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जो आँख ही से न टपका तो वो लहू क्या है


रसांतर
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यह लेख कुछ दिन पूर्व लिखा गया थाअब भारत ने जबकि ऐसी पहल की है वह संयुक्त राष्ट्र संघ के पास पहुँचा और पाकिस्तानी आतंकवाद पर अंकुश लगवाने की दिशा में थोड़ी गतिविधि भी कीसंघ ने भी तुंरत पाकिस्तान में
बसे
मुम्बई से जुड़े कुछ व्यक्तियों को नजरबंद करवाने का कदम पाकिस्तान से
उठवा लिया हैलेख की अन्य बातों की प्रासंगिकता को देखते हुए इसे प्रथम बार प्रस्तुत किया जा रहा है

- कविता वाचक्नवी




संयुक्त राष्ट्र किसलिए है
- राजकिशोर




भारत सरकार पाकिस्तान पर दबाव डालने में लगी हुई है कि वह प्रमाणित आतंकवादियों को पकड़ने और आतंकवाद के प्रशिक्षण केंद्रों को नष्ट करने में सहयोग करे। मुंबई हमले के तुरंत बाद सरकार ने पाकिस्तान सरकार से अनुरोध किया था कि वह अपने यहां की आईएसआई के प्रमुख को इस भयावह घटना की संयुक्त जाँच के लिए भारत भेजे। शुरू में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। बाद में वे इससे मुकर गए और इस शक्तिशाली संगठन के किसी अन्य प्रतिनिधि को भारत भेजने की बात कही। ऐसा लगता है कि यह बात भारत सरकार को मंजूर नहीं थी। सो इंग्लैंड और अमेरिका से तो जाँच दल बुलाए गए, पर पाकिस्तान के किसी प्रतिनिधि को नहीं। यह रणनीति गलत थी। पाकिस्तान से सब-इंस्पेक्ट स्तर का भी अधिकारी आता आता, तो उसकी बड़ी राजनीतिक उपयोगिता थी।



पता नहीं यह रणनीति कितनी कारगर होगी कि अमेरिका तथा अन्य देशों से पाकिस्तान पर यह दबाव डलवाया जाए कि वह आतंकवाद पर अंकुश लगाने की दिशा में ठोस कार्रवाई करे। इस तरह के अनुरोधों का तो अभी तक कोई सुफल नहीं निकला है। अमेरिका के लिए पाकिस्तान की उपयोगिताएं दूसरी तरह की हैं। जब वह इन्हें ही ठीक से साध नहीं पा रहा है, तो वह भरतीय हितों की कितनी चिंता करेगा, यह विचारणीय है। खास तौर से तब, जब उसकी भारत चिंता उसकी स्व-चिंताओं के विरुद्ध जा सकती हों। यह बात मैं नहीं, देश के बुद्धिजीवी और समरनीति विशेषज्ञ कह रहे हैं। जहाँ तक भारत की अपनी ताकत का सवाल है, पाकिस्तान के मामले में शून्य है। नहीं तो मुंबई जैसी घटनाएँ होती ही नहीं।



इसलिए बिना किसी संकोच के यह भविष्यवाणी की जा सकती है कि तीन-चार हफ्तों में यह सारा कोलाहल शांत हो जाएगा और देश हस्बमामूल अपने काम-काज में लग जाएगा। इसके लक्षण अभी से दिखाई पड़ने लगे हैं। इस संदर्भ में मिर्जा गालिब का वह प्रसिद्ध शेर बार-बार याद आता है जिसमें वे कहते हैं कि रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल, जो आँख ही से टपका तो वो लहू क्या है। जिन आँखों से लहू टपका है, वे मध्य वर्ग की, खास तौर से मुंबई के मध्य वर्ग की है। इस वर्ग का तीखा निष्कर्ष यह है कि हमारे राजनीतिक वर्ग ने हमारे साथ बहुत बड़ा विश्वासघात किया है और इस कारण ये संवेदनहीन और निकम्मे लोग देश चलाने के अधिकारी नहीं रहे। भारत को इनसे तुरंत छुटकारा पा लेना चाहिए -- भले ही देश को चलाने के लिए किसी सैनिक अधिकारी को निमंत्रित करना पड़े।



यह निराशा बहुत ही खतरनाक है। हमारा मानना है कि अभी भी एक रास्ता बचा हुआ है जिस पर चलने के बारे में भारत सरकार को गंभीरता से सोचना चाहिए और वह खुद सोचने से परहेज करे, तो देश के बुद्धिजीवियों और नागरिकों को उस पर दबाव डालना चाहिए। यह रास्ता दूरगामी है, पर हमें भूलना नहीं चाहिए कि आतंकवाद भी एक दूरगामी समस्या है और कल या परसों यह समस्या खत्म होने नहीं जा रही है।



चूंकि अपने अनुभव से हम देख चुके हैं कि आतंकवादी घटनाओं के प्रतिरोध के लिए एकपक्षीय कार्रवाई कारगर नहीं है तथा बहुरक्षीय दबाव की नीति और भी कम कारगर है, इसलिए एक वि· संस्था की आवश्यकता है जो इस दिशा में ठोस, सतत और कारगर कार्रवाई कर सके। हम अमेरिका नहीं हैं कि अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए सुदूर देशों पर भी हमला कर दें और और दुनिया भर में अपने बाहु बल का आतंक पैदा कर दें। हमें इस तरह का राष्ट्र नहीं बनना है बनना चाहिए। अमेरिका की सुरक्षा नीति दूसरे देश भी अपनाने लगें तो यह मध्य युग की वापसी होगी और चारों तरफ अराजकता फैल जाएगी। अराजकता और आतंकवाद में कोई खास फर्क नहीं है। आतंकवाद अराजक सोच का ही एक परिणाम है।



सौभाग्य से हमारे पास ऐसी एक संस्था पहले से ही मौजूद है। उसका नाम है संयुक्त राष्ट्र। मानव जाति के दुर्भाग्य से जैसे-जैसे ऐसे मुद्दे बढ़ रहे हैं जिन पर साझा वि· स्तर की कार्रवाई की जरूरत है, क्योंकि कोई एक देश कारगर कार्रवाई नहीं कर सकता, वैसे ही वैसे संयुक्त राष्ट्र की अवमानना भी बढ़ रही है। आखिर यह कैसे संभव हो सका कि राष्ट्र संघ का समर्थन पाए बिना अमेरिका ने अफगानिस्तान और इराक पर हमला कर दिया? इससे तो यही जाहिर हुआ कि वि· सुरक्षा के लिए राष्ट्र संघ की कोई उपयोगिता नहीं रह गई है। इस तर्क से तो अमेरिका कल भारत या पाकिस्तान पर हमला कर सकता है। उसी समय भारत तथा अन्य कमजोर देशों को राष्ट्र संघ में नई जान फूंकने की ठोस प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए थी। फ्रांस और जर्मनी सरीखे देशों को भी, जो अमेरिका के बढ़ते हुए वर्चस्व से नाखुश और चिंतित हैं, एक निष्पक्ष और कारगर वि· संस्था की आवश्यकता है।



पिछले कई वर्षों से राष्ट्र संघ के ढांचे में फेर-बदल करने की चर्चा हो रही है। इस सिलसिले में कई तरह के प्रस्ताव भी आए हैं। लेकिन कोई निर्णय नहीं लिया जा सका है। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। जब राष्ट्र संघ के एक प्रमुख अवयव सुरक्षा परिषद के नए सदस्यों के चुनाव की घड़ी आती है, तब भारत के उच्च तबकों में खलबली मच जाती है। राष्ट्र संघ के महासचिव के चुनाव के समय तो यह हलचल बहुत बढ़ जाती है। भारत का मीडिया अचानक देशप्रेमी हो जाता है। यह सब बिना यह सोच-विचारे होता है कि वर्तमान संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र की उपयोगिता कितनी रह गई है।



निवेदन यह है कि आज की दुनिया राष्ट्र संघ जैसी वि· संस्था को कारगर किए बिना चलाई ही नहीं जा सकती। जब वि· व्यापार संगठन को हम इतने सारे अधिकार सौंप सकते हैं, तो राष्ट्र संघ को इतना कमजोर बनाए रखने के पीछे तर्क क्या है? हम तो कहेंगे कि वि· व्यापार संगठन को भी राष्ट्र संघ के कानूनी दायरे में काम करना चाहिए। जैसे वि· व्यापार संगठन अंतरराष्ट्रीय व्यापार के क्षेत्र में अराजकता को समाप्त करने के लिए कदम उठा रहा है, वैसे ही राष्ट्र संघ को भी राजनीतिक क्षेत्र में अराजकता को समाप्त करने के लिए ठोस कदम उठाना चाहिए। आतंकवाद चूंकि एक बहुत ही खतरनाक अराजकता है और इसका एक अंतरराष्ट्रीय संदर्भ भी है, इसलिए आतंकवाद पर विचार करने और उसे रोकने में राष्ट्र संघ ही मजबूत कदम उठा सकता है। हम बेकार इधर-उधर सिर पटक रहे हैं और कीमती वक्त जाया कर रहे हैं। पाकिस्तान को राह पर लाने के लिए हमें राष्ट्र संघ के मंच का भरपूर उपयोग करना चाहिए।


(लेखक इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, नई दिल्ली में वरिष्ठ फेलो हैं)



जो आँख ही से न टपका तो वो लहू क्या है जो आँख ही से न टपका तो वो लहू क्या है Reviewed by Kavita Vachaknavee on Sunday, December 14, 2008 Rating: 5

8 comments:

  1. सही है, पिछले कई वर्षों से संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं . उसकी प्रासंगिकता स्पष्ट नहीं हो पा रही. महाशक्तियों की हठ के आगे वह बेबस हो जाता है . निःसंदेह एक निष्पक्ष और कारगर विश्व संस्था की आवश्यकता है, जिससे शान्ति और सद्भाव का वातावरण बनाने में मदद मिल सके .

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  2. इंसानो के इलाज के लिए भी आज कल मल्टी ड्रग थेरपी का कारगर प्रयोग हो रहा है.

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  3. बहुत सही सोच है ! और नितान्त आवश्यक भी !

    राम राम !

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  4. प्रथम तो यदि पाकिस्तान का चपरासी भी आता तो उसे यही हिदायत होती कि भारत के हर तर्क को नकार दे। ऐसे में यह समझना कि वहां का सब -इंस्पेक्टर भी आता तो अच्छा होता, का औचित्य नहीं ही है। यू एन ओ को सक्षम बनाने में बडे देशों की दिलचस्पी नहीं है क्यों कि वह सशक्त हो गया तो उनकी साख कम हो जाएगी।

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  5. हम तो इस संस्था का नाम महज़ स्वास्थ्य सेवायों ओर कुछ घोषणाओं के लिए सुनते थे ,अब कितनी प्रासंगिकता है....ये महतवपूर्ण है.......अमेरिका ओर ब्रिटेन से लेकर फ्रांस को भी थामना जरूरी है ओर इस्राईल को भी

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  6. संरासंघ का तो भरपूर उपयोग करना चाहिए। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई आसान नहीं। बहुत मोर्चे हैं इस के। हर मोर्चे पर मुस्तैदी और सामयिक कार्यवाही से ही लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।

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  7. आज पहली बार आया आप के बांल्ग पर, ओर आप का लेख पढ कर बहुत अच्छा लगा.
    पाकिस्तान से जो भी बात,ल॑डाई या झगडा भारत को अपने दम पर करना चाहिये, अमेरिका या किसी अन्य देश को मदद के लिये पुकारना गलत है. संयुक्त राष्ट संघ तो अमेरिका ओर अन्य देशो के सामने पंगु है कारण, गरीब देश के लोग वेसे ही इन गोरो को भगवान समझते है, तो इन से ऊंची आवाज मे बात कोन करेगा??? कोई भी लडाई जीतनी हो तो हमे अपने दम पर ही जीतनी चाहिये, लडनी चाहिये.
    धन्यवाद

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  8. United Nations might be an appropriate platform to raise the issue of Pakistan sponsored terrorism. Really good article has been written by RAJKISHOR.

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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