बात बिगड़ेगी अगर बात शुरू न होगी




बात बिगड़ेगी अगर बात शुरू न होगी

डॉ. वेदप्रताप वैदिक



पहले किलिनोचई, फि एलीफेंट पास और अब जाफना ! अब लिट्टे के पास रह क्या गया है ? उसके सारे गढ़ गिर गए हैं। अब वन्नी के जंगलों के अलावा उसका कोई ठौर नहीं बचा है। उन जंगलों में भी वह कितने दिन छुपा रहेगा। मौत ने उसे चारों तरफ से घेर लिया है। लाखों तमिल लोग अपने-अपने गांव और कस्बे खाली करके भाग रहे हैं। लिट्टे के सैनिक उन्हें भागने नहीं दे रहे हैं। उनका इस्तेमाल वे कवच की तरह कर रहे हैं। लिट्टे के नेता खुद प्रभाकरन का कुछ पता नहीं। अंदेशा है कि वह भाग खड़ा होगा। उसकी जान के लाले पड़ गए हैं। भारत ने माँग की है कि अगर प्रभाकरन पकड़ा जाए तो उसे भारत के हवाले किया जाए। वह राजीव गाँधी की हत्या का मुख्य दोषी है। लगता नहीं कि प्रभाकरन पकड़ा जाएगा। पकड़े जाने की बजाय वह मरना पसंद करेगा। वह भागे या मरे, अब यह निश्चित है कि वह श्रीलंका की तमिल राजनीति का सूत्रधार नहीं रह पाएगा।


प्रभाकरन के अभाव में श्रीलंका के तमिलों के हितों की रक्षा अब कौन करेगा ? तमिलों के बड़े-बड़े नेताओं को तो लिट्टे ने ही मार गिराया। अब अमृतलिंगम और तिरूचेल्वम जैसे नेता कहाँ हैं ? फिर भी तमिलों की पार्टियों और संगठनों को आपस में मिलकर सामूहिक मोर्चा बनाना होगा। यदि इस मौके पर तमिल लोग एक नहीं हुए तो श्रीलंका की गुत्थी पहले से भी ज्यादा उलझ जाएगी। राष्ट्रपति महिंद राजपक्ष का पलड़ा इतना भारी होता जा रहा है कि वे तमिलों की जायज मांगों को भी दरकिनार कर सकते हैं। वे स्वयं सिंहल अतिवाद के प्रतिनिधि रहे हैं। इसके अलावा मई 2008 के प्रांतीय चुनाव में उन्होंने तमिल क्षेत्र में अपनी सरकार बनाकर नया आत्म-विश्वास अर्जित किया है। प्रभाकरन के पुराने साथी करूणा से हाथ मिलाकर उन्होंने लिट्टे की कमर तोड़ दी है। अब जबकि लिट्टे के 8000 जवान मारे गए हैं और सिर्फ डेढ़-दो हजार जवान अपनी जान बचाने को छिपते फिर रहे हैं, राजपक्ष संपूर्ण श्रीलंका के एकछत्र सम्राट की तरह उभरने लगेंगे। फरवरी के दो प्रांतीय चुनावों और अप्रैल के आम चुनाव में वे प्रचंड बहुमत से जीतेंगे, इसमें जरा भी संदेह नहीं है। डर यही है कि वे अपनी मनमानी न करने लगें। उनका रवैया पूर्व प्रधानमंत्री प्रेमदास की तरह अतिवादी न हो जाए। इस मौके पर भारतीय विदेश सचिव शिवशंकर मेनन का कोलंबो पहुँचना बहुत ही सही है।

राजपक्ष और श्रीलंका के अन्य सिंहल नेता यह तो मानेंगे कि भारत ने उनके मार्ग में कोई रोड़े नहीं अटकाए। तमिल उग्रवादियों के विरूद्ध जोरदार सैन्य-अभियान चलाने के पहले सिंहल नेताओं के मन में कुछ घबराहट जरूर थी। उन्हें डर था कि भारत की तमिल पार्टियाँ दिल्ली सरकार पर जबर्दस्त दबाव डालेंगी। वे उनका सैन्य-अभियान रूकवाने की कोशिश करेंगी। उनका डर सही था। तमिल पार्टियों ने ही नहीं, तमिलनाडु सरकार ने भी केंद्र सरकार को दबाने की भरसक कोशिश की। केंद्र की गठबंधन सरकार डर सकती थी, क्योंकि उसमें तमिलनाडु की पार्टियाँ भी शामिल हैं लेकिन भारत सरकार ने श्रीलंका में हस्तक्षेप करना उचित नहीं समझा। इसी संयत नीति का परिणाम है कि भारत के विदेश सचिव मेनन का कोलंबो में स्वागत हो रहा है। राजपक्ष-सरकार तथा श्रीलंका की सिंहल जनता को पूर्ण आश्वस्ति है कि भारत तमिल ईलम का समर्थन नहीं करता। वह श्रीलंका में 1947 को दोहराना नहीं चाहता। लेकिन भारत यह भी नहीं चाहता कि श्रीलंका के तमिलों के साथ अन्याय होता रहे। यदि श्रीलंका के तमिल वहाँ दूसरे दर्जे के नागरिक बनकर रहेंगे तो उसका कुछ दोष भारत के सिर जरूर आएगा।


श्रीलंका के सिंहल नेताओं और बौद्ध महानायकों के दिमाग से यह हव्वा हटाना बेहद जरूरी है कि शक्तियों का विकेंद्रीकरण करने से श्रीलंका का विघटन हो जाएगा। श्रीलंका-जैसा विविधतामय देश ग्रेट-ब्रिटेन की तरह केंद्रीकृत व्यवस्था के अंतर्गत तो नहीं चल सकता। यह बात समस्त सिंहल नेता समझते हैं लेकिन उनके दिल में भारत के तमिलनाडु की दहशत बैठी हुई है। उन्हें लगता है कि उत्तर और पूर्व के तमिल प्रांतों को एक कर दिया गया और उन्हें भारत के प्रांतों की तरह काफी अधिकार दे दिए गए तो उनके मुख्यमंत्रियों को प्रधानमंत्री बनने में कोई देर नहीं लगेगी, क्योंकि उनकी पीठ पर भारत के तमिलनाडु का हाथ होगा। यह सिंहल नेताओं की शुद्ध गलतफहमी है। हमारे तमिलों की सहानुभूति श्रीलंका के तमिलों के साथ हो, यह स्वाभाविक है लेकिन क्या ऐसा कभी हो सकता है कि हमारे करोड़ों तमिल तो `प्रांत' के रूप में रहें और श्रीलंका के 20-25 लाख तमिल `राष्ट्र' के रूप में रहें ? भारतीय तमिल कभी नहीं चाहेंगे कि श्रीलंका के तमिल उनसे एक बालिश्त ऊपर दिखें। एक-दूसरे के सुख-दुख में काम आना एक बात है और दूसरे को अपने सिर पर बिठाना बिल्कुल दूसरी बात है। इसीलिए प्रभाकरन के तमिल ईलम (स्वतंत्र तमिल राष्ट्र) का समर्थन करनेवाले लोग तमिलनाडु में बहुत कम हैं। इसके अलावा राजीव गाँधी की हत्या करके प्रभाकरन ने `ईलम' की जड़ों को मट्ठा पिला दिया है। ईलम के प्रति जो थोड़ी-बहुत सुगबुगाहट पहले थी, वह भी खत्म हो गई है। खुद श्रीलंका के तमिलों में `ईलम' के प्रति कौनसा उत्साह है ? अगर वे `ईलम' के समर्थक होते तो प्रभाकरन को बंदूक क्यों उठानी पड़ती ? वे मतदान और सत्याग्रह के जरिए अब तक ईलम बना डालते। अगर हिंसा से ईलम बनता कभी नजर आया तो भारत उसका सक्रिय विरोध करेगा, क्योंकि यह विष-बीज भारत को ही भंग कर सकता है। सैद्धांतिक तौर पर भारत समस्त अलगाववादी तत्वों के विरूद्ध है। विदेश सचिव मेनन को ये तर्क श्रीलंका के सिंहल-समाज के गले उतारने होंगे, क्योंकि वे अभी तक यह नहीं भूले हैं कि भारत-सरकार ने ही श्रीलंका के हिंसक तमिल संगठनों को भरपूर प्रश्रय दिया था।


ऐसा नहीं है कि राष्ट्रपति महिंद राजपक्ष अपनी भावी समस्याओं से बेखबर हैं। उन्होंने पहले से एक सर्वदलीय प्रतिनिधि कमेटी बना रखी है। इस कमेटी का उद्देश्य तमिलों की मांग पर विचार करना ही है। मुश्किल यह है कि इस कमेटी में सत्तारूढ़ दल और तमिल राष्ट्रीय गठबंधन के चारों दल तो हैं लेकिन श्रीलंका के प्रमुख विरोधी दल `युनाइटेड नेशनल पार्टी' और ÷जातीय विमुक्ति पेरामून' ने उसका बहिष्कार कर रखा है। `हेला उरूमया' के भिक्खु नेता भी इसके प्रति उत्साहित नहीं हैं। सभी सिंहली संगठन कहते है कि पहले लिट्टे का समूलोच्छेद हो, तभी कुछ बात हो सकती है। यह शर्त अव्यावहरिक है। हो सकता है कि वन्नी के जंगलों के लिट्टे अभी एक-दो साल तक और सांस लेती रहे। तब तक बातचीत बंद क्यों रहे ? इस 15 दलीय कमेटी में सर्वसम्मति से कुछ ठोस निर्णय करने का समय बस यही है। यदि अब भी बातचीत शुरू नहीं होगी तो बात बिगड़ जाएगी। प्रभाकरन को ना पसंद करनेवाली तमिल जनता का विश्वास भी समूचे श्रीलंका में से उठ जाएगा। ऐसा न हो, यह देखना भारत और श्रीलंका दोनों सरकारों का कर्त्तव्य है।

(लेखक, दक्षिण एशियाई राजनीति के विशेषज्ञ हैं)



2 comments:

  1. डॉ वेद प्रताप जी ..विद्वान लेखक पत्रकार विचारक हैं ..महत्वपूर्ण जानकारी दी उन्होंने लेख के माध्यम से ,सहेजने लायक है ..एक बात क्या प्रभाकरण को जोकि राजीव गांधी का मुख्य हत्यारा है उसे भारत को सौपने मैं मुश्किलें पेश होगी यदि पकडा जाता है ...

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  2. आदरणिय वैदिक जी, आपकी लेखनी से बिल्कुल सटीक बात लिखी गई है, इस १५ दलीय कमेटी को तुरंत बात चीत शुरु करनी चाहिये.
    और अधिक विलम्ब वाकई बात को बिगाडेगा, इस स्थिति मे अब बात चित का महत्व भी बढ गया है.

    बहुत आभार आपका, इस बेबाक विशलेषण के लिये.

    रामराम.

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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