अब अगर आलोक तोमर को यह कविता न लगे तो




अब अगर आलोक तोमर को यह कविता न लगे तो कोई क्या करे




आज कुछ घंटे पूर्व हिन्दी भारत याहू समूह पर आलोक तोमर जी ने अपनी एक कविता सदस्यों से बांटी और भेजते हुए अपनी विनम्रता में, ऊपर यह लिखा कि "अब अगर आलोक तोमर को यह कविता लगे तो कोई क्या करे "मुझे आश्चर्य हुआ कि इतनी बढ़िया कविता लिख कर आलोक जी यह विनम्रता बरत कर ठीक नहीं कर रहे हैं। सो, उस कविता को यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ आप सभी निश्चय करें कि आलोक जी वास्तव में कवि हैं ना!!

आलोक जी का परिचय तो राजनीति में रूचि रखने वाले सभी लोग बढ़िया से जानते ही होंगे , जो न जानते हों वे

परिचय यहाँ देखें

भाग -

भाग -








पराजय
का उत्सव गीत
( पता भी नहीं ये कविता है भी या नहीं)

- आलोक तोमर








मैं अचानक हार जाता हूँ
और तुमसे हारने का
एक, चुप
उत्सव मनाता हूँ



गुदगुदाता है यूँ तुमसे हारना
हार कर
खुद से उलझना
और फिर
भीगे पलों में
चंद्रमा की साक्षी में
किलक बतियाना
या तो सपना है
है या हकीकत
नहीं कोई दाम
न कोई कीमत



अपने अन्दर की नदी में
बिना तैरे
जिन तटों को कभी देखा ही नहीं
जिन द्वीप-टापू को नहीं जाना
हारने की ही शक्ति लेकर
नदी की हर लहर से सुलझ कर
तैरता हूँ
पार जाता हूँ
मैं अचानक हार जाता हूँ
और
तुमसे हारने का
एक, चुप
उत्सव मनाता हूँ






9 comments:

  1. बाप रे इतनी अच्‍छी तो है किसको बुरी लगी मेरा तो मन खुश हो गया बहुत ही अच्‍छी कविता है

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  2. अपनी ही रचना के प्रति इतना संशय क्यों ? इतनी सुन्दर पंक्तियों को पढ़ने के बाद कहीं से भी नहीं लगता कि यह कविता नहीं है। बहुत सुन्दर और मन को छूने वाली इस छोटी-सी कविता के लिए बधाई !

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  3. आलोक जी का यह नया रूप दिखाने के लिए डॉ. कविता वाचक्नवी को धन्यवाद।

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  4. ऐसा भी होता है क्या? कि लिखने की समझ हो म समझने की नहीं.. :) आलोक जी के साथ यही हुआ है.

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  5. kavi aalok tomar ka nai vidhaa me swagat .halaki mai kavita samjh nahi pata hu.

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  6. अच्छे रचनाकार अपने ही रचनाओं की सम्पूर्णता पर संशय करते हैं, यह तो नम्रता का द्योतक है. अच्छी कविता है.

    तोमर जी को नमन है और आपको धन्यवाद.

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  7. Kavita ji, kavita kafi prabhavit karti hai...ek aur duvidha hai...aapka mail chahiye....!!

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  8. hindi sahitya men kavita knam par aisa bahut hua hai ki jo kavita nahin thi use hi kavita ke roop men pratishthitiya gaya alok tomar jaise k se samarth rachanakar ko hardik badhai aur unaki vinamrata men chhipe vyang ko sadhuvad

    suresh yadav i














    i

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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