मणिपुरी कविता : मेरी दृष्टि में



गतांक से आगे


मणिपुरी कविता :
मेरी दृष्टि में
- डॉ. देवराज
(२१)


द्वितीय समरोत्तर मणिपुरी कविता: एक दृष्टि
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विश्व युद्ध के दौरान मणिपुर वासियों में एक अजब सी दुविधा थी। एक ओर तो वे अंग्रेज़ों के विरुद्ध स्वतंत्रता की लडा़ई लड रहे थे तो दूसरी ओर अंग्रेज़ी सेना के साथ विश्व युद्ध में भाग ले रहे थे! इसी कशमकश को डॉ। देवराज ने यूँ बयान किया:"द्वितीय विश्व युद्ध का एक हिस्सा मणिपुर की भूमि पर लडा़ गया। उस युद्ध के अनेक प्रत्यक्षदर्शी अभी भी जीवित हैं और वे उस समय के लोमहर्षक वर्णन सुनाते हैं। इम्फ़ाल निवासी दूर-दूर गाँवों की ओर भाग गये थे। युद्ध समाप्ति पर जब लोग अपने घरों को लौटे तो उनका बहुत कुछ नष्ट हो चुका था। फ़िर से उन्हें अपने को व्यवस्थित करने में लम्बा समय लगा। "विश्वयुद्ध लड़ने वाले देशों को मित्र-राष्ट्र और शत्रु-राष्ट्र कहा गया था। मणिपुर में युद्ध करनेवाला मित्र-राष्ट्र ब्रिटेन था और शत्रु-राष्ट्र जापान। अब ज़रा मणिपुर के सन्दर्भ में इन देशों की स्थिति को देखा जाए। ब्रिटेन, जिसे मित्र राष्ट्र कहा गया [यह शब्द ब्रिटेन ने इसे अपने लिए गढा़ और वह न्याय के लिए फासीवाद के विरुद्ध दूसरे देशों का अगुआ बन गया], मणिपुर की सम्प्रभुता का विनाशक था। इस कारण मणिपुर की आम जनता अपने मन में अंग्रेज़ों के विरुद्ध घृणा रखती थी। अतः ब्रिटेन से उसका कोई मानसिक लगाव नहीं था। उधर जापान, जिसे शत्रु देश घोषित किया गया था, सुभाषचन्द्र बोस के भारतीय स्वतन्त्रता संघर्ष का सबसे बडा़ सहायक था। सुभाषचन्द्र बोस, भारतीय की अंग्रेज़ों से मुक्ति के लिए, स-शस्त्र संघर्ष कर रहे थे और माणिपुर की जनता उस संघर्ष के द्वारा अंग्रेजी साम्राज्यवाद से अपनी मुक्ति भी देख रही थी। यदि उस समय जापान पर बमबारी न की जाती और सुभाष अंग्रेज़ों के विरुद्ध युद्ध जीत जाते तो सबसे पहले मणिपुर राज्य ही गुलामी से मुक्त होता। इस स्थिति में यहाँ की जनता किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई; क्योंकि उसके लिए एक ओर ब्रिटेन था, जिसे केवल गांधीजी के आग्रह पर सारे भारत ने मित्र राष्ट्र माना था। दूसरी ओर जापान था, जो भारतीय स्वतन्त्रता के लिए लड़ रहा था, किन्तु जिसे शत्रु राष्ट्र की कोटि में रखा गया था और फासीवाद का हिमायती देश माना गया था। ऐसे मोड़ पर मणिपुर की आम जनता की शारीरिक और मानसिक किसी भी स्तर पर युद्ध में भागीदारी नहीं रही।"
....क्रमशः



प्रस्तुति सहयोग : चंद्र मौलेश्वर प्रसाद


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