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एक चुप्पी क्रॉस पर चढ़ी - प्रभु जोशी (३)

गतांक से आगे
(३)
एक चुप्पी क्रॉस पर चढ़ी
- प्रभु जोशी


कँघी उठा कर काफी देर तक यों ही उसे अपने घने और लम्बे बालों में घुमाती रही। अक्सर, अमि छुट्टी के दिन ऐसा ही करती है। रोज़मर्रा के अपने छोटे-छोटे कामों को अनावश्यक रूप से लम्बा करके उनमें ख़ुद को न चाहते हुए भी उलझाये रखती है। एक बार छुट्टी के दिन रोज़ की तरह ज़ल्दी निबट गयी थी, तो लगने लगा था कि दिन इतना लम्बा हो गया है कि शाम का इंतजार करते-करते तो वह पागल हो जायेगी। इस प्रकार का अनुभव करने का एकमात्र कारण पापा के सामने ज्यादा देर तक पड़ते रहना ही था। आज छुट्टी है। इसलिए अमि को यह दिन कल से ही बड़ा भयंकर व अनावश्यक रूप से लम्बा लग रहा है। उसने सोचा, आज का पूरा दिन बंदूक के सामने खड़े किसी शिकार की-सी घोर मानसिक यंत्रणा के बीच बीतेगा। लेकिन, उसने निष्कर्ष निकाला कि उसकी स्थिति तो शायद उस शिकार से भी बदतर है, क्योंकि, शिकार के लिए तो कुछ क्षणों बाद
ही ‘ठाँय’ होता है। और हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति ! एक चैन ! सब कुछ प्रलय। मगर, उसे तो हर क्षण मरते रहना पड़ता है। जीते हुए मरते रहना पड़ता है। उसे तब प्रगति पुस्तक भण्डार से ख़रीदी गई एक किताब का संदर्भ याद आया, जिसमें रूसी ज़ार द्वारा मोबेली नाम के एक शख़्स को सुबह गोली मार दी जानी होती है, तो रात भर में उसके सारे बाल सफेद हो गये थे। वह अपने इतने घने और लम्बे बालों के एकाएक सफेद हो जाने की कल्पना करके घबरा-सी उठी थी।......


अपनी स्थिति को इतने दयनीय निष्कर्ष की गोद में डाल कर वह ख़ुद के प्रति उपजी आत्मदया में भर कर काफी भावुक हो उठी। उसे लगा, उसके अंदर कोई एक और अमि है, जो उसकी स्थिति को हमेशा अतिरिक्त आत्मीयता और सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण के साथ देखती है। ख़ुद की स्थिति का ऐसा विश्लेषण करने पर दोहरे व्यक्तित्व की उपस्थिति का एहसास अमि को भीतर तक असहज बना गया। आखि़र, उसमें यह दूसरी अमि कौन है ?हाँ, कौन है ? अंदर एक कुनमुनाती आवाज़ मन की भीतरी दीवारों से एक अनुगूँज की तरह
टकराने लगी....


बहरहाल, ठीक इस वक्त बँगले के पार्टीशन के उस पार के कमरों में भी टकरा रही थीं, दूसरी आवाज़ें..... प्रतिध्वनित होती, आवाज़ें जो पापा की व लोकेश की थीं। उसने कभी उनको सुनने की कोशिश नहीं की। करती भी नहीं कि पापा व लोकेश क्या बातें करते हैं ? उसे याद आया, घर का यह पार्टीशन भैया की अनिच्छा से हुआ था। पार्टीशन को लेकर पापा व भैया के बीच काफी कुछ अघट-सा घट गया था। तब उसने कुछ ख़ास नहीं समझा था कि पापा व भैया के बीच भी पार्टीशन थे। हज़ार-हज़ार पार्टीशन। भैया खूब नाराज़ होकर अपने एक दोस्त के पास बम्बई चले गये थे। और उनके जाने के एक हफ़्ते बाद ही पापा ने आधा फ्लैट किराये पर उठा दिया था, मिसेज नरूला के लिए......। अमि को लगा, भैया के ख़यालों का भीगा फाहा, उसे मन की भीतरी गहराइयों तक तर कर गया है। अमि उदास हो उठी। भैया के विषय में सोच कर उदास होते समय पापा उसे हमेशा एक बेहद क्रूर व षड्यंत्रकारी व्यक्ति लगते रहे हैं, जो बुनता रहता है, रेशम के कीड़े की तरह कोई तन्तु। एक दिन भैया के संदर्भ में वे जैसे ख़ुद से जूझते हुए बड़बड़ाये थे-‘साला आखि़र, अपनी उस कमीनी व धोखेबाज़ माँ की तरह ही निकला।’ ममी के लिए पापा इतने गंदे शब्द भी इस्तेमाल कर सकते हैं, उसने पहली बार सुना था।

क्रमश:>>>>>
आगामी अंक में समाप्य
एक चुप्पी क्रॉस पर चढ़ी - प्रभु जोशी (३) एक चुप्पी क्रॉस पर चढ़ी   -  प्रभु जोशी  (३) Reviewed by Kavita Vachaknavee on Wednesday, October 08, 2008 Rating: 5

1 comment:

आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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