मेरी दिल्ली : मेरी शर्म

राग दरबारी





"दिल्ली में कभी तवायफें अच्छी संख्या में रहती होंगी। दिल्ली ने तय किया है कि अब वह खु तवायफ बनेगी। उसके इस सजने-संवरने में कोई सौंदर्य चेतना नहीं है। शील के बिना सौंदर्य कहाँ! जब भी मैं दिल्ली में कोई नई चमचमाती चीज देखता हूँ, मेरी आँखें शर्म से झुक जाती हैं। मुझे लगता है, करोड़ों पुरुषों और स्त्रियों को आधे अनाज और आधे कपड़ों में रख कर यह मुटल्ली अब कुछ ज्यादा ही इतराने की तैयारी में है"




मेरी दिल्ली मेरी शर्म

राजकिशोर


दिल्ली में रहनेवाला कोई भी हिन्दी लेखक दिल्ली से खुश नहीं रहा। मेरी पढ़ाई कम है, इसलिए इस समय तीन ही लेखक याद आ रहे हैं। पहले हैं, रामधारी सिंह दिनकर। दिल्ली ने उन्हें मंत्री पद छोड़ कर सब कुछ दिया। अपने संस्मरणों में उन्होंने कई जगह अफसोस जताया है कि वे किस तरह शिक्षा मंत्री बनते-बनते रह गए। मेरे अपने अनुमान से, उनके मंत्री न बन पाने का जो भी कारण रहा हो, शिक्षा मंत्री न बन पाने का यह कारण जरूर रहा होगा कि उन दिनों किसी हिन्दी भाषी को यह पद नहीं दिया जाता था। पता नहीं डर किससे था -- हिन्दीवालों से, जो जवाहरलाल नेहरू को शायद धोतीप्रसाद लगते थे, या गैर-हिन्दी भाषियों से, जिनसे भारत के पहले प्रधानमंत्री का लगाव कुछ ज्यादा ही था। बहरहाल, दिल्ली से दिनकर को घोर सैद्धांतिक असंतोष था। उनकी एक बहुत अच्छी कविता है -- भारत का यह रेशमी नगर। इसमें उन्होंने दिल्ली के रेशमी चरित्र पर बहुविधि प्रकाश डाला है -- दिल्ली फूलों में बसी, ओस-कण से भीगी /दिल्ली सुहाग है, सुषमा है, रंगीनी है/प्रेमिका-कंठ में पड़ी मालती की माला/दिल्ली सपनों की सेज मधुर रस-भीनी है। दिल्ली की यह सुषमा दिनकर को आक्रांत करती थी। उन्हें लगता था कि 'कुछ नई आधियाँ' इस जादू को तोड़ कर रहेंगी। उनकी भविष्यवाणी थी -- ऐसा टूटेगा मोह, एक दिन के भीतर/इस राग-रंग की पूरी बर्बादी होगी/जब तक न देश के घर-घर में रेशम होगा/तब तक दिल्ली के भी तन पर खादी होगी।


ऐसा लगता है कि तीसरी दुनिया के गरीब देशों का राशिफल कवि और दार्शनिक नहीं लिखते। सो श्रीकांत वर्मा तक आते-आते दिल्ली का चरित्र 'मगध' जैसा हो गया। श्रीकांत जी ने अपने मगध का चित्रण एक ऐसे राज्य के रूप में किया है, जहां वैभव के साथ कुचक्र है तो सत्ता के साथ विचारों की कमी। इसे उस दिल्ली का पतन काल कहा जा सकता है, जिससे आकर्षित हो कर श्रीकांत वर्मा मध्य प्रदेश के एक छोटे-से शहर से यहां आए थे। दिल्ली ने उन्हें भी खूब दिया। जितना दिया, उससे कहीं ज्यादा उन्होंने वसूल कर लिया। आखिर कांग्रेस में थे वे। जब दिल्ली कवि से नाराज हो गई, तो कवि ने बगावत कर दी और अंतिम दिनों की अपनी कविताओं में दिल्ली का सारा हाल खोल कर लिख दिया।


रघुवीर सहाय में दिनकर की उदात्तता और श्रीकांत की तुर्शी, दोनों की झांकी दिखाई पड़ती है। वे दिल्ली में रहते हुए 'धर्मयुग' में 'दिल्ली मेरा परदेस' कॉलम लिखते थे। इस स्तंभ में छपी सामग्री इसी नाम की एक किताब में संकलित है। इस शीर्षक से ही आप समझ सकते हैं कि एक कवि की जगह के रूप में दिल्ली को सहाय जी ने सबसे सटीक ढंग से समझा था। दिल्ली वाकई सभी का परदेस है। यहाँ की ज्यादातर आबादी उनकी है जो बाहर से आए हैं। दिल्ली पर कभी मुसलमानों का प्रभुत्व रहा होगा। वह खत्म हो गया। फिर पंजाबी हावी हुए। अब वे भी अल्पसंख्यक हैं। लेकिन दिल्ली को रघुवीर सहाय ने अपना परदेस बताया, तो वह एक बड़े अर्थ में था। इस मायने में दिल्ली सभी संवेदनशील लोगों के लिए परदेस है। लेकिन परदेस होते हुए भी यह इतनी मोहक है कि कोई अपने देस नहीं जाना चाहता। बड़े से बड़े कलावादी और बड़े से बड़ा प्रगतिशील, सभी यहीं से देश को दिशा दे रहे हैं। कवियों, लेखको और पत्रकारों की दिल्ली-अभिमुखता इतनी बढ़ गई है कि कुछ दिनों के बाद यह कहावत आम हो जाएगी -- जो जा न सका दिल्ली, उसकी उड़ेगी खिल्ली।


दिनकर के शब्दों में मैं भी कह सकता हूँ कि 'मैं भारत के रेशमी नगर में रहता हूँ ।' लेकिन मैं यहाँ यह नहीं लिखना चाहता कि दिल्ली से मुझे क्या मिला और क्या नहीं मिला। बताना मैं यह चाहता हूँ कि दिल्ली आजकल 'मेरे लिए' बड़ी तेजी से सँवर रही है। जिधर से भी गुजरो, एक सुंदर-सा बोर्ड बताता है, इतनी हरियाली और कहाँ है मेरी दिल्ली के सिवा, मेरी दिल्ली सँवर रही है, दिल्ली मेट्रो मेरी शान, कितनी खुशहाल है मेरी दिल्ली, मेरी दिल्ली कितनी साफ-सुथरी है आदि-आदि। यह सिर्फ विज्ञापन नहीं है, दिल्ली को वाकई सजाया-सँवारा जा रहा है। पता नहीं कितने फ्लाईओवर बन गए है तथा कितने और बनाए जाएँगे। दिल्ली मेट्रो का विस्तार बहुत तेजी से हो रहा है। हवाई अड्डे को नया रूप मिलेगा। रेलवे स्टेशनों का पुनर्निर्माण किया जा रहा है। सड़कों को चौड़ा और सुचिक्कन बनाया जा रहा है। एयरकंडीशंड बसें चलने लग गई हैं। सभी जानते हैं, इस सबकी वजह क्या है। सन 2010 में दिल्ली में राष्ट्रमंडलीय खेल जो होनेवाले हैं! किसी उपन्यास में पढ़ा था कि जिस दिन नवाब साहब आनेवाले होते हैं, उस दिन लखनऊ की सबसे खूबसूरत तवायफ कितनी बेताबी से अपना श्रृंगार करने लगती है और उसके रईसखाने को सजाने-सँवारने में कितनी जद्दो-जहद की जाती है।


दिल्ली में कभी तवायफें अच्छी संख्या में रहती होंगी। दिल्ली ने तय किया है कि अब वह खुद तवायफ बनेगी। उसके इस सजने-संवरने में कोई सौंदर्य चेतना नहीं है। शील के बिना सौंदर्य कहाँ! जब भी मैं दिल्ली में कोई नई चमचमाती चीज देखता हूँ, मेरी आँखें शर्म से झुक जाती हैं। मुझे लगता है, करोड़ों पुरुषों और स्त्रियों को आधे अनाज और आधे कपड़ों में रख कर यह मुटल्ली अब कुछ ज्यादा ही इतराने की तैयारी में है।


०००

3 comments:

  1. रमानाथ अवस्थी जी दिल्ली के बारे में ही लिखते हुये लिखा था:
    सम्मान सहित हम सब कितने अपमानित हैं
    यह बात गांव की पगडंडी बतलाती है।

    ReplyDelete
  2. सटीक और लाजवाब !

    राम राम !

    ReplyDelete

आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

Comments system

Disqus Shortname