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शक्ति संग्रह के अभाव में प्रेम सिर्फ कविता है, सत्य मात्र सुभाषित है






गरीब के पास जाओ वह राह दिखाएगा

राजकिशोर


गरीब का घर आधुनिक भारत की सबसे बड़ी पाठशाला है। वहाँ अर्थशास्त्र और राजनीतिशास्त्र से ले कर धर्म, दर्शन और समाजशास्त्र सब की शिक्षा मिल सकती है। अगर चंद्रमा का वास्तविक रहस्य उसकी सतह की चट्टानों में नहीं, उसके बड़े-बड़े गह्वरों में छिपा हुआ है, तो गरीब के घर में ही भारत की वर्तमान दशा-दिशा को समझने की कुंजी का वास है। गरीब से हम क्या सीखते हैं, यह उस गरीब पर नहीं, उस गैर-गरीब पर निर्भर है जो उसके पास जाता है। गरीब इसलिए भी गरीब है क्योंकि उसके पास अपना और अपनी स्थिति का विश्लेषण करने की क्षमता नहीं है। उससे ज्यादा पढ़ा-लिखा, उससे ज्यादा समझदार उसके पास जाता है तो उसके पास ऐसे औजार होते हैं जिनसे वह गरीबी के सत्व को आत्मसात कर सकता है। याद रखना जरूरी है कि जब महात्मा गाँधी निलहे किसानों की समस्याओं का अध्ययन करने के लिए चंपारण गए, तब जा कर उन्हें भारतीय स्थिति का मर्म समझ में आया। यहीं उन्हें वे तीन स्त्रियाँ मिलीं जो उनकी जाँच टीम के सामने गवाही देने के लिए एक साथ नहीं आ सकती थीं क्योंकि उनके घर में एक ही साबुत साड़ी थी जिसे पहन कर बाहर निकला जा सकता था। उस परिवार की इस स्थिति को देखा, जाना और समझा उन अनेक व्यक्तियों ने भी जो गाँधी जी की जाँच टीम में शामिल थे, पर भविष्य में कम से कम कपड़े पहनने का निर्णय अकेले गाँधी ने किया। कहने की जरूरत नहीं कि बाकी सभी महानुभावों की नजर निलहे किसानों पर जुल्म की समस्या तक सीमित थी, जब कि गाँधी इसके साथ-साथ या कहिए इसके आईने में और भी बहुत कुछ देखने के लिए उत्सुक और आत्म-प्रशिक्षित थे। हर चीज हर चीज से जुड़ी हुई होती है – कहीं मित्र भाव से और कहीं शत्रु भाव से, यह हम न देखना चाहें, तो कोई क्या कर सकता है?



महात्मा गाँधी के उदाहरण से यह सबक मिलता है, अगर सबक लेने में हमारी कोई दिलचस्पी रह गई है, कि गरीब के पास जाओ, तो किस तरह जाओ। तुम जैसा जाओगे, वैसा ही वहाँ पाओगे। अगर नेतागीरी करने जा रहे हो, तो गरीब के घर जा कर नेतागीरी करोगे तथा बाहर से फूल कर, कुप्पा हो कर लेकिन भीतर से कुछ और दीन-हीन हो कर वहाँ से लौटोगे। ऐसी यात्राओं को अगर दलित पर्यटन का नाम दिया जा रहा है, तो क्या गलत है! पर्यटक आनंद प्राप्त करने के लिए ही कहीं जाता है। वह अगर गम वाली, तकलीफ वाली जगह पर जाता है, तो डॉक्टर की तरह, स्वयंसेवक की तरह नहीं जाता है। वह बाद में दूसरों को यह बताने के लिए जाता है कि उसने दुख और अभाव की कैसी दर्दनाक बस्तियाँ देखी हैं। तो नेतागीरी करने के लिए गरीब के घर जाओगे, तो वहाँ कुछ देख कर नहीं, बल्कि अपना कुछ दिखा कर वहाँ से लौटोगे। इससे न तुम्हारा भला होगा, न गरीब का। वह बेचारा शुरू में अपने घर में बड़े आदमियों का स्वागत करने के अवसर से भले ही थोड़ा गौरव-दीप्त हो ले, पर धीरे-धीरे यह सब उसके लिए एक और बोझ बनता जाएगा। एक ही नौटंकी रोज देखी जाए, तो एक समय के बाद हँसी नहीं आती, गुस्सा आता है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस के नेताओं को गरीबनिवाजी के लिए जिस तरह निर्देश जारी किए जा रहे हैं और इसे आत्म-शिक्षण का नहीं, लोक शिक्षण का कार्यक्रम बनाने का यत्न किया जा रहा है, उसके बाद राहुल गाँधी को भी अपनी ऐसी व्यक्तिगत यात्राओं के बारे में पुनर्विचार करना पड़ सकता है।



गरीब के पास जाने का एकमात्र तरीका वही हो सकता है जो किसी और के पास जाने का है : प्यार से जाओ। तुम सेंसस के कर्मचारी नहीं हो। तुम चकबंदी अधिकारी नहीं हो। न ही मलेरिया इंस्पेक्टर हो। तुम्हें वहाँ जा कर कुछ सूचनाएँ नहीं जुटानी हैं न कुछ सूचनाओं का प्रसारण करना है। सीमित प्रयोजन वाली यात्राएँ सीमित परिणाम ही दे सकती हैं। गरीब के पास जाओ, तो इसलिए जाओ कि उसके प्रति तुम्हारे मन में प्रेम है। प्रेम ही उसकी झोपड़ी में और उसके माहौल में तुम्हारी आँखें खोले रखेगा और तुम्हें वह सब कुछ देखने को बाध्य करेगा जिसके कारण तुम्हारे और उसके बीच तरह-तरह की दूरी बनी हुई है। प्रेमिल हृदय के बिना तुम्हारे लौट आने के बाद यह दूरी कम नहीं होगी। बल्कि बढ़ती रहेगी, क्योंकि वर्तमान व्यवस्था सफल और विफल के बीच अलंघ्य दूरियाँ पैदा करने के सिद्धांत पर ही टिकी हुई है। तुम्हारे भीतर अगर पहले से ही गरीब के प्रति प्रेम से भरा हुआ नहीं है, तुम सिर्फ उत्सुकतावश वहाँ जाते हो, तब भी अगर तुम्हारा दिल खुला हुआ है और तुम्हारा दिमाग साफ है, तो ज्यादा संभव है कि तुम्हें गरीब से प्रेम हो जाए। उसकी अभावग्रस्तता देख कर, उसकी वैचारिक असंगतियों पर गौर कर यह भावना तुम्हारे भीतर उमड़ने-घुमड़ने लगेगी कि तुम्हारे प्रेम का सच्चा पात्र अगर कोई है, तो यही है, यही है, यही है।



तब तुम गरीब से धड़ाधड़ सीखने भी लगोगे। उसका घर देख कर तुम्हारे मन में यह विचार आएगा कि निवास की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें सबको अपने लिए थोड़ी खुली जगह मिले। तब तुम्हें बड़े-बड़े फ्लैटों और कोठियों पर गुस्सा आने लगेगा। तुम्हें लगेगा कि रहने की जमीन और घर बनाने के साधनों का मौजूदा बँटवारा दुष्टता और पाप से भरा हुआ है। जब तुम उसके घर में पड़े अनाज की किस्मों और मात्रा पर नजर डालोगे, तो तुम्हें दिल्ली, मुंबई और दूसरे शहरों में खाद्य और पेय पदार्थों की गुणवत्ता, विविधता और उपलब्धता पर ग्लानि होने लगेगी। जब तुम देखोगे कि गरीब के घर में नहाने-धोने और पीने के पानी का इंतजाम कैसा है, बिजली है या नहीं और है तो कितनी है, बच्चे पढ़ने के लिए जाते हैं कि नहीं और जाते हैं तो क्या पढ़ कर लौटते हैं, स्त्रियों की स्थिति कैसी है, उनकी सहनशीलता को किस असंभव लंबाई तक खींच कर ताना हुआ है, तब तुम गहरे सोच में पड़ जाओगे। तुम्हारा दिमाग चकरघिन्नी खाने लगेगा कि हे भगवान, नागरिकों का एक छोटा-सा वर्ग किस संवैधानिक, धार्मिक, नैतिक या लोकतांत्रिक अधिकार से नागरिकों की इतनी विशाल आबादी को दबोच कर, एक अंधे कुएँ में औंधे लटका कर रखे हुए है। तब तुम्हारा हृदय विद्रोह कर उठेगा और तुम अपने ही वर्ग के विरोधी बन जाओगे। लुटेरों के साथ रहते हुए, घूमते-फिरते हुए, उनका हँसी-मजाक सुनते हुए तुम्हारा रोआँ-रोआँ जलने लगेगा।



गरीबी सिर्फ भौतिक ही नहीं होती। वह वैचारिक भी होती है। जब तुम गरीब के घर में रहोगे, उस घर में रहनेवालों और आने-जानेवालों से बातचीत करोगे, उनकी भावनाओं को अपने हृदय में स्थान दोगे, उनकी तर्क प्रणाली पर विचार करोगे, तब भी तुम्हारा दिल किसी जलते हुए मकान की तरह प्रज्वलित हो उठेगा। तुम्हारे अंधेरे दिमाग में ये चिनगारियाँ दीपावली के आसमान की तरह भेदने लगेंगी कि दुनिया में ज्ञान-विज्ञान का इतना विस्फोट हो चुका है, मनुष्य और उसकी स्थिति के बारे में इतना कुछ जाना-समझा जा चुका है, ईश्वर और धर्म की हकीकतें सामने आ चुकी हैं, विषमता के अधिकांश स्रोत हथेली पर रखे हुए आँवले की तरह एकदम स्पष्ट हैं, दुख और सुख को स्रोत बहुत ज्यादा गोपनीय नहीं रह गए हैं, आजादी और गुलामी के रेशे करीब-करीब पहचान लिए गए हैं, मानव अधिकारों के नक्शे में रेखाएँ और रंग एक पर एक भरते ही जा रहे हैं, तब भी, हाँ, तब भी मानवता के इतने बड़े हिस्से का वैचारिक अस्तित्व इतना धूसर क्यों है? सूचना का अधिकार दे दिया गया है, पर ज्ञान पर अभी भी मुट्ठी भर लोगों का कब्जा है। लड़ते तो हाथ-पैर ही हैं, पर लड़ने की प्रेरणा और ताकत दिमाग से मिलती है। जब तुम गरीबी के इन पहलुओं से साक्षात्कार करोगे, तब बाहर ही नहीं, भीतर भी बहुत कुछ बदलने के लिए आकुल हो उठोगे। जो ज्ञान समाज में फैल नहीं सका या फैलाया नहीं जा सका, वह अंतत: शोषण के औजार के रूप में ही अस्तित्व में बना रह सकते है। जब तुम सच्चे दिल से यह अनुभव करोगे, तब, अपने जीवन में शायद पहली बार, यह अनुभव कर सकोगे कि गरीब का घर एक बहुत बड़ी पाठशाला है। जब तुम अमीर के घर जाते हो, तो सिर्फ जानकारी बढ़ा कर लौटते हो। हो सकता है, तुम्हारे भीतर द्वेष भी पैदा हो। जब तुम गरीब के घर जाते हो, तो तुम्हारे व्यक्तित्व के दबे हुए, मुरझाए फूल खिल उठते है। यथार्थ के उन पहलुओं से तुम्हारी नजदीकी कायम होती है जिनके अभाव में तुमने अपने आपको कुएँ का मेढ़क या एक्वेरियम की मछली बना रखा था।



लेकिन कुछ भी होने के लिए प्रेम अकेला काफी नहीं है। वह प्रेरणा दे सकता है, शक्ति पैदा नहीं कर सकता। शक्ति के लिए तो लोगों के पास जाना होगा। एकाकी की शक्ति पूजा देह बल या शस्त्र बल पैदा करता है। ये पाशविक शक्ति की अभिव्यक्तियाँ या उसका विस्तार हैं। सच्ची शक्ति का जन्म तो लोगों के साथ मिलने से होता है। जब लोगों का जुड़ाव होता है, तब हिंसा अनावश्यक या अर्थहीन हो जाती है। सत्य में सामर्थ्य आ जाती है। इस सामर्थ्य के हिस्सेदार के रूप में ही व्यक्ति भी तेजस्वी और बलशाली हो उठता है। जो जनता से जुड़े बिना, उसके साथ सघन रिश्ता बनाए बगैर अनशन पर बैठ जाते हैं या सत्याग्रह करने लगते हैं, उन्हें समय से पहले ही नींबू-पानी पी कर उठ जाना पड़ता है। शक्ति संग्रह के अभाव में प्रेम सिर्फ कविता है, सत्य मात्र सुभाषित है।



इसलिए जब तुम गरीब के घर जाते हो, तो वहाँ सिर्फ प्रेम का जागरण नहीं होता, शक्ति का भी संधान होता है। तुम देख पाते हो कि शक्ति का सच्चा स्रोत कहाँ है। तब तुम खुद को भी शक्तिशाली महसूस करते हो। तुम्हारा असहायपन दूर होने लगता है। गरीब से दूर रह कर तुम अपने ही सत्य के सामने निरुपाय अनुभव करते हो, अपने ही प्रेम के सामने नपुंसक बन जाते हो। गरीब के साथ एकाकार होना प्रेम की शक्ति को पहचानना है, उस शक्ति का संचार करना है। तब पाठशाला एक अद्वितीय शस्त्रागार भी बन जाती है। इस शस्त्रागार की सबसे बड़ी महिमा यह है कि इसमें किसी के प्रति घृणा या द्वेष के लिए कोई जगह नहीं होती। प्रेम ही परिवर्तन का औजार बन जाता है। यह रास्ता कहीं और दिखाई नहीं देगा। बाकी रास्ते किसी न किसी बिंदु पर जा कर रुक जाते हैं। यह रास्ता सीधा, प्रशस्त और अंतहीन है।

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शक्ति संग्रह के अभाव में प्रेम सिर्फ कविता है, सत्य मात्र सुभाषित है शक्ति संग्रह के अभाव में प्रेम सिर्फ कविता है, सत्य मात्र सुभाषित है Reviewed by डॉ.कविता वाचक्नवी Dr.Kavita Vachaknavee on Wednesday, October 07, 2009 Rating: 5

3 comments:

  1. शायद राहुल गांधी यही कर रहे है। अच्छा हो कि सभी नेता अपने-अपने क्षेत्र में गरीबों से संपर्क बनाए रखें ताकि चुनाब के समय वोट खरीदने की आवश्यकता न हो॥

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  2. सच्ची शक्ति लोगों से/के मिलने से पैदा होती है और तब हिसा निरर्थक हो जाती है.
    लेकिन इन ड्रामेबाजों का क्या कीजे जो मिलते भी किसी न किसी प्रकार की हिंसा के उद्देश्य से ही हैं?

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