एक चुप्पी क्रॉस पर चढ़ी (५)

गतांक (४) में आपने पढ़ा -

भैया ने जाने के तीसरे ही दिन बाद ख़त डाला था, अमि के नाम, जिसमें जिक्र था कि वे बम्बई में ही अपने एक इंजीनियर दोस्त के पास पवई के होस्टल में रुके हुए है।


अब आगे पढ़ें ..
एक चुप्पी क्रॉस पर चढ़ी ()
प्रभु जोशी


कुछ दिनों बाद ही भैया ने अमि के लिए एक उपहार भेजा था। पापा ने उसे उठा कर खिड़की के बाहर फेंक दिया था। अमि रोने लगी थी, तो शाम को पापा ऑफिस से लौटते समय उसके लिए ढेर सारे स्कर्ट व कुर्तियों के पीसेज़ उठा लाये थे। और बाद इसके पापा हमेशा लाने लगे थे, कुछ न कुछ। अमि को खुश करने के लिए। मगर अमि को वे तोहफ़े कभी अच्छे नहीं लगे। उसे हमेशा लगता, जैसे पापा के द्वारा लायी गयी इन तमाम चीज़ों में, उनका तनाव और उनका निर्मम पितृत्व लिपटा है। उनकी संजीदगी और गुस्सा लिपटा है। फ़्रॊक से चल कर, इस वर्ष से वे साड़ियाँ लाने लगे हैं। उसे इन तोहफ़ों के बदलाव से अपनी बढ़ती उम्र का एहसास होने लगा है। मसलन अब वह बच्ची नहीं, बड़ी हो गयी है। अमि को लगता है ठीक इसी प्रकार साड़ियाँ लाते-लाते पापा उसके लिए ऑफिस से लौटते समय एक दिन कोई लड़का ला देंगे, संजीदगी व गुस्से से भर कर, `कर लो इससे शादी......। आय’म गिफ्टिंग यू अ ब्राइडग्रूम !..... देट्स ऑल !’

मगर, ऐसा नहीं हुआ। पापा में धीरे-धीरे बदलाव आता गया। चेहरे पर की संजीदगी का थक्का कभी-कभी पिघलता दीखने लगता। पापा कभी-कभी एकाएक बहुत खुश लगते। कई बार पापा के इस बदलाव की छाया के पीछे छुपे कारणों को जानने की तीव्र उत्कण्ठा ने अमि को काफी हद तक बेचैन बनाया है। भला ऐसा क्या काम्प्लेक्स या कन्फ्लिक्ट रहा होगा पापा व भैया के बीच, जो पापा ने उनको एकदम काट कर अलग फेंक दिया, जैसे हम फेंक देते हैं, त्वचा की भीतरी सतहों के भीतर से उगने वाला टूटा बाल या कि नाख़ून का सिरा। क्या पापा भैया की अनुपस्थिति से वाकई ख़ुश हैं ? कौन बतायेगा ? किससे पूछेगी यह सब? अमि बेकल हो उठती।

और आखि़र धीरे-धीरे अपने आप ही उम्र की यात्रा के ठहराव का ऐसा फोकल-प्वाइंट आ गया, जहाँ खड़े हो कर अमि को सारा यथार्थ एकदम साफ व उजला दीख गया। अब वह पूरी तरह इतने लम्बे समय से प्रश्नचिन्ह बनी आ रही स्थिति को बड़ी सरलता से समझ चुकी थी। ममी की पापा से दूसरी शादी थी व भैया पहली शादी के थे। यह जान कर अमि को एकाएक ऐसा पहली बार लगा था, जैसे वह अचानक सयानी और बड़ी हो गयी है। बड़ी व अकेली। पापा व भैया के होते हुए भी अकेली। भैया ने एक दिन अवसादग्रस्त आवाज़ में, आँसुओं को पलकों के भीतर ही रोक कर कहा था-‘अमि, कभी-कभी माँ को याद करते हुए लगता है कि मुझे इतनी ममतामयी माँ देकर ईश्वर ने कुछ ज़्यादा ही दे दिया- और बाद देने के ईश्वर को लगा होगा कि वह उतावली में कुछ अधिक उदार हो गया है, नतीज़तन उसने मुझसे माँ को वापस छीन लिया- बस यही समझ लो तुम।’

खट.... खट्..... खट्..... खट्....। शायद पापा अमि के कमरे की ओर चढ़े चले आ रहे थे। उसे समझ में नहीं आ पा रहा था कि अब वह क्या करे ? खिड़की में खड़ी-खड़ी इसी तरह बाहर देखती रहे या फिर बालों में कंघी करने लगे या चुपचाप यों ही खड़ी रहे। क्या वह पापा की उन तीखी नज़रों का सामना कर पायेगी ? इतने में पापा आ ही गये। अमि अपराधी मन में आतंकित भाव लिये फ़र्श की ओर ताकती रही। वहाँ एक चींटी सरकती चली जा रही थी।


चींटी सरकती गयी। क्षण भी सरकते गये। मगर पापा वहीं ठहरे रहे। इतने क्षणों तक कुछ भी नहीं बोले। ‘‘अमि, तुम्हारा कमरा कितना गंदा हो रहा है। रम्मी से कह के साफ करवा लो।’’ एक विराम के बाद यह वाक्य उगला और टैरेस की ओर मुड़ गये। अमि ने सोचा, भाषा, पापा और उसके बीच कितना छोटा पुल बनाती है। छोटा और अस्थायी कि अपने उपयोग के बाद अपने आप ही समाप्त हो जाता है। अमि ने अपने कमरे पर एक नज़र डाली। ग़ालिबन मुआयना कर रही हो। उसका पूरा कमरा साफ व व्यवस्थित ही तो है।

मगर, पापा को पुलिसवालों की-सी व्यवस्था चाहिए। पापा टैरेस की ओर मुड़े। अमि झट से नीचे उतर आयी। लेकिन, कुछ क्षणों के बाद ही पापा भी नीचे आ गये। अमि ऊपर जाने का रुख करने लगी, तो पापा बोले, ‘‘खाना लग गया है। पहले खाना खा लो।’’ एक विराम के बाद यह वाक्य उगला और अंदर ड्राइंग रूम की ओर निकल गए।


अमि ने चाहा कि वह कह दे, ‘‘पापा, मुझे अभी भूख नहीं है।’’ मगर चाह कर भी कुछ नहीं कह पायी। चुपचाप वॊश -बेसिन का नल खोल कर हाथ धोने लग गयी। हाथ धोते हुए सोचने लगी। वह इतना छोटा-सा प्रतिकार भी क्यों नहीं कर पाती ? ज़्यादा से ज़्यादा पापा का चेहरा तनाव भरा हो जाता। या डाँट देते। और अच्छा ही होता न यह सब। पापा का डाँटना पिछले समय से चले आ रहे तनाव को इस हद तक खींच देता, जहाँ आकर वह टूट भी सकता था।

अमि के भीतर कभी-कभी इसी तरह के प्रतिरोधों के ख़याल की लौ उठती है, जो लपट बनना चाहती है। वह ख़ुद को उकसाती भी है कि वह क्यों नहीं इस घर की दीवारों को तोड़ कर बाहर निकल जाती- जैसे कि परिन्दों के चूज़े तोड़ देते हैं, अण्डे की दीवारों को- पर, ऐसे ख़यालों की लौ धीरे-धीरे धुँधुआने लगती है। फिर चुपचाप बुझ जाता है, सब कुछ। अमि हाथ धोकर डाइनिंग-टेबुल के सामने बैठ गयी। पापा ड्राइंगरूम से लौट कर उसके सामने की कुर्सी पर बैठ गए। फिर खाना खाते हुए पापा बोले, ‘‘अमि बेटे, ख़ुद को सँभाल कर रखो। देख रहा हूँ, तुम दिन-ब-दिन बीमार-बीमार और सुस्त होती जा रही हो।’’ अमि ने पापा के मुख से ‘बेटा’ सम्बोधन सुनकर बहुत धीमे से सिर उठा कर उनकी ओर देखा। पापा का चेहरा पहली बार उसे इतना सपाट व निर्विकार लगा। ऐसा चेहरा देख कर उसे कॉलेज की लेबोरेटरी का वह फ्लास्क याद हो उठा, जो बाहर से सख़्त लेकिन भीतर कण-कण में टूट जाने वाले शीतल द्रव से भरा है। पापा के प्रति न चाहते हुए भी वह सहानुभूति से भर उठी। अमि की इच्छा होने लगी, देखे एक बार उस भीतर के द्रव को छूकर तो देखे। मगर, वह बाहर की सख़्ती की कल्पना से ही डर कर रह गयी। ‘बेटे’ सम्बोधन की अनुगूँज भी उसे फलाँग कर पापा के निकट जाने के लिए वाँछित हिम्मत नहीं भर पाई।

रम्मी ने एक चपाती और परोस दी। वह खाती रही। चुपचाप। प्लेट की चपाती ख़त्म हो गयी, तो दूसरी उठायी भी नहीं। और रम्मी ने आवश्यकता न होने पर भी रख दी, तो मना नहीं किया। अंत में उठ गयी। चढ़ कर फिर अपने कमरे में बंद हो गयी। फिर कॉलेज से लायी गई किताब में से एक कहानी पढ़ने की कोशिश की। मगर, उसमें भी ख़ुद को ज़्यादा देर तक न डुबो पायी। अमि को लगा, वह बरसों से उदास और चुप है तथा अब उदासी इतनी गहराई पकड़ चुकी है कि कम से कम पापा के साथ रहते हुए तो वह जनम भर न हँस सकेगी....। ग़ालिबन, अब वह हँसी को ग़ुमशुदा चीज़ों की फेहरिस्त में दर्ज़ कर चुकी है।

ऐसे समय में उसे भैया पर भी गुस्सा आता है। वे क्यों नहीं उबार लेते इस अंधेरे तहख़ाने से? क्यों नहीं लिख देते कि अमि, तू, यहाँ चली आ मेरे पास। बम्बई। पहली बार भैया का ख़त आया था, तब पापा का चेहरा कैसा-कैसा तो भी हो उठा था। अमि को लगा था अब तो वे उसे भी भैया की तरह पीट-पाट कर निकाल देंगे। तब वह क्या करेगी ? और उसने भीतर ही भीतर अपनी भीरूता को फलांगने की कोशिश में एक कमज़ोर निर्णय लिया था कि यदि पापा कुछ कहेंगे, तो वह भी बहस पर उतर आयेगी और कहेगी-‘पापा ये भाई-बहन के रिश्ते हैं। आप इसमें क्यों खाई पैदा करना चाहते हैं ?’ मगर, पापा कुछ नहीं बोले थे, तो उसने ख़ुद रह कर ही भैया को लिख दिया था कि आगे से ख़त वे उसके स्कूल के पते पर ही लिखा करें। और ख़त स्कूल से अब कॉलेज के पते पर आने लगे थे। स्कूल से कॉलेज तक की यात्रा के बीच भैया अपने ख़तों में वैसे ही थे। मगर, पापा बदल गये थे। अमि ने भैया को इस बदलाव का संकेत लिख भेजा था। मगर, भैया ने कोई भी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की थी। गोया उन्हें पहले से ही इस सारी परिणति का पता हो।

अमि सोचते-सोचते घुटने लगी, तो खिड़की पर खड़ी हो गयी। बाहर रोज़ की तरह धुँएली शाम उतर आयी थी। लॊन में कुर्सी डाले पापा व लोकेश बैठे बतिया रहे थे। अमि जब भी पापा व लोकेश को बातें करते देखती है, तो उसे लगता है, जैसे दोनों कोई भयंकर षड्यंत्र रचने में लगे हैं। लोकेश मिसेज नरूला के भाई का लड़का है। पिछले कुछ महीनों से यहीं है और अमि को घूर-घूर कर देखा करता है। अमि ने देखा, मिसेज नरूला भी लॊन में आकर एक खाली कुर्सी पर पसर गयी हैं। खिड़की में खड़े उसे देखा, तो मिसेज नरूला ने अमि को आवाज़ लगा ली, ‘‘अमिया, नीचे आओ न !’’ अमि बहुत अरूचि से नीचे पहुँच गयी। अमि को यह मार्क करके बहुत खीझ होती है कि ये मिसेज नरूला हमेशा ही पापा की ओर कैसे-कैसे तो भी देखा करती हैं ! हँसती भी तो कैसी-कैसी हैं ! मिसेज नरूला को हँसते हुए देखकर उसे हमेशा लगता है, जैसे प्रकृति किसी से जन्म के साथ ही कुछ चीज़ें निर्ममता से छीन लेती है। और, प्रकृति ने मिसेज नरूला से, जो चीज़ छीनी है, वह है, हँसी की निश्छलता। और पापा भी मिसेज नरूला की उपस्थिति में एकदम अजनबी व अनपहचाने-से लगते हैं। वह तअज़्जुब से घिर जाती है कि क्या पापा का मूँछोंवाला चेहरा इतना कोमल-कोमल व प्यारा भी लग सकता है ?

अमि चुपचाप रम्मी द्वारा लाये गये एक मोढ़े पर बैठ गयी।

मिसेज नरूला कह रही है, ‘‘अमिया, भई तुम कितनी रिज़र्व्ड नेचर की हो। बिल्कुल मिस्टिक-रिक्लूज़। घर से कॉलेज और कॉलेज से घर। चलो, आज शॊपिंग कर आओ, लोकेश के साथ।’’ मिसेज नरूला का यह वाक्य सुन कर अमि का चेहरा विकृत हो आया। भीतर से इच्छा हुई कि कह दे-‘भला आप मेरे लिए इतनी चिंतित क्यों हैं ? मुझे नहीं जाना शॊपिंग के लिए।’ क्या करूँगी कुछ ख़रीद कर। सब कुछ तो भरा है, मेरी अल्मारियों में। और दरअसल, जिस चीज़ की मुझे ज़रूरत है, उसके लिए शापिंग नहीं होती।’

अमि ने पापा की ओर देखा।

पापा की विस्फारित आँखों में लिखा पाया, एक सख़्त आदेश कि हो आओ और वह कपड़े बदल कर लोकेश के साथ चली गयी। सारी शाम लोकेश की बदबूदार पसीने से लथपथ पीठ से सटी स्कूटर पर घूमती रही। लोकेश ने कुछ सामान दिलवाया, तो अरुचि से पैक करवा लिया। बोली एक भी शब्द नहीं। भीतर ही भीतर उसका मौन तराशता रहा, उसके लिए कुछ शब्द, जिन्हें वह संकट की स्थिति में शस्त्र की तरह इस्तेमाल कर लेगी। शब्द भी शस्त्र होते हैं और उनके जरिए ही खींची जाती है। लक्ष्मण रेखाएँ।

पूरे समय अलगाव की तीव्र यातना भोग कर लौटी, तो पापा रसोई में थे। पापा का चेहरा अतिरिक्त प्रसन्न था। वे ख़ुद रम्मी के पास खड़े होकर गरम-गरम पकौड़े उतरवा रहे थे। अमि को देखते ही बोले, ‘‘अमि तुम्हें ये खूब पसंद हैं न ! आज मैंने तुम्हारे लिए ख़ुद खड़े रह कर बनवाये हैं। खाओगी न !’’ अमि क्षण भर को, यह दृश्य, पापा का यह वाक्य, यह आग्रह, देख कर स्तंभित रह गयी। अमि की समझ में ही न आया कि इन क्षणों में वह क्या करे ? खूब ज़ोरों से हँसना शुरू कर दे या कमरे में जाकर फूट-फूट कर रोना। उसे लगा, लेबोरेटरी का वह सख़्त फ्लास्क आज अचानक टूट गया है और वह उसकी ममताली तरलता में सराबोर हो उठी है। अमि ने ख़ुद को कोसा कि भला वह कितनी मूर्ख है, जो पापा से जानबूझ कर डरी-डरी व दूर रही। उनका इतना प्यार न पा सकी। पापा कितने प्यारे हैं ! अमि के आनन्द का यह एक अकल्पित चरम बिन्दु था। उसका मन होने लगा, शहर के सबसे ऊँचे मकान की छत पर चढ़ कर ज़ोर-ज़ोर से खिल खिलाकर हँसे। हाँ, खूब ज़ोर से। आकाश की ओर मुँह करके।

मगर, जब डाइनिंग टेबुल पर बैठे, तो पापा ने रम्मी से कह कर लोकेश व मिसेज नरूला को बुला लिया। अमि को लगा, जैसे अचानक गर्म काँच पर किसी ने पानी की बूँदें छींट दी हैं। कुछ क्षणों पहले पापा के विषय में उपजे ख़याल टूट कर छार-छार हो गये। उसे पापा के चेहरे पर रिसती आत्मीयता मात्र एक वहम लगी। एक स्पष्ट धोखा। पापा वही हैं। एकदम वही। अमि से अनकंसर्ड, अनलिंक्ड और षड्यंत्रकारी। अमि वापस ख़ुद की पहली स्थिति में लौट आयी। लोकेश व मिसेज नरूला ठहाकों के साथ पकौड़े खाते रहे। अमि को लगता रहा, यह सब अमि के लिए नहीं था, इनके लिए था। लोकेश व मिसेज नरूला के लिए। वह सोचने लगी, क्या उसके तमाम सुख ऐसे ही होते हैं कि उनके आखि़री सिरे से लटकता रहता है कोई न कोई अचीन्हा दुःख ?

अमि दो-चार पकौड़े उगल-निगल कर उठ गयी।
अमि सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर आ गई।
कमरा खोला तो अंधेरा उससे ऐसे लिपट गया, जैसे वह उससे लिपटने के लिए बहु-प्रतीक्षित हो। वह कमरे में बत्ती जलाए बिना खड़ी रही, जैसे अंधेरे को अनुमति दे रही हो कि वह उससे जितना लिपटना चाहे लिपट ले। वह चाहे तो उसकी देह के रन्ध्र-रन्ध्र में उतर कर उसकी आत्मा को भी लील जाए। बाद इसके बिस्तरे पर पड़ी-पड़ी पता नहीं कब तक रोती रही। काफी देर बाद उठ कर देखा, तो लॊन में ड्राइंग-रूम में जलती बत्ती के प्रकाश का हाशिया चुपचाप घास पर उसी तरह लेटा था। और अब केवल आ रही थीं, कुछ आवाज़ें, जिनमें शब्द थे, ध्वनि थी, मगर अर्थ नहीं थे। अमि को लगा, उसकी संवेदनाओं की गीली ज़मीन पर कोई भयंकर तीखी चीज़ घसीट रहा है। फिर पता नहीं, अमि कब सो गयी। अब सिर्फ सन्नाटे को गाते झींगुर- भर जाग रहे थे।

क्रमश:



आगामी अंक () में पढ़ें
आँख खुली, तब सुबह हो चुकी थी। धूप चढ़ने लगी व चढ़ती चली गयी। मगर अमि नहीं उठी। रम्मी ऊपर आकर आवाज़ देने लगा। उसके जी में आया कि वह जवाब ही न दे और न ही दरवाज़ा खोले। आखि़र उठना ही पड़ा। झुंझलाहट में भरकर सिटकनी हटायी.....





2 comments:

  1. प्रभु जोशी का वर्णन सशकत है. आगे के अंकों का इंतजार रहेगा -- शास्त्री

    ReplyDelete

आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

Comments system

Disqus Shortname