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भेड़ियों को मारो उनकी माँद में घुसकर


भेड़ियों को मारो उनकी माँद में घुसकर

डॉ. वेदप्रताप वैदिक






मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले का सीधा जवाब क्या हो सकता है ? यदि भारत की जगह अमेरिका होता तो क्या करता ? क्या भारत को वही करना चाहिए, जो अमेरिका ने पहले अफगानिस्तान और फिर एराक़ में किया ? अमेरिका ने न्यूयार्क के ट्रेड टॉवर गिरने के लिए पहले अफगानिस्तान के तालिबान और बाद में एराक के सद्दाम हुसैन को जिम्मेदार ठहराया और दोनों मुल्कों पर अपनी फौजें चढ़ा दीं। क्या भारत भी यही करे ? जब साफ़ पता चल गया है कि मुंबई पर हमला करनेवाले भेड़ियों की माँद पाकिस्तान में है तो भारत उन्हें उनकी माँद में घुसकर क्यों न मारे ? वह आतंक को जड़ से क्यों न उखाड़े ?



भारत ने ऐसा तेजस्वी कदम उठाने की बात कभी सोची ही नहीं। इसीलिए संसद पर हुए हमले के बाद सीमांत पर फौजें डटाकर भारत सो गया। उसने अमेरिका की तरह शोर नहीं मचाया। वह संयुक्तराष्ट्र की शरण में नहीं गया, जैसे कि अमेरिका गया था। अफगानिस्तान में घुसने के पहले उसने संयुक्तराष्ट्र का वरद-हस्त प्राप्त कर लिया था और सद्दाम को पकड़ने के पहले उसने अपने मित्र-राष्ट्रों का संयुक्त-मोर्चा बना लिया था। विश्व-जनमत को धता बताते हुए वह एराक पर चढ़ बैठा। एराक पर चढ़ाई की पोल भी बाद में खुल गई लेकिन अमेरिका अब भी उक्त दोनों राष्ट्रों पर काबिज है। अमेरिका ने जो कुछ किया, उसका अंध-समर्थन नहीं किया जा सकता लेकिन यह तो मानना होगा कि उसने अपने पर हुए हमले का अंतरराष्ट्रीयकरण कर दिया। भारत पर वैसे कितने ही हमले हो चुके लेकिन उसने आज तक विश्व-समाज के दरवाजे नहीं खटखटाए। यहाँ तात्पर्य यह नहीं है कि अमेरिका की तरह भारत पाकिस्तान पर हमले की घोषणा कर दे और उसके समर्थन में विश्व-संस्थाओं का समर्थन माँगे। लेकिन भारत इतना तो कर सकता है कि संसार के देशों से वह कहे कि वे आतंकवाद की असली जड़ को पकड़ें। वे खुले-आम बताएँ कि वह पाकिस्तान में है। वे पाकिस्तान को स्पष्ट निर्देश दें कि वह आतंकवादी अड्डों को या तो खुद नष्ट करे या उन्हें नष्ट करने की अनुमति विश्व-संस्था को दे। इस मौके पर भारत को सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1373 का सहारा लेकर अपनी सुरक्षा के लिए विश्व-व्यापी अभियान चलाना चाहिए।



जाहिर है कि संयुक्तराष्ट्र के निर्देश को आसिफ जरदारी की सरकार अमान्य नहीं कर सकती। जरदारी ने भारत के प्रधानमंत्री और एक टीवी चैनल से जितनी स्पष्ट बात की है, आज तक कभी किसी पाकिस्तानी नेता ने नहीं की। उन्होंने आतंकवादियों के खिलाफ़ सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया है। वे स्वयं भुक्तभोगी हैं। बेनजीर के जुलूस में इन्हीं आतंकवादियों ने पहले कराची में सैकड़ों लोगों को मारा था और फिर उन्होंने बेनजीर को ही मार डाला। जैसा हमला उन्होंने ताज और ओबेराय होटलों पर किया, वैसा ही वे काबुल की सीरिना और इस्लामाबाद की मेरियट होटल पर कर चुके हैं। उनके हमलों में एक सोचा-समझा सिलसिला साफ दिखाई पड़ता है। इस सिलसिले को तोड़ने की क्षमता पाकिस्तान में नहीं है। आसिफ जरदारी चाहे राष्ट्रपति के पद पर बैठे हों लेकिन उनमें मुशर्रफ जितनी ताकत नहीं है। मुशर्रफ भी फौज और आईएसआई की अवहेलना नहीं कर सकते थे लेकिन ये दोनों संस्थाएँ भी उनकी अवहेलना नहीं कर सकती थीं। जरदारी तो अभी कुछ ही हफ़्तों में तीन बार मात खा चुके है। पहली बार उनकी सरकार ने तब मात खाई, जब उसने घोषणा कर दी कि आईएसआई गृह मंत्रालय के मातहत काम करेगी। यह घोषणा उन्हें उल्टे मुँह वापस लेनी पड़ी। दूसरी बार उनकी मजाक तब बनी, जब उन्होंने हिंदुस्तान टाइम्स के सम्मेलन की टेलि-कांफ्रेंस में कह दिया कि वे आणविक प्रथम प्रहार न करने का वादा करते हैं। उनकी इस घोषणा का इतना विरोध हुआ कि सरकार अभी तक उसे औपचारिक रूप नहीं दे सकी। तीसरी बार उन्होंने तब मात खाई जब वे अपने वादे से मुकर गए। उनके प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी और उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह से फोन पर कह दिया कि वे जाँच में सहयोग करने के लिए अपने आईएसआई महानिदेशक को भारत भेज रहे हैं। जब पाकिस्तान के लगभग सभी विरोधी दलों, चैनलों और अखबारों ने इसे अनुचित और जल्दबाजीभरा कदम बताया तो जरदारी ने अपनी टेक बदल दी। आसिफ जरदारी की जो सरकार इस तरह के मसलों पर भी खुद-मुख्तार नहीं है, वह आतंकवादी अड्डों पर हाथ कैसे डाल सकती है ? वह किसी भी विश्व-संस्था या अंतरराष्ट्रीय मोर्चे को कोई भी आश्वासन दे तो उस पर कौन भरोसा करेगा ?



ऐसी स्थिति में पाकिस्तानी सरकार को मजबूर किया जाना चाहिए कि वह कुख्यात आतंकवादी सरगनाओं को भारत के हवाले करे और अपने आतंकवादी अड्डों पर अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई की अनुमति दे। यह अनुमति अमेरिकियों ने अपने आप ही ले रखी है। वे पाक-अफगान सीमांत पर बने अड्डों पर प्रहार करते रहते हैं। पाकिस्तानी सरकार जबानी जमा-खर्च करके चुप हो जाती है। अमेरिकियों को सिर्फ उस आतंकवाद की चिंता है, जो उसके कब्जे के विरूद्ध हो रहा है। इतनी ही चिंता अगर उनको उस आतंकवाद के प्रति भी हो जाए, जो भारत के विरूद्ध हो रहा है तो क्या कहने ? मुंबई पर हुए हमले ने कुछ आस तो जगाई है। अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडालीजा राइस का दौड़े चले आना इसका प्रमाण है। ओबामा का बयान भी उत्साहवर्द्धक है। अमेरिकी नेताओं और संचार माध्यमों ने भारत पर हुए इस हमले को मूलतः अमेरिका पर हुआ हमला ही माना है। उनका तर्क है कि कुछ खास ठिकानों को पाकिस्तानी आतंकवादियों ने इसीलिए चुना है कि वहाँ अमेरिकियों, अंग्रेजों और यहूदियों से बदला निकाला जाए। पश्चिमी सरकारों के इस रवैए को भारत ठीक से भुना सके तो वह विश्व-समाज को अपने पक्ष में ले सकता है।



यह जरूरी है कि भारत इस मौके पर पाकिस्तान की सरकार और जनता की सहानुभूति अर्जित करे। फिलहाल, यह सहज ही उपलब्ध है लेकिन पिछले एक-दो दिन में पाकिस्तानी मीडिया ने भारतीय मीडिया के प्रति काफी आक्रामक रूप अपना लिया है। उनका कहना है कि किसी प्रमाण के बिना ही पाकिस्तान को बदनाम किया जा रहा है। पाकिस्तानियों को डर है कि कहीं भारत उनके कश्मीर, लाहौर और सियालकोट पर टूट न पड़े। विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी के बयान ने पाक सरकार के कान खड़े कर दिए हैं। गलतफहमियाँ बढ़ती चली जा रही हैं। भारत और पाकिस्तान, दोनों के मीडिया को यह समझना होगा कि मुंबई हमले के संदर्भ में जब भी पाकिस्तान का नाम लिया जाए तो यह स्पष्ट किया जाए कि उनका मतलब केवल पाकिस्तान के आतंकवादी तत्वों से है। यह स्पष्ट है कि दक्षिण एशिया से आतंकवाद का सफाया करने के लिए भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सरकारों को संयुक्त मोर्चा बनाना होगा। यह समय एक-दूसरे के खिलाफ कार्रवाई करने का नहीं है बल्कि तीनों सरकारों को मिलकर आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करने का है। आंतकवादियों को जब तक उनकी माँद में घुसकर नहीं मारा जाएगा, वे बार-बार आते रहेंगे।




भेड़ियों को मारो उनकी माँद में घुसकर भेड़ियों को मारो उनकी माँद में घुसकर Reviewed by Kavita Vachaknavee on Thursday, December 04, 2008 Rating: 5

5 comments:

  1. भारत को परमुखापेक्षी कतई नही होना चाहिए -वह प्रक्रिया तो अपनाए किंतु पाने बल पर सैन्य कार्यवाही करे !

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  2. आपका लेख बहुत अच्छा है। यहा सयम की जरूरत भी है

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  3. एक अच्छी विवेचना , लेखक से सवा से सौ प्रतिशत सहमत !

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  4. भाई साहब आप एक वरिष्ठ विशेषज्ञ तो इन मामलों के हैं ही , ये तो सर्वमान्य तथ्य ही है ! इसी वजह से अखबारों में आपके सामयीक लेखो का हमेशा ही इन्तजार रहता है ! आपके पिछले लेख से मैं आपकी वही शैली कविता जी के ब्लॉग पर भी पढ़ पारहा हूँ !

    आपका बात को स्पष्ट करने का तरीका इतना सुलझा हुवा है की आपने दूध का दूध और पानी का पानी वाली बात बतादी !

    यहाँ सर फ़ुट्टौवल चल रही है की पाकिस्तान पर टूट पडो, जैसे बकरी का बच्चा है पाकिस्तान तो ! और आपने क्या सही बात समझायी की आतंकवादियों को उनकी मांद में घुस कर मारो !

    दोनों बातो में जमीन आसमान काफार्क है पर बात आप वाली सही है जरदारी साहब ख़ुद बेनजीर को खोये बैठे हैं !
    और आपका ये कथन की जरदारी के हाथ में कुछ नही है ! बात को इतनी सहजता पूर्वक समझाने के लिए आपका अत्यन्त धन्यवाद !

    @ कविता जी मैंने आपको एक मेल आपके संदेश के एवज में किया था पर शायद आपको मिला नही !
    आप मेरे ब्लाग के कमेन्ट बॉक्स में आपका मेल आई.डी दे दे , मेरे ब्लॉग पर कमेन्ट माडरेशन चालु है मैं उसे पब्लिश नही करूंगा !

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  5. बात तो आपने पूर्णत: सार्थक एवं सटीक कही है, किन्तु काश ऎसा हो सकता.

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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