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द्वंद्व नहीं, प्रतिद्वंद्विता का सवाल : क्या युद्ध हमेशा सीमाओं पर ही लड़ा जाता है?





द्वंद्व नहीं, प्रतिद्वंद्विता का सवाल

दूसरी बात हाल ही में सामने आई है, जिसका श्रेय ‘माओ : द अननोन स्टोरी’ के लेखक द्वय जुंग चांग और जॉन हैलिडे को है। इस पुस्तक में विश्वसनीय साक्ष्य के आधार पर यह बताया गया है कि माओ त्से तुंग ने भारत पर इसलिए हमला करवाया कि वे अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में जवाहरलाल नेहरू की बढ़ती हुई लोकप्रियता से चिढ़ने लगे थे। माओ का यह सपना भी पूरा हुआ, क्योंकि चीनी आक्रमण के बाद नेहरू की ख्याति और लोकप्रियता पर ग्रहण लग गया और सिर्फ दो वर्ष बाद उनका देहावसान भी हो गया। दरअसल, अतिशय महत्वाकांक्षी और सत्ता-कामी माओ का यह चेहरा भारतीय मीडिया और जनमत से छिपा रहा है, क्योंकि भारत के वामपंथ ने माओ के व्यक्तित्व को एक ‘क्रांतिकारी रहस्यवाद’ से ढक रखा है। इस बीच चीन ने अपने को एक महाशक्ति के रूप में स्थापित किया है, इसमें संदेह नहीं। दूसरी ओर, भारत सरकार और उसका चापलूस बुद्धिजावी वर्ग भारत को भी महाशक्ति के रूप में पेंट करता रहता है, पर चीन और भारत के बीच अभी भी कोई तुलना नहीं है – न सामरिक शक्ति के स्तर पर और न आर्थिक शक्ति के स्तर पर। हाँ, व्यापक गरीबी के मामले में जरूर दोनों एक-दूसरे के आसपास ही हैं। आर्थिक मंदी के परिणामस्वरूप इस समय चीन की राजधानी तथा अन्य शहरों से गरीबों को कुत्तों की तरह खदेड़ा जा रहा है। इसे ‘बैक टू विलेज’ अभियान बताया जा रहा है। उसके बावजूद, भारत में दरिद्रता का प्रकोप कहीं ज्यादा है। हो सकता है, चीन अगले बीस-पचीस सालों में गरीबी की समस्या सुलझा ले, पर भारत की आर्थिक प्रगति की दिशा और तैयारी को देखते हुए यह अवधि पचास वर्ष से आगे भी जा सकती है।








1962 और 2009 के बीच फर्क क्या है? तब हमारा मीडिया सोया हुआ था और आज वह कुछ ज्यादा ही जगा हुआ है। तब अखबारों में वही सब छपता था जो सरकार चाहती थी या मुहैया कराती थी। आज मीडिया हर जगह अपना एक एजेंडा तैयार कर लेता है। तब राष्ट्रभक्ति के मोह में असुविधाजनक सवाल नहीं पूछे जाते थे। आज सिर्फ असुविधाजनक सवाल ही पूछे जाते हैं और अकसर झूठी राष्ट्रभक्ति दिखाई जाती है। सनसनी की खोज केंद्रीय महत्व की वस्तु हो गई है और इसके लिए युद्ध का आधारहीन माहौल भी बनाया जा सकता है।































1962 और 2009 के बीच फर्क क्या है? तब हमारा मीडिया सोया हुआ था और आज वह कुछ ज्यादा ही जगा हुआ है। तब अखबारों में वही सब छपता था जो सरकार चाहती थी या मुहैया कराती थी। आज मीडिया हर जगह अपना एक एजेंडा तैयार कर लेता है। तब राष्ट्रभक्ति के मोह में असुविधाजनक सवाल नहीं पूछे जाते थे। आज सिर्फ असुविधाजनक सवाल ही पूछे जाते हैं और अकसर झूठी राष्ट्रभक्ति दिखाई जाती है। सनसनी की खोज केंद्रीय महत्व की वस्तु हो गई है और इसके लिए युद्ध का आधारहीन माहौल भी बनाया जा सकता है।


पिछले कुछ समय से मीडिया में चीन को ले कर खासा तनाव है। कई बार तो ऐसा वातावरण बनाने की कोशिश की गई कि अरुणाचल प्रदेश में चीन का आक्रमण अब हुआ कि तब हुआ। चीन अरुणाचल प्रदेश को अपने देश का हिस्सा मानता है और बताता है, यह कोई नई बात नहीं है। ऐसे ही कुछ बहानों से उसने भारत पर आक्रमण भी किया था। अरुणाचल प्रदेश में, जिसे तब नेफा कहते थे, वह दाखिल भी हो गया था। लेकिन आज यह यकीन कर पाना मुश्किल है कि वह अपने दावे को साबित करने के लिए सेना भेजने की सोच सकता है। अगर वह ऐसा करता है, तो उसे फायदा कम, नुकसान ज्यादा होगा। लेकिन यह चीन के राजनय का अनिवार्य हिस्सा है कि वह भारत को और दुनिया को अपने दावे की सतत याद दिलाता रहे। जब दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा का कार्यक्रम बना, तो स्वाभाविक था कि चीन की मुखरता कुछ और कर्कश हो जाती। यही हुआ और सनसनी की तलाश में हमारे मीडिया ने हुआँ हुआँ करना शुरू कर दिया।


यद्यपि भारत सरकार बार बार टीवी चैनलों को चेतावनी जारी करती रही है कि वे तिल का ताड़ बना कर जनता को गुमराह न करें, फिर भी मीडिया के नजरिए में कोई परिवर्तन नहीं आया है। कोई मामूली-सी घटना भी हो जाती है या चीन सरकार द्वारा रुटीन टाइप का बयान भी जारी होता है, तो कुछ चैनलों को जुकाम हो जाता है। अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर अरसे से हो रही घुसपैठों और सीमा पार चल रही सैनिक गतिविधियों को गरम से गरम बना कर पेश करनेवाले हमारे टीवी चैनल अपने इस अज्ञान का परिचय देते थक नहीं रहे कि सन बासठ के हमले का रहस्य क्या था। बासठ के समझे बिना दो हजार नौ को समझा नहीं जा सकता।


अब यह सूरज की रोशनी की तरह साफ हो चुका है कि बासठ में भारत की सीमाओं पर हमला करने के पीछे चीन का इरादा इस देश पर कब्जा करना नहीं था। सैनिक स्तर पर यह शायद असंभव न रहा हो, लेकिन व्यावहारिक यह किसी भी तरह से नहीं था। अगर सैनिक ताकत के बल पर कब्जा हो भी जाता, तो वह कितने दिनों तक टिक सकता था? जो देश सिर्फ पंद्रह साल पहले ब्रिटेन की गुलामी से मुक्त हुआ था, वह अपने पड़ोसी देश की अधीनता स्वीकार कर लेगा, यह बात किसी पागल के दिमाग में भी नहीं आ सकती थी। पर चीन पागल नहीं था, न है। उसकी कुछ नीतियों में शैतानी का तत्व जरूर रहा है और यह आज भी कायम है।
अब यह सूरज की रोशनी की तरह साफ हो चुका है कि बासठ में भारत की सीमाओं पर हमला करने के पीछे चीन का इरादा इस देश पर कब्जा करना नहीं था। सैनिक स्तर पर यह शायद असंभव न रहा हो, लेकिन व्यावहारिक यह किसी भी तरह से नहीं था। अगर सैनिक ताकत के बल पर कब्जा हो भी जाता, तो वह कितने दिनों तक टिक सकता था? जो देश सिर्फ पंद्रह साल पहले ब्रिटेन की गुलामी से मुक्त हुआ था, वह अपने पड़ोसी देश की अधीनता स्वीकार कर लेगा, यह बात किसी पागल के दिमाग में भी नहीं आ सकती थी। पर चीन पागल नहीं था, न है। उसकी कुछ नीतियों में शैतानी का तत्व जरूर रहा है और यह आज भी कायम है।


विभिन्न तथ्यों, विश्लेषणों और रहस्योद्घाटनों से छन कर जो बात सामने आती है, वह यह है कि बासठ की सैनिक कार्रवाई के पीछे चीन के दो इरादे थे – एक, भारत की सीमावर्ती जमीन का जितना बड़ा हिस्सा हड़पा जा सके, हड़प लिया जाए। चीन शुरू से ही विस्तारवाद की नीति का शिकार रहा है। पड़ोसियों की जमीन पर उसकी आँख बराबर लगी रहती है। यहाँ तक कि उसके सैनिक नदी के छोटे-छोटे द्वीपों तक पर कब्जा जमाने के लिए रूसी सैनिकों से टकराते रहते थे। बासठ में जब चीन का यह इरादा पूरा हो गया, तो उसने अपनी आगे बढ़ती हुई सेना को पीछे लौटने का आदेश दे दिया। युद्धों के इतिहास में यह एक विरल घटना थी कि एक शक्तिशाली और विजयी होता हुआ देश पराजित हो रहे देश की जमीन से अपने पाँव पीछे खींच ले।



दूसरी बात हाल ही में सामने आई है, जिसका श्रेय ‘माओ : द अननोन स्टोरी’ के लेखक द्वय जुंग चांग और जॉन हैलिडे को है। इस पुस्तक में विश्वसनीय साक्ष्य के आधार पर यह बताया गया है कि माओ त्से तुंग ने भारत पर इसलिए हमला करवाया कि वे अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में जवाहरलाल नेहरू की बढ़ती हुई लोकप्रियता से चिढ़ने लगे थे। माओ का यह सपना भी पूरा हुआ, क्योंकि चीनी आक्रमण के बाद नेहरू की ख्याति और लोकप्रियता पर ग्रहण लग गया और सिर्फ दो वर्ष बाद उनका देहावसान भी हो गया। दरअसल, अतिशय महत्वाकांक्षी और सत्ता-कामी माओ का यह चेहरा भारतीय मीडिया और जनमत से छिपा रहा है, क्योंकि भारत के वामपंथ ने माओ के व्यक्तित्व को एक ‘क्रांतिकारी रहस्यवाद’ से ढक रखा है। इस बीच चीन ने अपने को एक महाशक्ति के रूप में स्थापित किया है, इसमें संदेह नहीं। दूसरी ओर, भारत सरकार और उसका चापलूस बुद्धिजावी वर्ग भारत को भी महाशक्ति के रूप में पेंट करता रहता है, पर चीन और भारत के बीच अभी भी कोई तुलना नहीं है – न सामरिक शक्ति के स्तर पर और न आर्थिक शक्ति के स्तर पर। हाँ, व्यापक गरीबी के मामले में जरूर दोनों एक-दूसरे के आसपास ही हैं। आर्थिक मंदी के परिणामस्वरूप इस समय चीन की राजधानी तथा अन्य शहरों से गरीबों को कुत्तों की तरह खदेड़ा जा रहा है। इसे ‘बैक टू विलेज’ अभियान बताया जा रहा है। उसके बावजूद, भारत में दरिद्रता का प्रकोप कहीं ज्यादा है। हो सकता है, चीन अगले बीस-पचीस सालों में गरीबी की समस्या सुलझा ले, पर भारत की आर्थिक प्रगति की दिशा और तैयारी को देखते हुए यह अवधि पचास वर्ष से आगे भी जा सकती है।



इसलिए वास्तविकता यह है कि चीन के साथ हमारी असली समस्या सैनिक द्वंद्व की नहीं, आर्थिक प्रतिद्वंद्विता की है। आर्थिक विकास के तमाम दावों के बावजूद भारत चीन से बहुत पीछे है। विकसित देशों के तमाम औद्योगिक निर्माताओं के लिए चीन विनिर्माण और निर्यात का मक्का बना हुआ है। स्वयं चीन की सरकार अपने उद्योग-धंधों को अधिक से अधिक उत्पादन और निर्यात करने के लिए भारी मात्रा में प्रोत्साहन दे रही है। इस समय चीन में बने सामान से भारत के बाजार पटे हुए हैं। बिजली, इलेक्ट्रानिक्स, खिलौने, कपड़े, जूते, घडियाँ आदि कई क्षेत्र हैं जिनमें चीन का सस्ता सामान हमारे उपभोक्ताओं को लुभा रहा है। भारत में उत्पादन की स्थिति ऐसी है कि बहुत-से निर्माता अपने यहाँ माल तैयार करने के बदले चीन में कारखाना लगाने या वहाँ के उत्पादों का आयात करने में फायदा देखते हैं। राखी, होली और दीपावली जैसे त्योहारों पर तो हमारे बाजारों में चीन ही चीन नजर आता है।


सीमा पर जो भी होगा, हमारे सैनिक संभाल लेंगे, यह विश्वास अतार्किक नहीं है। आखिरकार मामला छोटी-मोटी झड़पों तक ही सीमित रहेगा। लेकिन आर्थिक क्षेत्र में जो परिघटना दिखाई पड़ रही है, वह गुरिल्ला कार्रवाइयों की नहीं, खुले युद्ध की है। इस युद्ध में हम लगातार पराजित हो रहे हैं और सरकारी स्तर पर, उद्योग-धंधों की दुनिया में या मीडिया के जंगल में इसकी कोई चर्चा तक नहीं है। क्या युद्ध हमेशा सीमाओं पर ही लड़ा जाता है?




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चित्र : अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर का भाग भारत से पूरी तरह गायब  है।
राजकिशोर 

द्वंद्व नहीं, प्रतिद्वंद्विता का सवाल : क्या युद्ध हमेशा सीमाओं पर ही लड़ा जाता है? द्वंद्व नहीं, प्रतिद्वंद्विता का सवाल : क्या युद्ध हमेशा सीमाओं पर ही लड़ा जाता है? Reviewed by Kavita Vachaknavee on Friday, October 30, 2009 Rating: 5

1 comment:

  1. आपका लेख बहुत ही सार्थक है,कि युद्ध हमेशा सीमाओं
    पर ही नहीं लड़े जाते.किसी भी देश को aarthik
    रूप से तोड़ दो उसकी तरक्की स्वम ही रूक जायेगी
    और देश हर प्रकार से कमजोर ही होगा.

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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