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पाकिस्तान विघटन के कगार पर



 
पाकिस्तान विघटन के कगार पर

ब्रिगेडियर चितरंजन सावंत, वी एस एम

पाकिस्तान का निर्माण भारत की स्वतंत्रता से एक दिन पहले १४ ऑगस्ट १९४७ को हुआ था. कराची में समारोह हुआ था. लॉर्ड मांउट्बेटन, जो अविभाजित भारत के अंतिम वाइसरॉय थे, और मोहम्मद अली जिन्नाह, जो पाकिस्तान के प्रथम गवर्नर जनरल थे, साथ साथ समारोह में पहुँचे थे। वाइसरॉय की बग्घीयात्रा सुखद नहीं रही क्योंकि आसूचना विभाग ने पूर्व चेतावनी दी थी कि उन पर कोई अँग्रेज़ विरोधी बम से हमला करेगा. अंतिम वाइसरॉय ने स्वयं लिखा है की बग्घी में बैठे बैठे वे लगातार भीड़ में उस आदमी को खोजने में व्यस्त रहे, जिसका हाथ ऊपर उठे बम फेंकने के लिए और वे स्वयं बचाओ मुद्रा में आते हुए अपने सुरक्षा कर्मियों को सतर्क कर दें। ईश्वर की कृपा से ऐसा कुछ नहीं हुआ. जिन्नाह को सत्ता सौंपने के बाद वो फ़ौरन नयी दिल्ली वापस आ गये और तब जा कर उन्हे चैन मिला। पाकिस्तान के अस्तित्व में आते ही असुरक्षा की भावना इतनी प्रबल थी की स्वयं लॉर्ड माउंटबैटन भी उस से बच नहीं सके, आम आदमी की कौन कहे. हिंदू और मुसलमान के बीच ऐसी मारकाट मची हुई थी कि लोग कहने लगे प्रशासन, क़ानून और व्यवस्था में, इस से अच्छे तो अँग्रेज़ ही थे.


पाकिस्तान किसे मिला

पाकिस्तान निर्माण में उस समय के युनाइटेड प्रॉविन्सस के मुसलमान अग्रणी थे. हिंदू विरोधी भी वही सबसे अधिक थे. अखंड भारत जैसा शब्द वे सुनने को राज़ी नहीं थे, उस मुद्दे पर विचार-विमर्श का प्रश्न ही नहीं उठता था. हज़ारों की संख्या में वे अपना घर-बार त्याग कर, सपरिवार पाकिस्तान गये. कराची पहुचें तो वहाँ के मुसलमानों ने न स्वागत किया, न सत्कार. उन्हे मोहाजिर नाम दिया गया. कल्पना के स्वर्ग में वे बने शरणार्थी. किन्ही किन्ही की बहू-बेटियों को भी स्थानीय मुसलमान भगा ले गये. अंततः उन्हें अपना राजनैतिक दल बनाना पड़ा और कम से कम कराची की राजनीति में वर्चस्व बनाना पड़ा. भारत से आ कर पाकिस्तान में बसने वाले मुसलमानों को, मारे गये और पलायन किए हुए हिंदुओं की ज़मीन जायदाद मिल गयी लेकिन कराची और आस-पास ही में. अन्य स्थानों पर वहाँ के स्थानीय मुसलमानों ने क़ब्ज़ा जमाया और मोहाजिर को तो घास भी नहीं डाली.


सेना हो या हो राजनीति - सभी विभागों में पाकिस्तानी पंजाब के मुसलमानों की तूती बोलती रही. सेना में उनकी संख्या प्रबल होने से सेना प्रमुख पंजाबी ही बनता रहा. जब जब लोकतंत्र का तख्ता पलटा गया और सेना का शासन हुआ तो मार्शल लॉ प्रशासक पंजाबी मुसलमान ही बना. असैनिक प्रशासनिक सेवा में भी उसी प्रांत का बोलबाला था. बलूच, सिंधी और पठान अपने को अलग-थलग समझने लगे. पठानों में से काई लोग तो मार्शल लॉ प्रशासक आदि उँचे ओहदे पर आसीन हुए, जैसे फील्ड मार्शल अयूब ख़ान लेकिन बलूच बेचारे कहीं के नहीं रहे. सिंध से प्रधान मंत्री हुए जैसे भुट्टो परिवार से दो और अब राष्ट्रपति ज़ारदारी लेकिन आम आदमी अपने को उपेक्षित पाता रहा. पाकिस्तान से अलग हो कर स्वतंत्र होने की भावना बलूचिस्तान के लोगों में सबसे प्रबल रही है. पाकिस्तानी सेना ने वहीं क़हर ढाया और ऐसा नृशंस अत्याचार किया कि हलाकू को भी शर्म आ जाए. जनरल टिक्का ख़ान को तो लोगों ने "बुचर ऑफ बलूचिस्तान" की उपाधि दे डाली. पाकिस्तान के बिखरने में और टूटने में बलूचिस्तान की भूमिका प्रमुख रहेगी.



पाकिस्तान कब टूट कर बिखर जाएगा ? यह एक महत्वपूर्ण बात है और इस पर शीघ्रता में कोई भविष्यवाणी नहीं कर देनी चाहिए जो बाद में झूठी साबित हो. सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि संसार के अधिकतर पत्रकार यह मानते हैं कि  पाकिस्तान का स्वास्थ्य ठीक नहीं है. अभी कोई चिकित्सक भी आस-पास नहीं है जो मर्ज़ जान कर सही दवा दे सके. पाकिस्तान का कोई शुभ चिंतक दूर दूर तक दिखाई नहीं दे रहा है. अधिकतर लोग तो "नीम हकीम ख़तरये जान हैं" और वहाँ नीम मुल्ला ख़तरे इमान की भी कमी नहीं है. यदि परमात्मा कभी किसी सही मायने में पाकिस्तानी को जन्म देता है जो केवल दाढ़ी शरिया को ही इस्लाम का सही रूप ना समझ ले, तो हो सकता है कि पाकिस्तान विघटन के कगार से वापस लौट आए.


हम आने वाले कल की प्रतीक्षा करेंगे और आशा करेंगे कि नयी सुबह की नयी किरण नये जीवन का संचार करेगी. उम्मीद है कि पाकिस्तान के शासक और लोग अपने देश को आतंक मुक्त करने की कोशिश सही मायने मे करेंगे और आस पास के देशो में आतंकवाद का निर्यात करने में अब समय और ऊर्जा नष्ट नही करेंगे।




पाकिस्तान विघटन के कगार पर पाकिस्तान विघटन के कगार पर Reviewed by Kavita Vachaknavee on Tuesday, October 20, 2009 Rating: 5

4 comments:

  1. very thoughtful of u indeed to have published this analytical piece of information by Brigadier Savant. More should follow.

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  2. विकास के लिए प्राप्त धन जब विनाश में व्यय होगा तो विनाश निश्चित ही है।

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  3. एक अकृत्रिम राष्ट्र का नाश तो निश्चित है- कब? यह तो समय ही बताएगा!!

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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