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ओबामा की विजय का भारतीय पक्ष : काउंसिल फ़ॊर इंडियन फ़ॊरेन पॉलिसी


ओबामा की विजय का भारतीय पक्ष
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सों डॊ.वेद प्रताप वैदिक जी का यह निमन्त्रण मिला, जिसमें इस संगोष्ठी की सूचना थी कि भारत के विविध सन्दर्भों में ओबामा की विजय का क्या अर्थ है। देश की आर्थिक स्वायत्ता, विदेश नीति आदि पर विमर्श के निमित्त इसका आयोजन किया गया और अमेरिका के महाशक्ति स्वरूप के वर्तमान के साथ जोड़ कर इसे राष्ट्रीय नीतियों व अर्थवयवस्था आदि के परिप्रेक्ष्य में आँकने का यत्न किया गया। राजनयिक, सूचना क्रान्ति से जुड़े लोग व अन्य प्रबुद्ध जनों की उपस्थिति में हुए विचार विमर्श ने विश्लेषण की दिशाओं को अवश्य स्पष्ट किया होगा। आयोजन के लिए वैदिक जी को बधाई!


हिन्दी के पाठकों के लिए व हिन्दी एवं राष्ट्रीय जनजीवन के कुछ मूलभूत प्रश्नों पर विचार करने की दृष्टि से डॊ. श्रीमती अजित गुप्ता ने कुछ बहुत ही मौलिक आकलन किए हैं; जो "मधुमती"(राजस्थान साहित्य अकादमी की मासिक पत्रिका) के दिसम्बर अंक के सम्पादकीय में उन्होंने व्यक्त किए हैं ( अंक अभी मासान्त में जारी होने वाला है )। वे अकादमी की चेयरमैन होने के साथ- साथ जनजीवन को निकट से जानने पहचानने वाली अत्यन्त सहृदय लेखिका भी हैं, जो सामाजिक यथार्थ की अच्छी पहचान रखती हैं। भारतीय लोक जीवन का इतिहास खंगालते हुए उन्होंने जिन मूलभूत प्रश्नों की मीमांसा की है वे एक प्रकार से भारतीय मन की तलाश के प्रश्नों से एकीकृत होते हैं। भौगोलिक, व्यापारिक, मानवीय, कृषि, तकनीकी व भाषायी आदि परिप्रेक्ष्य के साथ रख क इन्हें देखने का यह सुविचारित दृष्टिकोण भले ही देश के नीति निर्धारण के लिए सहायक सामग्री के रूप में संप्रयुक्त न हो किन्तु विचार के लिए व ओबामा के प्रति भारतीय जनमानस के रुख को माँजने -समझने में अवश्य सहायक सिद्ध होगा।

Justify Full
आप भी इसे पढे़ व इन सन्दर्भों में ओबामा की विज के अर्थ भी तलाशें।


- कविता वाचक्नवी
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सम्पादकीय : `
मधुमती' दिस.२००८


ओबामा के मायने





अपनी जड़ों से उखड़ने का दर्द शायद इतना गहरा नहीं होता जितनी गहरी वह टीस होती है जब हमें हर क्षण यह अनुभव कराया जाता हो कि तुम पराए हो। आज से तीन सौ वर्ष पूर्व भारत से लाखों लोग विदेशी धरती को आबाद करने के लिए दुनिया के विभिन्न कोनों में गए थे। उनकी मेहनत से दलदली भूमि में भी गन्ने की फसलें लहलहाने लगीं थीं। आज वे सारे ही देश सम्पन्न देशों की श्रेणी में हैं। लेकिन उन धरती के बाशिन्दों ने उन्हें अपनेपन की ऊष्मा कभी प्रदान नहीं की। वे भारत के रामायणी-परिवार को सीने से चिपकाए ही अपना कर्तव्य करते रहे। जैसे एक महिला अपना पैतृक घर छोड़कर पति-गृह में हमेशा के लिए रहने जाती है फिर भी उसे कभी भी अपनत्व की बाँहें नसीब नहीं होतीं। पराएपन की यह टीस या तो महिलाएँ जानती हैं या फिर वे लोग जो अपनी जड़ों से उखड़कर दूसरी धरती पर अपना घरोंदा बसाते हैं। भारत अनेक राज्यों का समूह है, विश्व के सारे ही राष्ट्र अनेक राज्यों के समूह से निर्मित होते हैं। लेकिन भारत में और अन्य राष्ट्रों में शायद एक मूल अन्तर है। भौगोलिक दृष्टि से किसी भी राष्ट्र का राज्यों में विभक्त होना पृथक बात है लेकिन भाषा, खान-पान आदि की पृथकता अलग बात है। ये अन्तर एक होने में अड़चने डालते हैं। जब दुनिया में किसी देश की सीमाएँ नहीं थी तभी से भारतवंशी व्यापार के लिए, घुम्मकड़ता के लिए दुनिया के कोनों में जाते रहे हैं। इतिहास तो यह भी कहता है कि भारतीय मेक्सिको तक गए थे। यही कारण है कि जब दुनिया सीमाओं में बँटी, तब भी भारतीय व्यक्ति अपने कदमों पर लगाम नहीं लगा सके। वे कल भी कुँए के मेढ़क नहीं थे और आज भी नहीं रहना चाहते और शायद कल भी नहीं रहेंगे। शायद भारतीय मन असुरक्षा-भाव से ग्रसित नहीं हैं, यही कारण है कि वे अकेले ही दुनिया के किसी भी कोने में बसने के लिए निकल पड़ते हैं। इसीलिए भारतीयों में पराएपन के भाव की पीड़ा मन के अन्दर तक बसी है। वे कभी विदेश में और कभी अपने ही देश में इस पीड़ा को भुगतते हैं। इसलिए ओबामा की जीत उनके लिए महत्वपूर्ण हो जाती है।



हम भारतीय जब सम्पूर्ण सृष्टि को एक कुटुम्ब मानते हैं तब भला एक भारतीय अपने ही देश भारत में प्रांतों की सीमाओं में कैसे सिमटकर रह सकता है? कभी राजस्थान में रेगिस्तान का फैलाव अधिक होने के कारण यहाँ विकास की सम्भावनाएँ नगण्य थीं। तभी से यहाँ का व्यापारी भारत में ही नहीं अपितु विदेशों में भी रोजगार और व्यापार की सम्भावनाएँ तलाशने के लिए निकल पड़ा। भारत का ऐसा कोई कोना नहीं है जहाँ पर राजस्थान का निवासी नहीं हो। ऐसे ही भारत के आसपास के देशों में भी राजस्थानी बहुलता से गए। राजस्थान की तरह ही सम्पूर्ण देश की जनसंख्या भारत के महानगरों में रोजगार की तलाश में गयी। कभी कलकत्ता उद्योग नगरी थी तो सभी का गंतव्य कलकत्ता था। मुम्बई फिल्मी नगरी थी तो आम भारतीयों के सपने वहीं पूर्ण होते थे। पूर्वांचल में भी व्यापार की प्रचुर सम्भावनाएं थीं तो भारतीय वहाँ भी गए। शंकराचार्य ने भी सम्पूर्ण भारत को सांस्कृतिक भारत बनाने का सफल प्रयास किया। भाषाओं की प्रचुरता वाला यह देश सम्पर्क भाषा को गढ़ने लगा। इसी का परिणाम था कि संस्कृत हमारी सम्पर्क भाषा और साहित्य की भाषा के रूप में विकसित हुई। लेकिन जब संस्कृत में व्याकरण की कठोरता लादी गयी तब संस्कृत का स्थान प्राकृत, खड़ी बोली से होता हुआ हिन्दी ने ले लिया। प्रत्येक प्रांत या क्षेत्र की भाषा का स्थान पूर्ववत् ही रहा बस परिवर्तन इतना हुआ कि सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी का विकास हुआ। लेकिन आज पुनः क्षेत्रीयता के आधार पर भारतीय सम्पर्क भाषा के रूप में विकसित हिन्दी को मान्यता का प्रश्न खड़ा कर दिया गया है और अंग्रेजी को मान्यता प्रदान कर दी गयी है। जो भाषा क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दों से पुष्ट हुई हो और जिस भाषा ने भारत को एक सूत्र में बाँधने में महती योगदान दिया हो आज उसे ही धकेलने का प्रयास किया जा रहा है। भाषा और क्षेत्रवाद से उपजा आम भारतीय का दर्द ओबामा की जीत से कहीं कहीं सकून पाता है।



अमेरिका में जब यूरोप का साम्राज्य स्थापित हुआ तब उसके नवनिर्माण की बात भी आई। दक्षिण-अफ्रिका से बहुलता से गुलामों के रूप में वहाँ के वासियों को अमेरिका लाया गया। उन लोगों ने रात-दिन एक कर अमेरिका का निर्माण किया। जैसे भारतीयों ने फिजी, मोरिशस आदि देशों का निर्माण किया था। घनघोर जंगल, दलदली भूमि को स्वर्ग बनाने का कार्य यदि किसी ने भी इस दुनिया में किया है तो इन्हीं मेहनतकश मजदूरों ने किया है। लेकिन कभी धर्म के नाम पर, कभी त्वचा के रंग के आधार पर, कभी जाति के आधार पर या फिर कभी बाहरी बताकर जब हम मनुष्य में अन्तर करते हैं तब वेदना का उदय होता है। यही वेदना जब एकीकृत होती है तब उसमें से एक क्रांति का सूत्रपात होता है। कभी यह क्रांति प्रत्यक्ष होती है और कभी इस क्रांति का मूल हमारे मन में होता है। यह घर हमारा भी है, इसी सूत्र को थामें करोड़ों दिलों ने ओबामा को देश का प्रथम नागरिक बना दिया। ओबामा के स्थापित होते ही वे करोड़ों लोग जो बाहरी होने की पीड़ा झेलते आए थे, वे सभी भी इस पीड़ा से मुक्त हो गए। अमेरिका में आकर यूरोप, आस्ट्रेलिया, एशिया, अफ्रिका आदि देशों से बसे करोड़ों बाशिन्दे इस पीड़ा को कहीं कहीं मन में बसाए थे कि वे बाहरी हैं। उन्हें कभी कभी इस पीड़ा से गुजरना पड़ा है। गौरी चमड़ी बाहरी रूप से एक दिखायी देती है लेकिन अश्वेत और एशिया मूल के लोग एकाकार नहीं हो पाते। इसलिए इन सभी ने एक स्वर में यह माना कि हम सब एक हैं। अब अमेरिका हमारा देश है। ओबामा की जीत के मायने यह भी नहीं है कि सभी ने इस सत्य को स्वीकार किया है लेकिन सत्य प्रतिष्ठापित हो गया है। घनीभूत वेदना पिघलने लगी है। फिर ओबामा सभी का प्रतीक बनकर आए थे।



ओबामा की जीत मानवता की जीत दिखायी देने लगी है। जिन यूरोपियन्स ने करोड़ों मेहनसकश इंसानों को गिरमिटिया बनाया और कभी भी समानता का दर्जा नहीं दिया। जिन यूरोपियन्स ने महिलाओं को समानता प्रदान नहीं की, उन्हीं यूरोपियन्स ने अमेरिका में अपने पापों को धो लिया। अमेरिका में ही यह क्यों सम्भव हुआ? शायद इसलिए कि अमेरिका की धरती पर ही यूरोपियन्स को पराए होने की वेदना का अनुभव हुआ। वे भी इस वेदना के भागीदार बने। आज अमेरिका के मूल निवासी रेड-इण्डियन तो वहाँ केवल बीस प्रतिशत हैं, शेष तो यूरोप, एशिया, आस्ट्रेलिया, अफ्रिका, मेक्सिको आदि के निवासी ही हैं। जब एक भारतीय से यूरोपियन कहता है कि तुम अमेरिकी नहीं हो तब वह भी प्रश्न करता है कि तुम अमेरिकी कैसे हो? तुमने तो यहाँ अत्याचार किए थे, लाखों अमेरिकन्स का कत्लेआम किया था। मैं तो यहाँ के नवनिर्माण का भागीदार हूँ, अतः बताओ कि कौन श्रेष्ठ है? तुम तो लाखों अफ्रिकन्स को गुलाम बनाकर यहाँ लाए थे! तुमने उन्हें इंसान कब समझा? तुमने तो उन्हें 1962 के बाद मताधिकार दिया। इसी वेदना के चलते ओबामा की जीत हुई। उन सभी ने स्वीकार किया कि हम सब अमेरिकी हैं। अमेरिका में अब रंग-भेद के आधार पर राष्ट्रीयता की अनुभूति नहीं होगी। लेकिन वहाँ के मूल निवासियों की वेदना शायद इससे और बढ़ जाए! वे वहाँ अल्पमत में थे और उनकी आवाज कहीं सुनाई नहीं देती थी। दुनिया में यह संदेश गया है कि अमेरिका की धरती सबके लिए है। किसी भी शान्त और सहिष्णु कौम का शायद यही हश्र होता हो!


अमेरिका का एक उज्ज्वल पक्ष और भी है। वहाँ बसे समस्त नागरिकों ने स्वयं को अमेरिकी कहने में गर्व का अनुभव किया। वहाँ तो उन्हें अमेरिकी नहीं कहने से ही वेदना उपजी थी। भारत में ऐसा नहीं है। हम स्वयं को भारतीय होने पर गर्व नहीं करते। हमारी पहचान क्षेत्रीयता के आधार पर विभक्त होती जा रही है। इसके कई कारण हो सकते हैं, लेकिन मुझे एक कारण दिखायी देता है कि जब भारत एक सुदृढ़ भारत बनकर विश्व के मानचित्र पर उभरेगा तब शायद हम गर्व से कहें कि हम भारतीय हैं। जब विश्व में हमें भारतीय होने के कारण सम्मान प्राप्त होगा तब शायद हम भी गर्व से कहेंगे कि हम भारतीय है। उस समय शायद हम गर्व से कहने लगेंगे कि हमारी भाषा हिन्दी है। आज भी जो भारतीय विदेशों में बसे हैं वे अपनी पहचान और अपने सम्मान के लिए चिंतित हैं। वे भारत की समग्रता के लिए चिंतित हैं। यही कारण है कि वे सारे एकजुटता के साथ भारत की छवि को बनाने में लगे हैं। वे हिन्दी भाषा को प्रतिष्ठापित करने में लगे हैं। आप इन्टरनेट पर जाइए, सारी ही वेबसाइट्स किसी न किसी हिन्दी शब्द से प्रारम्भ हो रही हैं। सैकड़ों हिन्दी की वेबसाइट्स वहाँ उपलब्ध है। हिन्दी भाषा को लेकर कम्प्यूटर पर एक क्रान्ति का सूत्रपात हो चुका है। अब वे दिन दूर हुए कि आपका काम अंग्रेजी के बिना नहीं चलता था। अब तो केवल हिन्दी से ही आपका कार्य बहुत आसानी से होता है। आप बोलिए और कम्प्यूटर स्वतः ही हिन्दी में आपकी बात टाइप करेगा। अतः जिस दिन हम सब क्षेत्रीयता से निकलकर भारत-राष्ट्र में गर्व का अनुभव करने लगेंगे तब हिन्दी भाषा भी हमारे लिए गौरव का विषय होगी। जब ओबामा अमेरिका का राष्ट्रपति बन सकता है तब हिन्दी क्यों नहीं भारत की सम्पर्क भाषा से निकलकर विश्व की सम्पर्क भाषा की ओर अपने कदम बढ़ाती है? हम क्यों हीनभावना के शिकार बन अपने ही देश और भाषा को दोयम दर्जा देने पर तुले हैं। क्यों नहीं हमें भारत कहने में गर्व की अनुभूति होती? क्यों हम इण्डिया कहकर अपनी पहचान छिपाने का प्रयास करते हैं?


आज जितने लोग भी इन्टरनेट पर कार्य कर रहे हैं, मेरा उन सबसे निवेदन है कि अपने तकनीकी कार्य के अलावा वे हिन्दी में कार्य करने प्रारम्भ करें। हिन्दी अब कम्प्यूटर की भाषा बन चुकी है। आपकी क्षेत्रीय भाषा के शब्दों से ही हिन्दी का निर्माण हुआ है, अतः हिन्दी में भी उतनी ही मिठास है जितनी क्षेत्रीय भाषाओं में है। हम किसी भी क्षेत्रीय भाषा का स्थान हिन्दी को नहीं देना चाहते, हम तो केवल अंग्रेजी का स्थान हिन्दी को देना चाहते हैं। जिन्हें व्यावसायगत अंग्रेजी की आवश्यकता हो, वे अवश्य अंग्रेजी या किसी भी अन्य विदेशी भाषा का प्रयोग करें लेकिन भारत की राजभाषा के रूप में हिन्दी को पुष्ट करें, उसे प्रतिष्टापित करें। ओबामा की जीत को स्वयं की जीत समझे। ओबामा की जीत हमारी हीनभावना को परे धकेलती है, हम में गौरव की अनुभूति जगाती है। जब ओबामा की जीत विदेशी धरती पर बसे करोड़ों भारतीयों के मन में सपने जगा सकती है तब हम भारतीयों के मन में भी क्षेत्रीयता का दर्द भी मिटा सकती है। ओबामा ने प्रयास किया, वह सफल हुआ। हम भी प्रयास करें, सफल होंगे। सम्पूर्ण भारत हम भारतवासियों का है, यहाँ के कण-कण से अपनत्व की महक आनी चाहिए। हम भारत के किसी भी कोने में जाकर बसें, हमें वहाँ पराएपन की अनुभूति नहीं होनी चाहिए। चाहे वो कश्मीर हो, पूर्वांचल हो या फिर महाराष्ट्र। किसी भी व्यक्ति के मन में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और गुजरात से लेकर पूर्वांचल तक, प्रत्येक प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने का सपना जगना चाहिए। ओबामा की जीत का उत्सव इसलिए नहीं मनाना है कि वह बेहतर राष्ट्रपति सिद्ध होगा अपितु इसलिए मनाना है कि अब कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे को पराया नहीं कह सकेगा। कोई भी इंसान छोटा-बड़ा नहीं बताया जाएगा। किसी भी देश, प्रदेश या संस्था पर कुछ मुट्ठीभर लोगों का कब्जा ही नहीं बताया जाएगा। भारत देश हम सबका है, हमारे पूर्वजों ने इसका निर्माण किया है। अब किसी भी कारण से कहीं भी अवरोध खड़े नहीं किए जाएँगे। मैंने भारत की भूमि पर जन्म लिया है, सम्पूर्ण भारत मेरी जन्मभूमि और कर्मभूमि है। मैं भारत का हूँ और भारत मेरा है। ओबामा के बहाने इसी भावना को पुष्ट करने की आवश्यकता है। हमारे लिए ओबामा के मायने यही हैं।
- डॉ. अजित गुप्ता
सम्‍पादक, ‘मधुमती’
राजस्‍थान साहित्‍य अकादमी की मासिक पत्रिका


ओबामा की विजय का भारतीय पक्ष : काउंसिल फ़ॊर इंडियन फ़ॊरेन पॉलिसी ओबामा की विजय का  भारतीय पक्ष : काउंसिल फ़ॊर  इंडियन  फ़ॊरेन पॉलिसी Reviewed by Kavita Vachaknavee on Saturday, November 22, 2008 Rating: 5

6 comments:

  1. अच्छा आलेख, आभार.

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  2. आपके आलेख से पूर्ण सहमति है। कंप्‍यूटर और इंटरनेट पर हिन्‍दी की ताकत बखूबी उभर कर आ रही है। हिन्‍दी इतनी अपरिहार्य होती जा रही है कि इसके आलोचक भी इसका इस्‍तेमाल कर रहे हैं।

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  3. सही है जिस दिन हमें भारतीय होने की वजह से सम्मान मिलेगा हम अपने आपको भारतीय कहने में गर्व अनुभव करेंगे ! और आज हम क्षेत्रीयता की बातो में ज्यादा उलझे हैं ! हिन्दी के विषय में आपने बिल्कुल सटीक और यथार्थवादी विचार रखे हैं ! मैं आपकी बातो से पूर्णतया सहमत हूँ ! बहुत सुंदर सटीक और यथार्थ परक लेख है ! बहुत बहुत धन्यवाद और शुभकामनाएं !

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  4. “जब भारत एक सुदृढ़ भारत बनकर विश्व के मानचित्र पर उभरेगा तब शायद हम गर्व से कहें कि हम भारतीय हैं।” यह बात ठीक तो है लेकिन वह काल्पनिक दिन कब साकार रूप लेगा और कैसे? यह विचार किया जाना जरूरी है। यह आलेख इस दिशा में एक सार्थक प्रयास करता है। हमें राष्ट्रनिर्माण की लम्बी प्रक्रिया से गुजरना होगा। सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

    हिन्दी ही भारत को एकता के सूत्र में पिरो सकती है। सारथी वाले शास्त्री जी (J.C.Phillip)का यह जुमला हमें मन में बिठाना चाहिए।

    हम यदि राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर राष्ट्रव्यापी एकस्वर उठाने और आम सहमति बनाने के बजाय क्षुद्र राजनीति से प्रेरित होकर बिहारी-मराठी के मुद्दों पर झगड़ते रहेंगे, आतंकवाद से सीधी लड़ाई लड़ने के बजाय इसे हिन्दू या मुस्लिम ठहराने की कवायद में उलझे रहेंगे और सत्ता-लोलुप, अयोग्य चाटुकारों से घिरे पराये व्यक्ति के हाथ में देश की बागडोर सौंपकर उनकी राष्ट्र विरोधी नीतियों के सामने असहाय होकर हाय-हाय करते रहेंगे, तो शेष विश्व हमारा सम्मान क्यों करेगा?

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  5. " हिन्दी भाषा को लेकर कम्प्यूटर पर एक क्रान्ति का सूत्रपात हो चुका है। अब वे दिन दूर हुए कि आपका काम अंग्रेजी के बिना नहीं चलता था। अब तो केवल हिन्दी से ही आपका कार्य बहुत आसानी से होता है। आप बोलिए और कम्प्यूटर स्वतः ही हिन्दी में आपकी बात टाइप करेगा। "


    अन्य बातों के अलावा यह बात अत्यन्त सारगर्भित लगी।

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  6. जब देश आज़ाद हुआ तो लोगों के मन में एक देश का जज़बा था पर हमारे नेताओं ने अपने लाभ के लिए लोगों को अंग्रेज़ों की नीति पर ‘बांटो और राज करो’ की पालिसी अपनाई और धीरे-धीरे देश भाषा, धर्म, जाति, लिंग आदि के आधार पर बटता गया। अब स्थिति यह है कि एक ही भाषा के लोग भी दो पृथक राज्य मांग रहे है। यानि, एक ही भाषा[बोली] बोलने वाले भी मिल कर नहीं रह सकते। इस के ज़िम्मेदार कौन है, इसे बूझना कठिन नहीं है।
    अच्छे और चिंतनपरक लेख के लिए बधाई।

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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