मणिपुरी कविता : मेरी दृष्टि में - डॉ. देवराज

मणिपुरी कविता : मेरी दृष्टि में
- डॉ. देवराज


नवजागरणकालीन मणिपुरी कविता - १८



हमारी गुलामी का मुख्य कारण थी अपनी आपसी फूट जिसके चलते अंग्रेज़ ‘फूट डालो राज करो’ की राजनीति चला कर सत्ता हासिल करने में सफल हो सके। मणिपुर के कवियों ने इस बात को समझा और अपनी लेखनी से वैचारिक क्रांति लाने में सहयोग दिया। उस समय की लेखनी का जिक्र करते हुए डॉ. देवराज जी बताते हैं :

"आधुनिक ज्ञान के प्रवेश और वैचारिक क्रान्ति ने ही नवजागरणकालीन कवियों का ध्यान आपसी फूट की ओर भी दिलाया। उन्होंने आह्वान किया कि अपने आनेवाले कल की भलाई के लिए हमें आपसी बैर-भाव को भुलाना चाहिए:

बढा़ओ मित्रता कल की भलाई हेतु
निर्बल पक्षी बचने का करो प्रयास हाथों से पक्षी के
मुंह में रखॊ दबा कर फल सुबह-शाम के लिए

- हिजम अङाङ्हल

" कवि का यह आह्वान उस समय के सामाजिक और राजनीतिक जागरण की गवाही देता है। इसमें अप्रत्यक्ष रूप से साम्राज्यवादियों की ‘फूट डालो राज करो’ नीति का विरोध झलकता है। एकता और मित्रता का यह आह्वान अङाङ्हल के उपन्यास [जहेरा] में दो टूक शब्दों में किया गया है - "हम हिंदू-मुसलमान, भाई-भाई एकता के सूत्र में बंध कर एक-दूसरे के क्रोध को शांत करके और एक दूसरे की उद्दण्डता पर अंकुश लगा कर भारतमाता के पैरों में पडी़ लोहे की जंजीर को तोड़ दें...।" बहुत थोडी़ संख्यावाला मुस्लिम समुदाय यहाँ प्रेम और सौहार्द से निवास करता था।
"यह एक विशेष प्रकार का राष्ट्रीयताबोध था, जिसके विकास की पृष्ठभूमि थी, समाज सुधार, मानवीयता, मैत्री का प्रय़ास और स्वार्थ व शोषण का विरोध।

रहने वाले दूर या निकट
बडे़ या छोटे
विचारें, मैतै-चनु की हैं सन्तान
टूट न जाए पुष्प माला
देश के पुत्रो, मातृ सेवकों
संजीवनी को स्वार्थ त्याग की
रोप दो चारों ओर मंदिर के
करो कामना मैतै-चनु की दीर्घायु की।

[लमाबम कमल]"

( .....क्रमशः )
प्रस्तुति : चन्द्रमौलेश्वर प्रसाद



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