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मरी बिल्ली पर चादर

रसांतर



साहसिक पहल का एक प्रस्ताव
राजकिशोर



भारत सरकार के गृह मंत्री के रूप में शिवराज पाटिल के इस्तीफा का हम क्या करें? उसे बिछाएँ या ओढ़ें? कद्र उस आदमी के इस्तीफे की जाती है जिसने अपना कर्तव्य निभाने में एड़ी-चोटी का पसीना एक कर दिया, फिर भी जिससे कोई बड़ी चूक हो गई। शिवराज पर अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत होने का आरोप नहीं लगाया जा सकता। वे जब से राजनीति में हैं, ऐसे ही हैं। इस तरह की निकम्मी राजनीति ने हमेशा हमारे साथ दगा की है। दूसरी ओर, मुंबई पर हमले में हमारे कमांडो तथा अन्य सुरक्षा कर्मियों की जाँबाजी और कार्यकुशलता पर कोई उँगली नहीं उठा सकता। इसके बावजूद हमें मानना होगा कि आतंकवादी अपने मिशन में काफी हद तक सफल रहे। अगर वे दस ही थे, तो इतनी कम संख्या में आतंकवादी जितना विनाश कर सकते थे, कर गुजरे। इसके बरक्स हमारी सुरक्षा तैयारी में ढील ही ढील थी। इसके बाद भी गृह मंत्री को निर्देश देना पड़ा कि वे चलते बनें, तो यह हमारी ढीठ राजनीतिक व्यवस्था की बेहयाई ही है।


देश भर से यही आवाज आ रही है कि भारत के सुरक्षा जवानों में कोई कमी नहीं है, वे कठिन से कठिन परिस्थिति का मुकाबला कर सकते हैं, शहादत देना उन्हें खूब आता है, पर हमारे नेता जनता के किसी काम के नहीं है। जनता जीतती है, वे हार जाते हैं। इस सिलसिले में 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की बरबस याद आती है। हमारे बहादुर फौजियों ने युद्ध के मैदान में जो सफलता अर्जित की थी, उसे मॉस्को में ताशकंद समझौते के द्वारा खो दिया गया। इसी तरह, 1971 में बांग्लादेश में भयानक कहर ढाने के बाद पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया था, पर सैनिक विजय के बाद पाकिस्तान पर उचित शर्तें लागू करने के बजाय शिमला समझौते में सारी सफलता पर पानी फेर दिया गया। अब शायद वैसी स्थितियाँ दुबारा पैदा होने वाली नहीं हैं। इतिहास ने हमें दो-दो बार बड़े-बड़े मौके दिए, पर हमने उनका कोई दूरगामी राजनीतिक इस्तेमाल नहीं किया। ऐसी मूढ़तापूर्ण उदारता दुनिया के किसी भी दूसरे देश ने दिखाई हो, इसका सबूत नहीं है। अब जबकि समय हमारे बहुत अनुकूल नहीं है, हमें अपना इतिहास खुद गढ़ना होगा। जिस सवाल से दिमाग झनझनाने लगता है, वह यह है कि क्या हमारा वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व यह करने में सक्षम है भी? ऐसे लगता है कि घोड़ों के काफिले का नेतृत्व गधे कर रहे हैं।

मान लिया कि मुंबई में जो होना था, हो गया। मुंबई वासियों की हिम्मत कहिए कि मजबूरी, वे हस्बमामूल अपने काम-काज में लग गए हैं। मुंबई सामान्य हो रही है। लेकिन इस आशंका से छुटकारा अभी नहीं मिला है कि अगर पाकिस्तान में आतंकवाद के अड्डे साबुत हैं, तो मुंबई की तरह कल दिल्ली या बंगलुरू ऐसे झटकेदार हमले का शिकार हो सकता है। क्या हमारा काम ऐसे हमलों के बाद राष्ट्रीय स्तर पर स्यापा करना और इस या उस नाकाबिल मंत्री का इस्तीफा ले लेना है? इस्तीफों के रूमाल से देश की इज्जत नहीं ढकी जा सकती, न देशवासियों की जान की हिफाजत की जा सकती है।

इस समय जो पहला राजनीतिक कदम उठाया जा सकता है, वह है पाकिस्तान पर दबाव डालना कि वह अपनी जमीन पर आतंकवादियों को काम न करने दे। पाकिस्तान के राष्ट्रपति जरदारी आतंकवादी हमले में अपनी पत्नी बेनजीर भुट्टो को खो चुके हैं जो इस उपमहादेश की एक तेज-तर्रार नेता थीं। इसलिए आतंकवाद विरोधी अभियान से उनकी सहानुभूति स्वाभाविक रूप से होनी चाहिए। इसीलिए उन्होंने मुंबई कांड की संयुक्त जांच के लिए वे आईएसएई प्रमुख को भारत भेजने के लिए तुरंत तैयार हो गए। थोड़ी ही देर बाद उन्हें अपने इस वादे से मुकरना पड़ा, तो इसका मतलब है कि पाकिस्तान का राजनीतिक नेतृत्व वहाँ के सैनिक प्रतिष्ठान के वर्चस्व के मुकाबले कितना कमजोर है। ऐसे नेतृत्व के साथ सौदा करने में कठिनाई जरूर होगी, पर हमारे पास इसके सिवाय कोई चारा नहीं है। हमें एक-एक भारतीय और भारत की जमीन पर जान खोनेवाले विदेशी की लाश का हिसाब करना है। मरी बिल्ली पर चादर डाल कर यह काम नहीं हो सकता। इसके लिए साहसिक पहल की जरूरत है।

पाकिस्तान को आतंकवादियों की सूची दी गई हैं और माँग की गई है कि इन्हें भारत के सामने पेश किया जाए। एक औपचारिक प्रस्ताव के रूप में तो यह ठीक है। लेकिन पाकिस्तान इनमें से एक को भी पेश नहीं करेगा, यह सारी दुनिया जानती है। इसलिए थोड़े समय तक इंतजार करने और बार-बार याद दिलाने के बाद जरूरी साहसिक पहल यह होनी चाहिए कि पाकिस्तान में आतंकवाद के अड्डों की तलाश करने और उन्हें नष्ट करने के लिए एक बहुदेशीय दस्ता बनाया जाए। अरसे से हम दावा करते रहे हैं और हमारे पास इसे साबित करने के लिए पुष्ट साक्ष्य भी हैं कि भारत में और उसके अविभाज्य हिस्से कश्मीर में होनेवाली आतंकवादी कार्रवाइयों को पाकिस्तान की जमीन से शह और सहायता मिल रही है। पाकिस्तान ने इसे कभी कबूल नहीं किया, न आज वह कबूल कर रहा है। चलिए, हम इस बार भी पाकिस्तान सरकार पर विश्वास करते हैं और यह मान लेते हैं कि उसे पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादी प्रशिक्षण के केंद्रों की सचमुच कोई जानकारी नहीं है। ऐसी स्थिति में उसे इस प्रस्ताव पर आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए कि एक बहुदेशीय जाँच दस्ता बनाया जाए जो पाकिस्तान के चप्पे-चप्पे का दौरा कर पता लगाए कि ऐसे अड्डे वास्तव में वहाँ हैं या नहीं।


पाकिस्तान सरकार में थोड़ी भी ईमानदारी या दूरंदेशी होती, तो वह खुद यह प्रस्ताव रखती कि भारत-पाकिस्तान का एक संयुक्त जाँच दल गठित करे जो आतंकवाद के अड्डों की शिनाख्त करे। सिर्फ शिनाख्त करे -- इन अड्डों को नष्ट करने का काम तो पाकिस्तान की अपनी एजेंसियों का होगा। अगर किसी कारण से यह संभव नहीं है, तो एक निष्पक्ष बहुदेशीय जाँच दल तो बनाया ही जा सकता है। इस जाँच दल में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका आदि के अलावा ग्रेट ब्रिटेन, जर्मनी, फ्राँस, स्वीडन आदि देशों के प्रतिनिधियों को रखा जा सकता है। संयुक्त राज्य अमेरिका और इजरायल को बाहर ही रखना चाहिए, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मामलों में इनकी निष्पक्षता संदेह से परे नहीं है।


भारत सरकार में थोड़ा भी दम है, तो उसे इस प्रकार के बहुदेशीय जाँच दल के गठन को एक प्रमुख मुद्दा बनाना चाहिए। दरअसल, यह राजनीतिक से ज्यादा नैतिक मुद्दा है, क्योंकि मामला सीधे आतंकवाद और मानव अधिकारों तथा आतंकवाद के शिकार देश की प्रभुसत्ता के हनन का है। यह तथ्य स्वीकार कर लिया गया है कि आतंकवाद एक अंतरराष्ट्रीय समस्या है। अल-कायदा या लश्करे-तोएबा की गतिविधियाँ किसी एक देश तक सीमित नहीं हैं। इसलिए आतंकवाद से संघर्ष अंतरराष्ट्रीय सहयोग और बहुदेशीय कार्रवाई के बिना ठीक से नहीं चलाया जा सकता। अगर हम इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाते हैं तथा अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने में सफल हो जाते हैं, तो पाकिस्तान को या तो सहयोग करना होगा या विश्व स्तर पर नीचा देखना होगा। अमेरिकी सरकार चाहे तो पाकिस्तान से कह सकती है कि अब हम तब तक एक भी डॉलर नहीं देंगे,जब तक पाकिस्तान बहुदेशीय जाँच दल के गठन के लिए सहमत नहीं हो जाता। जरूरत पड़ने पर इस प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद तथा अन्य मंचों पर भी उठाया और विश्व - बिरादरी से मनवाया जा सकता है। पाकिस्तान ना नुकुर करता है, तो दहाड़ कर उससे कहा जा सकता है : साँच को आँच क्या !


आयातित आतंकवाद के मसले पर हमारी सरकार अभी तक ज्यादातर म्याऊँ-म्याऊँ ही करती रही है। अब समय आ गया है कि वह इस संदर्भ में पाकिस्तान का नाम लेना छोड़ दे या सामूहिक कार्रवाई के लिए जोरदार उद्यम करें। नहीं तो भारत की जनता को आतंकवादी हमलों से बचने के लिए नागरिक सुरक्षा पहलों के बारे में सोचना ही पड़ेगा।



(लेखक इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, नई दिल्ली में वरिष्ठ फेलो हैं।)
मरी बिल्ली पर चादर मरी बिल्ली पर चादर Reviewed by Kavita Vachaknavee on Tuesday, December 02, 2008 Rating: 5

5 comments:

  1. नागरिक सुरक्षा पहल तो तुरंत आवश्यक है।

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  2. मुम्‍बई में नकवी ने प्रदर्शन कर रही महिलाओं पर बड़ी घटिया टिप्‍पणी की है। आप सभी महिला ब्‍लॉगरों को इसका मुंहतोड़ जवाब देना चाहिए।

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  3. नागरिक सुरक्षा ?एक कम्यूनिटी पुलिसिंग के बारे मे भी सुना था शायद?

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  4. आदरणीय कविता जी !नमस्कार ! खोज खबर लेने का धन्यवाद ! असल में अन्य आवश्यक कार्यों में व्यस्त हूँ . १३ दिसम्बर को हाज़िर हो जाऊँगा नए जोश से.

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  5. बहुत सार्थक चिंतन है ! हमको अब इस विषय पर कुछ ठोस सोचना नही, बल्कि करना पडेगा ! नेताओं की तो मति भ्रष्ट हो चुकी है ! कुछ भी प्रलाप करते हैं !

    रामराम !

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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