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पुरु, गोडसे और कसाब - समान हैं ?

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पुरु
, गोडसे और कसाब : सम्यकद्रष्टा हम


- कविता वाचक्नवी






अभी भारत पर हुए आतंकी हमले के बाद जीवित पकड़े गए आतंकी पर अभियोग न्यायिक प्रक्रिया का प्राम्भ भारत में होने जा रहा है| चैनलों की हर चीज को उत्सव की तरह मनाने की परम्परा के चलते आज लगातार बहस गर्म रही कि कसाब को अपना पक्ष रखने या कहें कि न्यायिक सहायता पाने का अधिकार है या नहीं, पैरवी का अधिकार मिलना चाहिए या नहीं|

भारत में क्योंकि प्रत्येक नागरिक को न्यायिक मामलों में कानूनगो से कानूनी सहायता प्राप्त करने का मौलिक अधिकार है, इसलिए यह भी कहा जाना स्वाभाविक है कि क्या हमें अपने क़ानून को अपमानित करने का अधिकार है?

दूसरी और मुम्बई के वकीलों ने विधिक सहायता देने से पूरी तरह मना कर दिया, विधिक सहायता पैनल ने भी हाथ खड़े कर दिए और भी इसी प्रकार के विरोध के स्वर आए, रहे हैं|

अशोक सरावगी को लिखित बयान देकर स्पष्टीकरण देना पड़ा -

कुछ ग़लतफहमी हुई है. मैंने कहा था कि अगर किसी वकील की मौजूदगी के बिना अदालत की कार्रवाई पूरी नहीं होती हो, तो ज़रूरत पड़ने पर मैं स्वयं पेश होने के लिए तैयार हूँ ताकि मुक़दमे में रुकावट न आए और कसाब को कड़ी से कड़ी सज़ा मिले
अशोक सरोगी, प्रसिद्ध वकील


दूसरी ओर

मुंबई बार एसोसिएशन के फ़ैसले के बावजूद पूर्व अतिरिक्त एडवोकेट जनरल पी जनार्दन ने घोषणा की है कि अगर पाकिस्तान उच्चायुक्त उनसे संपर्क करेगा, तो वे कसाब का मुक़दमा लड़ने को तैयार हैं.
बी.बी.सी.


हिन्दी ब्लॉगजगत में विधिविशेषज्ञ दिनेशराय द्विवेदी भी इसी पक्ष में लिखते हैं -

चलिए हम उसे मृत्यु दंड दे ही दें, यदि इस से आतंकवाद या उस के विरुद्ध लड़ाई का अंत हो जाए। आज कसाब भारत का अपराधी तो है ही। लेकिन उस से अधिक और भी बहुत कुछ है। वह इस बात का सबूत भी है कि आतंकवाद किस तरह पाकिस्तान की धरती, पाकिस्तान के साधनों और पाकिस्तान के लोगों का उपयोग कर रहा है। वह आतंकवाद की जड़ों तक पहुँचने का रास्ता भी है। वह आतंकवाद के विरुद्ध हमारे संघर्ष में एक मार्गप्रदर्शक भी है। वह हमारा हथियार बन चुका है। ऐसी अवस्था में हमारे इस सबूत, रास्ते, मार्गप्रदर्शक और हथियार को सहेज रखने की जिम्मेदारी भी हमारी है।
.....
मैं सोचता हूँ कि भारत इतना कमजोर नहीं कि वह इतना भी न कर सके, और अपना और अपने न्याय का ही सम्मान न बचा सके। कोई भी पैरोकार कसाब को उस के अपराध का दंड पाने से नहीं बचा सकता। फिर हम क्यों उसे पैरवी का अधिकार नहीं देना चाहते? केवल भावनाओं में बह कर या फिर एक अतिवादी राजनीति का शिकार हो कर?




भावना, तर्क मर्यादा की बात पर पर जहाँ कुछ लोगों ने मर्यादा को महत्व देने की पैरवी की तो कुछ ने विधिक सहायता के लिए कानूनी तर्क भी दिए| पी. जनार्दन की घोषणा के बाद निरंतर विरोध प्रदर्शन आदि हो रहे हैंबहस चल रही है सभी अपने अपने मत दे रहे हैंकिंतु ऐसी घड़ी में कुछ सहज प्रश्न अपने आप से करने हमें अनिवार्य क्यों नहीं लगते?


जेठमलानी ने सीधी बातचीत में एक चैनल पर दो तीन तर्क दिए, कसाब को कानूनी सहायता दिए जाने के पक्ष में| एक बड़ा तर्क था कि जब गाँधी के हत्यारे (?) को कानूनी सहायता मिल सकती है, इन्दिरा के हत्यारे को कानूनी सहायता मिल सकती है या रजाकार मूवमेंट में कानूनी सहायता दी जा सकती है तो इसे क्यों नहीं |


इस पूरे प्रकरण में विधिक सहायता के पैरोकार जिन तर्कों का पक्ष ले रहे हैं, उन तर्कों की स्थिति ज़रा देखें -


)
- "गाँधी पर गोली चलाने वाले को अभियोगी बनाने पर भी उसे कानूनी सहायता दी गयी"


गधे लोग! इतना भी नहीं जानते कि गाँधी पर गोडसे द्वारा गोली चलाने के उस कार्य को भारतीय अस्मिता को बचाने व राष्ट्रीय हित की रक्षा प्रक्रिया में उठाए गए गए कदम के रूप में बड़ा समर्थन वाली विचारधारा के लोग इसी देश के वासी हैं, और गोडसे भारतीय थे, भारत की सुरक्षा हित और राष्ट्रीयता से प्रेरित होकर उन्होंने ऐसा कदम उठाया थाउस कदम के अच्छे या बुरे होने पर बहस हो सकती है, होती रही है, होगीकिंतु कोई भी सहज बुद्धि वाला गोडसे को आतंकी तो क्या राष्ट्रद्रोही भी नहीं प्रमाणित कर सकता. वह दो भिन्न भारतीय विचारधाराओं के टकराव का फल अवश्य माना जा सकता है, या अतिरेकी प्रतिक्रिया, या ऐसा ही कुछ और परन्तु कदापि राष्ट्रद्रोह नहीं कहा जा सकता


- दूसरे, ऐसा कहकर क्या हम गोडसे कसाब को एक बराबर तराजू पर नहीं तोल रहे हैं? ऐसा करने वाली निर्लज्जता पर क्या लिखूँ ? केवल धिक्कारा ही जा सकता है|


२)
- " इंदिरा के हत्यारों को वकील दिया गया"


अरे भई, इन्दिरा जी की हत्या भी भारत के ही एक वर्ग और विचारधारा द्वारा उन्हें भारतीय जनता के विरुद्ध होकर घात करने का परिणाम के रूप में आँकी गई थी। स्वर्णमंदिर के अतिक्रमण वाले मुद्दे पर तत्कालीन विघटनकारी तत्वों द्वारा इसे सिखों के पूजास्थल पर किया गया आक्रमण निरूपित करना इसके कारणों में निहित था। यद्यपि वह आक्रमण भारत के हित में उठाया गया इंदिरा जी का एक बड़ा महत्वपूर्ण व आवश्यक कदम था, आज काश कोई ऐसा दबंग नेता अस्तित्व में होता। इंदिरा जी के उस कदम की चर्चा के साथ इसे जोड़ने पर मामला बारीकी खो देता है। यहाँ बात इंदिरा जी की ह्त्या की न होकर हत्यारों के उद्देश, नागरिकता, व्यक्ति पर आक्रमण वर्सेज़ राष्ट्र पर आक्रमण की होनी चाहिए।


- इंदिरा जी भले ही प्रधानमंत्री थीं, किंतु वे राष्ट्र नहीं।


- इंदिरा जी व उनके हत्यारे, दोनों पक्ष भारतीय नागरिक थे, अत: दोनों पर भारतीय संविधान के प्रावधान लागू होते थे, होने चाहिए थें व हुए भी।


- इंदिराजी की ह्त्या और राष्ट्रद्रोह की बारीकी व फिर इसमें भी दूसरे देश द्वारा भारत पर आक्रमण की बारीकी व पेचीदगी को बड़ी सफाई से नजरंदाज किया जा रहा है। इसे ध्यान रखने की जरूत है।


- युद्ध यदि भौगोलिक सीमा पर लड़ा गया होता, तो सेना आक्रमणकारी शत्रु से / का क्या करती ?


- यहाँ एक पेचीदगी और है, वह यह कि यह आक्रमण संवैधानिक दृष्टि से भारत पर पाकिस्तान का आक्रमण नहीं है , क्योंकि ये आतंकवादी पाकिस्तानी सेना द्वारा विधिवत् किए जाने वाले सैनिक युद्ध का हिस्सा नहीं थे, न हैं| पाकिस्तान स्वयं स्वीकारता- कहता आ रहा है। अत: इनके प्रति युद्धबंदियों वाला वैधानिक व किंचित् मानवीय रवैय्या अपनाने -दिखाने का औचित्य ही नहीं बनता। ध्यान रखना चाहिए कि ये किन्ही दो देशों के बीच युद्ध के लिए वैधानिक रूप से नियुक्त किए गए अपने अपने देश के लिए बलिदान भावना लेकर जूझने वाले सैनिक नहीं हैं।इस प्रकरण में केवल भारत की ओर से नियुक्त किए गए कमांडो, पोलिस या सैनिक ही इस श्रेणी में आते हैं।


- भारतीय सेना, पुलिस, कमांडो व इनके विरूद्ध टक्कर लेने वाले नागरिकों के आत्मबल को क्या हम क्षति नहीं पहुँचाएँगे?


- पाकिस्तानी मीडिया ने स्वयं गत दिनों भारत को ऐसा लचर देश बताया है कि जो अपनी संसद पर आक्रमण करने वाले को अब तक पाल रहा है। ऐसे में इस लचर व्यवस्था द्वारा एक और अफजल को पालने का यह षड्यंत्र नहीं दिखाई देता? शहीदों के परिवारों के प्रति कितने अनुत्तरदायी हैं हम, इसे समझने की आवश्यकता दिखाई नहीं देती?


- जो लोग पेट में गोली खाकर बचाने वाले की दुहाई दे रहे हैं, वे उस बचाने वाले शहीद के बलिदान को दिग्भ्रमित कर रहे हैं। उसके बचाने का उद्देश्य इसे न्यायिक समानता या सहायता दिलाना नहीं था, अपितु जानकारियाँ जुटाना भर था। यहाँ कौन नहीं जानता कि जानकारियाँ जुटाने के लिए बचाव का वकील देने की अनिवार्यता नहीं होती है।


- जो लोग इसे न्यायिक सहायता का विरोध कर रहे हैं, वे ऐसा कदापि नहीं कह रहे कि बिना जाँच में सहयोग लिए इसे फांसी दे दी जाए। जितना व जैसा सहयोग सरकार, न्यायपालिका या संविधान को अपेक्षित है,वह बिना बचाव पक्ष के वकील रखे भी हो सकता है। उस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं।


- अब रही मर्यादा, भावना या मानवीयता की बात। ऐसी बातें बोलना भी किसी राष्ट्रप्रेमी को नहीं शोभता। जो ऐसा कह रहे हैं उनके परिवार पर एक बार हत्यारों की खुली छूट का प्रयोग करवा कर देखें, उनके घर में चोर, डाकू, लुटेरे,आक्रान्ता, बलात्कारी का तांडव उनके अपनों के साथ होने पर उनकी राय व उदारता जानी जाए। जिनके परिवार उजड़ गए हैं, उनकी पीडा तो जाने दीजिए, वे तो ऐसे लोगों के अपने थे ही नहीं, पर यह देश भी अवश्य आज तक उन लोगों ने अपने परिवार की तरह वास्तव में नहीं माना है। कहने - या बोलने की बात और है।


- क्या ऐसा करके हम भविष्य में सदा के लिए अपनी सेना और पुलिस का मनोबल नहीं तोड़ रहे हैं?


- क्या ऐसा दयालुतापूर्ण होने का नाटक करना छद्म रूप से आतंकवादियों को प्रश्रय देना नहीं है ?क्या उनके ग़लत, अनैतिक ,बर्बर , कामों को गति, बल व बढ़ावा देना नहीं है?


- जब इस देश में युवकों के लिए अनिवार्य सैनिक शिक्षा की आवश्यकता की बातें हो रही हैं, उसे रेखांकित किया जा रहा है, ऐसे में शहीदों की संतानें, संबन्धी या अन्य सामान्य परिवार के बच्चे अथवा युवक क्या सेना का अंग होना स्वेच्छा से स्वीकारेंगे?


- क्या यह न्यायिक सहायता भारतीय मनोबल को तोड़ने वाली नहीं है? वह भी ऐसे समय पर जब देश का आमआदमी पहली बार अपने किसी भी प्रकार के वर्ग चरित्र से उबर कर एक साथ इसके विरोध की प्रबल शक्ति के साथ उठ-जुड खड़ा हुआ है।


- क्या आप अपने नगर,मोहल्ले में इस अनथक विस्फोट, आतंक श्रृंखला का परिणाम व मृत्य झेलने को आगे भी इसी प्रकार अभिशप्त रहना चाहते हैं?


- अपनी माँ, बेटी, पत्नी, बहन से बलात्कार कर उनकी ह्त्या करने वाले के साथ आप कितनी मानवीयता बरते जाने के पक्ष में हैं? उन्हें कानूनी सहायता देने के लिए आप कितना व क्या-क्या करना चाहेंगे ?कृपया सच बोलें, क्योंकि उदारता दिखाने के चक्कर में बोला गया झूठ आपको अपनी पत्नी,परिवार,माँ, बहन , व बेटी सभी की नजरों में गिरा ही देगा ..और एक दिन स्वयं आपकी नजरों में भी।


- एक अन्तिम प्रश्न और। क्या आप कसाब को अपने इतिहास-पुरूष व पूर्वज राजा पुरु का दर्जा देना चाहते हैं? क्योंकि केवल आक्रमणकारी द्वारा बंदी बनाए जाने पर वे ही शत्रु राजा से अपेक्षा कर सकते थे कि - " वह व्यवहार, जो एक राजा को दूसरे राजा से करना चाहिए" गर्वोक्ति कर सकें?


यदि अभी भी आप सहायता के पक्ष में हैं तो आप को अपना अभिनंदन अवश्य करवा लेना चाहिए क्योंकि कहीं ऐसा न हो कि अभिनंदन की किसी भावी घड़ी से पहले ही अभिनंदनीय व अभिनन्दनकर्ता दोनों पर किसी आतंकी हमले की काली छाया पड़ जाए और हम जैसे बधाई देने वाले भी संसार में न रहें ।



डिस्क्लेमर
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मेरी बातों से यदि किसी की भावना आहत हुई हो तो कृपया उदार मानवीय रवैया अपनाने वाली अपनी बात को वास्तव में मेरे व अपने प्रति भी अपनाने पर बल दीजिएगा और अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखिएगा.
- कविता वाचक्नवी




जो आँख ही से न टपका तो वो लहू क्या है

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रसांतर
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यह लेख कुछ दिन पूर्व लिखा गया थाअब भारत ने जबकि ऐसी पहल की है वह संयुक्त राष्ट्र संघ के पास पहुँचा और पाकिस्तानी आतंकवाद पर अंकुश लगवाने की दिशा में थोड़ी गतिविधि भी कीसंघ ने भी तुंरत पाकिस्तान में
बसे
मुम्बई से जुड़े कुछ व्यक्तियों को नजरबंद करवाने का कदम पाकिस्तान से
उठवा लिया हैलेख की अन्य बातों की प्रासंगिकता को देखते हुए इसे प्रथम बार प्रस्तुत किया जा रहा है

- कविता वाचक्नवी




संयुक्त राष्ट्र किसलिए है
- राजकिशोर




भारत सरकार पाकिस्तान पर दबाव डालने में लगी हुई है कि वह प्रमाणित आतंकवादियों को पकड़ने और आतंकवाद के प्रशिक्षण केंद्रों को नष्ट करने में सहयोग करे। मुंबई हमले के तुरंत बाद सरकार ने पाकिस्तान सरकार से अनुरोध किया था कि वह अपने यहां की आईएसआई के प्रमुख को इस भयावह घटना की संयुक्त जाँच के लिए भारत भेजे। शुरू में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। बाद में वे इससे मुकर गए और इस शक्तिशाली संगठन के किसी अन्य प्रतिनिधि को भारत भेजने की बात कही। ऐसा लगता है कि यह बात भारत सरकार को मंजूर नहीं थी। सो इंग्लैंड और अमेरिका से तो जाँच दल बुलाए गए, पर पाकिस्तान के किसी प्रतिनिधि को नहीं। यह रणनीति गलत थी। पाकिस्तान से सब-इंस्पेक्ट स्तर का भी अधिकारी आता आता, तो उसकी बड़ी राजनीतिक उपयोगिता थी।



पता नहीं यह रणनीति कितनी कारगर होगी कि अमेरिका तथा अन्य देशों से पाकिस्तान पर यह दबाव डलवाया जाए कि वह आतंकवाद पर अंकुश लगाने की दिशा में ठोस कार्रवाई करे। इस तरह के अनुरोधों का तो अभी तक कोई सुफल नहीं निकला है। अमेरिका के लिए पाकिस्तान की उपयोगिताएं दूसरी तरह की हैं। जब वह इन्हें ही ठीक से साध नहीं पा रहा है, तो वह भरतीय हितों की कितनी चिंता करेगा, यह विचारणीय है। खास तौर से तब, जब उसकी भारत चिंता उसकी स्व-चिंताओं के विरुद्ध जा सकती हों। यह बात मैं नहीं, देश के बुद्धिजीवी और समरनीति विशेषज्ञ कह रहे हैं। जहाँ तक भारत की अपनी ताकत का सवाल है, पाकिस्तान के मामले में शून्य है। नहीं तो मुंबई जैसी घटनाएँ होती ही नहीं।



इसलिए बिना किसी संकोच के यह भविष्यवाणी की जा सकती है कि तीन-चार हफ्तों में यह सारा कोलाहल शांत हो जाएगा और देश हस्बमामूल अपने काम-काज में लग जाएगा। इसके लक्षण अभी से दिखाई पड़ने लगे हैं। इस संदर्भ में मिर्जा गालिब का वह प्रसिद्ध शेर बार-बार याद आता है जिसमें वे कहते हैं कि रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल, जो आँख ही से टपका तो वो लहू क्या है। जिन आँखों से लहू टपका है, वे मध्य वर्ग की, खास तौर से मुंबई के मध्य वर्ग की है। इस वर्ग का तीखा निष्कर्ष यह है कि हमारे राजनीतिक वर्ग ने हमारे साथ बहुत बड़ा विश्वासघात किया है और इस कारण ये संवेदनहीन और निकम्मे लोग देश चलाने के अधिकारी नहीं रहे। भारत को इनसे तुरंत छुटकारा पा लेना चाहिए -- भले ही देश को चलाने के लिए किसी सैनिक अधिकारी को निमंत्रित करना पड़े।



यह निराशा बहुत ही खतरनाक है। हमारा मानना है कि अभी भी एक रास्ता बचा हुआ है जिस पर चलने के बारे में भारत सरकार को गंभीरता से सोचना चाहिए और वह खुद सोचने से परहेज करे, तो देश के बुद्धिजीवियों और नागरिकों को उस पर दबाव डालना चाहिए। यह रास्ता दूरगामी है, पर हमें भूलना नहीं चाहिए कि आतंकवाद भी एक दूरगामी समस्या है और कल या परसों यह समस्या खत्म होने नहीं जा रही है।



चूंकि अपने अनुभव से हम देख चुके हैं कि आतंकवादी घटनाओं के प्रतिरोध के लिए एकपक्षीय कार्रवाई कारगर नहीं है तथा बहुरक्षीय दबाव की नीति और भी कम कारगर है, इसलिए एक वि· संस्था की आवश्यकता है जो इस दिशा में ठोस, सतत और कारगर कार्रवाई कर सके। हम अमेरिका नहीं हैं कि अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए सुदूर देशों पर भी हमला कर दें और और दुनिया भर में अपने बाहु बल का आतंक पैदा कर दें। हमें इस तरह का राष्ट्र नहीं बनना है बनना चाहिए। अमेरिका की सुरक्षा नीति दूसरे देश भी अपनाने लगें तो यह मध्य युग की वापसी होगी और चारों तरफ अराजकता फैल जाएगी। अराजकता और आतंकवाद में कोई खास फर्क नहीं है। आतंकवाद अराजक सोच का ही एक परिणाम है।



सौभाग्य से हमारे पास ऐसी एक संस्था पहले से ही मौजूद है। उसका नाम है संयुक्त राष्ट्र। मानव जाति के दुर्भाग्य से जैसे-जैसे ऐसे मुद्दे बढ़ रहे हैं जिन पर साझा वि· स्तर की कार्रवाई की जरूरत है, क्योंकि कोई एक देश कारगर कार्रवाई नहीं कर सकता, वैसे ही वैसे संयुक्त राष्ट्र की अवमानना भी बढ़ रही है। आखिर यह कैसे संभव हो सका कि राष्ट्र संघ का समर्थन पाए बिना अमेरिका ने अफगानिस्तान और इराक पर हमला कर दिया? इससे तो यही जाहिर हुआ कि वि· सुरक्षा के लिए राष्ट्र संघ की कोई उपयोगिता नहीं रह गई है। इस तर्क से तो अमेरिका कल भारत या पाकिस्तान पर हमला कर सकता है। उसी समय भारत तथा अन्य कमजोर देशों को राष्ट्र संघ में नई जान फूंकने की ठोस प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए थी। फ्रांस और जर्मनी सरीखे देशों को भी, जो अमेरिका के बढ़ते हुए वर्चस्व से नाखुश और चिंतित हैं, एक निष्पक्ष और कारगर वि· संस्था की आवश्यकता है।



पिछले कई वर्षों से राष्ट्र संघ के ढांचे में फेर-बदल करने की चर्चा हो रही है। इस सिलसिले में कई तरह के प्रस्ताव भी आए हैं। लेकिन कोई निर्णय नहीं लिया जा सका है। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। जब राष्ट्र संघ के एक प्रमुख अवयव सुरक्षा परिषद के नए सदस्यों के चुनाव की घड़ी आती है, तब भारत के उच्च तबकों में खलबली मच जाती है। राष्ट्र संघ के महासचिव के चुनाव के समय तो यह हलचल बहुत बढ़ जाती है। भारत का मीडिया अचानक देशप्रेमी हो जाता है। यह सब बिना यह सोच-विचारे होता है कि वर्तमान संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र की उपयोगिता कितनी रह गई है।



निवेदन यह है कि आज की दुनिया राष्ट्र संघ जैसी वि· संस्था को कारगर किए बिना चलाई ही नहीं जा सकती। जब वि· व्यापार संगठन को हम इतने सारे अधिकार सौंप सकते हैं, तो राष्ट्र संघ को इतना कमजोर बनाए रखने के पीछे तर्क क्या है? हम तो कहेंगे कि वि· व्यापार संगठन को भी राष्ट्र संघ के कानूनी दायरे में काम करना चाहिए। जैसे वि· व्यापार संगठन अंतरराष्ट्रीय व्यापार के क्षेत्र में अराजकता को समाप्त करने के लिए कदम उठा रहा है, वैसे ही राष्ट्र संघ को भी राजनीतिक क्षेत्र में अराजकता को समाप्त करने के लिए ठोस कदम उठाना चाहिए। आतंकवाद चूंकि एक बहुत ही खतरनाक अराजकता है और इसका एक अंतरराष्ट्रीय संदर्भ भी है, इसलिए आतंकवाद पर विचार करने और उसे रोकने में राष्ट्र संघ ही मजबूत कदम उठा सकता है। हम बेकार इधर-उधर सिर पटक रहे हैं और कीमती वक्त जाया कर रहे हैं। पाकिस्तान को राह पर लाने के लिए हमें राष्ट्र संघ के मंच का भरपूर उपयोग करना चाहिए।


(लेखक इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, नई दिल्ली में वरिष्ठ फेलो हैं)



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