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शून्य से शिखर तक की यात्रा



शून्य से शिखर तक की यात्रा - लालबहादुर शास्त्री

मनोज कुमार श्रीवास्तव


स्वतंत्रता के बाद जिन महान नेताओं ने अपने त्याग, तपस्या, व्यक्तित्व और राजनीतिक चेतना से जनमानस को प्रभावित किया था, उनमें लाल बहादुर शास्त्री का नाम बडी़ श्रद्धा से लिया जाता है। २ अक्टूबर १९०४ को मुगलसराय में एक शिक्षक मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव के घर उनका जन्म हुआ। जब वे डेढ़ वर्ष के थे, तब ही उनके पिताजी का देहान्त हो गया। दस वर्ष की अवस्था तक उनका लालन-पालन उनके नाना ने किया। बाद में बनारस के हरिश्चन्द्र स्कूल में शिक्षा ग्रहण की। यहाँ से निकल कर वे काशी विद्यापीठ गए जहाँ से उन्होंने शास्त्री की उपाधि प्राप्त की।

माँ रामदुलारी और अध्यापक निष्कामेश्वर ने उन्हें शिवाजी और महाराणा प्रताप जैसे वीरों की कहानियाँ सुनाकर उनके मन में देशभक्ति की भावना उत्पन्न कर दी। गरीबी में भी उन्होंने अपने आत्मसम्मान का साथ कभी नहीं छोडा़।

शास्त्रीजी जब ५-६ वर्ष के थे, तो एक दिन स्कूल की छुट्टी के बाद अपने साथियों के साथ लौट रहे थे। रास्ते में सभी साथी बगीचे में घुसक्रर आम तोड़ रहे थे। शास्त्रीजी भी बाग में घुसे लेकिन उन्होंने आम न तोड़कर एक गुलाब का फूल तोड़ लिया था। इतने में माली आ गया जिसे देख कर सभी बच्चे भाग गए। शास्त्रीजी वहीं खडे रहे। माली ने उन्हें पकड़ लिया और गाल पर एक तमाचा जड़ दिया। शास्त्रीजी रो पडे़ और माली से बोले- ‘तुम्हें मालूम नहीं कि मेरे पिताजी नहीं है?’ इतना सुनकर माली ने एक और थप्पड़ उनके गाल पर जड़ दिया और कहा- ‘फिर तो तुम्हें कडी़ सज़ा मिलनी चाहिए, क्योंकि तुम्हारे पिता नहीं हैं तब तो तुम्हें सबसे अच्छा लड़का बनना चाहिए।’ इस घटना ने शास्त्रीजी के बालमन पर अमिट छाप छोडी़।

१९२६ में शास्त्रीजी भारत सेवक संघ के सदस्य बन गए और मुज़फ्फरनगर में हरिजन उद्धार के रूप में सार्वजनिक कार्य शुरू कर दिया। यहाँ से उनकी सामाजिक एवं राजनीतिक लम्बी यात्रा प्रारम्भ हुई। १९४६ में वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत के संसदीय सचिव बने और बाद में मंत्री बनाए गए। १९५१-५६ तक वे केंद्रीय रेल मंत्री रहे। दो रेल दुर्घटनाओं की ज़िम्मेदारी खुद पर लेते हुए, उन्होंने मंत्री पद से त्याग पत्र दे दिया।

१९६४ में नेहरूजी की मृत्यु के बाद प्रधानमंत्री का ताज उनके सिर पर रखा गया। इनके काल में १९६५ का भारत-पाक युद्ध हुआ। ‘जय जवान, जय किसान’ के उनके नारे ने देश में उत्साह भर दिया। उस युद्ध में भारत की शानदार विजय हुई। उनका १८ महीने का शासन, स्वतंत्रता के बाद का सर्वोत्तम काल माना जाता है।

आखिर शास्त्रीजी के पास ऐसे कौन से हथियार थे, जिनकी सहायता से वह देश की समस्याओं और चुनौतियों पर विजय प्राप्त करते हुए लगातार आगे बढ़ते गए! वे हथियार थे - कठोर परिश्रमशीलता, आदर्शवादिता, सत्यनिष्ठा, ईमानदारी, साहस, बौद्धिकता, त्याग भाव, मितव्यता, सरलता, उदारता और प्रगाढ़ देशभक्ति।

रूस के आग्रह पर पाकिस्तान से बातचीत के लिए शास्त्रीजी ताशकन्द गए। वहाँ आपका निधन ११ जनवरी १९६६ को हुआ। मरणोपरांत उन्हें देश का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया।

प्रस्तुतिः चंद्र मौलेश्वर प्रसाद
शून्य से शिखर तक की यात्रा शून्य से शिखर तक की यात्रा Reviewed by Kavita Vachaknavee on Thursday, October 02, 2008 Rating: 5

4 comments:

  1. एक प्रेरक और सादगी भरे व्यक्तित्व से मिलवाने का धन्यवाद।

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  2. बड़े शौक से लाल बहादुर शास्त्रीजी के बारे में पढ़ने को इस पेज को खोला, पर गहरे रंग के आधार और लेखन के कारण पढ़ने में बड़ी असुविधा हुई। इसका रंगसंयोजन ठीक कर दें तो अच्छा रहेगा।

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  3. संगीता जी, लगता है कि आपके कम्प्यूटर पर रंग संयोजन गहरे पर सेट किया हुआ है। आप के अतिरिक्त किसी को आज तक यह असुविधा नहीं हुई है। आपने एक बार पहले भी यही बात लिखी थी। किसी किसी पी.सी.अथवा लैपटोप पर मूल रंग से बहुत अन्तर दिखाने वाली रंगों की सेटिंग्स् होती हैं, कृपया उसे जाँच लें।

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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