द्वितीय समरोत्तर मणिपुरी कविता- एक दृष्टि


गतांक से आगे



मणिपुरी कविता : मेरी दृष्टि में
--डॉ. देवराज

============ ========= ====

[२२]



द्वितीय समरोत्तर मणिपुरी कविता- एक दृष्टि
------------ --------- --------- ---------




किसी भी युद्ध में आम आदमी ही पिसा जाता है - आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मानसिक रूप से उसी को क्षति पहुँचती है। उसे हर कठिनाई का सामना झेलना पड़ता है। इन्हीं विषम परिस्थितियों का जायज़ा लेते हैं डॉ. देवराज जी: "विश्वयुद्ध को युद्ध के रूप में लेने का वहाँ अवकाश ही नहीं रह गया। इसके विपरीत इस युद्ध को भी उन्होंने आदर्श जीवन-मूल्यों को नष्ट करने वाली बडी़ घटना के रूप में लिया। इस स्थिति में युद्ध उनकी चिन्ता का कारण नहीं बना, बल्कि आदर्श जीवन-मूल्यों की गिरती अवस्था चिन्ता का कारण बन गई। "इस समस्त परिस्थितियों ने मणिपुरी समाज में एक विशेष प्रकार के संघर्ष को जन्म दिया, जिसे निश्चित रूप से सामाजिक सभ्यता के विकास का अनिवार्य परिणाम माना जाना चाहिए। यह संघर्ष राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आस्थाओं के बीच इतनी शक्ति लेकर आया कि इसने मणिपुरी भाषा की कविता के इतिहास में नया पृष्ठ खोला। इसी सन्दर्भ में इ.नीलकान्त सिंह और लाइश्रम सोमरेन्द्र सिंह जैसे कवि सामने आए, जिन्होंने मणिपुरी कविता में नए परिवर्तन की सूचना दी। "उन शैलियों को नकारा गया जिनमॆं बँधकर शब्द किसी राजा के मुकुट के चमकते हुए मोती तो हो जाते हैं किन्तु उनसे प्राणवत्ता की आशा नहीं की जा सकती। अब कविता ने रचना की उन शैलियों को अपनाया, जिनके सहारे वह चारॊं ओर से दबाव डालने वाली परिस्थितियों से घिरे मनुष्य का सही चित्र खींच सके। "सन्धिकालिन कवियों के साथ आधुनिक कविता की जो यात्रा शुरू हुई,वह सन पचास के कुछ बाद ही एक स्वतंत्र अस्तित्व वाली काव्यधारा बन गई। लाईश्रम सोमरेन्द्र सिंह ऐसे कवि सिद्ध हुए, जिन्होंने आधुनिकता से प्रबद्ध होकर अपने संधिकालीन कवि साथी ई.नीलकान्त सिंह का साथ छोड़ दिया और आधुनिक कविता के मुख्य पुरुष हो गए। उन्होंने अपनी ‘लैलाङबा’ कविता से सन्धिकाल में काव्य-परिवर्तन की सूचना दी और वे आधुनिक मनुष्य के जीवन को हानि पहुँचानेवाली दुरभिसंधियों पर चोट करने में जुट गए। आधुनिक कविता की इस यात्रा में राजकुमार मधुवीर, युमलेम्बम इबोमचा सिंह, काङ्जम पदमकुमार, खुमनथेम प्रकाश सिंह, एलाङ बम दिनमणि सिंह, एन. ज्योतिरिन्द्र लुवाङ, रंजीत डब्ल्यू, काङ्जम इबोहल सिंह, इबेमपिशक, हुइद्रोम राधाकान्त, राजकुमार भुवनसना और कयामुद्दीन पुखीमयुम आदि कवियों ने अपनी काव्य-कला का विकास किया।"


...........क्रमशः
प्रस्तुति सहयोग : चंद्र मौलेश्वर प्रसाद


2 comments:

  1. युद्ध कथित रूप से होते हैं जीवन मूल्यों की रक्षा के लिए.
    लेकिन सिद्ध होते हैं जीवन मूल्यों की हत्या का विनाशकारी उद्योग भर!

    ReplyDelete

आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

Comments system

Disqus Shortname