असंभव के लिए निमंत्रण

असंभव के लिए निमंत्र
राजकिशोर  



प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के ये बोल सुनने में सुहाने लगते हैं कि हम नक्सलवादियों से बातचीत करने के लिए तैयार हैं, मगर इसके लिए उन्हें हिंसा का रास्ता छोड़ना होगा। मनमोहन सिंह को प्रचलित किस्म का राजनीतिक नेता नहीं माना जाता। वे पढ़े-लिखे, बुद्धिजीवी व्यक्ति हैं।

उनसे यह उम्मीद नहीं की जाती कि वे दूसरे नेताओं की तरह ऐसे चालू मुहावरों का इस्तेमाल करेंगे जिनका कोई अर्थ नहीं रह गया है। किसी भी आंदोलनकारी समूह से बातचीत की पेशकश करते समय कोई ऐसी शर्त लगाना बुद्धिमानी की बात नहीं है जिसका पालन संभव ही नहीं है। अगर कोई समूह हिंसा का मार्ग पर चल पड़ा है, तब भी उससे बातचीत करने के लिए राज्य को तैयार रहना चाहिए। जिद और हठ आंदोलनकारियों के लिए स्वाभाविक माने जाते हैं, पर सरकार भी अहंकार या जिद की शिकार हो जाए, यह किसी भी दृष्टि से स्वीकार करने योग्य बात नहीं है।

जहाँ तक नक्सलवादियों का मामला है, उनसे यह अपील तो हमेशा की जानी चाहिए कि वे हिंसा का रास्ता छोड़ दें, लेकिन यह उम्मीद करना राजनीतिक नादानी है कि वे जिसे बूर्ज्वा संस्था या एजेंसी मानते हैं, उसकी अपील पर विचार कर संघर्ष की कोई अहिंसक प्रणाली अपना लेंगे। यह एक असंभव कल्पना है। नक्सलवाद ने हिंसा की राह किसी मजबूरी से या किसी शौक से नहीं पकड़ी है। सिर्फ आत्मरक्षा के लिए हम हिंसा का सहारा लेंगे, ऐसा कोई संकल्प भी उन्होंने नहीं किया है। वे हिंसा करते हैं और अपने अनुयायियों को हिंसा का प्रशिक्षण देते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि इसके बिना राज्य सत्ता पर कब्जा नहीं किया जा सकता। यह बात उनके सिद्धांत या विचारधारा में ही है कि राज्य सत्ता हिंसा के बल पर टिकी हुई होती है और अहिंसक साधनों से उसे अपने नियंत्रण में नहीं लिया जा सकता। इसलिए नक्सलवादियों के लिए हिंसा का रास्ता छोड़ने का मतलब होगा अपनी विचारधारा को ही खारिज कर देना। क्या किसी भी राजनीतिक समूह से इसकी उम्मीद या अपेक्षा करना युक्तिसंगत है ? अगर नक्सलवादियों ने कभी हिंसा की राजनीति छोड़ी तो यह उनके अपने अनुभवों और वैचारिक मंथन के परिणामस्वरूप होगा, न कि इसलिए कि देश का प्रधानमंत्री या गृह मंत्री ऐसा चाहता है।

जब नक्सलवादी समूहों से कहा जाता है कि वे हिंसा का रास्ता त्याग कर सरकार से बातचीत करने के लिए आगे आएँ, तो इसके पीछे यह आधाररहित मान्यता होती है कि वे दूसरे आंदोलनकारियों की तरह ही हैं। इससे बढ़ कर भ्रांति कुछ और नहीं हो सकती। नक्सलवादी संगठन भूमि सुधार या मानव अधिकारों के लिए लड़नेवाले सामान्य नागरिक समूह नहीं हैं। न ही ये आदिवासी संगठन हैं और इनका लक्ष्य आदिवासियों के मूल अधिकारों की रक्षा करना है। ये संगठन अपने को क्रांतिकारी संगठन मानते हैं। इनका लक्ष्य क्रांति तो भारत में करना है, ताकि हर प्रकार की सामंती और पूंजीवादी सत्ता को समाप्त करना है। इन्हें राज्य से कुछ हासिल करना नहीं है। ये राज्य से कुछ माँग भी नहीं रहे हैं। इन्होंने तो राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ा हुआ है। इसलिए योद्धा से यह कहना कि वह रणभूमि छोड़ कर घर लौट जाए, उसका उपहास करना है। ऐसे समूहों को अगर बहस के लिए आमंत्रित करना ही है, तो इस बात के लिए आमंत्रित करना चाहिए कि अहिंसक साधनों से भी समाजवादी समाज स्थापित किया जा सकता है। दुर्भाग्य से इस तरह का न्योता किसी भी ओर से आता दिखाई नहीं देता – सरकार की ओर से तो बिलकुल ही नहीं। सरकार चाहती भी नहीं है कि देश में समाजवादी समाज की स्थापना हो।


ऐसे में, मनमोहन सिंह नक्सलादियों से किस प्रकार की बातचीत की उम्मीद करते हैं ? मान लिया जाए कि नक्सलवादी सरकार से बातचीत करने के लिए कुछ समय तक हिंसा का रास्ता छोड़ने के लिए सहमत हो जाते हैं और छोड़ भी देते हैं, तो उनके प्रतिनिधियों से देश के सर्वोच्च राजनीतिक प्रतिनिधि की बातचीत किस प्रकार की होगी ? प्रारंभिक चाय-पानी तथा स्वागत-सम्मान के बाद प्रधानमंत्री पूछेंगे, बताइए, आप लोग क्या चाहते हैं ? नक्सलवादी कहेंगे, हम भारत में समाजवाद चाहते हैं। हम वर्गविहीन समाज की स्थापना करना चाहते हैं। प्रधानमंत्री का दो टूक जवाब होगा, यह संभव नहीं है। कुछ और बोलिए। नक्सलवादी कहेंगे, इससे कम कुछ भी हमें नहीं चाहिए। मनमोहन सिंह कुछ और गंभीर हो कर कहेंगे, देखिए, हम निजी पूँजी, बाजार और कारपोरेट प्रणाली के पक्ष में प्रतिश्रुत हैं, क्योंकि हमारा मानना है कि इसी रास्ते से देश की आर्थिक प्रगति हो सकती है। नक्सलवादी जवाब देंगे कि इस रास्ते से सिर्फ मुट्ठी भर लोगों का ही भला हो सकता है, व्यापक जनता का तो विनाश ही होगा। कहना न होगा कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत इस बिन्दु पर आ कर गतिरोध का शिकार हो जाएगी। ऐसी बातचीत से क्या फायदा, जिसके परिणाम की कल्पना अभी से की जा सकती है ?


सच तो यह है कि अगर हमारी सरकारो ने बातचीत का महत्व शुरू से ही समझा होता तथा समृद्धि और समानता की लोक अभिलाषाओं की कद्र की होती, तो नक्सलवादी राजनीति का जन्म ही नहीं होता। एक समय में राममनोहर लोहिया कहते थे कि कम्युनिस्ट कीड़ा कांग्रेसी घूरे पर पलता है। हम इस कठोर मुहावरे को दुहराना नहीं चाहते, पर यह जरूर मानते हैं कि नक्सलवाद की राजनीति हमारी संसदीय राजनीति की संपूर्ण विफलता का नतीजा है। अब इस विफलता को क्या इसी तरह की राजनीति के माध्यम से पोंछा जा सकता है ? ताजा उदाहरण लालगढ़ का है, जहाँ नक्सलवादी राजनीति ने बहुत कम समय में पाँव जमा लिए हैं। यह इसीलिए संभव हुआ क्योंकि प. बंगाल में वामपंथी राजनीति भी कांग्रेस के ही ढर्रे पर चलती आ रही है और पिछले कुछ समय से उसने केंद्र सरकार की आक्रामक आर्थिक नीति भी अपना ली है।


तो क्या अब कुछ भी संभव नहीं है ? क्या युद्ध अनिवार्य है ? इस तरह के कठिन प्रश्नों का उत्तर कोई और नहीं दे सकता। सारा दारोमदार सरकार के दृष्टिकोण पर है। अगर देश की समस्याओं के बारे में उसका वर्तमान रवैया जारी रहते हैं, तो एक अशांत समय हमारी प्रतीक्षा कर रहा है।

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2 comments:

  1. न युद्ध होगा न समझौता.....यह खींचातानी यूं ही चलती रहेगी॥

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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