साहित्यिक दुनिया का वर्तमान : दिल्ली की जय हो

साहित्यिक दुनिया का वर्तमान




इतने सालों हिन्दी में कविता लिखने के बाद अगर मैं अपने आप से सवाल करूँ कि हिन्दी साहित्य क्या है? तो शायद आपको आश्चर्य होगा। हिन्दी साहित्य क्या वह है जो हिन्दी भाषा में लिखी जाकर इधर उधर पड़ी रहती है या वह, जो हिन्दी क्षेत्र में फैलती रहती है। अगर हिन्दी क्षेत्र में पढ़ी जाने वाली, फैलने वाली साहित्य भी हिन्दी साहित्य के निर्धारण का एक मानक है तो उसके विमर्श में उसके प्रसार को नियंत्रित करने वाली शक्तियाँ यथा, अखबार, प्रकाशक, आलोचक, पुरस्कारदाता, पाठक, ओपिनियन मेकर्स इत्यादि आएँगे ही। और अगर ये आएँगे तो साहित्यिक दुनिया के निर्माण में इनकी भूमिका होगी ही । अगर आक्टोवियो पॉज़ के शब्दों में अपने ‘साहित्यिक वर्तमान’ की खोज की कोशिश करुँ तो उसमें इनकी पदचाप, इनकी हिंसा, इनसे मिली प्रतिष्ठा, इनसे मिला अपमान, सब दिखाई पड़ेगा।



मैं बिहार के आरा जिले के एक छोटे से गाँव जनईडीह में जन्मा, फिर हाई स्कूल में पढ़ने आरा गया। तब आरा साहित्यिक दुनिया का एक ऐसा शहर था जो मानो साहित्य के साम्राज्य का बुद्धकालीन छोटा सा गणतंत्र हो, जिसके साहित्यिक वासियों को राजधानियों के साहित्यिक शासकों को किसी न किसी रुप में साहित्यिक टैक्स देना पडता था। साहित्यिक टैक्स से तात्पर्य- साहित्यिक साम्राज्य के चमकते सेनापतियों को नाम के प्रतिष्ठा, के प्रसार में कोई न कोई योगदान! तो लोगों कभी कभी लगता है कि साहित्यिक दुनिया एक साम्राज्य की तरह है- छोटे-छोटे अनेक किले, अनेक राजाओं के आल्हा-उदल, अनेक युद्ध, अनेक समझौता, अनेक, डिप्लोमेटिक मूव से भरी हुआ। अगर छोटे-छोटे राज्य होगें, छोटे-छोटे नगर होगें तो उनके सामन्त, मठाधीश, किलाधीश होगें ही । आपको किसी न किसी से जुडे रहना ही है। महान जनतंत्र के इस समय में कोई जरुरी नहीं कि जुडाव जनतांत्रिक हो, प्रायः फ्यूडल एवं पूंजीवादी (बुरे अर्थो में) भी हो सकता है। साहित्यिक दुनिया अनेकों बार पवित्र, साधुता से भरी, निरामिष, बिल्कुल साफ-पाकसाफ की नहीं होती।



कभी कभी साहित्यिक दुनिया हिंसक, कू्र एवं गर्वोन्नत आधिपत्यों से भरे आकारों एवं रंगों की एक पेन्टिंग या कालीन भी लग सकती है। साहित्यिक दुनिया का साहित्यिक वर्तमान सेके्रड, पवित्र एवं भावनाओं का देश जैसा नहीं भी हो सकता है। हिंसक, कू्र, गर्वोन्नत, अपवित्र शक्ति सम्बन्धों, अनैतिक अपमानकारी व्यवहारों की प्रतीकात्मक भाषा से लैस भी हो सकता है। साहित्यिक एवं सामाजिक दुनिया दोनों में देखें तो कई बार सीमान्त केन्द्र के अधीन भी प्रतिरोधी स्थिति में खड़ा होता है। किन्तु सीमान्त केन्द्र का प्रतिरोधी स्पेश होते हुए भी केन्द्र बनने के मारक आकर्षण से युक्त होता है। तो मामला यहाँ सीमान्त बनाम केन्द्र का ही नही है, बल्कि सीमान्त में भी केन्द्र की भयावह उपस्थिति से सीमान्तों के भी केन्द्र में बदलने का हो सकता है। पर दोस्तो! सीमान्त को थोड़ी छूट दें और साहित्यिक दुनिया में केन्द्र की उपस्थिति पर थोड़ा और विचार करें।


दिल्ली मत जाओ, ओ पाँचवें घुड़सवार
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दिल्ली के दोस्त मुझे माफ करेगें । दिल्ली मेरे लिए यहाँ मात्र स्पेश नहीं है बल्कि एक मेटाफर है-साहित्य के शक्ति संस्थानों के सकेन्द्रण का। यह ठीक है कि दिल्ली का बनना हमारा नियति भी है, जरुरत भी और हमारे प्रयासों का परिणाम भी। यह भी सही है कि दिल्ली हमारी रोजी की जरुरतों में शामिल है। परन्तु दिल्ली आर्थिक क्रियाओं के स्पेश होने के साथ ही राज्य शक्ति का केन्द्र भी है। अगर आप बहुत निर्दोष भाव से साहित्यिक दुनिया को समझे तो भी दिल्ली इसी प्रक्रिया में एक साहित्यिक शक्ति भी उत्पादित करती जाती है। साहित्यिक संस्थान, एकेडेमीज की उपस्थिति तो साहित्यिक शक्ति के दृश्यमान रुप हैं, साहित्यिक शक्ति के अनेक परोक्ष प्रारुप एवं इकाई दिल्ली में सक्रिय हैं। जैसे राजनीति एवं शेयर बाजार में दलाल, स्पोन्सरर, इमेज मेकर इत्यादि सक्रिय होते हैं, वैसे ही साहित्यिक शक्ति की दुनिया में भी स्पोंसर करने, कोलाबोरेट करने, निगोशिएट करने की अनेक क्रियाएँ जारी हैं। साहित्यिक दुनिया में भी जो ‘इमेज स्पेश’ बनता है उसमें दलाल, साहित्यिक महत्व का कमीशनखोरी करने वाले एवं स्पाॅनसरर सक्रिय होते हैं। यह अलग बात है कि उनकी शक्ति, प्रभाव एवं परिणाम ‘आर्थिक स्पेश’ एवं ‘मिडिया स्पेश’ में कार्यरत ऐसी शक्तियों से बहुत कम होता है।



ओपिनियन मेक करने का पूरा समाजशास्त्र यहाँ आपको दिख सकता है ओपिनियन प्रोडयूस करना, उसका डिस्ट्रीब्यूशन छोटे-छोटे शहरों, नगरों एवं कस्बों में सक्रिय साहित्यिक दुनिया में करने की क्रिया चलती रहती है। परिणाम होता है साहित्यिक रचनाओं एवं मूल्यों के बारे में होमोंजिनियस, बायस्ड, मैटोनैरेटिव का आक्रामक एवं हिंसक प्रसार जो ग्राम्शी के शब्दों में अगर कहें तो साहित्यिक रचनाओं एवं मूल्यों के बारे में अनेक छोटे-छोटे एपिसोड, प्रतिरोधी एवं लघु वृतांतों, आख्यानों एवं ओपिनियन को हतती जाती है। फलतः साहित्य में जनतंत्र का स्पेश सिकुड़ता जाता है। इस तरह के एकरसी ओपिनियन पाठकों की मानसिकता को बनाते हैं, फलतः अनेकों बार साहित्यिक दुनिया में पाठक की भागीदारी का स्वरुप स्वनिर्मित ओपिनियन पर आधारित नहीं होता। यह मामला सिर्फ ओपिनियन का ही न होकर साहित्य रचना को भी प्रभावित करने का है। अर्थात केन्द्र सृजित भाषा, भाव, वाक्य, भंगिमा, शब्द एवं मुहावरे सीमान्त में फैलने लगते हैं। उसे जो नकल करते हैं वे सीमान्तों की साहित्यिक दुनिया में केन्द्र के ‘अपने लोग’ हो जाते हैं।



यूँ तो आई0एस0टी0 (इण्डियन स्टैन्डर्ड टाईम) इलाहाबाद से गुजरता है किन्तु दिल्ली की साहित्यिक दुनिया का स्टैन्डर्ड टाईम पूरे देश के साहित्यिक दुनिया का स्टैन्डर्ड टाइम बनने लगता है। दिल्ली के स्टैन्डर्ड टाइम के आधार पर ही साहित्य की सौन्दर्यात्मक आधुनिकता का निर्धारण होता है। यह स्टैन्डर्ड टाइम घड़ी की टाइम की तरह ही मारक एवं आधिपत्य स्थापित करने वाली होती है। जिस प्रकार घड़ी के समय ने आकर उपयोगितावादी अर्थो में हमें प्रोडक्टिव बनाया, वैसे ही हो सकता है, डी0एस0टी0 हमें साहित्य रचना में प्रोडक्टिव के रुप में स्थापित करती हो, किन्तु घड़ी के समय जैसे हमारी स्वतः स्फूर्त रचनात्मक, सृजनशीलता, साहित्यिक जीवन में मौलिकता का बध कर देती है। वैसे ही दिल्ली स्टैन्डर्ड टाइम (डी0एस0टी0) हमारी रचनाजगत की स्वतः स्फूतर्त, मौलिकता एवं रचनात्मक एडवेंचर को मारती जाती है। परिणाम होता है साहित्य का एकरस नार्मल जीवन! किस साल प्रेम कविताएँ नहीं लिखी जानी हैं। किस साल राजनीतिक कविताओं का मौसम है। काव्य भाषा को कितने तापमान पर गर्म करें कि वह एक दम सूखा एवं अनुर्वर होकर अत्याधुनिक काव्य भाषा हो जाए, यह सब डी0एस0टी0 से ही तय होता है।



साहित्यिक दुनिया में शक्ति के घोड़े
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गलत कहें या सही साहित्यिक दुनिया के इस साहित्यिक वर्तमान की मूल प्रवृत्ति है- सतत रुप से हाइरेरकी एवं असमानता का सृजन। साहित्यिक दुनिया के ऐसी असमानता के सृजन के आधार हैं वे निर्माणकारी सिद्धान्त, जिनसे समाज बनता है और समाज के विकास का इतिहास जो मिलकर समाज के साथ साथ साहित्यिक संस्रोतों एवं मूल्यों का निर्धारण एवं वितरण की प्रक्रिया को निर्धारित करती रही है। गोथे ने पहली बार विश्व साहित्य एवं नयी अर्थशक्ति के सम्बन्धों को व्याख्यायित करते हुए बाजार से इसके समबन्धों की खोज की थी। गोथे का मानना था कि एक ऐसा बाजार होता है जहाँ हर राष्ट्र अपने साहित्यिक उत्पादों, रचना एवं विद्वानों को सौंपने के लिए तैयार रहते हैं । भारत के सन्दर्भ में अगर देखें तो दिल्ली ऐसा ही बाजार बन रहा है जहाँ इलाहाबाद, बनारस, बिहार, झारखण्ड एवं भोपाल अपने-अपने साहित्यिक उत्पादों एवं साहित्यकारों को सौपते रहे हैं। वहीं कि पत्रिका, वहीं के प्रकाशक एवं वहीं के अपार्टमेन्ट जिनमें हमारी रचनाएँ एवं रचनाकार छपते, प्रसारित होतें एवं रहते हुए मुस्कुराते रहते हैं।



साहित्यिक संस्रोतों का असमान वितरण जाति, धर्म, पूॅजी एवं शक्ति संस्रोतों से भारतीय समाज में बन गए अनेक संकुलों के कारण भी होता है। ऐसे संकुल एवं होल ऐसे संस्रोतों को ज्यादा एबजार्व कर लेते हैं । जिनके कारण साहित्यिक संस्रोतों का स्मूथ एवं समान वितरण नहीं हो पाटा । ऐसे में साहित्यिक संस्रोतों एवं मूल्यों के प्रसार के लिए वैकल्पिक एवं रेडिकल शक्तियों एवं ढाॅचों की जरुरत हैं जिसके विकास में सबसे बड़ी बाधा है साहित्यिक शक्तियों का उभरा हुआ एवं अधिपत्य शाली ढाँचा । इसी ढाँचे में आलोचक, पुरस्कारदाता, कारपोरट कवि ग्रुप , पत्रिकाएँ, प्रकाशक आते हैं। इनके नृवंशीय बन्धुगण, कृपापात्र, चारण-भाट साहित्यिक संस्रोतों के असमान वितरण के कारण होते हैं। जाति, धर्म, क्षेत्र जैसे भावनात्मक रिश्ते भी कई बार साहित्यिक प्रतिष्ठा के रचना एवं प्रतिभा आधारित वितरण के रास्तें में बाधा खड़ी करती है।



अगर किसी कवि को संकलन छपवाना होता हैं तो प्रकाशक कहता है ब्लर्बभेजिए। ब्लर्ब लिखवाने के लिए वह दिल्ली के ऐसे आलोचकों एवं कवियों से सम्पर्क करता है जो ब्लर्व के माध्यम से अपनी प्रतिष्ठा का कुछ अंश उस रचनाकार को ट्रान्सफर करते है जो उसे प्रकाशक, आलोचकों एवं पाठकों की नजरों में महत्वपूर्ण बनाता है। किन्तु प्रतिष्ठा के इस ट्रान्सफर के एवज में वह रचनाकार उस ब्लर्व लेखक साहित्यकार की प्रतिष्ठा के प्रसार का माध्यम भी हो जाता है। वह युवा रचनाकार एक ऑब्जेक्ट में भी बदल जाता है। साथ ही ब्लर्व लेखक रचनाकर चेतस , अचेतस ढंग से उस नये या युवा कवि को एप्रोप्रिएट भी कर लेता है। कई बार तो वह बड़ा रचनाकार युवा लेखक के लिए अमर बेल भी हो जाता है। यही निष्कर्ष रिब्यूज के सन्दर्भ में भी निकल सकता है। वाल्टर स्कॉट की पुस्तक पर विक्टर ह्यूगों का रिव्यू जैसे रिव्यू प्रतिष्ठा स्थानान्तरण के सकारात्मक परिणाम के रुपमें देखे जा सकते हैं। हिन्दी में ब्लर्व लिखने-लिखवाने के अनेक नकारात्मक परिणाम भी नये रचनाकारों के साहित्यिक जीवन में होते रहते हैं।


साहित्यिक दुनिया में स्वायत्ता
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साहित्य के शक्ति केन्द्र आज प्रायः आर्थिक एवं राजनैतिक शक्ति से जुड़े नगर ही हो गए हैं। दुनिया का साहित्यिक इतिहास देखें तो पहले ऐसा नहीं था। विश्व के आर्थिक इतिहास के अध्ययन से जाहिर होता है कि पहले कलात्मक एवं साहित्यिक स्पेस का आर्थिक एवं राजनैतिक स्पेसेज पर निर्भरता कम थी। सोलहवीं शताब्दी में यूरोप में वेनिस जब आर्थिक शक्ति का केन्द्र था तो फ्लोरेन्स एवं टुस्कान की भाषाएँ बौद्धिक एवं कलात्मक रचना की महत्वपूर्ण माध्यम थी। 17वीं शताब्दी में जब अम्स्टर्डम यूरोपीय व्यापार का केन्द्र बना रोम एवं मेड्रिड कला एवं बौद्धिक विमर्श के केन्द्र थे। 18वीं शताब्दी में लन्दन जब दुनिया का महत्वपूर्ण आर्थिक केन्द्र था तो पेरिस की सांस्कृतिक सत्ता सर्वमान्य थी। हलाँकि 19वीं शताब्दी से आधुनिकता के ज्यादा आक्रामक होने के बाद साहित्यिक एवं कलात्मक दुनिया की स्वायत्तता टूटी। फिर भी आज के समय में भी लैटिन अमेरिका का साहित्यिक स्वीकार सीमान्त के महत्व को नया अर्थ देता है।



हिन्दी साहित्य में भोपाल, पटना, इलाहाबाद जो नब्बे के दशक तक साहित्यिक केन्द्र के रुप में दिल्ली से अलग अपने वजूद को बनाए रखे थे, धीरे-धीरे खत्म होते गए हैं। हमारे यहाँ साहित्यिक आधिपत्य के अनेक रुप सीमान्त पर साहित्य के रचने की जद्दो-जहद के लिए संकट पैदा कर रहे हैं। शारीरिक रुप से रचनाकारों का छोटे शहरों से बड़े केन्द्रों में उत्प्रवास (माईगे्रशन)? से ज्यादा बड़ा खतरा हमारे मनोजगत में केन्द्र का (दिल्ली का) सर्वग्रासी प्रसार एवं अधिपत्य की स्थापना है। नये रचनाकारों में शक्ति केन्द्रों में बैठे रचनाकारों से स्वीकार, सार्टिफिकेट प्राप्त करने की चाह, साहित्य की बढ़ती जा रही कैरियरिज्म सीमान्त को कमजोर करने के कारण बन रहे हैं। कभी-कभी तो लगता है दिल्ली हर जगह भयावह ढंग से फैला है। कोई-कोई कह सकता है सीमान्त की जरुरत ही क्या है? देश का हर भाग दिल्ली की ही तर्ज पर, हर रचनाशीलता दिल्ली जैसी हो और दिल्ली की जय हो।


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बद्री नारायण









5 comments:

  1. जब सारे सरदार दिल्ली में बैठे हों, अपने गुर्गों को स्थापित कर रहे हों, तो अन्य रचनाकार दोयम दर्जे के हुए कि नहिं?

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  2. बद्रीनारायण का यह आलेख आज के हिंदी साहित्य के परिदृश्य पर कटु स्पष्टोक्ति है. मेरा अनुभव और मत तो यह है कि दिल्ली या अन्य गढों से दूर रहकर लिखने वाले रचनाकार अपनी जनता की चित्तवृत्ति के अधिक निकट की रचनाएँ दे पाते हैं जबकि गढानुमोदित साहित्य ढांचाबद्ध और निर्जीव प्रतीत होता है.

    ''हिंदी भारत'' में बद्रीनारायण के इस विचारोत्तेजक आलेख की प्रस्तुति पर अभिनन्दन!
    आशा है कि उनके और भी आलेख इस मंच के माध्यम से पढने का अवसर मिलेगा.

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  3. सटीक व बढिया आलेख प्रेषित किया है।

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  4. और
    ..........
    दुनिया का वर्तमान
    भी यही है
    जय हो।

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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