पर्यावरण प्रोत्साहन वेद मंत्रो द्वारा



ओ3म्

पर्यावरण प्रोत्साहन वेद मंत्रो द्वारा 
ब्रिगेडियर चितरंजन सावंत, वी.एस.एम




सन् 1900 में गुरूकुल की स्थापना महात्मा मुंशीराम ने गुजराँवाला  (अब पाकिस्तान) में की थी। किंतु पर्यावरण की दृष्टि से और गुरूकुल का जैसा वातावरण होना चाहिए उस दृष्टि से भी उन्हें वो स्थान पसंद नहीं आया। सन् 1902 में महात्मा मुंशीराम नें आदर्श पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए गंगा नदी के उस पार कांगड़ी ग्राम में गुरूकुल को स्थानांतरित कर दिया। मुंशी अमन सिंह द्वारा दान में दिए गए कांगड़ी ग्राम के आस पास आदर्श वातावरण में गुरूकुल के आचार्यों और ब्रह्मचारियों ने वेद मंत्रो का उच्चारण किया, हवन किया और इस बात का पूरा ध्यान रखा कि प्राकृतिक वातावरण और मूल पर्यावरण में सदैव तालमेल रहे। वह तालमेल लगातार बना रहा और पर्यावरण में कभी भी प्रदूषण के समावेश का कभी प्रश्न ही नही उठा। यह वो आदर्श परिस्थिति थी जिसमें प्राचीन भारत में ऋषि मुनि अपने आश्रमों में, आचार्य अपने गुरूकुलों में कभी भी प्रदूषण को पास नही फटकने देते थे। वैदिक शिक्षा पद्धति द्वारा प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से पर्यावरण को प्रोत्साहन दिया जाता था।


वैदिक त्रैतवाद में प्रकृति
  

वैदिक परंपरा में प्रकृति का उतना ही महत्व है जितना कि दिया जाना चाहिए। त्रैतवाद जिसका मूल वेद है और आधुनिक काल में जिसका प्रतिपादन महर्षि दयानंद सरस्वती ने किया, उसमें परमात्मा, जीवात्मा एवं प्रकृति को समान रूप से अनादि और अनंत बताया गया है। इस तरह प्रकृति का महत्व सृष्टि और सृष्टि निर्माण में मौलिक है। बिना प्रकृति के तो सृष्टि संभव नहीं है। प्रकृति का अभिन्न अंग है प्रदूषण रहित पर्यावरण। वैदिक व्यवस्था में प्रकृति और पर्यावरण को ऊँचा स्थान देकर दोनों के ही रख रखाव पर बल दिया गया है। इसके अर्थ यह हुए कि वैदिक व्यवस्था का पालन करने वालों को अपनी सृष्टि से, प्रकृति से प्रदूषण को उतनी ही दूर रखना चाहिए जितनी दूर उत्तरी ध्रुव दक्षिणी ध्रुव से है। यों आज कल ध्रुव प्रदेश भी प्रदूषण से इतना त्रस्त हैं कि हिमखंड टूट-टूट कर नदियों में बह रहे हैं और पृथ्वी के अनेक भू भागो के अस्तित्व को नष्ट करने पर तुलें हैं।  


आइए त्रैतवाद के उस मंत्र का हम स्वयं उच्चारण कर के देखें कि हमारी सृष्टि के लिए कितना महत्वपूर्ण है –

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परि षस्वजाते।
तयोरन्य: पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभि चाकशीति।। 
- 1.164.20, ऋग्वेद

हमारी सष्टि में अनेक सौर मंडल हैं, अनेक आकाश गंगा और नीहारिकाएँ हैं और संभवत: पृथ्वी के ही समान अन्य ग्रह हैं जिनपर जीवन हो सकता है। मनुष्य के रूप में कहाँ जीवन है और कहाँ नहीं यह तो वैज्ञानिक, भूगोल शात्री और खगोल शास्त्री निश्चित रूप से नहीं कह पाए हैं। फिर भी हमारी पृथ्वी पर तो जल भी है और जीवन भी। मानव सृष्टि त्रिष्टुप या तिब्बत में आरंभ होकर अनेक देशों में फैल गई। हम निश्चित रूप से यह जानते हैं कि हमारी पृथ्वी, जिसके हम मानव संतान हैं, इस समय अपने ही संतानों से ही त्रस्त हैं। मानव सृष्टि के आरंभ में परमपिता परमात्मा ने मानव मात्र के मार्ग दर्शन के लिए ऋषियों के हृदय में वेदो को प्रकाशित किया। मानव जीवन सुचारु रूप से चलने लगा। कितुं जैसे जैसे समय बीतता गया कुरीतियाँ और कुप्रभाव कुछ मनुष्यों को प्रभावित करने लगे और वो पथभ्रष्ट होने लगे।यज्ञ अवश्य होते रहे किंतु जहाँ यज्ञ होते रहे वहाँराक्षस भी आते रहे। इस प्रकार से निर्माण और विध्वंस को आगे बढ़ाने वाली परस्पर विरोधी शक्तियाँ एक दूसरे से जूझती रहीं। राम रावण का युद्ध और कृष्ण कंस का टकराव चलता ही रहा। वेद ने यह अवश्य कहा ``पृथ्वी माता पुत्रो अहम् पृथिव्या:’’ किंतु पृथ्वी की गोद में पलते हुए भी कुछ मानव उसी गोद को उजाड़ने में भी सक्रिय रहे। प्रदूषण बढ़ाते रहे और आधुनिकीकरण, उत्पादन और प्रगति के नाम पर हम पर्यावरण को प्रदूषित करते रहे। इसके फल स्वरुप मौसम बदलता रहा, भूकंप अधिक संख्या में आने लगे और समुद्र कंपन सुनामी के रूप में हमारी तथाकथित प्रगति को निगलने लगे।    
 


हमारी धरा ने हम सब को धारण किया हुआ है किंतु हम मनुष्य कोई न कोई उत्पात ऐसा मचाते रहते हैं कि धरा जैसी धैर्यशाली माता भी अपने संतानो से ऊब जाए और कहे अब बहुत हो चुका है। कहीं पृथ्वी का खनन करते हैं तो कहीं जंगल के जंगल काट डालते हैं, पहाड़ो में सुरंगो का जाल बिछा देते हैं और नदियों के प्रवाह को बांध बना कर उन्हे रोक देते हैं। माना कि मनुष्य अपनी प्रगति के लिए और कम ज़मीन पर अधिक अन्न उपजाने के लिए तथा बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए सर पर छत बनाने के उद्देश्य से ही धरती में फेर बदल करते रहते हैं। किंतु जब यह फेर बदल लक्ष्मण रेखा लाँघ जाता है तो मौसम बदलने लगता है। और मौसम इस कदर बदलता है कि कभी अतिवृष्टि तो कभी अनावृष्टि, कभी मॉनसून के मौसम में बादलो का आकाश में न आना तो कभी असमय में ही घनघोर वर्षा हो जाना हमारे अपने ही कुकृत्यों और कुकर्मो का परिणाम है। यदि प्रकृति और जीवात्मा में आपसी तालमेल रहे तो सृष्टि में शांति रहती है। हमारे कार्यो में और आपसी तालमेल में संतुलन अत्यंत आवश्यक है। जब मनुष्य लोभ और लालच के चक्रव्यूह में फंस जाता है तो उसे उन बुराइयों से छुटकारा पाने और व्यूह से बाहर निकलने का मार्ग नहीं सूझता। वो अफनाता रहता है और मन की शांति तथा तन के स्वास्थ्य से वंचित हो जाता है।   


परमपिता परमात्मा नें मनुष्य मात्र के मार्ग दर्शन के लिए वेद मंत्र ऋषियो के हृदय में प्रकाशित किया और उन्ही मंत्रो के बीच शांति तथा मनुष्य और पर्यावरण में अर्थात जीव जंतुओं तथा प्रकृति के बीच सामंजस्य के लिए हमें मार्ग दिखाया।

शांति के लिए वेद मंत्र

औ3म् द्यौ: शांतिरन्तरिक्षँ शांति: पृथ्वी शांतिराप:
शांतिरोषधय: शांति:। वनस्पतय: शांतिर्विश्वे देवा:
शांतिर्ब्रह्म शांति: सर्वँ शांति: शांतिरेव शांति: सा मा
शांतिरेधि। ओ3म् शांति: शांति: शांति: ।।

इस ब्रह्मांड में अनेक ग्रह और नक्षत्र हैं जिनमें हमारी पृथ्वी भी एक ग्रह है। हमारे सौरमंडल में मानव जीवन संभवत: पृथ्वी पर ही है। परमात्मा द्वारा निर्देशित मार्ग पर चलते हुए जीवात्मा प्रकृति से भी शांति पाता है। अपनी पुस्तक वेद प्रवचन में पंडित गंगा प्रसाद उपाध्याय ने लिखा है कि द्यौ लोक, अंतरिक्ष में, पृथ्वी पर, औषधियों में, वनस्पतियों में जो शांति स्वत: विराजमान है उसी शांति की कामना हम मनुष्य करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि वो शांति हमें भी मिले। प्रश्न यह उठता है कि यदि पृथ्वी में स्वत: शांति है तो यह झंझावात, चक्रवात, सुनामी आदि अशांति के परिचायक क्यों मनुष्य को दुख देते रहते हैं। इस प्रश्न का उत्तर मनुष्य़ को अपने की कर्मों में ढूंढना चाहिए। जब हम धरती से अनावश्यक छेड़ छाड़ करते हैं तो आपात कालीन स्थिति को स्वंय निमंत्रण देते हैं।  


इस समय हमारे पृथ्वी लोक में गर्माहट आवश्यकता से अधिक बढ़ रही है। फलस्वरूप उत्तरी ध्रुव तथा दक्षिणी ध्रुव में हिम खंड पिघल कर टूटते हुए विशाल बर्फ के पहाड़ो से अलग हो रहे हैं तथा जल के रूप में धारा बन कर के पृथ्वी के अनेक भागों में प्रवाहित हो रहे हैं। ध्रुव से चल कर आइए हम भारत पहुंचते हैं। गंगा के स्रोत गंगोत्री और उससे भी ऊपर गोमुख में तथा आस पास विशाल हिम का भंडार अब नहीं है। भूगर्भशास्त्रियों का यह कहना है कि गंगोत्री और गोमुख दोनो ही स्थान अब अपने मूल स्रोत से पीछे की ओर जा रहे हैं। धीरे धीरे विशाल नदी गंगा सिमट कर पतली जल रेखा समान न हो जाए, इसके लिए हमें अभी से प्रयास करके वातावरण में अनावश्यक गर्माहट को कम करना है।     



भौगोलिक स्तर पर सभी देशो को विशेष कर विकसित देशो को, विशेष रुप से अनावश्यक वातावरण की गर्माहट को कम करने का प्रयास करना होगा। उदाहरण के लिए चीन में ऊर्जा का सत्तर प्रतिशत स्रोत कोयला है। कोयले से उत्पन्न गर्माहट और धुआँ वातावरण में जितना प्रदूषण फैलाता है उतना ऊर्जा का कोई अन्य स्रोत नहीं करता। संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में पिछले कई वर्षों से कभी जापान में तो कभी दक्षिण अमेरीका में सम्मेलन होते रहे हैं किंतु वह विद्यार्थियों के वाद-विवाद प्रतियोगिता के स्तर से कभी ऊपर नहीं उठ पाए। अभी दिसंबर 2009 में कोपेनहेगन में एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन होगा जो हमारी पृथ्वी के वातावरण में अनावश्यक गर्माहट को कम करने पर विचार करेगा। सफलता मिलेगी या नही इसमें संदेह है। अंत में हमे इस चेतावनी पर अवश्य ध्यान देना चाहिए कि यदि भौगोलिक गर्माहट इस द्रुत गति से बढ़ती रही तो अगले कुछ दशकों में संभवत: मॉलदीव, मुंबई और लंदन के कुछ भागो का पृथ्वी से लोप हो जाएगा। धरा के कई भागो का समुद्र में समा जाना, मनुष्य को खेती आदि के लिए कम धरती मिलने का कारण बनेगा। इससे सामाजिक तनाव बढ़ेगा और अतंरराष्ट्रीय तनाव मानव को युद्ध की विभिषिका में ढकेल देगा।   


हवन है रामबाण

पर्यावरण प्रदूषण को दूर करने के लिए और भौगोलिक गर्माहट को कम करने के लिए जो उपाय हमारे सीमित साधनो से हो सकते हैं, उनमें हवन प्रमुख है। यदि बड़ी संख्या में नगर नगर में गाँव गाँव में नागरिक हवन करते रहें तो पर्यावरण प्रदूषण से मुक्ति पाने में मदद मिल सकेगी। साथ ही साथ हमें ऐसे उपकरणों का उपयोग नही करना चाहिए जो गर्माहट को बढ़ाते हैं। एक सामान्य सी बात यह है कि पीला प्रकाश देने वाला बल्ब गर्माहट को बढ़ाता है जबकि सी एफ एल जैसे प्रकाश स्रोत गर्माहट को कम बढ़ाते हैं तथा ऊर्जा की खपत भी कम होती है।
   

जब ऊर्जा की खपत कम होगी तो ऊर्जा उत्पादन के साधनो से जो भौगोलिक गर्माहट बढ़ती जा रही है उसमें निश्चित रूप से कमी आएगी। ध्रुव के हिम खंड नही टूटेंगे और गोमुख गंगोत्री यथा स्थान बने रहेंगे।
   

आइए, हम और आप मिल करके वेद मंत्रो के उच्चारण के साथ हवन करते रहे तथा पड़ोसियों को और भूमंडल के अन्य देशों के नर-नारियों को हवन करने की प्रेरणा देते रहें। इसी से हम अपने वैदिक उद्देश्य, सर्वे भवंतु सुखिन: को प्राप्त करनें में सफल होंगे, निरोग रहेंगे और सुखमय तथा शांतिमय जीवन व्यतीत करेंगे।

सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया: ।
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद् दु:खभाग्भवेत् ।।
 
 

5 comments:

  1. पर्यावरण पर इतनी सुन्दर पोस्ट कम ही नेट पर दिखाई देती हैं।
    इसे प्रकाशित करने के लिए आभार!

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  2. आपने विषय की मूलभूत अंतर्वस्तु को उसकी समूची विलक्षणता के साथ बोधगम्य बना दिया है।

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  3. पर्यावरण पर इतना बेतरीन लेख पहली बार पढ़ा , लाजवाब प्रस्तुति । बधाई

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  4. अपनी संस्कृति को भूलने वाले अब इसकी महत्ता को समझ कर फिर जडों की ओर मुडने की बात कर रहे हैं। भविष्य तो वैदिक पद्धति से ही सुधर सकता है, ऐसा अब विदेशी भी मान रहे हैं॥

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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