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ग्रीड इज गुड ?



तीन खतरनाक संस्थाएँ
राजकिशोर




हर संकट कुछ न कुछ सिखाता है। यह सीखनेवाले पर निर्भर है कि वह क्या सीखता है। एक ही घटना से अलग-अलग सबक सीखा जा सकता है। वर्तमान आर्थिक संकट से अमेरिका ने यह सीखा है कि सरकारी पैसे उड़ेल कर संकटग्रस्त संस्थाओं को बचाओ। भारत सरकार का खजाना उतना बड़ा नहीं है। इसलिए वह नोट पर नोट नहीं उड़ेल पा रही है। उसकी सारी कोशिश यह है कि ब्याज की दर घटा कर बाजार में अधिक से अधिक रुपया मुहैया कराया जाए। लेकिन न अमेरिका की हालत सुधर रही है, न भारत की। मंदी और उसका मनोविज्ञान दोनों के सिर पर हावी है। इससे यह सवाल पैदा होता है कि इस आर्थिक मंदी से क्या कुछ अलग भी सीखा जा सकता है। हमारा उत्तर है, हाँ।


अगर किसी के सिर में दर्द है, तो दर्द का इलाज करना चाहिए। सिर को धड़ से अलग कर देना कोई समाधान नहीं है। लेकिन अगर यह साबित किया जा सके कि मानव शरीर में सिर की कोई उपयोगिता नहीं है और वह शरीर पर बोझ है, तब क्या करना चाहिए? जब यह भी साबित हो जाए कि सिर कुछ देता नहीं है, बल्कि उसमें बार-बार दर्द होता रहता है, तो सिर दर्द का इलाज कराने में कौन-सी बुद्धिमानी है? इससे तो अच्छा है कि बेकार, अनुपयोगी और परेशानी पैदा करनेवाले सिर से ही छुटकारा पा लिया जाए। न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी।


आज की अर्थव्यवस्था में इस बेकार और मनहूस सिर की भूमिका कौन निभा रहा है? हमारा सोचा-समझा उत्तर है -- बैंकिंग, बीमा व्यवसाय और शेयर बाजार। ये तीनों ही खतरनाक संस्थाएँ हैं। जिस अर्थव्यवस्था में ये संस्थाएँ रहेंगी, उसके समस्याग्रस्त होते रहने को कोई रोक नहीं सकता। दावा किया जा रहा है कि वर्तमान विश्वव्यापी आर्थिक संकट से भारत ज्यादा प्रभावित नहीं हुआ है, क्योंकि उसने अपनी अर्थव्यवस्था को पूरी तरह भूमंडलीकरण का अंग नहीं बनने दिया है। यह सफेद झूठ है। अगर हम भूमंडलीकरण की प्रक्रिया से अपेक्षाकृत मुक्त हैं, तो हमारे यहाँ मंदी क्यों आई? सिर्फ डॉलर का पलायन इसका कारण नहीं हो सकता। फिर ये डॉलर हमारे शेयर बाजार में लगे हुए थे, जो जुआघर का आधुनिक पर्याय है। शेयरों के भाव गिरने से टिकाऊ उपभोक्ता सामान के व्यापार में गिरावट क्यों आनी चाहिए? सभी जानते हैं कि शेयरों का बाजार मूल्य उनका वास्तविक मूल्य नहीं होता। नहीं तो शेयरों की कीमतों में इतने बड़े पैमाने पर उतार-चढ़ाव नहीं आ सकता।


सचाई यह है कि भारत की तीन-चौथाई जनता इन तीनों खतरनाक संस्थाओं -- बैंक, बीमा और शेयर बाजार -- से बाहर है। इसलिए इन तीन क्षेत्रों में अगर संकट आता है, तो साधारण भारतीयों का साधारण जीवन प्रभावित नहीं होता। यहाँ तक कि भारत में जिन लोगों की नौकरियाँ जा रही हैं, उनमें भी ज्यादातर मध्य वर्ग के ही लोग हैं। कल अगर साधारण लोगों की नौकरियाँ भी जाने लगीं, तो संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों की संख्या इतनी कम है कि उससे देश की बुनियादी अर्थव्यवस्था प्रभावित नहीं होनेवाली है। हाँ, यह जरूर होगा कि बैंक, बीमा और शेयर बाजार के चक्र में फंसे हुए लोग अपने संकट को साधारण लोगों की तरफ अग्रसरित कर देंगे और गेहूँ के साथ घुन भी पिसेगा। वैसे, सच एकदम उलटा है : घुन के साथ गेहूँ भी पिसेगा। गेहूँ की रक्षा हम तभी कर सकेंगे जब घुन से छुटकारा पा सकें।


जिन्हें यहाँ खतरनाक संस्थाएँ कहा जा रहा है, उन तीनों के ही द्वारा कोई वास्तविक उत्पादन नहीं किया जाता। यही कारण है कि जब आधुनिक पूंजीवाद नहीं आया था, तब इनमें से किसी भी संस्था का अस्तित्व तक नहीं था। बैंक नहीं थे, साहूकार थे। पर वे ब्याज पर अपना पैसा चलाते थे -- किसी और का पैसा नहीं। बल्कि जरूरत पड़ने पर वे राजा-महाराजाओं और जमींदारों के अपने पास से पैसा उधार देते थे। आज के बैंकर अपना पैसा नहीं के बराबर लगाते हैं। वे शेयर जारी कर जनता से अपनी पूँजी जमा करते हैं और जरूरत पड़ने पर केंद्रीय बैंक यानी सरकार से उधार लेते हैं। लेकिन उनकी कमाई उनकी अपनी होती है, जिसका एक मामूली हिस्सा ही लाभांश के रूप में वितरित किया जाता है। बाकी कमाई बैंकों के संचालक और बाबू अपनी ऐयाशियों के लिए हड़प लेते हैं। पुराना साहूकार यही काम बहुत छोटे पैमाने पर करता था। इसलिए वह अर्थव्यवस्था पर बोझ नहीं था। आज का साहूकार शाखा पर शाखा खोलता जा रहा है, इसलिए उसे अपना कुनबा चलाने के लिए जनता की कमाई का बड़ा हिस्सा चाहिए। पहले वे लोग सुखी माने जाते थे जिन्हें साहूकार का मुँह देखने की जरूरत नहीं पड़ती थी। आज उसे बेहद पिछड़ा माना जाएगा जिसका किसी बैंक में खाता नहीं है या जिसने बैंक से लोन नहीं लिया है।


बीमा व्यवसाय का किस्सा कुछ अलग है, पर यहाँ भी कोई उत्पादन नहीं होता और मुफ्त की प्रचुर कमाई होती है। बीमा कंपनी भी अपने पैसे नहीं चलती, बीमाकृत व्यक्तियों के योगदान से चलती है। वह हर साल जितना उगाहती है, उससे बहुत कम का भुगतान करती है। इस तरह उसके पास पैसा जमा होता जाता है। यह हराम की कमाई है, जिस पर कोई सभ्य व्यक्ति गर्व नहीं कर सकता। फिर अमेरिका की बहुत बड़ी बीमा कंपनी एआईजी क्यों लड़खड़ाने लगी? इसका कारण वही है जो अमेरिकी बैंकों की लड़खड़ाहट का है। इस बीमारी का नाम है, लालच। पूँजीवाद के समर्थन में अभी हाल तक कहा जाता था कि ग्रीड इज गुड यानी लालच अच्छी चीज है। आज पूरी दुनिया इस सीख का नजारा देख रही है। अमेरिकी बैंकों ने लालच की गिरफ्त में आ कर ऐसे लोगों को लोन दिया जिनके पास चुकाने की सामर्थ्य नहीं थी और बीमा कंपनियों ने ऐसी संपत्तियों का बीमा किया जिनकी कीमत स्थिर थी। इसे ही सब-प्राइम संकट कहा जाता है यानी हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे। भारत के बैंक और बीमा संस्थान अभी अमेरिकी स्तर के लालच का शिकार नहीं हुए हैं। इसलिए वे बहती गंगा में डूबने से बचे हुए हैं। लेकिन भविष्य की गारंटी कौन ले सकता है? अगर लालच ही एकमात्र प्रेरक शक्ति रह गई है, तो इस समाज का खुदा ही मालिक है।


फिर भारत के बैंक संकट में क्यों पड़े? इसका एक कारण यह है कि उन्होंने काफी पैसा विदेशी, खासकर, अमेरिकी वित्तीय संस्थानों में निवेश कर रखा था। जब इन संस्थानों की संपत्तियों का मूल्य गिरने लगा, तो हमारे बैंक भी गरीब होने लगे। दूसरी ओर, शेयर बाजार में गिरावट से भी संपत्तियों का मूल्य गिरा तथा अंबानी, टाटा आदि की कुल आर्थिक वकत में भारी गिरावट आई। बैंकों ने भी शेयरों में रुपया लगा रखा था, सो उन्हें भी घाटा उठना पड़ा। यहाँ यह पूछना प्रासंगिक होगा कि बैंकों ने अपना रुपया बाहर क्यों लगा रखा था। जवाब यह है कि वे ब्याज की जिस दर पर ग्राहकों का पैसा जमा करते हैं, उससे ऊँची दर पर अपना पैसा नहीं खटाएँ, तो उनकी दुकान बंद नहीं हो जाएगी? पहले के साहूकार सिर्फ साहूकारी करते थे। इसलिए वे कभी आर्थिक संकट में नहीं पड़ते थे। आज के साहूकार रुपया जमा करने और लोन देने के साथ-साथ व्यापार भी करते हैं। वे रुपए से रुपया पैदा करने की कोशिश करते हैं। कौन नहीं जानता कि व्यापार में हमेशा जोखिम होता है? तब तो और भी ज्यादा जब व्यापार किसी ठोस चीज का न हो कर मुद्रा नाम की अत्यंत चंचल चीज का हो। रहीम के एक दोहे में कहा गया है कि चूंकि लक्ष्मी जैसी युवा स्त्री का विवाह विष्णु जैसे पुरुष पुरातन से हुआ है, जो उसे किसी भी तरह संतृप्त नहीं कर सकता, तो वह 'क्यों न चंचला होय?' आज की लक्ष्मी तो वार वनिताओं की तरह रोज जिस-तिस से ब्याह रचाती रहती है, अत: वह तो एक जगह या एक पुरुष के साथ स्थिर हो कर बैठ ही नहीं सकती।


इसका सबसे मजेदार नजारा शेयर बाजार में देखा जा सकता है। यह वह बाजार है जहाँ शेयरों की खरीद-बिक्री होती है। हर शेयर बार-बार खरीदा जाता है और बार-बार बेचा जाता है। कई बार एक ही दिन में उसकी खरीद-बिक्री कई-कई बार हो जाती है। दरअसल, शेयर बाजार के खिलाड़ी शेयर खरीदते ही इसलिए हैं कि उन्हें अच्छी कीमत पर बेचा जा सके। यहां विवाह संस्था की स्थिरता नहीं है, उच्छृंखल भोग-विलास की लालसा है, जिसमें कोई किसी का सच्चा मित्र नहीं होता और सभी एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी होते हैं। गाँधी जी के शब्दों में यह 'बेसवा बाजार' है। विडंबना यह है कि शेयर बाजार में भी कुछ पैदा नहीं होता -- सिर्फ जुआ खेला जाता है। जुए की महिमा से हम लोग युधिष्ठिर के समय से ही वाकिफ हैं। आज की खूबी यह है कि यह लत नहीं रही, एक प्रतिष्ठित व्यवसाय बन गई है। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है कि शेयर बाजार से रुपया कैसे खींचे। अखबारों में और टीवी पर रोज बताया जाता है कि कौन-सा शेयर कितना उछला और कितना लुढ़का -- साथ में यह एक्सपर्ट सलाह भी कि अपने शेयरों के साथ क्या करें। बहुत-से लोग तो सिर्फ यही जानने के लिए अखबार खोलते हैं और टीवी के सामने मुँह बाए बैठे रहते हैं।


हम तो यह मानते हैं कि शेयर बाजार की संस्था पूँजीवाद के विकास की दृष्टि से भी खतरनाक है। पूँजीवाद की स्थिरता और वास्तविक प्रगति के लिए यह आवश्यक है कि साबुन की खरीद-बिक्री की जाए -- झाग की नहीं। शेयर बाजार मूलत: झाग का व्यापार है। इसे ही बुलबुले का फैलना और फूटना कहते हैं। पूँजीपति लाभ-होने के मामले में बहुत सतर्क होता है, पर शेयर बाजार में उसके पाँव स्थिर नहीं रह जाते। वह कूदने लगता है, भागने लगता है, उछलने लगता है, एक कदम आगे और एक कदम पीछे चलने लगता है, जिसका नतीजा यह होता है कि वह समय-समय पर औंधे मुँह गिर पड़ता है। शेयर बाजारों के दरवाजों पर हमेशा के लिए ताला लगा दिया जाए, तो पूँजीवाद को कुछ सुरक्षा ही मिलेगी। जिस किराएदार को रोज घर बदलना पड़े, उसके सुखी होने की गारंटी कौन ले सकता है?


तो बैंकिंग, बीमा और शेयर बाजार को खत्म कर देने से वाणिज्य-व्यापार का क्या होगा? इसका उत्तर कठिन नहीं है, पर संतोषजनक वैकल्पक व्यवस्था करने के लिए हमें एक ऐसे समाज की कल्पना करनी होगी, जिसमें न तो सरकार जनता की दुश्मन हो और न उद्योग-धंधा चलानेवाले ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाने की ख्वाहिश रखते हों। शेयर बाजार के विकल्प की तो जरूरत ही नहीं है। बैंकिग और बीमा को व्यवसाय न बना कर जन सेवा का माध्यम बनाया जाना चाहिए। दरअसल, बीमा की भी कोई जरूरत नहीं है, अगर सरकार या उसके द्वारा बनाई गई कोई संस्था सबकी आर्थिक सुरक्षा की जिम्मेदारी ले ले। जहाँ तक बैंकों का सवाल है, उन्हें सिर्फ रुपए-पैसे की सुरक्षा का काम करना चाहिए और इसके लिए ग्राहकों से प्रशासनिक शुल्क लेना चाहिए। मुद्दे की सबसे बड़ी बात यह है कि इन तीन संस्थाओं के रहने से जो लाखों लोग फालतू के अनुत्पादक कामों में लगे रहते हैं, वे चिड़ियाखाने से मुक्त होने के बाद अन्न, कपड़ा और इस्पात पैदा करेंगे, बच्चों को पदाएँगे और सड़कों तथा गलियों को साफ-सुथरा रखेंगे। तब उन्हें भी यह संतोष होगा कि हम कुछ सार्थक काम कर रहे हैं। दिन को उनका चेहरा खिला रहेगा और रात को नींद भी अच्छी आएगी।

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ग्रीड इज गुड ? ग्रीड इज गुड ? Reviewed by Kavita Vachaknavee on Wednesday, January 07, 2009 Rating: 5

5 comments:

  1. विस्तृत विवरण , अच्छा लगा
    - विजय

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  2. सच है.....पर आज की व्यवस्था ही ऐसी हो गयी है..

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  3. जानकारीपूर्ण और आँखें खोलने वाली पोस्ट। धन्यवाद।

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  4. जुआ तो जुआ ही है, अब उसे कोई भी नाम देदो,
    भगवान का शुकर हम ने कभी लालच नही किया.
    बहुत अच्छा लगा आप का यह लेख
    धन्यवाद

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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