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एक चुप्पी क्रॊस पर चढ़ी

भाग २
एक चुप्पी क्रॉस पर चढ़ी
- प्रभु जोशी

उसने खिड़की में से झाँक कर नीचे देखा। पापा अब लाॅन की धूप में चेयर पर पसरे हुए थे। हाथों में, लॊन के पीले गुलाब से तोड़ा गया ताज़ा फूल था। और धीरे-धीरे पापा की लम्बी व सख़्त अँगुलियाँ उसकी एक-एक पँखुरी को उधेड़ रही थीं।अमि डाइनिंग टेबुल पर पापा के साथ खाना खाने बैठते समय प्लेटों में चलती उनकी उन लम्बी व सख़्त अँगुलियों से ऊपर नज़र नहीं ले जा पाती। पापा की अँगुलियाँ देख उसे हमेशा दहशत होती है। जैसे, वे पिस्तौल के ट्रिगर पर रखी हुई हैं। थोड़ी-सी भी हरकत हुई कि धड़ाम्..... यहाँ तक कि उनकी पेन थाम कर काग़ज़ पर लिखती अँगुलियों से भी उसे डर लगता है कि इधर उन्होंने साइन किया कि उधर किसी पर गोली चालन हो जाएगा। कोई नौकरी से बरख़ास्त हो जाएगा या फिर किसी की कलाई में हथकड़ी पड़ जाएगी ।अमि ने बहुत धीमे से खिड़की बन्द कर दी।बालों को फिर से निचोड़ कर झटके से फैला लिया। फिर अपने कमर को छूने वाले लम्बेबालों के साथ एक सूखा-सा टाॅवेल लपेट कर ढीला-सा जूड़ा बना, अपने कमरे के सामने टैरेस पर धूप में आ कर पसर गयी। उसके इन बालों को लेकर पापा ने एक दफा खाना खाते वक्त कहा था कि वह इन्हें कटवा लें। अभी से अधेड़ औरतों की तरह जूड़ा बाँधना भला नहीं लगता। पापा के कथन का स्वर सलाह नहीं, सिर्फ आदेश का ही होता है- वह कैसे कहे कि उसे अपने लम्बे बालों से प्यार है, परन्तु पापा के समक्ष यह तर्क देने की जगह अमि ने वहीं डाइनिंग टेबुल पर ही फूट-फूट कर रोना शुरू कर दिया था, तो वे फिर कुछ नहीं बोले थे। चुपचाप उठ गये थे।अमि को अमूमन लगता है, पापा उसे जिस तरह स्मार्ट व फारवर्ड बनाना चाहते हैं, उलटी वह उतनी ही अधिक भीरू और सुस्त होती जा रही है। पता नहीं, कितने दिनों से पापा व अमि के बीच तनाव भरा है। उसने कई बार बड़ी शिद्दत से चाहा भी कि वह इस तनाव को फाड़ फेंके। चिंदी-चिंदी कर दे। मगर, दूसरे ही क्षण अमि के इस निश्चय को पापा के संजीदा-संजीदा चेहरे के रेशे-रेशे से झाँकती तनाव की तपन मोम की तरह पिघला देती।फिर यह तनाव टूटेगा तो आखि़र कैसे टूटेगा ? कब टूटेगा ? पता नहीं क्यों पापा शुरू से उसे आपाद मस्तक तनाव के आदमक़द प्रतिरूप लगते हैं। काॅशन देती कठोर आवाज़। कलफ लगी वर्दी और कैप के साथ शायद जैसे पापा के ओहदे की अर्हता बनी रही है, उनकी मूंछें। चित्र में उनकी मूंछें देखकर भैया ने एक बार कहा था-‘इन मूंछों को देखकर भ्रम होता है कि शायद विश्वयुद्ध रूका नहीं, अभी भी चल रहा है।’ नीचे से पापा की आवाज़ें आने लगी थीं। शायद वे लाॅन से उठ कर रसोई में आ गये थे।और रम्मी को खाना पकाने सम्बन्धी हिदायतें दे रहे थे। फिर देर तक उसने कुछ नहीं सुना। काफी देर से टैरेस पर बैठे रहने से धूप तेज लगने लगी थी। अमि उठकर कमरे में आगयी। और धूप ज़रूर टैरेस पर छूट गई थी, लेकिन उसकी धीमी-धीमी आँच अभी भी देह में थी, पीठ पर।कमरे में आते ही उसने अपने कामों के विषय में सोचना शुरू किया। मगर काफी देर तक सोचते रहने के बाद भी उसे कोई काम याद नहीं आया तो ड्रेसिंग टेबुल के सामने जा पसरी ।
(क्रमश: >>>>> )
एक चुप्पी क्रॊस पर चढ़ी एक चुप्पी क्रॊस पर चढ़ी Reviewed by Kavita Vachaknavee on Tuesday, September 30, 2008 Rating: 5

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