भार्गव जी की बात पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए. केवल एक विदेशी प्रायोजक के नाम को पढ कर भड़क उठना कोई समझदारी की बात नहीं है. असल् बात तो साहित्य और धन के रिश्ते की है. जब सरकार साहित्य के लिए धन देती है तो वह भी जाने-अनजाने में अपनी शर्तें जोड़ती है. भारत में केन्द्रीय और प्रदेशों की साहित्य अकादमियों की पक्षधरता किसी से छिपी नहीं है. क्या वह हमें स्वीकार्य है? अगर नहीं, तो हमने उसे भी बदलने के लिए क्या कर लिया?

किस लेखक को सम्मान, पुरस्कार और अपने साहित्य के प्रचार प्रसार की तमन्ना नहीं होती? जब मुझे पुरस्कार मिलता है तो मैं उसे निष्पक्ष मानता हूं लेकिन जब किसी और को मिलता है तो मुझे तमाम छल छद्म नज़र आने लगते हैं. असल में यो सोच की यही विसंगति सारी दिक्कतें पैदा करती है.
अब समय आ गया है कि खुल कर इस पर बात हो कि लेखक चाहता क्या है? क्या सिर्फ लिख कर और उसे समय के भरोसे छोड़ कर निशिंत हो जाना चाहता है? क्या वह केवल स्वांत: सुखाय लिखना चाहता है? या वह्चाहता है कि जो उसने रचा है वह अधिक से अधिक लोगों  तक पहुंचे? उसका व्यापक प्रचार प्रसार हो, और साथ ही एक रचनाकार के रूप में समाज में उसकी भी विशिष्ट जगह और हैसियत बने?

अगर उसका चयन यह दूसरा विकल्प है, तो मुझे लगता है कि बाज़ार से बच पाना असंभव प्राय: है. आप जो लिखते हैं, उसे कोई प्रकाशन (चाहे वह अखबार हो, पत्रिका हो या पुस्तक प्रकाशक हो) छापता है, या कोई अन्य संचार माध्यम जैसे रेडियो या टेलीविज़न या सिनेमा प्रसारित करता है. क्या इनसे बचा जा सकता है? अगर  आप सरकारों की भी बात करें तो उनकी राजनीतिक पक्षधरता के साथ ही  व्यावसायिक घरानों से उनकी  निकटता को भी नज़र अन्दाज़ नहीं किया जाना चाहिए. सरकारों के पास जो पैसा होता है वह बाज़ार का भी होता है, और यह सोचना कि बाज़ार सरकारों को नियंत्रित नहीं करते, मासूमियत की पराकाष्ठा ही होगा.

भार्गव जी ने सही कहा है कि आपत्ति तब होनी चाहिए जब कोई प्रायोजक कृति के चयन में हस्तक्षेप करे.

अन्यथा तो इस बात का स्वागत ही होना चाहिए कि बड़े औद्योगिक संस्थानों और घरानों की नज़र भी साहित्य की तरफ जाने लगी है. अन्यता अब तक तो वे खेल या मनोरंजन तक ही देख पाते थे.


इस पर सुरेश कुमार जी ने पुनः लिखा                                                              





श्री अनूप भार्गव ने बडी स्पष्टता से अपने विचार रखे हैं जिससे  स्थिति का दूसरा पक्ष सामने आया है. इसके लिए वे हमारे धन्यवाद के पात्र हैं. तथापि आलोक जी के लेख से जो बात सामने आई है उसमें केवल नामकरण का मुद्दा है, पुरस्कार निर्णय में निष्पक्षता आदि का नहीं. हम भारत में इस बात को लेकर संवेदनशील हैं कि केवल धन के बूते कोई विदेशी व्यापारी संगठन ’साहित्य’ जैसे सम्माननीय क्षेत्र में न घुसे. साहित्य के पुरस्कारों में धनराशि का आकार गौण है, सम्मान की बात मुख्य है. इसके नाम के साथ विदेशी नाम का जुडना हमॆं अपनी अस्मिता पर आघात-सा लगता है.



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मित्रो! यह खुला मंच अब आप के हवाले! 


आप क्या सोचते हैं, हिन्दी साहित्य के एक सम्मानित पुरस्कार के प्रायोजित स्वरूप में बदले जाने वाले  प्रकरण पर ?
आप की राय की प्रतीक्षा है !!





अब से साहित्य अकादमी पुरस्कार के प्रायोजक हैं ...... अब से साहित्य अकादमी पुरस्कार के प्रायोजक हैं ...... Reviewed by Kavita Vachaknavee on Sunday, November 22, 2009 Rating: 5

2 comments:

  1. ham log kya itane daridr ho gaye hai ki apne desh ke lekhakon ko puraskar dene ke liye videshee kampanee kee madad le..? had hai. yaa to daridr hai yaa mansik roop se gulam. gulam nahee to shayad bahut adhik chalak ho gaye hai. jo bhi ho, yah sharm kee baat hai. mai bhi is mansikata ka virodh karta hoo. bhavishy me bhi karoonga. sahity akademy kee baitha hogee to usame bhi aawaz uthaoonga.

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  2. क्या किसी संस्था से किसी औध्योगिक घराने से जुड जाने से किसी पुरस्कार की निश्पक्षता आहत होती है? क्या आज तक जितने पुरस्कार [राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय] दिए जाते रहे हैं उन पर पक्षपात के आरोप नहीं लगाए गए है? जब भी कोई औद्योगिक घराना किसी भी पुरस्कार से जुडता है तो निश्चय ही उसका उद्देश्य अपना व्यवसाय होता है यह तो सर्वविदित है, पर उससे साहित्य की हानि होती है या लाभ? शायद हानि कुछ नहीं क्योंकि वे साहित्यकारों की विचारधारा को नहीं बदल सकते। लाभ यह हो सकता है साहित्यकार को कुछ आर्थिक सहायता हो जाय!

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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